Prabhu Shree
0:04
[संगीत]
0:17
मेरी रेंज जो आपको सबसे ज्यादा पसंद
0:30
असल में जो सहजावस्था
0:41
है उसमें रिएक्शन मार देता है। हां मतलब सहजा अवस्था जिसको बोध हुआ है उसी को
0:50
सुनाना चाहिए जिसको स्वयं का बोध है। बढ़िया नियम भी नहीं है वहां
0:57
पर इसलिए तो वह सहजा अवस्था है समझ रहे
1:05
हो जो मेरी रेंज है मेरा प्रिय
1:15
है अब जैसे रज्जु में सर्प भासता है दिखता
1:24
अंधकार में और प्रकाश में नहीं दिखता। रज्जु यानी रस्सी में सर्प दिखता है
1:32
ना अंधकार में। तो मेरे को एक बात
1:41
बताना अंधकार में भी वह रस्सी है
1:49
ना और प्रकाश में भी वह रस्सी है। सर्प जिस समय दिखा उस समय भी वह क्या
1:59
है? रस्सी है। ठीक है?
2:06
ओके। तो जब मैं जीव हूं तब भी मैं ही
2:14
हूं। जब मैं भगवान हूं तब भी मैं ही हूं।
2:26
जब मैं भोग कर रहा हूं तब भी मैं मैं ही हूं। जब मैं त्याग कर रहा हूं तब भी मैं
2:33
ही हूं। अब यह मारेगा रिएक्शन। समझ रहे हो? अब आप क्या करोगे?
2:43
भोग में कूद जाओगे। हालांकि तब भी आप आप ही हो। लेकिन आप लोग गलत समझ रहे हो अभी
2:54
भी मेरा लक्ष्य ना भोग है ना त्याग है मैं
3:02
है समझ रहे हो ना जीव है ना भगवान है मैं
3:12
है तो आप अज्ञानी हो तब भी मैं ही है ज्ञानी हूं तब भी मैं ही
3:18
है। अरे रस्सी छ ना सांप कहां है?
3:27
हैं रस्सी तो सहज
3:39
में त्याग त्यागी और त्याज तीनों का त्याग हो जाता है।
3:49
त्याग त्यागी और जो वस्तु त्याग त्यागते हो आप त्याज्य
3:56
तीनों का त्याग हो जाता है। अब क्या बताऊं मैं आप लोग को?
4:19
सहज और खतरनाक है। इतना ही नहीं है। ये हटाओ
4:28
[हंसी]
4:30
इसको। रिएक्शन मारता है। समझ रहे हो?
4:46
तो जिस समय आपको सांप दिख रहा है उस समय भी रस्सी रसच्छ है
4:52
ना और प्रकाश में भी रस्सी रसच्छ
4:58
है तो जिस समय आपको लग रहा है कि मैं शरीर हूं मैं जीव हूं तब भी मैं ही हूं
5:05
ना मैं त्यागी हूं। मैं भोगी हूं तब भी मैं मैं हूं और मैं परमात्मा हूं लग रहा
5:13
है तब भी मैं ही हूं। तब भी एग्जैक्ट उस समय
5:21
भी यानी जिस समय आप सर्प देख रहे हो उस समय भी वो रस्सी है ना। एग्जैक्ट उस समय
5:27
भी वह रस्सी है। जिस समय आप दुनिया देख रहे हो, संसार
5:34
देख रहे हो। शरीर मन देख रहे हो उस समय भी मैं ही
5:41
[संगीत]
5:43
हूं दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरु करुणा
5:55
बिना इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कुछ भी करने की आजादी दे रहा
6:02
हूं कि आप कुछ भी करोगे
6:17
और इसका मतलब यह भी नहीं है कि मैं आजादी छीन रहा हूं। क्योंकि करना इंपॉर्टेंट नहीं है।
6:26
मैं इंपॉर्टेंट है। बहुत बारीक लाइंस हैं ये।
6:34
बहुत बारीक। अरे भाई आप बचपन से बेबी थे 9
6:41
महीने के। 10 साल के हुए, 20 साल, 50 साल। मैं मैं ही हूं ना क्या हुआ क्या? मैं को कुछ हुआ क्या
6:51
आपके? मैं क्या 10 महीने का हुआ, 10 साल का हुआ, 50 साल का हुआ। कुछ हुआ मेरे
6:58
को बचपन में आपका मन कई चीजें मांगता था जो आज नहीं मांगता है ना आपका मैं तो एज इट इज है ना
7:08
क्या हुआ आपके मैं को आपके मैं को कुछ नहीं
7:20
हुआ हो ही नहीं सकता ना तो कामना करो तब मैं हूं और सारी कामनाएं
7:30
त्याग दो तब मैं हूं। कामना रहित कर्म भी मैं हूं। निष्काम
7:40
कामना सहित कर्म भी मैं हूं। दोनों हालात में मैं ही रहता हूं
7:49
ना। तो चाह हो या अचा हो हूं मैं ही।
8:01
अरे जब आप चाहते हो तो आप ही रहते हो। कोई और रहता है। जब बोलते हो अब मैं अचाहा हो गया।
8:08
अमित जी ने अचाहा बता दिया। अरे पागल तब भी कौन रहता है? मैं ही तो रहता है।
8:18
[हंसी]
8:34
अब बहुत इच्छा किए हो तो रिएक्शन के लिए भी तैयार रहना। ठीक है? मारेगा तो जरूर
8:40
है। है ना? हो जाए जो होना है तब भी मैं ही हूं। रिएक्शन मारे तब भी
8:49
मैं ही हूं ना। ना मारे तब भी मैं ही हूं। हम लक्ष्य मैं रखना तो रिएक्शन नहीं
8:57
मारेगा। समझ रहे हो? लक्ष्य आपने रखा चाह तो रिएक्शन मारेगा। अचा रखा तो भी एक बारीक
9:06
रिएक्शन है। मैं के सामने अचा होना भी ना एक
9:13
रिएक्शन है। समझ रहे हो?
9:21
ठीक है। हो तो गया क्या?
9:27
[हंसी]
9:32
तो आज तक मैं जितना भी भटका तो मैं ही था ना और पहुंचा तब भी मैं
9:41
ही था। अरे भैया यह
9:53
लकड़ी कुर्सी बन गई तब भी यह लकड़ी छ ना लकड़ी दरवाजा बन गई तब भी लकड़ी
10:02
छ तो लकड़ी हर हाल में है ना मैं हर हाल में
10:10
है तो जब मैं खुद को भूल जाता हूं तब कौन रहता है मैं हूं और जब मैं याद करता हूं खुद को तब भी कौन है?
10:21
इस बात पर अगर निष्ठा आ गई वही आत्मनिष्ठा
10:29
है। जिस समय आप मैं को पूरा भूल जाते हो तब भी मैं ही रहता हूं पे एक निष्ठा
10:38
आत्मनिष्ठा श्रद्धा सुप्रीम वाली और जब याद करते
10:47
हो दोनों पोजीशन में तब आत्मनिष्ठा
11:03
है। तो जब आप शिष्य हो तब भी मैं ही है। जब आप गुरु बनते हो तब भी मैं ही है। तो आपका नजर क्या रहता है? या तो
11:12
शिष्य में रहता है या गुरु में रहता है। मैं में कहां रहता है?
11:19
लक्ष्यमय होना चाहिए। जब आपका लक्ष्य कुछ और है तब भी
11:28
मैं ही है। और जब आपका लक्ष्य मैं है तब भी मैं ही है। फिर भी लक्ष्यमई होना
11:37
[हंसी]
11:42
चाहिए। अरे दुर्लभ हो। हां।
11:52
दुर्लभो सहजा अवस्था
12:03
यहीं पे कृष्ण ने अर्जुन को लाया और बोला अब तुम्हार इन अधर्मियों
12:10
को क्योंकि मैं ही है मैं का नाश होता है ना उत्पत्ति होती है ना अग्नि जला सकती है
12:17
जो भी गीता में गोविंद ने बताया इस पॉइंट पर बताया गया और अथॉरिटी दी अथॉरिटी दी
12:26
जाती है मैं अथॉरिटी नहीं दे रहा हूं आप लोग को कुछ भी करने की है ना उस समय गोविंद ने अथॉरिटी दी कि मार इन अधर्मियों
12:36
को तू युद्ध भी कर और मेरा स्मरण भी कर याद रखना जो भी मेरे को सुन रहा है मैं
12:45
किसी भी चीज की अथॉरिटी नहीं दे रहा हूं कुछ भी करने
12:53
की। नहीं तो बुरे फंसोगे। आप लोग बोले कि मेरी रेंज बताओ तो
13:01
मैं अपनी रेंज बता रहा हूं। है ना? यह आप लोग की रेंज नहीं है।
13:08
सुन भी लिए तब भी नहीं है। मैं उस देश में हूं ना। यह चीजें मेरे पर
13:19
लागू होती है। आप लोग पर लागू नहीं
13:33
होती। अब यहां पर मैं भेद कर रहा हूं मेरे में और आप में। भेद करने में ही
13:42
आपकी भलाई है। है ना? याद रखना। हां। जब मैं अथॉरिटी दूं तब एक अलग
13:53
बात है। और यह अथॉरिटी कभी भी ग्लोबली नहीं दी
14:02
जाती। पर्सनल दी जाती है। जैसे कृष्ण ने अर्जुन को दी। कृष्ण ने पांचों पांडव को
14:09
नहीं दी। केवल अर्जुन को गीता सुनाई और दी। यह एकदम पर्सनल दी जाती
14:16
है कि तू यह कर तेरे को कोई पाप पुण्य कुछ नहीं लगेगा।
14:29
हां। तो इस पॉइंट पे कॉन्फिडेंस दिलाना भयंकर होता है। उस पॉइंट को जान लो। दुरुपयोग बस नहीं
14:38
करना।
14:51
क्योंकि वो असंभव हो जाता ना अर्जुन के लिए फिर द्रोण को मारना अपने गुरु को
14:58
भीष्म पितामह को अपने भाइयों को और इतने हजारों लाखों लोग हैं उनको
15:29
तो ये जो लैंग्वेज है ना कोई मरता है ना कोई मरता है जो गोविंद ने कहा गीता में भगवान वाच
15:39
उसमें आता है ना भगवान की वाणी है मैं की वाणी है वो ये बहुत हाई रेंज है
15:55
हम बट उस जगह मैं देश में जब आपके लिए मैं के अतिरिक्त कुछ बचा
16:04
ही नहीं
16:15
उस समय की जरूरत थी। अधर्म इतना बढ़ गया
16:21
था। उसे मिटाना अति आवश्यक था।
16:42
पूरे महाभारत और यह पूरा मैं के बेस पर
16:50
चला। अब द्रोपदी के साथ जो हुआ जब वो सबको पुकारी चिल्लाई कोई नहीं
16:59
आया। कृष्ण को बुलाई कृष्ण आ गए मैं आत्मा कृष्ण जब मैं का सहारा मिलता है ना तो
17:05
आपके साथ कितना ही अपमान हो जाए आप जी लेते हो उससे बड़ा अपमान आज तक किसी का किया गया क्या हजारों मृत्यु के तुल्य है
17:15
वो लेकिन फिर भी मैं आत्मा भगवान तो मैं
17:21
आत्मा भगवान है वहां क्या मान क्या अपमान
17:32
तो जब द्रोपदी मैं ही हूं मैं आ गई और बात खत्म हो गई। फिर मैं प्रकट और बाकी सब निर्वस्त्र हो गए। जितने भी उस
17:41
सभा में थे।
18:03
मैं का पावर भयंकर है। ये अपमान और ये सब मृत्यु ये वो बहुत
18:13
छोटी बातें होती है मैं के लिए।
18:32
तो अमर हो जाओ तब भी कौन है? और सदा के लिए मर जाओ तब भी कौन है?
18:39
मैं ही हूं ना। तो मैं खुद को जान
18:51
लूं तब भी कौन है? और मैं खुद को कभी ना जानू। कभी भी ना
18:58
जानू तब भी कौन है? मैं ही हूं। अरे मैं ही हूं यार।
19:11
यही असली वाला जानना है मैं। जो जानने से भी परे
19:53
इसलिए तो कृष्ण के इतने विवाह हुए है ना तब भी वह ब्रह्मचारी
20:01
है। वह कहानी है ना कि नदी रास्ता दे देती है। कृष्ण अगर सदा से उपवासे हैं तो नदी
20:11
रास्ता दे देगी गोपियों। बोलते हैं नदी को नदी रास्ता दे देती है। वापस कैसे जाए? बोले कृष्ण
20:19
अगर बचपन से ब्रह्मचारी हैं तो नदी रास्ता दे देगी। नदी फिर
20:26
रास्ता दे देती है। अब कृष्ण के इतने बच्चे इतना इतनी
20:35
पत्नियां और यह सब फिर भी वह ब्रह्मचारी वह मैं है
20:41
ना मैं पे कोई नियम कायदा नहीं लगता है।
20:50
चाहे कितनी पत्नियां हो, कितना ही कुछ भी हो। हां, कृष्ण यानी मैं मैं आत्मा
21:00
कृष्ण। चाहे वो विवाह किसी से भी ना करते तब भी मैं ही रहता
21:08
ना। चाहे वो हजारों से किए तब भी मैं ही है।
21:17
मारेगा रिएक्शन मारेगा मैं बोल रहा है ना मारेगा
21:25
[हंसी]
21:53
अब एकदम सजग हो जाना यह केवल आत्मा कृष्ण के लिए है
21:59
बस आपके लिए नहीं है।
22:46
अति दुर्लभ होती है
22:47
[संगीत]
23:02
सहजावस्था इसलिए उपनिषद ने लास्ट में रख दिया विषय त्याग प्रथम दुर्लभो विषय त्याग
23:10
तत्व दर्शनम सेकंड आत्मज्ञान सेकंड थर्ड है दुर्लभो सहजावस्था
23:19
लास्ट में रखा गया है सद्गुरु करुणा
23:30
बिना क्योंकि आप देखो ना यार आप ही तो हो ना भटक गए पहुंच
23:37
गए शिष्य बन गए गुरु बन गए जीव बन गए भगवान बन गए मैं ही तो है ना अमित बन गए, सौरभ बन गए, विष्णु बन गए,
23:50
प्रज्ञा बन गए, कुछ भी बन गए। है तो मैं ही
23:58
ना बन गए तब भी मई है। नहीं बने तब भी मैं ही है। पापी बने, पुण्यत्मा बने हैं तो मैं
24:07
ही
24:15
तो इसमें अगर आपका लक्ष्य पाप करना है इस
24:20
ज्ञान के सुनने के बाद तो पाप का परिणाम मिलेगा।
24:29
क्योंकि अगर आपका सेंस है ना कि इससे मैं एकदम कुछ भी कर लूं पक्का उसका परिणाम
24:38
मिलेगा। फिर आप कितना ही ज्ञानबाजी करो कुछ नहीं होगा। यह सुनकर केवल आप अपने पाप खोज रहे हो,
24:45
दुष्कर्म खोज रहे हो तो उसको आपको भोगना पड़ेगा। उसका फल मिलेगा ही। चाहे आप कितना
24:52
ही बोलो फल वल कुछ नहीं होता। यह वो मिलेगा जरूर। पुण्य भी अगर सोच रहे हो तो उसका
24:59
पुण्य भी मिलेगा। ऐसा समझ के अगर पुण्य पुण्य कर रहे हो तो पुण्य भी मिलेगा।
25:08
लेकिन मैं की गंगा में पाप तो धुल ही जाते हैं, पुण्य भी धुल
25:16
जाते हैं। समझ रहे
25:23
हो? वहां ख्याल ही नहीं रहता इन चीजों का।
25:32
पाप पुण्य सब धुल जाते
25:39
हैं। केवल मैं का आकाश प्रत्यक्ष रहता
25:48
है। ना कोई पाप, ना कोई पुण्य, ना कोई जीव, ना कोई
25:54
भगवान, ना कोई ज्ञान ना कोई
26:01
अज्ञान बस मैं आकाश
26:38
मैं का ऐसा आकाश जिसमें मैं का भी ख्याल नहीं।
26:52
जिसमें मैं की भी याद
27:04
नहीं वह सहज पद है।
27:33
यह धरती का सबसे दुर्लभ सत्संग है। ये जो सुन रहे हो अभी हां
27:54
हम यही डालो धरती का सबसे दुर्लभ
28:10
सत्संग क्योंकि आप देखो ना बेवजह परेशान होते हो।
28:19
इतना भोगे तब भी आप ही है ना मैं ही है। इतना त्यागे तब भी मैं ही
28:28
है। दृश्य को देखे तब भी मैं ही हूं। दृष्टा में आप रहे तब भी मैं ही
28:38
हूं। तो यह सब आपका नाटक है। और क्या है?
28:48
खुद को देह मान लिए तब भी मैं ही हूं। खुद को आत्मा जान लिए तब भी मैं ही
29:00
हूं। तो देह मानने में आपने कुछ गलत नहीं कर दिया। और आत्मा जानने में खुद को कुछ आपने बहुत बड़ा काम नहीं कर
29:09
दिया। यह है सहजावस्था। यह मेरा रेंज है। आप लोग का नहीं है।
29:45
तो आप लोग को बोलना चाहिए मैं मेरी भी रेंज है। ऐसा जवाब देना चाहिए मेरे को। क्या ऐसा नहीं लगता आप लोग को?
29:55
लगता है ना क्योंकि यह आप लोग की भी रेंज है। वह इसलिए मैं अंकुश लगा रहा हूं कि इसका दुरुपयोग ना
30:03
हो। है तो यह सबकी रेंज एक ही आत्मा है। एक ही
30:11
परमात्मा क्योंकि सहजावस्था में अगली लाइन सामने वाला भी बोलता है। केवल इधर से नहीं बोला
30:19
जाएगा। हां जी। क्या सौरभ जी सुन रहे हो? नहीं सुन रहे
30:29
हो? आज
30:56
अच्छा है ये सबको जा रहा है ना सत्संग इसमें क्या है कचरा लोग हट जाएंगे है ना
31:04
सिलेक्टेड लोग पे जिस पे मेरे को वर्क करना है वह उसपे वर्क होगा बढ़िया
31:38
अब सबके कल्याण की भावना तो रहती है सर्वे भवंतु सुखिना बट सामने वाला खुद अपना कल्याण
31:46
नहीं चाहता तो उसको आप जबरदस्ती नहीं कर सकते। समझ रहे
32:03
हो?
32:05
तो मेरे द्वारा मैं के द्वारा पूरे पृथ्वी वासियों का कल्याण हो जाए तब
32:14
भी कौन है? मैं ही हूं। और किसी का भी कल्याण मत हो तब भी कौन
32:22
है? खत्म ना बात यार।
32:30
हां। तो हर हालत में मैं ही हूं भैया।
32:50
तो बेहोश कौन होता है? बेहोश हो गया, मूर्छित हो गया। कौन होता
32:59
है? होश में कौन आता है? तो मैं आपके होश बेहोशी से विराट है ना?
33:10
मेरी इस बात को आप काट ही नहीं सकते। अपने आप को कैसे
33:18
काटोगे? फस गए सुन के।
33:34
और आप हर समय इसी में हो। पूछो कैसे?
33:43
देखो मन दो जगह रहता है। याद रखना। एक रहता है चंचलता में। दूसरा रहता है मूर्छा
33:52
में। जैसे गहरी नींद में सुशुप्ति में वह मन की अवस्था है।
33:59
सुशुप्ति सुशुप्ति कोई आत्मावत्मा की मत समझ लेना। मन की
34:07
अवस्था गहरी नींद और चंचलता दो जगह
34:16
मन रहता है। तो अभी जो आप लोग मेरे को सुन रहे
34:21
हो अगर मन चंचल होता तो आप सुन ही नहीं सकते। मन इधर-उधर जाता।
34:30
और अगर आप मूर्छित होते तो भी आप सुन ही नहीं
34:36
सकते। तो आत्मा में रह के ही तो सुन रहे हो। अपने स्वरूप में स्थित होकर ही तो सुन रहे हो। इसलिए हर कोई स्वरूपस्थ है,
34:50
समाधस्थ है। वह समाधि नहीं लगाने वाली कि एकांत में बैठ गए और अपने ब्रह्म रंद्र
34:58
में सुषुमना में जो योगी लोग करते वह वाली समाधि की बात नहीं कर रहा हूं। वह भी मन
35:04
की समाधि है। यह सहज समाधि है। एकदम सहज व्यवहार में भी
35:15
है। इसी समाधि में तो युद्ध की आज्ञा दी है ना। वरना वो व्यवहार और तीर कैसे चलाता अर्जुन?
35:27
जो हर हालत में रहे वही तो सत्य होगा ना भाई। अभी जो आप लोग मेरे को सुन रहे
35:34
हो तो आत्मा से ही बोलना सुनना हो रहा है ना ये
35:39
सब ना मूर्छा है ना चंचलता है
36:02
हर कोई मैं में ही है, आत्मा में ही है। हर सिचुएशन में हर स्थिति परिस्थिति
36:11
में इवन अस्थिति में भी आत्मा में ही है।
36:24
इसी को जैसे गोविंद समझाया ना तो स्थित प्रज्ञ बोले प्रज्ञा यानी बुद्धि जिसकी बुद्धि
36:33
स्थिर हो गई तो आप कहां सदा स्थित होते हो ये
36:45
बताओ मैं मैं वहां वहां इवन स्थिति या स्थिति दोनों नहीं है। है ना? सहज में स्थित हो ना वहां
36:54
पे। जिस स्थिति या स्थिति से आपका परिचय है वो दोनों नहीं। सहज में हो जो
37:25
तो यह सब नहीं सुने थे आधे घंटे पहले तब भी मैं ही था ना सुन लिए तब भी मैं ही हूं
37:32
ना यार यह सामान्य पद है कुछ हो गया सुन के वह विशेष पद आ गया
37:43
अरे यार क्लियर हो गया कुछ हो गया जान गया वह भी विशेष पद है कि यार इतनी बड़ी बात
37:49
सुन लिया मैं और कुछ हो गया ना गया ही भैंस पानी
37:55
[हंसी]
37:58
में पहले भी मैं ही था ना ये सुन लिया तो भी मैं ही हूं सिंपल बात है यार
38:07
ये वो अहंकार क्या है मन विशेष खुश सोचता है।
38:32
तो कोई अज्ञानी है तो भी मैं ही हूं। कोई बुद्ध पुरुष हो गया तो भी मैं ही हूं। कोई बड़ी चीज थोड़ी ना है कि आप
38:41
बुद्ध हो गए और कोई अज्ञानी हो गया।
39:03
अब सारी बाउंड्रीज तोड़ दी
39:06
[हंसी]
39:08
अब मजा आ जाता है बाउंड्री तोड़ने में
39:21
बकवास है बाकी सब बस मैं हूं ना यार क्या करना है
40:26
हां जी हम रोरा जी बताइए
40:45
ये परम गुह ज्ञान है।
40:57
गुहतम गुप्त भी जिसको गुप्त बोलता है। मनुष्य जिसको गुप्त बोलता है। नहीं
41:03
गुप्त भी जिसको गुप्त बोलता है। वो
41:14
ज्ञान और इस पर सबका अधिकार है कायदे से हां बट सजग होके सुनना गलतियां नहीं
41:24
करना पाप पुण्य में मत फंस जाना भोग और त्याग में मत फंस
41:31
जाना त्याग भी फंसना है बता रहा हूं भोग वो भी फंसना है।
41:39
लक्ष्य बस मैं आत्मा भगवान बस मैं हूं।
41:47
ठीक है। सभी को प्रेम प्रणाम।