0:04
[संगीत]
0:16
कोई कुछ देखा कोई कुछ
0:24
देखा यानी नारायण को आप क्या देखते हो नर देखते हो जो मैं आत्मा आत्मा नारायण है उसको क्या देखते
0:32
हो नर तो यही है कोई कुछ देखा कोई कुछ
0:41
देखा ये प्रगट ब्रह्म है इसको आप संसार देखते
0:52
हो मन के जैसा शांत कुछ भी नहीं है उसको आप मन देखते हो चंचलता चलता देखते
1:03
हो। अब मन के जैसा शांत कैसे कुछ नहीं है? ऐसा पूछा करो ना।
1:14
मन के जैसा शांत
1:18
[हंसी]
1:24
मन के जैसा शांत अशांत
1:31
अशांति का नाम ही मन है। वह आज तक आपने सुना होगा। है ना? हम क्या बोल रहे
1:37
हैं? मन के जैसा शांत कोई नहीं है। कैसे? अरे बताओ ना कैसे?
1:46
[हंसी]
1:57
मन गलत जगह में है तब अशांत है। मन अगर सही जगह में है आत्मा में है
2:08
तो उसके जैसा कोई शांत नहीं है। वही अमन है या शांत है जैसा बोल लो
2:15
आप। अब मन अगर गलत जगह में है तो वह तो बवाल मचा देगा।
2:26
मन को अपने होने के एहसास में रखो अभी
2:35
भला। हां कैसा लगता है? मन जैसा कोई शांत
2:43
है? नहीं है ना? आप उसको अशांत देखते हो।
2:50
कोई कुछ देखा? कोई कुछ
3:01
देखा अब मैं को आप जीव मानते
3:07
हो और फिर क्या खोजते हो? बोलो ना भगवान खोजते हैं। जीव ही तो
3:15
भगवान खोजेगा ना। भगवान थोड़ी ना भगवान खोजेगा।
3:20
नदी ही सागर खोजती है। सागर सागर नहीं
3:29
खोजता। तो मैं को जीव माना। अब भगवान की तलाश शुरू। भगवान का स्मरण
3:41
शुरू। अब भगवान का स्मरण क्यों करना चाहिए भाई?
3:51
बताओ क्योंकि वह भगवान है इसलिए उसका स्मरण करना चाहिए। कॉमन सेंस
4:03
हां अब वो भगवान है तो आप उसका स्मरण कैसे करोगे? भगवत स्मरण कैसे करोगे?
4:16
भगवान तो निरंतर है। भगवान क्या है? निरंतर है। तो उसका
4:26
स्मरण या भजन भी निरंतर होना चाहिए।
4:38
[संगीत]
4:41
हां भाई खुद को जीव माने तभी स्मरण है
4:54
ना अपने मैं को जीव माने तभी स्मरण है
5:02
ना और जब मैं भगवान से भिन्न नहीं
5:12
मैं भगवान से भिन्न नहीं तो स्मरण
5:20
कैसा करेगा कौन शुरू में ठीक है अगर आप जीव भाव से
5:30
ग्रसित हो जो कि हर कोई रहता है तो भगवान का नाम लो उसको याद बात करो तो उससे
5:37
कल्याण होता है। तब जाके लास्ट में यह पोजीशन आती है। है
5:47
ना? स्मरण क्यों करता है आदमी बताओ? जीव हो या कोई भी हो क्यों करता है स्मरण?
5:57
हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। हर किसी को कितनी इच्छाएं रहती है? चार
6:07
इच्छा। धर्म, अर्थ, काम,
6:12
मोक्ष। सारी इच्छाएं इन चारों इच्छाओं में आ जाती है। और हर कोई ये चार इच्छाएं ही
6:20
करता रहता है किसी ना किसी तरीके से। इसलिए स्मरण करता है।
6:32
अब भरत क्या बोल रहे हैं? धर्म ना अर्थ ना काम ना मोक्ष ना चाहूं
6:40
निर्वाण जन्मजन्म रति राम पद
6:50
जन्मजन्म अब प्रेम हो गया तो स्मरण करना पड़ेगा।
7:01
प्रेम नहीं हुआ तभी तक स्मरण है। प्रेम हो गया तो क्या स्मरण करना
7:08
पड़ेगा? जैसे नॉर्मल किसी को प्यार हो जाता है एक दूसरे से तो क्या वो लोग याद करते रहते हैं?
7:17
बताओ नहीं करते ना?
7:21
स्वाभाविक प्रेम रहता है ना सहज सने तुम संग सहज
7:29
सने जाह न चाहू कबू कुछछु तुम संग सहज
7:38
सनेह सहज सनेह में स्मरण नहीं
7:43
है। कोई क्रिया कर्म ये वो कुछ नहीं
7:50
है। सहज स्नेह में
8:01
जैसे किसी का पुत्र गया हुआ है। कहीं अदर कंट्री में
8:08
है तो मां क्या उसको बार-बार याद करती है
8:14
क्या? सहज स्नेह रहता है मां का। उसको याद नहीं करना पड़ता।
8:33
काम ही कोई पुरुष है उसको नारी को याद करना पड़ता है क्या?
8:41
अपने आप याद आती है
8:43
[हंसी]
8:49
उसको जो धन का प्रेमी है धन को क्या याद करना पड़ता है
8:57
उसको वो खाता है तो धन में रहता है सोता है तो धन में सपना भी उसी का देखता है उसकी आत्मा भी धन होती है तो धन से उसका क्या होता है?
9:11
सहज नारी से उसका क्या होता है? सहज स्नेह। तो यही सहज
9:21
स्नेह जब स्वयं से हो जाता है। मैं आत्मा भगवान से तो चैप्टर
9:30
क्लोज। स्मरण का चैप्टर क्लोज। भगवान का चैप्टर शुरू।
9:40
सहज सनय में स्मरण नहीं है। भले भय जो हरि
9:51
बिसरो ये सहज स्नेह है। भले भय जो हरि
9:58
बिसरो सर से टली बला
10:02
है। जैसे थे वैसे भय अब कछु कहा ना
10:11
जाए। अच्छा हुआ मैं भूल गया भगवान को। भला हुआ।
10:19
लेकिन हरि को भूलने से पहले पहले आपको संसार को भूलना पड़ेगा। यह बाद की बात
10:27
है। ऐसा नहीं कि हरि को भूल गए हो संसार याद है। गड़बड़ हो
10:33
जाएगा। पहले संसार भूलो दुनियादारी भूलने के लिए हरि का स्मरण भगवान का
10:42
स्मरण। फिर भगवान को भी भूल जाओ। क्योंकि वह आपकी आत्मा ही है। वह आप ही हो और सबकी
10:51
आत्मा है।
11:09
तो यहां तक तो ठीक है सब पल्ले पड़ता है। अब सर्वकाल में तू मेरा स्मरण भी कर
11:17
अर्जुन और युद्ध भी कर। अब सर्वकाल में कोई कैसे स्मरण
11:25
करेगा? अब युद्ध करते समय वह कैसे कृष्ण कृष्ण याद करेगा? याद करेगा तीर नहीं चला
11:34
पाएगा। बताओ भला
11:46
हम अच्छा सर्वकाल मतलब गहरी नींद। चलो सपने में तो
11:53
कर लेगा। गहरी नींद में कैसे स्मरण करेगा? सर्वकाल में तू मेरा स्मरण भी कर
12:04
और युद्ध भी कर। कैसे पॉसिबल है बताओ?
12:22
है कोई बताने वाला। अरे थोड़ा बुद्धि तो
12:30
लगाओ। हम अपने में रह के
12:41
भाई अपने में ही तो रह रहे हो ना आप। और कहां रह रहे हो?
12:47
स्वरूप में ही हो ना स्थित स्वरूपस्थ ही हो ना उसका
12:57
स्मरण उसका भी स्मरण करोगे तो गड़बड़ हो जाएगा ना सर्वकाल में कैसे होगा
13:10
कृष्ण हो के युद्ध कृष्ण होकर के युद्ध करना करना है तो कृष्ण नहीं कर
13:17
लेते। अर्जुन को क्यों बोले?
13:24
बताओ सर्वकाल में तू मेरा स्मरण भी कर और युद्ध भी कर। मतलब सर्वकाल में तू स्मरण
13:33
भी कर। अपने ऑफिस का काम भी कर। घर का काम भी कर। है ना?
13:42
जो भी आपका काम है वह भी कर। यह कैसे पॉसिबल
13:53
है? बताओ ना भाई। सर्वकाल में जो
13:59
रहेगा उसी का स्मरण सर्वकाल में होगा ना।
14:07
बताओ युद्ध सर्वकाल में हो सकता है क्या? जागृत
14:14
स्वप्न सुशुप्त में युद्ध हो सकता है क्या? कोई भी चीज सर्वकाल में नहीं हो
14:23
सकती ना। तो जो सर्वकाल में है उसी का स्मरण
14:31
सर्वकाल में होता है। तो सर्वकाल में कौन है?
14:43
बताओ पक्का। गहरी नींद में मैं कैसे हूं भैया? बताओ।
14:52
होता है जब ये बोलता है कि ये हम
14:59
हम तो गहरी नींद में कौन बोलता है ये गहरी नींद
15:08
है गहरी नींद में मैं गहरी नींद का अनुभव करता हूं सहज में और सुबहेरे जब मेरे पास
15:16
मन बुद्धि वापस आती है वाणी वापस आती है तो बोलता हूं कि मैंने गहरी नींद का अनुभ
15:22
अनुभव किया 4 घंटे चार सेकंड जैसे लगे तो
15:28
इट मींस मैं गहरी नींद में भी हूं स्वप्न और जागृत में तो मैं हूं ही
15:35
हूं तो सर्वकाल में मैं ही
15:42
हूं। सर्वकाल में मैं ही हूं।
15:50
कि सर्वकाल में स्मरण भी है।
15:58
सर्वकाल में मैं ही हूं। यही सर्वकाल में स्मरण है। इस बात का
16:07
निश्चय कि सर्वकाल में मैं ही तो हूं। यही स्मरण है ना। वह स्मरण नहीं है कि आप
16:16
याद करोगे मैं हूं मैं हूं ना वह तो फिर खंडित हो जाएगा वो
16:23
सेंस कि सर्वकाल में सर्व अवस्थाओं में भूत भविष्य वर्तमान
16:31
सर्वकाल और सर्व अवस्था जागृत स्वप्न सुशुप्ति मैं केवल मैं
16:38
हूं मैं ही तो हूं तो
16:48
मैं भगवान से भिन्न
16:54
नहीं। भिन्न मान के ही तो स्मरण करते हो
17:02
ना। अलग मान के ही तो स्मरण करते हो आप।
17:07
अब मैं भगवान से भिन्न
17:16
नहीं। तो अब स्मरण कैसे करोगे? स्मरण की जरूरत ही नहीं है
17:28
ना। बट ये क्लियर हो तब प्रत्यक्ष हो तब।
17:44
तो सर्वकाल में जब मैं ही रहता हूं तो स्वाभाविक है मैं का स्मरण हुआ ना
17:52
वो करने वाला नहीं हुआ सहज हुआ
17:59
ना तुम संग सहज सने
18:11
तो जो सर्वकाल में मैं हूं वो सहज है
18:17
ना और सहज से स्नेह भी सहज है
18:24
ना करने वाला स्मरण नहीं है।
18:37
स्मरण और विस्मरण ये वाला स्मरण नहीं
18:45
है। अनुस्मरण जहां किसी भी तरह का स्मरण नहीं
18:58
है। भगवान का क्या स्मरण होता है? जहां किसी भी तरह का स्मरण नहीं वही
19:06
भगवत स्मरण। तब आप अपने में आ गए
19:12
ना। किसी भी तरह का अगर स्मरण कर रहे हो तब आप अपने में नहीं हो। भगवान में नहीं
19:19
हो। किसी भी तरह का स्मरण ना करना ही भगवत
19:28
स्मरण है। प्रैक्टिकल जियो इस पॉइंट में अभी
19:38
किसी भी तरह का स्मरण ना करना। भगवत स्मरण
19:48
है। मत करो किसी भी तरह का स्मरण। ना किसी भगवान का, ना किसी
19:57
का, ना स्वयं का, मैं हूं, मैं हूं भी मत
20:06
बोलो। किसी भी तरह का स्मरण करो ही मत।
20:14
अरे बोलो
20:22
हम क्या लगता
20:29
है किसी भी तरह का स्मरण ना करना ही
20:36
भागवत स्मरण है।
20:49
क्योंकि करने वाला स्मरण तो सर्वकाल में हो नहीं सकता।
21:04
तो इसका अर्थ क्या यह है कि दुनिया भगवान का स्मरण नहीं कर रही है तो वह भगवान में
21:12
है। जिसको अध्यात्म में रुचि नहीं है वो तो स्मरण करता ही नहीं
21:19
है। क्या इसका मतलब क्या वो भगवान में है क्या? वैसा
21:26
भी नहीं है। और ऐसा भी नहीं
21:35
है। तो आपके लिए है यह सूत्र कि किसी भी तरह का
21:43
स्मरण ना करना ही भगवत स्मरण। प्रैक्टिकल करके देखो ना।
21:52
अभी कुछ भी स्मरण मत करो। बस तुरंत भगवान में आ जाओगे यानी स्वयं में आ
22:02
जाओगे। स्वयं का भी स्मरण मत करना। मैं हूं मैं हूं भी मत बोलना।
22:24
किसी भी तरह का स्मरण ना करना।
22:31
यही भगवत स्मरण है।
22:48
कैसा लग रहा है इसमें बताओ हम
22:57
वाओ आप बताओ मुस्कान
23:06
है और कोई बताएगा किसी भी तरह का स्मरण करो ही मत
23:19
यही सर्वकाल में स्मरण
23:26
है। करने वाला नहीं है ये।
23:36
हां। किसी भी तरह का स्मरण ना करना ही।
23:44
भगवत
24:05
स्मरण। अरे फ्री क्यों नहीं हो पा रहे हो स्मरण से?
24:11
किसी भी तरह का स्मरण मत करो ना। फिर वोट देते हो डांटता हूं मैं। अपुन
24:19
तो डांटेगा ना। गड़बड़ करोगे
24:30
तो किसी भी तरह का स्मरण करो ही मत। और तुम भगवान हो फिर।
24:41
अरे यार भगवान किसी का स्मरण करता है क्या? किसी भी तरह का स्मरण करता है
24:50
भगवान तो उसी के जैसे रहो ना तो मैच हो जाएगा
24:59
ना। और यह भी याद मत करो भगवान यह करता है वह करता है। किसी भी तरह का स्मरण मत करो।
25:20
परम स्वतंत्रता है ना
25:54
हम बताओ कैसा लगता है? लगता है भगवान जैसा कुछ
26:06
अपने जैसा लगता है। वो असली भगवान अगर भगवान बोले
26:29
तो किसी भी तरह का स्मरण ना करना। यही भगवत स्मरण
26:43
है। अभी कुछ कुछ स्मरण कर रहे हो आप। कुछ कैच करना चाह रहे हो। कुछ समझना चाह रहे
26:51
हो। कुछ हो जाए ऐसा चाह रहे हो। फेंको यह सब किसी भी तरह का स्मरण करो ही
27:00
मत। फ्री
27:37
भूल जाओ भगवान को भी भगवान को भूलने की ताकत केवल भगवान में होती
27:47
है। मैं आत्मा भगवान किसी भी तरह का स्मरण मत
28:06
करो। बिल्कुल भूल ही जाओ भगवान को।
28:55
हम क्या लगता है बताओ गहरागहरा
29:04
गहरागहरा ठीक है लेकिन कुछ और बताओ ना यार
29:12
[संगीत]
29:14
हम गलत और बताओ अरे भले भले भय जो हरि
29:23
बिरो सर से टली भला है इस पॉइंट में जियो
29:32
ना हम विश्राम भी ठीक आंसर है मतलब मजेदार
29:39
नहीं है वो तो अब मेकअप कर रहा है तू
29:55
निर्भ भी ठीक आंसर है। मजेदार नहीं है। वाओ फिर भी अच्छा आंसर
30:03
था। और कोई भले भाई जो हरि मिश्र
30:25
कोई बताने वाला नहीं है। मैं तो नहीं बताएगा। आप ही लोग को बताना है।
30:34
फक्कड़ टाइप लगता है। यस फक्कड़ टाइप लगता है। यह हुई ना बात।
30:42
बेफिक्री फक्कड़पन। अकड़ भूल जाता है भगवान को भी पहले संसार
30:50
को देन भगवान को भले भय जो हरि विष्णु सर से टली भला
31:01
है अरे भला हो गया था हरी हरी हरी हरी सिर
31:09
में है सर से टली भला है
31:16
जैसे थे वैसे भय अब कछु कहा ना
31:26
जाए। तो आप लोग भगवान के लिए आए थे। हम भगवान ही भुला रहे हैं आप लोग को।
31:52
क्या होता है मालूम बहुत गहरी बात क्या है इंपॉर्टेंट
31:59
बात की पॉइंट एकदम एकदम लास्ट मास्टर की
32:18
मेरे बात को याद रखना। एक शब्द भी इधर-उधर नहीं होना चाहिए। ठीक
32:33
है? शुरू में ठीक है। भगवान को याद किया।
32:37
बाद में भगवान को भूलने पर ही भगवान मिलता
32:53
है। एक गुरु मंत्र बता रहा हूं। अंतिम मंत्र लास्ट
33:01
मंत्र बाद में भगवान को भूलने पर ही भगवान
33:07
मिलता है। भूल जाओ यार।
33:26
अच्छा लग रहा है ना भूल के?
33:35
हां बताओ बताओ बोझ तो गया ना
33:43
भाई शुरू में याद करो जब तक तुम संसारी हो विषय में आसक्त हो तो भगवान को ही याद करो
33:53
हां क्योंकि वो भगवान है भैया उसको याद करना ही पड़ेगा उसका नाम लो
34:00
उसका स्मरण करो ताकि कि आप विषयों से मुक्त हो जाओ। है ना? और जब विषयों से मुक्त हो गए,
34:10
दुनियादारी से मुक्त हो गए। अब भगवान भगवान कर रहे हो। भगवान भगवान भगवान। अब
34:20
आप भूलोगे तभी मैं
34:26
मिलूंगा। भूलने से भगवान मिलता है यार। भगवान को भूलने से भगवान मिलता
34:38
है। जिगरा चाहिए भगवान को भूलने के लिए। और भगवान को कौन भूल सकता है? भगवान ही
34:46
भूल सकता है। फक्कड़ भूल सकता
34:54
है। भले भय जो हरि मिश्र
35:02
[हंसी]
35:34
तो फाइनल मैसेज भूल जाओ भगवान को।
35:45
जीव क्या कांप जाता है सुन के डर जाता है हम जीव को सुना ही नहीं रहे हैं
35:53
भैया हम आपका अंतर्यामी को सुना रहे हैं जो भगवत स्वरूप है जो सब जगह विराजमान
36:01
है और वो ईजीली बोलता है भूल जाते हैं क्या है उसमें अपना क्या जाता है
36:09
सीधा बोलता है। हां। बोलता है नहीं बोलता है। बराबर
36:19
बोलता है ना? ये किस टाइप का गुरु है?
36:35
भगवान को भूलने के लिए बोल रहा है। यहां पूरा सब बोलते हैं भगवान को याद करो। ये
36:42
भूलने को बोल रहा है। अब मैं क्या करूं? मेरे को जो आता है मैं वही तो
36:50
बताएगा ना। है
36:59
ना? अब मैं शर्त रखता हूं। जितने लोग आप याद करते हो भगवान को विषय से छूट गए हो
37:08
वह बहुत अच्छी बात है। भगवत स्मरण विषय से छुटा देता है। पवित्र कर देता है। भगवान
37:14
का स्मरण व्यर्थ नहीं जाता। ठीक है? बहुत सुंदर बात है। लेकिन उसके बाद आप वही कर रहे हो। कर रहे हो कर रहे हो। भगवान मिला
37:23
तो बता दो। आपका अंतर्यामी सीधा बोलेगा नहीं
37:32
नको मराठी में नको बोलते हैं ना नहीं बोलेगा है कि
37:38
नहीं और मेरी एक बात मान के देख लो अभी मान के देखो अभी मिलता हूं
37:48
मैं भूल जाओ भगवान को किसी भी तरह का स्मरण करो ही मत
37:55
यही भगवत स्मरण भूल के
38:07
देखो। अरे भूल जाओ।
38:42
एकदम फ्री हो जाओ बेफिक्र
38:52
परमात्मा बेफिक्रों को मिलता है और किसी को नहीं मिलता। अकड़ों को मिलता
39:08
है। उसको याद कर के उसको परेशान कर रहे हो। उसको नहीं मिलता।
39:35
सीमा होती है ना शुरू में ठीक है। अब आपका कोई प्रेमी है या प्रेमिका है। अब आप उसको बोल रहे हो नहीं मैं नहीं
39:45
जी सकता तेरे बगैर। नहीं जी सकता, नहीं जी सकता। अब दिन रात अगर आप यही बोल रहे
39:55
हो तो वो तो भागेगी ना। छोड़ के सीमा होती है ना। अब उसको आप गले से
40:05
लगा रहे हो और लगा छुए हो। लगा छुए हो। अब एक सीमा पार हो गई।
40:12
नहीं मैं लगा के रहूंगा। अब उसको घुटन हो रही है और आप
40:18
छोड़ ही नहीं रहे हो तो भागेगी ना वो तो आप परमात्मा के साथ यही कर रहे
40:29
हो। क्या कर रहे हो? यही कर रहे हो। नहीं मैं तेरे को याद करूंगा ही
40:38
करूंगा। यह अहंकार है आपका। मैं पा के रहूंगा, मिलके रहूंगा, जान के
40:48
रहूंगा। अरे भूल जाओ ना बाबा शांत हो जाओ।
41:05
यही नियम काम करता है। आपकी गर्लफ्रेंड है तीन-चार दिन उसको याद भी नहीं किए आप। फोन भी नहीं किए। एकदम भूल
41:14
गए। वो सोचती है क्या हो गया इसको? उसकी फोन आती है। होता है ना ऐसे? भाई दुनिया का नियम कायदा है ना कुछ?
41:26
[हंसी]
41:28
सेम परमात्मा में ऐसे होता है। खबरदार उसको याद नहीं
41:34
करना तब वो आपको याद करेगा।
41:41
क्या सिंपल नियम है। कोई ज्यादा बड़ी चीज नहीं है। अध्यात्म अगर कॉमन नियम चलता है
41:47
हर जगह। तो किसी भी तरह का स्मरण करो ही मत।
42:00
यही हरि स्मरण है। असली स्मरण भगवत
42:19
स्मरण। अब किसी भी तरह का स्मरण मत करो। यह बात भी बार-बार मत करो। क्या?
42:29
[हंसी]
42:34
किसी भी तरह का स्मरण मत करो। यह बात भी बार-बार मत
42:42
करो। अरे अवधूत पकड़ राम।
42:48
हां। क्या करना है यार? शाम हो गई। चायवा
42:56
पियो। हां। चाय के स्मरण तक क्षम्य
43:04
[हंसी]
43:25
है। तो अब हम जो भी बताएंगे आप उसका स्मरण
43:32
करोगे। इसलिए अब हम कुछ नहीं बताएंगे। ठीक
43:48
है? होता क्या है ना लोगों को सेंस नहीं। देखो
43:59
यार पते की बात क्या है बताऊं आप प्रेमीप्रेमिका साथ में बैठे
44:08
हैं एक दूसरे के साथ आंखें मिलाए हैं डूबे हैं उस समय अगर वो एक दूसरे का स्मरण कर
44:17
रहे हैं तो आप क्या बोलोगे मूर्ख है बोलोगे क्या बोलोगे?
44:31
मूर्ख। अब परमात्मा के मामले में आमनेसामने तो मामला है ही नहीं।
44:44
आमनेसामने में भी जब प्रेमी प्रेमिका स्मरण नहीं करते है ना डूबे रहते
44:52
हैं। परमात्मा के मामले में तो आमनेसामने भी नहीं
44:59
है। आपके मैं से भगवान भिन्न है ही नहीं। तो स्मरण कैसा और विस्मरण
45:07
कैसा और डूबना भी कैसा जो चीज डूबी ही हुई है उसको कैसे
45:14
डूबाओगे और अपने में ही डूबी हुई है। किसी और में नहीं डूबी हुई
45:22
है। मछली सागर में डूबी हुई है। ऐसा नहीं
45:30
है। ऐसा नहीं
45:36
है। मछली भी पानी और सागर भी
45:44
पानी। हां, मछली भी पानी और सागर भी पानी। समझ लो बर्फ की मछली
45:53
है। और बर्फ की मछली डूबी हुई है। तो बर्फ भी पानी, सागर भी पानी।
46:02
इस टाइप का मामला है तो तो स्मरण कैसा और विस्मरण
46:18
कैसा जब प्रेमी प्रेमिका साथ होते हैं तो स्मरण नहीं करते और भगवान आत्मा तो मैं ही
46:28
है तब आप क्यों स्मरण करते हो और विस्मरण करते हो
46:34
यार विकल्प है यह स्मरण और विस्मरण
46:48
दोनों मैं हूं तक का स्मरण नहीं होता यहां। वह तो मैं हूं ही ना तो मैं हूं।
46:59
क्यों बोलूं मैं जो मैं हूं उसको मैं क्यों बोलूं कि मैं
47:08
हूं तो अब याद की भी याद नहीं किसकी याद कौन
47:17
करे किसकी याद कौन
47:24
करे याद की भी याद नहीं किसकी याद कौन
47:41
करे? अब इस जगह से सर्वकाल में तू मेरा स्मरण भी कर और
47:49
युद्ध भी कर। इस जगह बोला गया था जहां स्मरण और
47:57
विस्मरण दोनों से आजादी है आत्म देश में जहां आत्मा के अलावा कोई
48:05
दूसरा है ही नहीं तो स्मरण किसका और विस्मरण किसका
48:12
यहां पे बोला गया था उस पॉइंट को
48:30
हां जी। अरे बात को समझो ना यार।
48:43
[हंसी]
48:47
प्रेमी प्रेमिका साथ में फिर से समझाता
48:51
[हंसी]
48:54
मैं पासपास बैठे हैं तो क्या वो एक दूसरे का स्मरण करेंगे
49:01
क्या अगर स्मरण कर रहे हैं तो वह प्रेमी प्रेमिका नहीं
49:08
[संगीत]
49:10
है। क्या समझे?
49:15
स्मरण कर रहे हैं तो वह प्रेमी प्रेमिका नहीं
49:23
है। अब इस सूत्र को लागू करो मैं आत्मा भगवान
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में। अगर आप स्मरण कर रहे हो तो आप भगवत प्रेमी नहीं हो। सहज समय में स्मरण की जरूरत नहीं
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होती। याद नहीं करना पड़ता। और भूलता भी नहीं
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है। सहज प्रेम में क्या याद करोगे? मैं आत्मा भगवान भी क्यों बोलोगे आप? या तू ही
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है तू ही है। भी क्यों बोलोगे आप? तो स्मरण कर रहे हो तो आपको भगवान से
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प्रेम नहीं है। बट यह चीज बाद में है। नहीं तो
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अज्ञानता घेर लेगी बच्चों। पहले स्मरण है। दुनियादारी से
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बचने के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह से बचने के लिए भगवान को याद करो। जो नाम आपको
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प्रिय है उसको याद करो। और हम जो अभी बता रहे हैं वह उसके बाद की बात है। और सही बात
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यही है। हां तो स्मरण कर रहे हो तो आपको भगवान से
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प्रेम नहीं है। हां जी।
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[हंसी]
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बताओ आ
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तो सर्वकाल क्या सर्वकाल का स्मरण करता है?
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नहीं करता ना प्रेम क्या प्रेम का स्मरण करता
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है? भगवान क्या भगवान का स्मरण करता है? स्मरण क्या स्मरण का स्मरण करता है?
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इसलिए मस्त रहो। भगवान वगैरह तो आप पहले से
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हो। मस्त रहो।
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पहले याद करो भगवान को फिर भूल जाओ भगवान को। यह डालना है टाइटल।
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हां पहले याद करो भगवान को फिर भूल जाओ भगवान
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को सुमिरन स्मरण ये वो सब डालो भैया हैशटग एक्सट असली चीज का पता तो
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चले लटके रहते नहीं तो स्मरण में ही सब उसको बीमारी बना लेते हैं यार अरे अरे
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प्रेम को कोई बीमारी बनाता है।
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प्रेम होता है ना तो ये सब बातें जरूरत ही नहीं रहती। यह सब प्रेम की कमी के कारण
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होता है। यह साधनाएं और यह जप और स्मरण प्रेम की कमी के
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कारण शुरू में ठीक है जब तक प्रेम पैदा हो जाए। बाद में यही गड़बड़ हो जाता
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है। क्योंकि प्रेम को जब तक सत्य से आप नहीं जोड़ोगे तो प्रेम वो गड़बड़ करेगा ही वो
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मोह बन जाएगा तो कुछ ना कुछ अलग चीज बन जाएगी। तो सत्य की
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धार जरूरी है। तब प्रेम का कमल खिलता
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है। सत्य से पूरा कटाई छटाई हो जाती है ना। बहुत जरूरी है वह।
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जो आपकी आत्मा में सहज है वो अचीव नहीं करना है पाना नहीं
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है आपके होने में सम्मिलित है जैसे आपके होने में साइलेंस आनंद
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सम्मिलित है वैसे प्रेम और ज्ञान भी सम्मिलित है।
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तो ठीक है। किसी भी तरह का स्मरण ना करना ही भगवत
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स्मरण है। सबको राम राम प्रेम प्रणाम।