Prabhu Shree
0:18
आप अभी आरती गा रहे थे ना उसमें एक वर्ड आया मैं ऐसे आ रहा था तो
0:30
ईस्ट इष्ट शब्द था। मेरे को वही चलते चलते ऐसा सेंस आया मेरा
0:39
इष्ट तो मैं ही हूं। मेरा इष्ट मैं ही हूं।
0:49
एकदम भाग हो गया। वह शब्द आया ना। फिर यह सेंस आया। मेरा इष्ट तो मैं ही हूं।
1:04
ऐसा कभी भी सुने हो इस धरती में कि मेरा इष्ट मैं हूं।
1:13
ये फर्स्ट टाइम है। मेरा इष्ट मैं हूं।
1:20
यह केवल आत्मनस्टिक ही कह सकता है। आप बोलोगे मेरा इष्ट तो यह है वह है वह भी
1:30
सुंदर है। बट ये कुछ बात ही और है।
1:44
तो
1:57
तो कोई मैं कुछ पढ़ता हूं तो वह खुद मेरे को बताता है। कभी कोई बुक आ गई, गीता आ गई या कुछ भी आ गया तो उसके शब्द मेरे को खुद
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बताते हैं उसके रहस्य को। कोई मंत्र है, कोई कुछ भी है।
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और मेरे को संस्कृत वस्कृत बिल्कुल नहीं आती।
2:34
हम मेरा इष्ट मैं ही हूं यार। खत्म बात बंद करो यह सब
2:44
चले अब क्यों
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एक लाइन पूरी उम्र जीने के लिए बहुत होती है।
3:03
एक लाइन बहुत होती है।
3:14
मैं फर्स्ट टाइम ही आया मेरे को ये अभी आया जस्ट आ रहा था मैं
3:23
फर्स्ट टाइम हां ये पूरे अस्तित्व में फर्स्ट टाइम है कि मेरा इष्ट मैं
3:34
यही डाल दो तो टाइटल में YouTube के
3:43
क्योंकि यार सच है ऐसा मैं अपनी बात कहूं तो मेरा इष्ट तो मैं ही
3:57
मैं सबका सम्मान करता हूं।
4:06
बट मेरा इष्ट तो मैं ही हूं।
4:32
तो मैं कल ये लोग मेरी पीठ दबा रहे थे। जोत है, सौरभ जी हैं और
4:41
तो मैं मजाक में इनको एक बात कह रहा था। क्या था वह कि
4:49
परमात्मा बाय द वे परमात्मा मेरे से भिन्न होता जो कि है नहीं
4:58
है ना क्या था यार वो परमात्मा अगर मेरे से भिन्न होता तो भी परमात्मा मैं अपने आप को ही मानता
5:06
हां हां हां बाय द वे परमात्मा अस्तित्व मेरे से भिन्न होता
5:14
है ना अलग ही होता तब भी मैं खुद ही को परमात्मा मान लेता जानता भी नहीं
5:25
क्योंकि अनदर गॉड अदर परमात्मा
5:31
वही भ्रम है। दूसरा परमात्मा में लोग भटके हैं। मैं
5:41
परमात्मा में कोई भटक के दिखा दे। परमात्मा कोई और है, कोई दूसरा है, अनदर
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है। अस्तित्व कोई और है। उसमें लोग भटके हैं। मैं अस्तित्व में कोई
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भटक के दिखा दे। मैं परमात्मा में कोई भटक के दिखा दे।
6:12
असंभव और आपका मैं ही परमात्मा है। और कोई परमात्मा हो कैसे सकता है?
6:26
तो अदर परमात्मा कभी मिलेगा नहीं क्योंकि वो आपके मन का है
6:37
काल्पनिक है और मैं परमात्मा भी कभी मिलेगा नहीं
6:45
क्योंकि वह मिला ही हुआ है इसलिए मस्त रहो चाय पिलाओ यार
6:55
अरे आदर परमात्मा कभी मिलेगा नहीं क्योंकि वो मन का है काल्पनिक है
7:04
सीखा सुखाया है धारणा में है मान्यता में है
7:11
और मैं परमात्मा मैं आत्मा भगवान भी कभी मिलेगा नहीं
7:19
क्योंकि वह आप ही हो मिलने की बात ही नहीं इसलिए मस्त रहो।
7:25
हां और कुछ नहीं रखा है यार। अध्यात्म अध्यात्म सब टाइम वेस्ट है।
7:59
असली अध्यात्म सबका स्वभाव है। एक्चुअल अध्यात्म। अब अध्यात्म वर्ड ना स्पिरिचुअल
8:07
स्पिरिचुअलिटी लोग खराब कर दिए। उसका गहरा सेंस जो है ना वह सबका स्वभाव
8:16
है। सर्व के स्वभाव को ही अध्यात्म कहते हैं।
8:35
अब वो सरल है, अघोर है। मैं हूं। मैं हूं से सरल क्या है?
8:44
आपके होने से सरल कुछ नहीं है।
9:11
बताओ यार कुछ सौरभ जी थोड़ा सा हम
9:19
हेलो हां आप एक बार में नहीं बोलते हो बताया करो
9:32
विषय तो स्वयं ही है।
9:42
स्वयं आत्मा उनको माइक दो यार। वो सही बोलते हैं। एकदम
10:00
आप उनको भेजो आगे आओ आगे
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बताओ कुछ कब तक हम ही बोलते रहेंगे
10:32
कल आप कुछ कह रहे थे मेरे को रात को कि एक को हम द्वितीय ना
10:39
और वहां एक बोलना भी लाइक के बाहर द्वितीय नास्तिक तक तो जाने का ही नहीं है। क्या बोल रहे थे कुछ ऐसा बताओ तो सही
10:48
बोल रहे थे आप ये
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गुरुदेव एक
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अक्सर पढ़ते आते अपन वेद के उपनिषद का महावाक्य है हम
11:16
अब मेरा होना जो है वो एक है।
11:29
तो इसका अनुभव में उतरना हम कि हां
11:36
मेरा होना जो है एक है हम और कोई दूसरा है ही नहीं।
11:45
हम
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तो तभी संभव है जब मेरे होने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। मेरा होना ही जो है
12:05
सबका होना हो तो ही मेरा एक होना सत्य है। हम
12:16
द्वितीय की तो बात ही नहीं होती है क्योंकि सर्वाधार फिर मैं ही हूं। हम
12:23
जो भी चराचर में है उसका अस्तित्व उनके अस्तित्व का अस्तित्व भी मैं ही हूं।
12:29
हम तो एक नाम में ही बात खत्म हो जाती है।
12:37
बल्कि कभी जरूरत नहीं है क्योंकि मैं ही हूं। हम
12:49
तो लिमिटलेस मेरा जो विस्तार है वो भी मैं हूं शद्रतम में भी मैं ही हूं
12:59
जो नहीं दिख रहा उसमें भी मैं हूं जो दिख रहा है उसमें भी मैं हूं मेरे से बाहर मेरे होने के बाहर कहीं कुछ है ही नहीं
13:06
भगवान
13:17
तो वो सत्य है हम
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क्योंकि जो कुछ भी हो रहा है घटित हो रहा है मेरे होने में ही हो रहा है भगवान उसके अतिरिक्त कुछ है
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ही नहीं मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं
13:54
ओके और मैसेज भिन्न भी कुछ नहीं है। मतलब देयर
14:03
इज नथिंग बसाइड्स मी देयर इज नथिंग व्हिच इज डिफरेंट फ्रॉम मी। यानी कोई चीज कोई भी घटना कोई भी चराचर
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में जो भी कृति है वो मेरे से अलग भी नहीं है तो भिन्न भी नहीं है वो नहीं हूं
14:21
हम ना भिन्न है ना अभिन्न है हां ना भिन्न है तो भिन्न अभिन्न
14:30
ना अलग है ना एक है सही है
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और ऐसा होना सहज में ही होना है। हां सहज में है ये स्वाभाविक है। नेचुरल
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ये सबको हटाओ तो ये शक्ल छिपाने वाले लोग मेरे को पसंद नहीं है। है ना? घुसने नहीं
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देना इनको। हटाओ। उसको वीडियो काहे के लिए किए हैं?
15:20
हम ठीक है रहने दो हां ऐसे देखते रहना चाहिए
15:33
खानावाना बना लेते हो क्या बीच में ऐसे बंद करके किचन विचन
15:46
हां तो सही बोल रहे हो आप
16:12
थोड़ी चाय और पिला दोगे क्या है इसमें?
16:14
पिलाओ।
16:35
थोड़ी सी शक्कर डाल देना तो यार बोलो तो ये दे दो उधर
16:43
तो मैं को एक कहना या शून्य कहना द्वैत अद्वैत कहना
16:50
द्वैता अद्वैत कहना उसको बांधना है। है ना?
17:00
या शून्य कहना या पूर्ण कहना भी बांधना है।
17:09
मैं मैं हूं। यह सबसे सरल है कि मैं मैं हूं। बस
17:18
उसको ना भगवान बोलो ना आत्मा ना मोक्ष ना कैवल्य ना देह ना मन
17:27
मैं मैं हूं बस यही अघोर है।
17:36
मैं मैं हूं। यह असली अघोर शिवत्व है।
17:49
मैं यह हूं वो हूं। ये सब माया जाल है। मैं
17:56
मैं हूं।
18:13
अब इससे सरल क्या है बताओ
18:22
कि मैं हूं
18:28
और आपकी प्रॉब्लम क्या है आपको क्या सुनना चाहते हो आप मालूम
18:38
मैं भगवान मैं अनंत हूं। अखंड हूं। आप यह सब सुनना चाहते
18:47
हो। बुद्धा हूं। मैं वो सब मायाजाल है।
18:54
अरे मैं मैं हूं बस। शरीर मन और यह सब तो हूं ही नहीं। और यह
19:01
जो भी आध्यात्मिक आप बोलते हो वह भी नहीं।
19:26
यस यह बनी ना चाय
19:39
मैं मैं हूं।
19:48
अरे साहब वो तो हम जानते ही हैं कि मैं मैं हूं। इसमें क्या रखा है? अब आपको कुछ
19:55
और ही चाहिए। है ना?
20:01
इसमें क्या है? मैं मैं हूं। जैसे ही आपने बोला इसमें क्या है? यानी आपने मैं को मैं
20:08
समझा ही नहीं। वो शरीर वाला मैं को समझ रहा हूं। है ये वो वाले को
20:32
जैसे परमात्मा आपसे कह के कहे कि मैं परमात्मा
20:43
उससे भी गहरा पॉइंट है यह कि मैं मैं हूं।
20:54
अब इस मैं में थोड़ा सा मिलाओ अभी फिलहाल परमात्मा को
21:00
कि परमात्मा कह रहा है ऐसे कहो।
21:06
परमात्मा कह रहा है कि मैं मैं
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तो तुरंत चार आ जाएगा। अस्तित्व कह रहा है एकिस्टेंस कि मैं
21:29
हूं।
21:44
आप ही से कह रहा है आप ही कह रहे हो
21:51
परमात्मा आप कि मैं हूं।
21:58
अब देखो अब इसमें चार आ गया।
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अब मनुष्य सारे मनुष्यों का मैं हर कोई तो मैं हूं ही कहता है ना
22:30
सारे देवताओं का मैं ब्रह्मा विष्णु महेश राम कृष्ण दुर्गा सबका मैं सारे भगवानों
22:40
का मैं ये सब
22:51
एक साथ कह रहे हैं कि मैं
23:00
मैं हूं
23:21
तो जब भी आप कहते हो सहज में सरल में कि मैं मैं हूं
23:31
उसमें सब ने कह दिया परमात्मा ने कह दिया ने सारे मनुष्यों ने पूरे अस्तित्व ने
23:43
मौन ने भी कह दिया कि मैं मैं हूं।
23:55
अरे मेरा इष्ट मैं ही हूं। क्या
24:03
मेरा इष्ट मैं ही हूं।
24:23
तो आप घबरा जाते हो ये सब सुन के जीव घबराता है
24:30
कि मेरा इष्ट मैं ही हूं। यह कैसे हो सकता है? डर जाता है। ये तो घोर अहंकार है।
24:39
अब आपको अहंकार लगे, कुछ भी लगे, मेरा इष्ट तो मैं ही हूं। शिव जी का एक नाम है ना अहंकारा
24:48
हवन कर रहे थे जो हजार नाम का क्या नाम था एक
24:55
अहंकाराय नमः ओम अहंकाराय नमः ओम महेश्वराय नमः बहुत सारे नाम है उनके
25:05
महेश्वर मींस ईश्वरों के ईश्वर
25:16
अब जो भी आपको लगे है मेरा इष्ट तो मैं आप अपना इष्ट जानो
25:24
सबके इष्ट का सम्मान है हम प्रणाम करते हैं लेकिन मेरा तो मैं हूं
25:32
क्या बोलते हो सौरभ जी ठीक है ना
25:41
इसलिए मैं मैं
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हूं। क्यों मालूम? क्योंकि अगर मैं कहूं कि मैं परमात्मा हूं।
25:56
तो भी मैं मैं को छोटा कर रहा हूं। परमात्मा को थोड़ा बड़ा कर रहा हूं। मैं अस्तित्व हूं, परमात्मा हूं, अनंत
26:05
हूं, शुद्ध हूं, बुद्ध हूं। मेरा फोकस इन में है।
26:12
मैं में भार होना चाहिए। मैं अरे मैं हूं। क्या?
26:22
मैं मैं हूं।
26:43
दो मुरमुरे अरे यार ऐसे चुप मत बैठा करो कुछ बोला करो
26:50
हां
27:02
तो यह अघोर है भैया क्या
27:16
यानी शिव से ज्यादा सरल मैं से ज्यादा सरल कोई
27:22
नहीं एकदम सरल भोले भोलेनाथ है ना
27:31
सरल यार तो आपका मैं ही तो शिव है उससे सरल और
28:09
तो मेरा इष्ट मैं ही हूं।
28:17
मेरा इष्ट मैं हूं। मेरा परमात्मा
28:24
मैं हूं। मेरा अस्तित्व मैं
29:06
तो कोई और परमात्मा क्यों नहीं हो सकता बताओ मेरे
29:19
हम बोलो कोई और है ही नहीं वो तो है ही नहीं
29:27
वहां तक ठीक है बट क्यों नहीं हो सकता हम
29:45
अरे बोलो यार ये कंफर्म मी और
29:52
यस क्योंकि कोई और परमात्मा अगर है उसको कंफर्म मैं ही करता हूं कि यह
30:01
परमात्मा है। तो असली परमात्मा कौन?
30:06
जो कंफर्म कर रहा है ना कि यह जीव है यह परमात्मा है वही असली परमात्मा है ना जो
30:14
सिद्ध कर रहा है
30:30
तो मैं आत्मा भगवान मैं स्वयं भगवान
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यह आपको यकीन ही नहीं होता कि हम हरि कि मैं ही नारायण हूं।
30:50
यकीन ही नहीं होता क्योंकि आप जीव का चश्मा लगा के सुनते हो
30:58
इन बातों को।
31:16
अच्छा
31:28
तो इसको शायद कबीर साहब बोले या कोई बोले कि तेरा साईं तुझ में पता नहीं जिसने भी
31:35
बोला है। है ना खोज सके तो खोज ऐसा कुछ है। तेरा साईं तुझ
31:45
में वो एक इशारा है कि तुझ में मैं कह रहा हूं कि तुम
31:54
तुम्हारे अंदर नहीं तुम। तुम तुम्हारे बाहर नहीं तुम।
32:17
तो भैया तो आप तो बोल रहे हो परमात्मा हो यह मन मन क्यों चलता है यह सब क्यों होता
32:23
है अरे जीव को होता है तुम जीव देश में जी रहे हो इसलिए हो रहा है
32:31
नारायण देश में रहो मैं देश में मन का अता पता नहीं रहेगा
32:57
तो यार सबसे आसान बात है और सत्य यही है कि मैं
33:05
मैं ही हूं बस जिंदगी भर आप मैं को कुछ और चाहते हो कि
33:17
मैं देह हूं। फिर मैं जीव हूं। फिर मैं बॉडी हूं। माइंड हूं। स्त्री हूं। पुरुष
33:23
हूं। अच्छा हूं। बुरा हूं। पापी हूं। पुण्य आत्मा हूं।
33:35
यानी आपका इंटरेस्ट मैं में नहीं है। आप कहीं ना कहीं कुछ और ही चाहते हो कि मैं
33:43
कुछ और हूं। चलो यह सब नहीं हूं तो चलो समाधि हूं।
33:48
शून्य हूं, पूर्ण हूं। यह भी अदर है। अरे मैं मैं हूं यार।
34:04
तो खोज कब शुरू होती है जब आप मैं को कुछ और मानते हो
34:12
बॉडी माइंड या जीव मानते हो तभी खोजते हो ना
34:19
परमात्मा को या खुद को मैं को कुछ मानते हो तभी खोजते हो
34:27
और अगर मैं मैं ही हूं तो उसको कुछ मानो ही मत।
34:33
इवन भगवान भी मत मानो। मैं मैं ही हूं बस।
34:45
मैं को मैं जान कि मैं मैं ही हूं।
35:19
मैं मैं ही हूं। इसमें सारे धर्म आ जाते हैं।
35:26
सब कुछ आ जाता है इस लाइन में।
35:33
एकदम सरल है और यही सत्य है।
35:42
नहीं कुछ तो होगा शून्य होगा पूर्ण होगा विराट होगा। वो फिर गया अरे मैं मैं ही
35:49
हूं बस उसको कुछ और मत बोलो ना समझो।
36:01
नहीं शिष्य है गुरु है मैं कुछ तो और है गए फिर आप
36:08
अरे मैं मैं हूं ना यार इतना सा सेंस नहीं है क्या आप आप ही हो ना
36:16
कि कुछ और हो यह तो माने हो ना खुद को बॉडी बॉडी वो तो
36:22
आपकी मान्यता है यह आप नहीं हो मैं मैं हूं
36:32
तो भैया मैं मैं हूं। इसमें क्या है? आपका मन खेलेगा। अरे इसमें क्या है यार?
36:39
वो तो मैं हूं ही। मैं मैं हूं। अब खेल दिया मैं।
36:50
अब कुछ और होने की जिज्ञासा पैदा हो गई कि मैं जरूर कुछ और भी हूं।
36:59
कोई सुप्रीम पावर या अल्टीमेट अब फिर आप गए
37:08
अपनी सरलता से दूर हो गए
37:52
तो इसमें मैं मैं ही हूं मैं आपको एक लगता है यह तो हूं ही मैं यह तो
38:01
मैं जानता ही हूं हूं ही मैं इसमें क्या है?
38:06
यही ट्रैप है। यहां कुछ नहीं है। ऐसा मन खेलता है। मैं तो मैं ही हूं यार। इसमें क्या है?
38:19
यही ट्रैप है। कुछ होने का मांगता है। लाइक कुछ परमात्मा
38:26
आत्मा ऐसा थोड़ा सा रहता है मन में ना। आत्मा परमात्मा भी नहीं अस्तित्व भी
38:34
नहीं। अरे मैं मैं ही हूं क्या होने का मांगता कुछ नहीं होने का मांगता
38:48
अरे कोई जगह तो ऐसा दे दो कि हम सहारा ले लें अवलंबन ले ले क्यों लेना है अवलंबन
38:54
पराधीन सुख स्वप्न नाही क्यों किसी पर आीन होना है चाहे वह परमात्मा ही क्यों ना हो
39:14
तो मेरे सारे सत्संगों का सार एकमात्र यही है कि मैं मैं ही हूं बस
39:23
खत्म बात और मैं कुछ और होना चाहता भी नहीं। परमात्मा भी नहीं, अस्तित्व भी नहीं,
39:32
व्यक्तित्व भी नहीं, जीव भी नहीं,
39:35
देह भी नहीं। अरे मैं मैं ही हूं बस। मैं संतुष्ट हूं अपने आप से।
39:46
बस मैं मैं हूं यार। क्या करना है?
40:10
तो मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान
40:16
मैं को मैं जान कि मैं मैं ही हूं
40:24
उसको कुछ भी मत मान ना देह ना मन ना आत्मा ना परमात्मा
40:31
बस मैं को मैं जान
40:37
क्योंकि मैं मैं से ही जानने योग्य हूं और किसी से मैं जाना नहीं जाऊंगा।
40:49
परमात्मा से भी मैं जाना नहीं जाऊंगा। बाकी की तो आप बात ही छोड़ दो।
40:56
शून्य पूर्ण ये वो ऐसा वैसा परमात्मा से भी मैं जाना नहीं जाऊंगा।
41:05
मैं मैं से ही जानने योग्य हूं। तो मैं को
41:15
मैं जान उसको कुछ भी मत मान।
41:26
मैं को आप जीव मानते हो तब परमात्मा का सेंस आता है।
41:33
मैं में परमात्मा का सेंस नहीं है। जीव में परमात्मा का सेंस है।
41:40
जीव के लिए परमात्मा है। नदी के लिए सागर है। सागर के लिए सागर नहीं है।
41:48
मैं को आप कोई छोटा-मोटा व्यक्तित्व मानते हो तो व्यक्तित्व के लिए अस्तित्व है।
41:57
अस्तित्व के लिए अस्तित्व नहीं है। नदी के लिए सागर है।
42:07
तो मैं को व्यक्तित्व और जीव मानो ही मत। बीमारी यहीं से शुरू होती है। तो मैं को कुछ भी मत मान।
42:16
मैं को मैं जा
42:24
कि मैं मैं ही हूं।
42:31
अरे मैं खुद को जो भी मान लूं मान लेने पर भी मैं मैं ही रहता हूं
42:39
और मैं मैं ही हूं। एक तो मान मत शुरू में
42:45
कि मैं को कुछ भी मत मान और तू मान भी
42:50
लेगा तो तू तू ही रहेगा। दिखाओ डंडा।
42:57
लकड़ी को डंडा मान लेने पर भी लकड़ी तो लकड़ी ही रहती है मेरे भाई।
43:06
अरे मेरे भाई लकड़ी को
43:13
आप मान लो विंडो दरवाजा डंडा।
43:19
लकड़ी को कुछ भी मान लेने पर लकड़ी लकड़ी रहती है ना यार एक बात बताना
43:31
जब लकड़ी को कुछ भी मान लेने पर लकड़ी लकड़ी रहती है
43:42
लकड़ी जैसी चीज लकड़ी को कुछ भी मान लेने पर लकड़ी
43:51
लकड़ी रहती है। तुम मैं को कुछ भी मान लोगे तो मैं क्या कुछ और हो जाएगा क्या?
44:00
अब इसको मानो देह मानो, मन मानो, जीव मानो, स्त्री पुरुष मानो, देवी देवता
44:07
मानो, आत्मा परमात्मा मानो, अस्तित्व मानो तब भी मैं ही रहता हूं ना। कुछ और थोड़ी
44:14
ना हो जाता हूं। कुछ और हो गया सा लगता हूं। होता नहीं
44:21
हूं। डंडा हो गया सा लगता हूं लेकिन रहता लकड़ी
44:28
ही हूं। ऐसे ही मैं कुछ और ये दुनिया ये शरीर ये
44:36
वो हो गया सा लगता हूं। लेकिन मैं मैं ही रहता हूं
44:45
क्योंकि यार मैं ही हूं।
44:54
हां जी। मैं मैं हूं।
45:01
इतनी सी बात है तो भैया मैं को मैं जान
45:13
मैं को कुछ भी मत मान कुछ भी मत मान
45:22
हां और मैं को मैं जानकर कर
45:30
मैं से संतुष्ट हो जा।
45:36
अपने ही आप से संतुष्ट हो जा।
45:43
मैं के अतिरिक्त सब लालचे हैं। मैं ही केवल संतोष है।
45:53
तो मैं को मैं जानकर मैं से तृप्त हो जा, संतुष्ट हो जा।
46:04
और अगर तू उसको कुछ मान भी लेता है मैं को तब भी मैं मैं ही रहता है। कुछ और हो नहीं
46:12
जाता। कितने बार आपके जीवन में सुख आए, दुख आया,
46:18
विपरीत परिस्थितियां आई, अच्छी परिस्थितियां आई। आपका मैं में कुछ गड़बड़ हो गया क्या? बचपन से अभी तक
46:28
आप बच्चे थे, आप जवान हुए, फिर बूढ़े हुए। आपका मैं तो आज भी सेम है। ऐसे ही मर
46:35
जाओगे तो भी सेम रहेगा। क्योंकि पैदा हुए हो तब से सेम है।
46:43
सेम ही रहता है।
46:54
वहां बनता बिगड़ता ही नहीं है। कुछ
47:04
अनब बनाना है। बनारस है मैं क्या है
47:10
बनारस बनाया रस बनाया
47:17
रस हूं मैं बनाना नहीं है भैया नहीं तो फिर ध्यान साधना शुरू कर दोगे
47:24
बनाने के लिए बनाया रस
47:37
तो मेरा इष्ट मैं ही हूं यार।
47:52
और अंततः ईस्ट भी एक अदर बात हो गई। मैं
48:00
ही हूं बस।
48:14
अब मैं में जिसको भी आप इष्ट मानते हो वो तो मैं में ऑलरेडी इंक्लूड है। क्योंकि
48:23
मैं ही इष्ट मानता है ना। किसी का मैं राम को इष्ट मानता है। किसी का मैं कृष्ण को,
48:29
किसी का जीसस को, किसी का बुद्धा को, किसी का महावीरा को। मैं ही मानता है ना आप इष्ट को
48:39
तो सारे इष्ट तो मैं में ऑलरेडी इंक्लूड है। क्योंकि मैं ही मानता हूं। है ना?
48:51
अगर अदर बीस्ट है तो इसलिए मैं से भिन्न कुछ भी नहीं
49:02
कुछ हुआ ही नहीं।
49:40
बताओ भैया और कुछ हां जी
50:13
तो मेरा हेलो मेरा मेरा गुरु
50:21
मैं हूं यार। हां कोई पूछे ना आपका गुरु कौन है? बोलना मेरा
50:30
गुरु मैं हूं। खत्म बात
50:39
अंतर्यामी ही गुरु हो सकता है। बाकी उसकी सब फोटो कॉपीज हैं बाहर वाली। यह जो हमको देख रहे हो या किसी को भी गुरु
50:48
देखते हो ना आप यह सब ज़ेरक्स है अंतर्यामी की मेरा गुरु
50:57
अरे मैं ही हूं बस
51:21
तो इससे क्या होता है मालूम?
51:24
आपका मान्यता वाला परमात्मा गया। मान्यता वाला परमात्मा किसका होता है? मन
51:32
का होता है। आपको एक हकीकत बताऊं।
51:40
अब मन ही अब परमात्मा तो एक ही होगा ना। किसी का मन
51:47
राम को परमात्मा मानता है। किसी का कृष्ण को, किसी का शिव को, किसी कोई गणेश जी को।
51:54
अच्छा है मानता है। अच्छा अदर कंट्री में कोई जीसस को मान रहा है। कोई बुद्धा को मान रहा है। कोई लाउत्से को मान रहा है।
52:03
कोई जैन मास्टर को मान रहा है। कोई शून्य को मान रहा है। असली चीज। कोई पूर्ण को मान रहा है।
52:11
तो मानना मींस क्या? इस मानना शब्द को समझो।
52:17
मानता मन है। मानता
52:23
मन है। मैं खुद को जीव मानता हूं। वही मन पैदा हो
52:32
जाता है। और फिर ये सारी मान्यताएं मन की है।
52:40
है ना? तो ये सारे परमात्मा किसके हुए?
52:48
मन के हैं यह परमात्मा और कम से कम सैकड़ों जन्म आप मन के
52:55
परमात्मा में भटकते हो। यह किसी को पता ही नहीं है।
53:05
भटकाव का असली कारण बता रहा हूं। हम भी भटके
53:10
मन के परमात्मा में आप कई जन्म भटकते हो क्योंकि वह बढ़िया एंटरटेनमेंट दिखाएगा मन
53:18
आपको और वह परमात्मा आपको अच्छा लगने लगेगा और सब आपको प्यार आने लगेगा ऐसा
53:25
वैसा फिर धीरे से वो अपने आप डाउन हो जाएगा और मन फिर दूसरे परमात्मा में ले जाएगा ऐसा हर जन्म में वो चेंज करता रहता
53:34
है आपको एकनिष्ठ भी नहीं होने देता
53:46
तो मन का परमात्मा है भाई वो
53:55
अभी जो आप आज जो शरीर में गुरु नहीं है रमना जय कृष्ण मूर्ति ओशो
54:02
तो वह मन के गुरु हैं अभी आपके वह आप बड़ा कल्पना करके यह वो बुद्धा महावीरा
54:12
जो कर रहे हो ना वह आपके मन का गौतम बुद्ध है। असली नहीं है।
54:20
मन के महावीर हैं। मन के कबीर हैं। मन के ओसो हैं। मन के रमण महर्षि हैं।
54:31
और उसी में आप कई जन्म खराब करते हो।
54:40
तो अब एक चीज बताओ
54:48
कौन सा परमात्मा या कौन सा सद्गुरु मन का नहीं हो सकता।
54:56
वही असली होगा। जो मान्यता का नहीं होगा वही असली होगा।
55:03
अरे बोलो जल्दी से हम
55:10
यस मैं परमात्मा या मैं सद्गुरु
55:19
आपका स्वयं आपका होना वो मान्यता से परे है और वही भगवान है।
55:26
मान्यता यानी माया और मान्यता से परे जो आपका स्वयं है वही
55:33
असली परमात्मा है। असली बुद्धा है। असली कृष्णा है, रामा है, शिवा है,
55:42
जो भी बोल लो। मैं के ही ये सारे सुंदर नाम है।
55:52
लेकिन मैं से ही टेली होंगे। मन के भगवान से टेली नहीं होने वाले।
55:59
मैं भगवान से मैं आत्मा भगवान से मैं देह मन नहीं मैं आत्मा भगवान
56:06
कि मेरा इष्ट मैं ही हूं।
56:15
तो इसलिए बोला जाता है कि ज्ञान मस्ट है क्योंकि एक बार में कट जाता है मान्यता का
56:23
भगवान। और असली भगवान में प्रतिष्ठा होती है। आप
56:29
गलत सेंस में जीते रहते हो। और फिर मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
56:40
ना राम, ना कृष्ण, ना कोई गुरु, ना सद्गुरु,
56:44
ना कोई बुद्धा, ना कुछ। इवन ना कोई इंसान मैं से भिन्न कुछ भी
56:55
नहीं।
57:19
और फाइनल चैप्टर में मैं ही हूं। बस
57:29
क्योंकि मैं से भिन्न कुछ है नहीं है भिन्न है अभिन्न है यानी कुछ और को ही तो
57:35
आप बोल रहे हो ना इसलिए मैं मैं ही हूं
57:56
हां जी यार एक वो कहां गया इसका अलख निरंजन वाला
58:10
क्यों इधर उधर रख दिए उसको वही तो काम की चीज है मेरे
58:22
हां जी
58:35
तो मैं में कोई सींग पूछ नहीं उगेगा। कोई चक्र निकल के नहीं आएगा। कोई गधा नहीं
58:43
आ जाएगा। है ना? कोई विस्फोट नहीं हो जाएगा। कोई ऊर्जा का बम नहीं फटेगा। कोई
58:52
कुंडलिनी ऐसे नाचेगी नहीं। मैं सरल है, अघोर है, सिंपल है।
59:03
इसलिए मैं ही हूं।
59:08
वो सब विशेषताएं हैं। यह सामान्य पद है।
59:22
अब ये जिसने भेजा वो सुनती ही नहीं है मेरे को
59:29
अभी ख्याल आ गया उसको माया घेरी हुई है अभी
59:38
गरुड़ के संपर्क में आ हां बस गरुड़ के संपर्क में आए यानी गए
59:44
बहुत अलर्ट रहना चाहिए शुरू में खासकर और बाद में भी रहना चाहिए।
59:54
चलो कल्याण हो फिर भी है ना ये बढ़िया है। हां तो कहां थे अपन?
1:00:07
अरे बताओ ना यार। बोलो। यस
1:00:26
तो मैं ना अपने से ऊपर किसी को मानूंगा किसी परमात्मा को ना अपने से छोटा कुछ
1:00:33
मानूंगा किसी चींटी को कीड़े-मकोड़े को है ना
1:00:39
छोटा बड़ा का खेल करना ही नहीं मैं ना अपने से श्रेष्ठ विराट को मानूंगा
1:00:47
ना अपने से कम सीमित को मानूंगा ना असीम को ना सीमित को ना विराट को ना
1:00:57
सूक्ष्म को छोटा बड़ा मानता ही नहीं मैं इसलिए मैं मैं ही हूं
1:01:10
मैं अपने से बड़ा सर्वशक्तिमान को नहीं मानूंगा और अपने से छोटा शक्तिहीन को नहीं
1:01:18
मानूंगा। कोई असहाय है, शक्तिहीन है, कोई मुर्दा ही क्यों ना हो, वह भी मेरे मैं से छोटा नहीं
1:01:26
है। और सर्वशक्तिमान नारायण ही क्यों ना हो, वह मैं से बड़ा
1:01:34
नहीं है। उसमें की बात कर रहा हूं मैं। हां।
1:01:43
तो मैं किसी बुद्ध पुरुष को अपने से बड़ा श्रेष्ठ नहीं मानता और किसी अज्ञानी को
1:01:50
अपने से छोटा शूद्र नहीं मानता। इसलिए तो मैं मैं हूं यार। इसलिए तो मैं सर्वोपरि अब ये बोलना भी
1:01:59
गड़बड़ हो जाएगा। मैं सिंपल हूं। यही ठीक है।
1:02:13
इसलिए मैं अल्टीमेट है। एकदम सिंपल सामान्य सहज सरल सरल इज राइट वर्ड अोर
1:02:23
जहां किसी भी तरह का घोर नहीं है। सरल और सहज एकदम
1:02:32
भोलेनाथ शिव स्वरूप
1:03:07
तो हम क्या है उसी ढंग से सोचते हैं कि मेरे से बेहतर यह है। मेरे से कम यह है। है ना?
1:03:20
मैं क्या है? समदर्शी इच्छा कछु नाही है ना समदर्शी है सब जगह उसका समान दर्शन
1:03:29
है जो एक भिखारी को और नारायण को एक समान देखता है एक चींटी को और ब्रह्मा को एक
1:03:39
समान देखता है समदर्शी जीवन और मृत्यु को सुख और दुख को
1:03:48
इवन भगवान और माया को भी एक समान देखता है। यह विशेष कला है। इस पर कभी और बात करेंगे।
1:04:03
वहां ऐसा छोटा बड़ा ऊंचनीच
1:04:08
ऐसा कोई भेद नहीं होता आत्मदेश में।
1:04:29
तो राम थे ना तो छोटे-मोटे साधुओं के भी ऐसे पैर पड़ लेते थे। इतने सरल
1:04:43
वो वो क्वालिटी है। वो होनी चाहिए।
1:05:01
तो मैं अपने से बेहतर किसी भगवान को नहीं मानता।
1:05:07
और हर भगवान की मैं पूजा करता हूं। आरती घुमाता हूं। हवन करता हूं।
1:05:17
यह सरलता होती है वहां पर। समझ रहे हो?
1:05:24
ये दोनों विपरीतताएं ऐसे एक जगह मिलती हैं। इतना सरल होता है।
1:05:36
मेरे को बोलते हैं आप ऐसा ज्ञानी हो। आप यह सब क्यों करते हो? अरे ज्ञानी हूं करके ही तो करता हूं यार।
1:05:46
ये क्या हवन करते रहते हो आप? अरे ज्ञानी हूं करके ही तो करता हूं।
1:05:53
अज्ञानी होता तो शायद नहीं भी करता।
1:06:12
इसलिए मैं अरे मैं हूं यार।
1:06:27
अब जिंदगी में एक स्टेप डाउन
1:06:33
अगर बात करें तो अब देह है तो एक बाहरी कर्म कुछ तो होगा
1:06:41
ना जिंदगी में है ना सांस चल रही है देह है तो यह सब सुंदर ही हो रहा है ना
1:06:53
यह नृत्य, यह सिंगिंग, यह पूजा, यह हवन,
1:07:03
यह सत्संग,
1:07:18
तो मैं नहीं हूं। मैं देश में कुछ भी नहीं हो रहा है।
1:07:26
वहां मैं हूं। दूसरा तो है ही नहीं। अरे दूसरा होगा तब तो कुछ होगा ना।
1:07:35
तो मैं देश में कुछ हो ही नहीं रहा है। हो रहा है वो नीचे की दुनिया। एक स्टेप नीचे
1:07:45
है। है ना? अगर बोले तो अंतत वो है ही नहीं कहीं फिर भी आपकी समझ के लिए कि
1:07:53
अच्छा हो रहा है जो हो रहा है सुंदर हो रहा है परमात्मा की मर्जी से हो रहा है वो एक स्टेप नीचे वाली बात
1:08:14
तो मेरा कैसा रहता है मालूम कोई ऐसे बीच में कोई ऐसा बॉर्डर नहीं है।
1:08:21
सहजावस्था किसको बोलते हैं मालूम? उसमें बीच में कोई बॉर्डर नहीं है
1:08:31
कि मैं परबह्म हूं, परात्पर हूं और फिर मैं दिए भी जला रहा हूं। ऐसे हवन जीव से
1:08:38
भी गहरा जीव बनकर आरती कर रहा हूं। इन दोनों चीजों में कोई बॉर्डर नहीं है।
1:08:45
कि यहां से उधर जंप हो गए। वहां से इधर जंप हो गए।
1:08:52
यह कंप्लीट मैं है इसलिए सहज है।
1:09:04
तो एक घंटे पहले जब आप सत्संग नहीं सुन रहे थे। जो भी जी रहे थे जैसा भी उस समय मैं से
1:09:12
भिन्न कुछ भी नहीं था मालूम। सहज में नेचुरल में से भिन्न कुछ रहता ही नहीं।
1:09:24
जब ट्राई मारते हो ना तो भिन्न करके ही तो ट्राई मार रहे हो। मैं से भिन्न
1:09:31
कुछ भी नहीं है।
1:09:44
तो यह जो भी है ना ऐसा सहज में अलग रहता ही नहीं है। मान लो तो भी नहीं रहता है। अलग मान लोगे
1:09:52
ना तो भी नहीं रहता है। जैसे पृथ्वी में इतने सारे देश को अलग मान
1:09:59
लिए। ये ये देश है। ये ये देश है। हमारा यह देश तो क्या पृथ्वी अलग-अलग हो गई क्या?
1:10:09
पृथ्वी तो एक ही है ना ऐसी खुद को आप कुछ भी मान लो भिन्न मान लो कुछ भी मान लो
1:10:15
भिन्न होता ही नहीं है कुछ भी मान लेने पर भी नहीं होता
1:10:24
नेचुरल है ना ऐसा
1:10:41
हम हम
1:10:56
आप बोलोगे यार ये तो हम जान गए मैं मैं ही हूं। अब क्या फिर गए आप?
1:11:07
अरे अब का वहां सवाल ही नहीं है।
1:11:14
हां।
1:11:40
वो परम संतुष्टि है। परम तृप्ति है। मैं को मैं जान और मैं को
1:11:50
कुछ भी मत मान। मैं को मैं जानकर मैं से तृप्त हो जा।
1:11:59
संतुष्ट हो जा। क्योंकि मैं का इष्ट मैं हूं। मैं का गुरु
1:12:09
मैं हूं। और अंतत मैं
1:12:18
और कुछ कहीं है ही नहीं।
1:12:27
तो जब जादू क्या है मालूम?
1:12:34
जब मैं ही हूं मैं के अतिरिक्त कुछ नहीं। ठीक है? तो अब आप क्या चाहोगे बताओ?
1:12:43
चाह कब उठती है?
1:12:47
बची नहीं ना। चाह कब उठती है? जब कुछ और होगा आपके अलावा तब तो उसको चाहोगे ना।
1:13:00
जब मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो चाहोगे कैसे? और चाहोगे क्या?
1:13:10
मैं को कुछ और मानकर ही आप चाहते वाते रहते हो।
1:13:19
मैं को बॉडी मान लिए तभी चाहत आएगी या मैं को जीव मान लिए तब भगवान को चाहोगे। मैं को पुरुष माने तो स्त्री को चाहोगे।
1:13:27
स्त्री माने पुरुष को चाहोगे। मान्यता से ही सारी चाहतें पैदा
1:13:35
होती है। कुछ भी मैं को आप माने तुरंत 50 किस्म की
1:13:43
चाहतें पैदा हो जाएंगी। हां तुरंत खुद को शरीर माने। पुरुष फिर पुरुष
1:13:50
फिर स्त्री की चाह फिर पुत्र की चाह पुत्री की चाह पैदा करेंगे बढ़ाएंगे फिर शरीर को बचाने की चाह
1:14:00
सिक्योरिटी फिर इंश्योरेंस कराओगे। है ना? तो कुछ मानोगे तभी तो चाहोगे।
1:14:17
तो खुद को जीव माने, देह माने तो फिर दूसरा सेंस फिर आएगा कि मैं अज्ञानी हूं फिर ज्ञान चाहोगे।
1:14:26
मैं जीव हूं तो परमात्मा चाहोगे। मैं व्यक्तित्व हूं अब अस्तित्व चाहोगे। कोई गुरु परमात्मा बताता है तो परमात्मा
1:14:35
वाला सीख जाते हो। कोई अस्तित्व बताता है कोई स्वयं बताया स्वयं वाला सीख जाते हो।
1:14:41
घुमा फिरा के बात तो एक ही है ना। खुद को कुछ और माने तभी तो स्वयं को खोज
1:14:47
रहे हो। अरे आप स्वयं ही हो। पागल हो जो स्वयं को खोज रहे हो।
1:14:56
खुद को कुछ और मान के ही आप स्वयं को खोजोगे ना। खुद को खोजोगे ना?
1:15:03
और जब मैं ही खुद हूं तो क्या खोजूंगा?
1:15:08
खुद को। क्या खोजूंगा खुद को? जब मैं ही खुद हूं।
1:15:23
तो खुद को मान लेने पर ही तरह-तरह की तरह-तरह की चाहत पैदा हो जाती हैं।
1:15:33
कुछ भी माने और तुरंत चाहते पैदा। और खुद को कुछ भी मत मानो।
1:15:47
खुद को कुछ जीव शरीर वरीर मानो ही मत यार।
1:15:52
तुरंत चाहते समाप्त हो जाएंगे।
1:16:07
तो मैं इच्छा पूर्ति का मंत्र नहीं बताता भैया। इच्छा खत्म करने का मंत्र बताता हूं। इच्छा उठेगी ही नहीं। जड़ तो वही है
1:16:16
ना। एक इच्छा पूरी हुई फिर 10 और आ जाएगी। उसी का मंत्र बता रहा हूं। खुद को कुछ
1:16:24
मानो ही मत। चाह पैदा ही नहीं होगी। फसोगे ही नहीं।
1:16:31
परम शांति परमानेंट। परम तृप्ति परमानेंट
1:16:40
परम संतोष परमानेंट कि मैं मैं ही हूं।
1:16:55
तो इच्छा के त्याग से जो शांति मिलती है वह करोड़ों प्रवचनों से भी नहीं मिलती।
1:17:12
तो फिर एक इच्छा आई त्याग की दूसरी आई त्याग किए कई हैं करोड़ों हैं फिर त्याग कब तक
1:17:19
त्याग करते रहोगे जड़ से ही काट दो ना खुद को कुछ मानो ही मत कट जाएगी सारी
1:17:28
इच्छा
1:17:46
तो खुद को कुछ भी ना मानना।
1:18:13
मायापति हो जाना है। खुद को कुछ मानना
1:18:20
माया हो जाना है। अब मायापति ही मैं ही माया हो गए। आपने खुद ही को तो कुछ माना। किसी और को
1:18:29
कुछ थोड़ी ना माना है। खुद को कुछ मानना
1:18:37
यानी माया हो जाना। राइट? माने तो तरह-तरह की इच्छाएं पैदा हो
1:18:44
गई। अब माया ही माया, माया ही माया। अब संसार भी माया, अध्यात्म भी माया।
1:18:51
और खुद को कुछ भी ना मानना।
1:18:58
माया पति हो जाना
1:19:05
कितना आसान है।
1:19:33
बस अपने आप में संतुष्ट तृप्त
1:20:22
अब अब जब इच्छा ही नहीं है तो सर्व स्वीकार क्या करोगे? वो तो सब हो ही गया ना। तथा सर्व स्वीकार क्या-क्या जो सोचते हो
1:20:32
वो तो सब नेचुरल हो गया वो और संसार संसार नहीं होता मेरे भाई। इच्छा
1:20:40
संसार होता है। इच्छा नहीं है तो ना कोई संसार है ना कोई
1:20:49
देह है। देह देह नहीं है। इच्छा देह है ना मान्यता देह है ना
1:20:58
मान्यता से इच्छा
1:21:31
अब सहजा अवस्था इससे परे समझ रहे हो अब वो अभी अभी इसमें जिओ
1:21:39
कंप्लीट उसके बाद सहज अवस्था है। पहले आत्मा कंफर्म एकदम सील थप्पा लग जाना
1:21:47
चाहिए आप ही के द्वारा कि मैं हूं बस मैं के अतिरिक्त कुछ नहीं।
1:23:03
तो सहजा अवस्था क्या है फिर मालूम राजा का जो पूरे विश्व का सम्राट है
1:23:16
उसका सबसे बड़ा आनंद क्या होगा?
1:23:26
जब वो भीख मांगने निकलता है। जब वह
1:23:35
भीख मांगने निकलता है। किसी के यहां चोरी करने जाता है।
1:23:46
अब जो विश्व का सम्राट है जिसके पास सब कुछ है अब वो जिंदगी में कुछ तो करेगा
1:23:57
है ना तो वो क्या करता है चोरी करने जाता है
1:24:04
गैंग खोजता है चोरों की चलो चोरी करेंगे
1:24:14
यानी परमात्मा जाता है मंदिर में और मूर्ति की पूजा करता
1:24:21
है। क्या यह सहजा अवस्था है?
1:24:29
इसको हल्के में मत लेना। परमात्मा का आनंद है। वो जा रहा है मंदिर।
1:24:39
और पूजा कर रहा है। अब वो करें क्या?
1:24:47
ये सहज अवस्था है। अब परमात्मा डिजायरलेस है। अब वो डिजायर
1:24:55
कर रहा है तरह-तरह के। अरे यह चाहिए वो चाहिए। ऐसा वैसा वो मजे ले रहा है
1:25:06
वो फिर खेलता है आनंद लेता है
1:25:13
तो पहले डिजायर से डिजायरलेस में आओ वो मस्ट है मैं आत्मा भगवान में
1:25:26
तो जब आप जानोगे कि मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो क्या चाहूं किसको चाहूं जो भी है वह
1:25:36
मैं ही हूं और उसके बहुत बाद में बहुत बाद में
1:25:47
फिर आप आनंद लेते हो चाहने का
1:25:55
जैसे कृष्ण के पास क्या हैित नहीं है तो वह सबका चित्त चुराते हैं ना। चित्त चोर बोलते हैं ना अपन
1:26:04
जिसके पास नहीं है वह क्या करेंगे अब वो सबके चित्त चुरा रहे हैं
1:26:11
इसलिए चित चोर माखन चोर
1:26:20
वो सहजा अवस्था है वहां तुम बोलोगे यार सब एक ही है वन नेस
1:26:30
है क्या इच्छा कर रहे हो माखन की इच्छा कर रहे हो वह भी चुराक खा रहे हो और तुमको अवतार बोल रहे हैं लोग अरे तुमको सेंस
1:26:39
नहीं है वो क्या कर रहे हैं है ना तुम केवल उनके बहिर चरित्र को देख
1:26:46
रहे हो बस तुमको अपना ही बोध नहीं है
1:27:03
तो आजकल क्या लोग नेगेटिव ढंग से बोलते हैं ना वो क्या डायलॉग था तो तुम करो तो रास लीला और वो क्या है वो डायलॉग
1:27:12
बताओ तो मैं करूं तो कैरेक्टर ढीला हां सही है
1:27:21
वो बात सही है क्योंकि तुम अज्ञानी हो ना साला जो करोगे तो गड़बड़ी करोगे ना?
1:27:30
हां। बंदरों के हाथ में परमाणु बम नहीं दिए
1:27:40
जाते। भाई नाश कर देंगे पृथ्वी का। हां।
1:28:15
है तो सहजावहजा में ज्यादा मत सोचो।
1:28:23
बस जो पॉइंट बताया गया मैं क्या था? मैं सहजा में
1:28:32
आता हूं तो वो सब सब भुला जाता है। क्या था वो? मैं
1:28:40
का इष्ट मैं हूं। और मैं मैं ही हूं। यस।
1:28:49
वहां तक आपको जीना है।
1:29:14
तो देखो शिव सहजा वाले होते हैं ना जो हाई रेंज वाले होते हैं वो सहजा वाले होते हैं। है ना?
1:29:22
वो भयंकर रहस्य है। भयंकर
1:29:39
तो हम लोग वो हजार नाम हवन कर रहे थे शिव जी के उसमें क्या-क्या नाम थे
1:29:45
कामदेव शिव जी का नाम है एक उसमें क्या था काम ही नाम है शिव जी का और फिर
1:29:53
ब्रह्मचारी भी नाम है शिव जी का और काम को भस्म करने वाले हैं। वह भी नाम
1:30:03
है शिव जी का। अब ये दोनों विपरीत कैसे किसी को पल्ले ही नहीं पड़ता। वो सब सहज अवस्था की दुनिया
1:30:11
है। अहंकारा नाम है और फिर महेश्वर नाम है।
1:30:21
ऐसे बहुत उसमें विपरीत नाम थे ना। बड़ा आनंद आ रहा था मेरे को।
1:30:29
हां, कामी के साथ कामेश्वर नाम था। काम यानी काम के भी ईश्वर हैं जो
1:30:37
तो वो बहुत विराट लेवल पर कहे हैं। जिन्होंने भी नाम दिए हैं ना वह ऐसे ही नहीं दिया
1:30:46
गया है। बट आम आदमी के बस की बात ही नहीं है। वह ऑलमोस्ट असंभव है।
1:30:55
क्योंकि वह अभी अभेद में ही नहीं आया है। पहले भेद से अभेद में आना है।
1:31:02
फिर लास्ट में अभेद भेद से खेलता है। अब भेद से भय नहीं है। है ना?
1:31:13
अब अभेद जो है आत्मवान भेद से खेलता है।
1:31:21
वो एक अलग आनंद है। फिर लेकिन प्रथम प्रथम प्रथम अभेद
1:31:28
पहले आपकी आत्मा ही राम है। अभी आपका होना ही राम आपको महसूस नहीं
1:31:35
होता। तो आपको आप काम को राम कैसे बोल सकते हो? पहले तो जहां काम तहां राम नहीं
1:31:45
है ना पहले राम में आओ शिव में आओ अपने शिवत्व में आओ फिर हर चीज शिव हो जाती है एक तो हर चीज
1:31:54
है ही नहीं ना फिर कुछ शिव के अलावा और फिर है तो शिव की तरह है
1:32:02
जैसे मैं के अतिरिक्त अब कुछ नहीं है
1:32:08
लेकिन एक स्टेप नीचे आए तो शरीर है तो मैं की तरह है। मन है तो मैं की तरह है।
1:32:16
यह सर्व है तो मैं की तरह है।
1:32:30
बहुत बारीक बारीक बारीक लेयर्स हैं सब में। एकदम शार्प।
1:32:43
यानी ब्लेड होती है ना उसको थोड़ा भी गलत पकड़े कट जाएगा हाथ इसलिए केवल आत्मा तक वाले ज्ञान में रहो
1:32:53
है ना बस मैं हूं और मैं मैं ही हूं
1:33:00
मैं को मैं जानो और मैं में संतुष्ट रहो
1:33:15
लेकिन साला ना वो दिल करता है बताने को मालूम
1:33:21
मैं तो यही बोलने आया हूं अब सब रेडी हो रहे हो ना बताऊंगा एक से एक
1:33:32
रहस्य यह तो सैंपल दे रहा हूं।
1:33:43
यानी ना आप यकीन मानो आप कीड़े मकोड़ों की पूजा करने लग जाओगे।
1:33:54
ऐसा दिखने लगेगा उसमें। परमात्मा का तो बात ही छोड़ दो। तो कीड़े
1:34:02
मकोड़ों की पूजा करने लग जाओ। आपका
1:34:13
क्या है अपन एक ही ट्रैक में जीते हैं ना कैलकुलेटिंग वे एक फिक्स वे जैसे मैं हूं की जब मैं बात करता हूं ना वो एकदम सेट
1:34:22
है। लाइक एफडी है वो है ना तो आप बहुत धन कमाते हो। बहुत सारी
1:34:32
एफडी करते हो ना लेकिन जब तक उस एफडी को तोड़ोगे नहीं उसका आनंद नहीं आएगा। समझ रहे हो?
1:34:44
ये लो एफडी कराई किस लिए थे? तोड़ने के लिए कराया था। एक समय के बाद पहले नहीं।
1:34:53
है ना? जब एफडी मैच्योर हो जाती है ना। जब आप मैं में मैच्योर हो जाते हो तब की बात।
1:35:01
तब मैं तोड़वाऊंगा सारी एफिया। छोड़ो रे मैं क्या लगा दियो?
1:35:14
बट अभी मैं और मैं के अतिरिक्त कुछ नहीं।
1:35:22
तो चलो भैया सबको प्रेम प्रणाम। इनफ फॉर
1:35:30
टुडे ओके
1:35:43
तो अब अरे रुको वापस लाओ बंद नहीं करना
1:35:55
क्या सेंस आया था अब शुरू में आप सुने मैं ही मैं हूं वाला
1:36:03
है ना कि मैं ही हूं उसके बाद थोड़ा सा सहजा का सुने
1:36:13
वहां चीजों में अभेद के बाद का भेद है
1:36:21
पहले भेद से अभेद और फिर अभेद के बात का भेद है।
1:36:28
है ना? उसका रस है, आनंद है कि गुरु और शिष्य बैठे हैं भेद में।
1:36:36
दोनों को पता है बरोबर अभेद। बट फिर भी रामा बैठे हैं और हनुमान जी
1:36:44
बैठे हैं। वह रसिक हैं। रस है। राधा बैठी है, कृष्ण
1:36:51
बैठे हैं। गोपियां बैठी हैं। उद्धव बैठे हैं। तो वो थोड़ा सा जो चला सहजावस्था का ना वो
1:37:00
सहजावस्था का चैप्टर है। वो आम आदमी के बस की बात ही नहीं है।
1:37:06
कि कृष्ण ने क्या किया है और राम के साथ यह ऐसा मतलब वह बहुत सहजा अवस्था के सूत्र है।
1:37:15
तो शुरू में जो मेरा इष्ट मैं ही हूं सुने और फिर जो सहजा अवस्था वाला सुने यह दोनों
1:37:25
मैं से भिन्न है ही नहीं। यह असली मैं है।
1:37:38
दोनों का एक चैप्टर हुआ ना और यह दोनों मैं से भिन्न
1:37:44
है ही नहीं। अब पूरा समेट लो सबको दोनों को।
1:37:50
दोनों में से भिन्न है ही नहीं। तो गलती नहीं होगी।
1:38:08
तब पूरी जिंदगी दैहिक तौर पे भी एक आनंद है। मानसिक तौर पर भी एक आनंद है,
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सेलिब्रेशन है। क्योंकि मैं ही हूं
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और मैं देश में तो सेलिब्रेशन है ही। परम समाधि है ही।
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अब संसार भी समाधि है। हां।
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अब मन भी शांति है। अब मोह भी प्रेम है।
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अब देह भी आत्मा है।
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अंतत सब कुछ सुंदर है। सत्यम शिवम सुंदरम
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सुंदरम सुंदरम
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अब पत्थर भी भगवान है। खाली मैं भगवान नहीं अब पत्थर भी भगवान
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है।
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अब बाउंड्री बाउंड्री लेस
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अब अब कोई उसका रेंज नहीं है। अब लिमिट विमिट नहीं है।
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अब लकड़ी भी डंडा है। अब मैं भी देह हूं।
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अरे शुरू में देह से मैं में गया ना तो अब मैं भी देह हूं।
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लकड़ी भी डंडा है। अब ये नाम रूप जो विकल्प है वह भी मैं ही
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हूं। अब अब भय खत्म हो गया ना।
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अरे मेरे भाई सांप को सांप मानने से भय लगता है। रस्सी
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को सांप मानने से भय लगता ही नहीं है।
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भगवान को मैं भगवान को माया मानने से भय लगता ही नहीं है यार वो आनंद है।
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माया पति माया का पति है ना
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पासा ही पलट गया। हां दुर्लभो सहजावस्था
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अति दुर्लभ है अति दुर्लभ सद्गुरु करुणा बिना
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ये उलझी हुई सुलझन है। क्या उलझी हुई सुलझन है।
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यह अस्तित्व को देखो ना। उलझी हुई सुलझन है यह पूरा अस्तित्व। यहां हर चीज एकदम सेट नहीं है। बस मैं हूं
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ऐसा वाला नहीं है। हां शुरू में वह भी है। बट मैं एक स्टेप
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बिय्ड चल रहा हूं। अभी जो मैं बताने आया हूं वह तो बताऊं ना यार।
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मैं हूं तो मेरे मास्टर ही बता दिए थे। महर्षि मुक्त
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तो पूरे चराचर में जितने भी शब्द हर मनुष्य उपयोग कर रहा है या देवता उपयोग कर
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रहे हैं। जितने भी शब्द निकल रहे हैं ना ये पूरे
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चराचर में जितने भी शब्द निकल रहे हैं वो
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मौन की बांसुरी से निकल रहे हैं।
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मौन के गीत है ये सारे शब्द मालूम गलत नहीं है
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कुछ
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अरे अलौकिक अस्तित्व है ये अलौकिक
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हां
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मन परमात्मा का प्रचार कर रहा है मालूम
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बगैर मन कि आप मैं हूं कह ही नहीं सकते।
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मन परमात्मा की ऐड करता है।
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मन बहुत सुंदर है।
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जर्रा जर्रा ऐसा दिव्य है ना वहां कोई कैलकुलेशन है ही नहीं
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सब अनोखा है अलौकिक
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तो परमात्मा को सबसे ज्यादा क्या प्रिय होता है? मांगना।
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शुरू में आप सीखते हो। अरे कभी कुछ मत मांगना। किसी से कुछ मत मांगना।
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आत्मा में आ गए। अरे उसके बाद मांगना प्रिय होता है
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वो आनंद है मांगना और देना भी।
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अरे नहीं समझे वो कौन थे दो मुट्ठी चावल वाले
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सुदामा सुदामा
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मुश्किल से भीख मांग मांग के वो चावल इकट्ठा किए और कृष्ण के पास गए और वो दे नहीं रहे
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कृष्ण को। कृष्ण मांग रहे हैं कि मेरे को चावल दे दे भाई चावल दे दे।
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छीन रहे हैं बल्कि समझ रहे हो?
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बहुत आनंद है
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सब कुछ इतना आनंद है ना आप सोच नहीं सकते।
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अब आप ज्ञानी हो तो बोलोगे परबह्म नारायण को चावल के दाने चाहिए।
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अगर आप ज्ञानी के ढंग से सुनोगे ना तो फेल खा जाओगे। वहां वैसे नहीं चलता
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है ना हां वो तीन मुट्ठी चावल और फिर वो तीनों लोग
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देने को तैयार हो गए फिर वो लक्ष्मी जी रोक रही है उनको तीसरी मुट्ठी में
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बड़ी सुंदर कथा है ना ये मतलब कितना अद्भुत है यार
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सब कुछ इतना प्रेम हो जाता है, रस हो जाता है।
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बताऊं इतना प्रेम हो जाता है ना यहां? कि समझ ही नहीं आता कि मैं परमात्मा हूं कि
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कोई और परमात्मा है। सच बता रहा हूं।
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भूल ही जाता है ये जीव भी परमात्मा भी। पता नहीं क्या हो जाता है।
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तब यह सब शुरू होता है। ये लीला का क्षेत्र जो सुने हो ना राम लीला कृष्ण लीला तब
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शुरू होती है। अब राम वो धनुष चला रहे हैं। मृग वो वाले स्वर्ण मृग
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क्या उनको बोध नहीं है कि स्वर्ण मृग होता ही नहीं है। वह नारायण है, राम है क्या उनको बोध नहीं
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है? अरे यह परम लीला है यह। सोने के पीछे जा रहे हैं। स्वर्ण मृग के
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पीछे जा रहे हैं। ये मतलब ना अलौकिक लीला है। ये
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फिर बेर खाना झूठे शबरी माता के
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क्या लीला है यार हम लोग कचरा जिंदगी जीते हैं मालूम
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बस वो मैं के अतिरिक्त कुछ नहीं है और सब मैं ही हूं मेरे को ये कचरा लगता है
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सच बता रहा हूं दिल की बात मेरे को तो झूठे बेर खाने हैं भैया
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अरे वो तो है ही ना मैं मैं के अतिरिक्त तो कुछ है ही नहीं वो तो है ही उसको आप भी चाहोगे तो बदल ही नहीं सकते तो क्या हो
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गया ठीक है शुरू में वह मस्ट है आत्मनिष्ठा मस्ट है हम एग्री करते हैं बट हम अभी कुछ
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और बात कर रहे हैं।
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पता नहीं इसको कोई कैसे कब एक्चुअल कैसे ग्रहण करेगा
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बट बट कर तो लेगा ही
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इतना रस है ना इतना रस है जब आप भूल जाते हो मैं हूं को भी आत्मा परमात्मा को जीव
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को मैं हूं को रस ही रस है पता ही नहीं रहता आप भगवान हो, सिंपल हो,
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विशेष हो। क्या है ये सब ऐसा लगता है।
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तो फिर आप अपने माता-पिता के पैर दाब रहे हो वो कथा है ना वो पीछे से आते हैं तो
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बोल देते हैं कौन विट्ठल कौन थे वो तो वो रुको अभी तो वो वैसे ही खड़े हो गए भगवान
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और ध्यान ही नहीं दे रहे हो आप भगवान को ये ये एक्चुअल इस जगह की बात है। असल में
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ना उसको शॉर्टकट में बता दिया गया है। वो ठीक है। है ना? बट यह इस जगह की बात है
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जब कबीर बोलते हैं कि भले भय जो हरि बिसरो सर से टली बला है वो इस जगह की बात है
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यानी भले भय जो मैं हूं बिसरो है ना भले भय जो हरि बिरो बोलते हैं ना
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कबीर अरे हरि हरि हरि बला हो गई थी सिर पे ऐसा बोलते बोलते हैं कबीर साहब तो मैं अभी
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क्या बोल रहा हूं भले भोज मैं हूं विरो अरे मैं हूं मैं हूं मैं हूं ये भला हो गया है
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सर से टली बलाए
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जैसे थे वैसे भय अब कछु कहा ना जाए।
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हालांकि यहां सहजा में जैसे थे वैसे वाला पॉइंट नहीं आएगा। सहजा वाला जैसा
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को ऐसा बनाने में भी आनंद ले लेता है। वहां पे कोई लिमिट कोई बाउंड्रीज नहीं है।
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वहां जैसा ऐसा में भी जंप कर लेता है और ऐसा जैसा में भी जंप कर लेता है। वहां निश्चिंतता है ना?
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परम बेफिक्री है कि मैं ऐसा हूं में भी रस है कि मैं देह हूं में भी रस है।
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मैं आत्मा हूं उसमें तो है ही। मैं देह हूं में भी रस है कि मैं ऐसा हूं।
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जो जैसा ऐसा ना हो सके वह जैसा भी कोई जैसा है।
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जो मैं तू ना हो सके वह भी कोई मैं है।
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जो आत्मा भिन्न ना हो सके वह भी कोई आत्मा है।
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और बस बहुत हो गया ये
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जो परमात्मा जीव नहीं हो सकता वह भी कोई परमात्मा है। अब यहां जीव होना भी आनंद है। और परमात्मा
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होना तो आनंद है ही और दोनों को भूल जाना महानंद है।
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तो बस अब स्टॉप बहुत हो गया है। अति हो गई सभी को प्रेम प्रणाम।
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हां। अब अब
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मेरा इष्ट राम है। मेरा इष्ट कृष्ण है। मेरा इष्ट शिव है। अब
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यस। अब कट करो। अब मेरा इष्ट मैं हूं। कचरा बात है यहां। हम