0:19
देखो आपकी निष्ठा किस पे है?
0:23
बताओ किस पे है? बॉडी पे है।
0:31
कि मैं बॉडी हूं। आपकी निष्ठा अपने ब्रेन पे है। जो बुद्धि से समझते हो
0:40
वही सही है। ऐसा समझते हो आप।
0:47
आपकी निष्ठा बाहरी व्यवस्था पे है। डिपेंड हो आप इन पे।
0:54
सब बिखर जाएगा एक दिन। बॉडी भी, माइंड भी और बाहर जो भी है ना सब
1:01
बिखर जाता है। यह सब थोड़े देर का नाटक है। यह नाव डूब ही जाती
1:08
है। आपकी निष्ठा बुद्धि में ही होती है। तभी
1:18
तो परमात्मा को आप याद करते हो। आप सोचते हो याद करेंगे तब है।
1:26
नहीं करेंगे तब नहीं है। तभी तो याद करते हो ना।
1:34
और जब जिस समय याद नहीं कर पाते हो तब आप सोचते हो अरे गड़बड़ हो गई।
1:43
आपका ट्रस्ट इन्हीं चीजों में है। मन पर आपका ट्रस्ट है।
1:50
थोड़ा सा कहीं पर भी डाउट क्रिएट कर देता है मन। आप उसके में आ जाते हो। हां यार सही बोल रहा है।
1:59
थोड़े से डाउट में ना आपकी निष्ठा इन्हीं चीजों पे है।
2:12
और ये सब मिट जाते हैं। अनित्य पे आपकी निष्ठा है। तो नित्य क्या है भैया? कौन है नित्य?
2:24
शोरस कुछ तो डाउट कुछ तो
2:34
मैं हूं को बॉडी तो नहीं समझ रहे हो ईगो तो नहीं है कैसे बोल सकते हो आपका मैं
2:41
हूं ईगो नहीं है अब बताओ आज तो मैं सवाल पूछूंगा सबसे क्या क्यों
2:51
और कैसे हम
3:00
ओके भैया ईगो तभी आएगा जब मैं को बॉडी मानोगे
3:10
नहीं उससे पहले नहीं आएगा तो यह सब अनित्य है तो इनके बाद भी क्या
3:21
करना इन पर निष्ठा भी क्या करना इनकी बात भी
3:27
क्या करना ओके यह बॉडी छोड़ के चली जाएगी बॉडी के रिलेशन
3:36
छोड़ देते हैं सब जगह एक कहीं ना कहीं फरेब है
3:45
देवता छोड़कर चले जाते हैं आपकी बॉडी को आंख से सूर्य देवता चले जाते हैं कम दिखने लगता है बुढ़ापे में मेरे को तो अभी से कम
3:54
दिख रहा है। कान से, जीभ से सारे देवता छोड़ के चले जाते हैं।
4:05
जैसे बुढ़ापा आता है ना आप वीक होने लगते हो। देवता ही तो भोगते हैं आपकी बॉडी से। आपको लगता है आप भोगते हो।
4:16
देवता ही भोगते हैं। जीभ से वरुण देव भोगते हैं। आंख से सूर्य, हाथ से इंद्र,
4:31
लेकिन जैसे ही बुढ़ापा आता है, सब जाने लगते हैं।
4:39
किसी पर आप विश्वास नहीं रख सकते। निष्ठा नहीं कर सकते।
4:49
आपके प्रेमी जो आपको आश्वासन देते हैं
4:57
कि जीना मरना तेरे लिए मैक्सिमम थ्री ईयर।
5:04
मैक्सिमम बता रहा हूं। आप जिसको प्रेम समझते हो वह भी कभी आता है
5:13
और कभी नहीं आता आपके जीवन में। आप जिसको ज्ञान समझते हो वो भी आने जाने
5:22
वाला है। तो निष्ठा किस पे करोगे यार आप? जिओगे कैसे?
5:37
यह तो सब अनित्य है। सब मिट जाएगा। जो भी आप जान रहे हो, समझ रहे हो, देख रहे
5:46
हो ना, सब बिखर जाता है। और यह आप नहीं हो। यह याद रखना।
5:54
यह आप नहीं हो। जैसे मेरा घर बोलते हो ना
6:02
मैं घर ऐसा थोड़ी ना कहते हो मेरी कार
6:09
मैं कार हूं ऐसा थोड़ी ना कहते हो इट मींस आप घर नहीं हो ना
6:17
और आप कार की हो बॉडी को क्या बोलते हो आप
6:25
मेरी बॉडी मेरा शरीर इसका मतलब श्योर
6:34
अच्छा मन को क्या कहते हो बुद्धि को अपने प्राणों को
6:43
मेरे प्राण है ना इसका मतलब नहीं बीच में मत बोलिए
6:52
इसका मतलब आप प्राण बॉडी बॉडी माइंड ये सब नहीं हो ना
7:00
श्योर होस अभी मृत्यु आ जाए तो तब भी श्योर हो
7:09
ज्यादा ही कॉन्फिडेंस नहीं आ गया आप लोग को ऐसे कैसे इतना कॉन्फिडेंस कैसे आ रहा है
7:22
यानी आवाज एकदम स्ट्रेट आ रही है सही जगह से अच्छा लग रहा मैं टेस्ट कर रहा हूं।
7:33
ओके। तो ये मेरा कहते हो ना आप? मेरी
7:44
इंद्रियां, मेरा शरीर, मेरे प्राण, मेरा मन, मेरी बुद्धि।
7:52
इट मींस ये आप नहीं हो। और यह सब छोड़कर चले ही जाते हैं। इन पर आप विश्वास नहीं
7:59
रख सकते। यह विश्वास पात्र नहीं है। आपके विश्वास के पात्र ही नहीं है।
8:07
यह सब। अब इस बॉडी के रिलेशन
8:15
क्या विश्वास पात्र हैं? जब यह बॉडी ही विश्वास पात्र नहीं। इसके रिलेशन कैसे विश्वास पात्र होंगे?
8:30
अच्छा अब ब्रेन बुद्धि से जो भी ज्ञान आप अर्जित करते हो बौद्धिक ज्ञान 100 किताबें पढ़ते हो क्या वह विश्वास पात्र है?
8:43
कैसे बोल सकते हो बताओ?
8:48
जो भी सीखते हो, समझते हो मिस हो जाता है और आपके सत्य बदलते रहते
8:59
हैं। बचपन में आपको कुछ और सच लगता था। फिर एक ऐज में कुछ और फिर कुछ और अभी कुछ
9:06
और। है ना?
9:10
ठीक। तो जितना भी मेरा वाले हैं ना यह विश्वास पात्र
9:19
अच्छा बाहर जो भी देख रहे हो यह भी परमानेंट है क्या?
9:25
ये पृथ्वी भी परमानेंट नहीं है। इसकी भी एक ऐज है। सूर्य की भी एक एज है। ठीक है।
9:31
लंबी है। बट है तो एज।
9:43
तो फिर क्या है जिस पर मैं निष्ठा रखूं,
9:50
भरोसा रखूं, श्रद्धा रखूं। एक क्षण को भी जिसका अभाव नहीं होता। ऐसा क्या है?
10:02
मैं आपका होना। स्वयं का एक क्षण को भी अभाव होता है क्या?
10:14
नहीं होता है। बचपन से अभी तक इतनी सारी चीजें बदली।
10:26
इतने सारे आपको अनुभव हुए। सुखदख इतने विचार आए। खरबों विचार बचपन से अभी
10:33
तक खरबों भाव आए आपका मैं बदल गया क्या
10:40
नहीं बदलना अनचेंजबल है श्योर
10:51
अच्छा इतने कर्म किए अच्छे बुरे सही गलत
10:57
उसके फल भी भोगे उन कर्मों से बचपन से अभी तक जो भी कर्म
11:06
आप किए हो आपका मैं कुछ बिगड़ गया क्या या बन गया क्या मैं गलत करने को नहीं कह रहा हूं इसको याद
11:15
रखना लेकिन आपका होना आपका स्व बिगड़ गया क्या
11:23
नहीं बिगड़ा ठीक तो विश्वास पात्र तो मैं ही होना चाहिए।
11:32
जो बनता बिगड़ता नहीं है जो हमेशा रहता है जिसका एक क्षण को भी अभाव
11:40
नहीं होता। असली भगवान कौन होता है मालूम? जिसका कोई
11:50
विरोधी ना हो। कोई भी अपना विरोध कर सकता है क्या?
11:57
कोई भी हो नास्तिक हो आस्तिक हो कोई देवता हो मनुष्य हो ना विरोध कर सकता है क्या कोई
12:06
ना पक्का तो आपको लगता है क्या आप असली भगवान हो
12:18
घबरा क्यों जाते हो भगवान सुनते ही घबराहट आ जाती है जीव
12:26
घबराता है आपका। आपका होना नहीं घबराता। आपका जो जीव है ना वो अरे यार मैं कैसे भगवान?
12:35
वो घबराता है। और आपका स्वयं
12:42
आपका होना। वह क्या बोलता है मालूम? जब भी बोलो ना
12:49
यार कि आपको लगता है आपका होना भगवान है तो वह क्या बोलता है?
12:55
क्या बोलता है यार? यह तो कॉमन सी बात है मेरे लिए।
13:03
जैसे आपका नाम क्या है? आप चेतन हो। ऐसा मैं बोला तो ये आपके लिए एकदम कॉमन हुआ ना।
13:11
ऐसे ही मैं बोल रहा हूं। आप परमात्मा हो तो वो एक्चुअल आपके लिए वो कॉमन है।
13:19
जो आप हो। आपने खुद को जो जीव माना है ना वह घबरा जाता है
13:27
कि अरे मैं कैसे परमात्मा और आपके स्वयं के लिए एकदम कॉमन है ये
13:37
एकदम सिंपल बात है ये परमात्मा हां यार वो तो मैं हूं
13:45
ऐसा किसी को लग रहा है क्या देखो वो जीव घबराया बैठा है।
13:53
हालत खराब है जीव की।
14:14
तो जब तक इसका निश्चय नहीं है
14:20
तब तक यह खेल तमाशा चलता रहेगा।
14:29
तो निष्ठा में आत्मा भगवान में मैं देह मन में नहीं मैं आत्मा भगवान में
14:42
तो कभी भी आप ना जैसे वृंदावन गए, अयोध्या गए, काशी गए या
14:51
भगवान की मूर्तियों के पास गए। आप वहां कितने भाव से श्रद्धा से झुकते हो
14:58
या किसी का कोई गुरु है उसके सामने झुकता है। वह बहुत श्रद्धा से। अस्तित्व के
15:05
सामने झुकता है। बहुत प्रेम और श्रद्धा से
15:13
इतनी ही श्रद्धा से अपने पास जाओ तो
15:26
इतने ही प्यार से निष्ठा से अपने पास
15:55
कि आपका होना ही राम है। वह कोई जीव नहीं है।
16:04
वही कृष्ण है, वही शिव है, वही परमात्मा है, अस्तित्व है।
16:12
बस जो आप हो जस्ट यू आर
16:21
बगैर किसी साधना के
16:30
तो भरोसे से जाओ ना अपने पास श्रद्धा से
17:10
हम कभी भी अपने पास आप निष्ठा से गए ही नहीं। जब भी गए तो मैं सही, मैं गलत, मैं पापी,
17:23
मैं पुण्य आत्मा, मैं ऐसा, मैं वैसा,
17:31
मैं स्त्री, मैं पुरुष, मेरा यह, मेरा वो। कभी भी अपने पास उस भाव
17:39
से आप गए ही नहीं। कि आपका होना ब्रह्म है, प्रभु है।
17:49
कभी भी प्यार से तक आपने खुद को देखा नहीं है। पूरे जहां को प्यार से देख रहे हो और खुद
17:58
को ही नहीं देखे हो।
18:10
खुद ही से मोहब्बत नहीं है। दूसरों से तो नाटक चल रहा है ना मोहब्बत का।
18:20
तो जाओ ना अभी अभी वह पल है अपने पास जाओ कि मैं भगवान के पास ही जा रहा हूं
18:31
उस श्रद्धा से उस निष्ठा से क्योंकि आपका मैं ही आपका स्वयं ही वह
18:38
परमात्मा है असली जिसका एक क्षण को वो भी अभाव नहीं होता।
18:54
मन के बनाए भगवानों में आप जाते हो। अधिकतर भगवान तो मन के बनाए हुए हैं।
19:01
काल्पनिक है। और जो रियल है
19:18
उस पर आपको ट्रस्ट नहीं है। अपने ही पे
19:27
यार ठीक है कि यह परमात्मा हो सकता है। वो परमात्मा हो सकता है। वह भी हो सकता। मैं
19:35
भी तो हो सकता हूं ना। मैं क्यों नहीं हो सकता? परमात्मा जब अखंड है तो क्या मुझे छोड़ देगा?
19:51
और सत्य की दृष्टि से देखो तो सब चीजों का अभाव हो जा रहा है। मैं का कभी अभाव हो ही
19:58
नहीं रहा है।
20:11
एक क्षण को भी जिसका अभाव होता ही नहीं।
20:32
बहुत निष्ठा से अपने पास जाओ अपने ही होने में
20:38
बहुत भाव से प्रेम से
20:45
कि मैं नर नहीं नारायण ही हूं।
20:54
भगवान मुझसे भिन्न नहीं है। अलग नहीं है।
21:18
बगैर श्रद्धा के आप पत्थर में भी नहीं देख सकते तो अपने में कैसे देखोगे
21:31
बड़ा ट्रस्ट के आप ना अपने मास्टर में देख सकते हो ना मूर्तियों में
21:38
ना अस्तित्व में तो बगैर ट्रस्ट के आप अपने में कैसे देख सकते हो परमात्मा
21:48
और आपको क्यों ट्रस्ट नहीं है जब हर चीज बिखर जा रही है आपके अतिरिक्त
21:57
सब तो मिट जाता है ना मन के भगवान वह भगवान आने जाने वाले हैं
22:06
कभी महसूस होते हैं कभी नहीं होते हैं वह तो मन ही का भगवान हुआ ना
22:17
और आपका होना जो कहीं आता जाता ही नहीं है स्थिर रहता है
22:24
आपके होने का एहसास
22:46
वह एहसास सदैव बना रहता है।
23:01
कभी धोखा नहीं देता। आप उसको अवॉइड भी करते हो तब भी वही रहता है।
23:08
सबसे बुरी चीज होती है अवॉइड करना मालूम किसी को और आप अपने को ही अवॉइड करते हो जो असली
23:17
परमात्मा है। आपकी पूरी जिंदगी क्या है? अपने को अवॉइड
23:27
करने के अतिरिक्त पूरा बस अवॉइड ही कर रहे हो।
23:42
और सत्य आप ही हो। परमात्मा आप ही हो।
23:56
अस्तित्व आप ही हो।
24:10
तो अपने पास जाओ उस भरोसे से उस निष्ठा से वो प्रेम के फूल ले जाओ श्रद्धा के चढ़ाओ
24:20
खुद पे कि वह परमात्मा मैं ही हूं मैं ही हूं
25:12
अपने प्रति परमात्मा से कम का भरोसा रखना ही मत।
25:28
अपने पर आप डाउट करते हो और काल्पनिक भगवान काल्पनिक चीजों में
25:36
उलझे रहते हो जो अनित्य है
26:09
कितने भाव से आप बोलते हो हे राम बोलते हो
26:17
कितने भरोसे से कभी भी उस भरोसे से बोले मैं
26:28
उस भाव से कभी भी मैं कहा आपने कि मैं अरे मैं ही वो राम है। आपका होना ही राम
26:38
है। और फिर सब कुछ राम है।
26:45
ठीक तो जड़ चेतन जग जी उजत सकल राम में जान
26:59
जड़ यानी क्या जिसको आप पत्थर समझते हो डेड समझते हो अब उसमें डेड का भाव मत रखो
27:07
राम का भाव रखो चेतन यानी जो जीवंतता है चैतन्यता है
27:15
उस पर राम का भाव जीव जो खुद को जीव मान रहे हो अब उस पर
27:24
कौन सा भाव रखोगे राम और यह दुनिया जगत अब इसमें जगत का भाव
27:32
नहीं राम भगवान का जो नाम प्रिय हो वो ले लो तब
27:40
चलेगा भाव इंपॉर्टेंट नाम से भी ज्यादा
27:48
भाव बस प्रेम से जी लो कि सब नारायण है।
28:00
मैं भी तू भी जीव भी देह भी
28:07
यह दुनिया भी
28:19
तो जीव भाव को निकालो उसकी जगह राम का भाव डालो अपने प्रति जो क्षुद्र का भाव सोचते
28:26
हो मैं जीव हूं तुच्छ हूं कोई प्राणी मनुष्य हूं ना राम स्वयं के
28:34
प्रति जगत के प्रति बस राम
28:53
आप बोलते हो मन परेशान करता है। अरे कभी भी अपने मन को राम बोले हो।
29:01
बोलो अभी भला अपने मन को अच्छे से देखो। यार तू तो राम है।
29:11
क्योंकि वह राम ही है। मन नहीं है।
29:20
बहुत प्यार से बोलो भला भीतर ही भीतर। अपने मन को
29:37
मेरे मन तू तो राम है। तू तो राम है।
29:48
मन तुरंत शांत हो जाता है। राममय हो जा। माया बोलते हो जिसको उसको कभी भी राम देखे
29:58
हो बोले हो दो ही बाधा है ना मन और माया एक ही है
30:06
आपका जो पर्सनल है वो मन है और सबका मन उसको बोलते हैं माया
30:13
है ना तो इसी को राम कर दो ना जो आपके लिए बैरियर है
30:22
जो आपको रोक रहा प्रॉब्लम दे रहा है उसी को राम में कर दो
30:28
और भाव से हो जाता है बता रहा हूं
30:35
जीव भाव ही जीव है। देह का भाव ही तो देह है।
30:45
यह दुनिया का भाव ही दुनिया है। तो राम का भाव ही राम है।
30:53
तो यह देह भाव को हटाओ। राम का भाव बॉडी मत बोलो अब इसको। यह राम है। यह भी ठीक
31:01
है। आपकी आत्मा भी राम है। बॉडी भी राम है। इसको जड़ बॉडी नहीं बोलना।
31:10
जीव भाव हटा के राम का भाव। मन का भाव हटा के राम।
31:20
माया का भाव हटा के राम
31:25
बस इस भाव से जियो यह प्रैक्टिस नहीं है। इसकी प्रैक्टिस भी कर लो तो वह भी राम है।
31:36
इसकी साधना भी कर लोगे ना तो वह भी राम है।
31:42
क्योंकि सही डायरेक्शन है। सही डायरेक्शन यानी वह राम ही होता है।
32:02
और आप मेरे को कॉमन सेंस से बताओ यार। इसको बॉडी बोलते हो तो अच्छा लगता है कि
32:10
प्रभु बोलते हो, राम बोलते हो तो अच्छा लगता है। अरे सब बोलो ना यार। राम
32:18
आ अब ठीक लगा अब मन को मन कहते हो तो अच्छा लगता है कि
32:25
राम कहते हो तो राम माया को राम जगत को राम
32:34
बस सब भगवत स्वरूप है सब दिव्य है बस तो उसी भाव से जियो ना
32:41
उसमें अच्छा भी लग रहा है वह सत्य भी है और राम ही तो है जिसको आप गलती से बॉडी
32:49
मान लिए दुनिया मान लिए राम ही तो रमा हुआ है
32:56
और उसमें आपको अच्छा भी लगता है फील भी अच्छा आता है
33:03
वैसे ही जियो सर्व भाव भज कपट
33:14
तज जी सर्व भाव जितने भी आपके भाव हैं कि यह दुनिया है यह वो है मैं वो हूं पापी
33:22
हूं पुण्य आत्मा हूं सर्व भाव भज यानी सारे भाव में राम को भज ये सारे भाव हटा
33:31
कपट तजी कपट क्या है मैं अलग और राम अलग
33:40
अरे आपका होना ही राम है सबका होना राम है
33:45
इस कपट को हटाओ और सर्वभाव भज
33:52
क्योंकि जाम मति ता गति गौतम बुद्धा बोले जो भी आप विचार करते हो
34:00
आप वैसे ही हो जाते हो या आप आज जो हो
34:06
पहले आपने उसका विचार किया है तभी वो आप आज हो विचारों की यह पावर
34:16
भाव तो और गहरे होते हैं। मैं तो आपको भाव के लिए बोल रहा हूं। विचार तो बहुत छोटी
34:22
बात हो गई भावों के सामने। सोचो राम के भाव से क्या हो जाएगा?
34:30
और ये तो हो जाएगा जो बोल रहा हूं ना। ऐसा है, है ही आत्मिक तल में भी फिर भी एक कॉमन सेंस से
34:40
भी अपन चले तो कि सब नारायण है जलस्य नारायणा थलस्य नारायणणा सर्वस्व
34:49
नारायणा तो कभी भी ना ऐसे बॉडी के अंदर को भीतर मत
34:56
कहा करो नारायण कहा करो राम कहा करो इसको बाहर मत मत कहा करो
35:04
राम ये दुनिया नहीं है ये राम है
35:16
डंडा दो भाई क्या देख रहे हो आप इधर देखो सब
35:23
डंडा लकड़ी देख रहे हो पक्का सबको श्योर है
35:31
देख लकड़ी रहे हो बोलते डंडा हो ना बस देख आप राम को ही रहे हो बोल दुनिया
35:40
रहे हो और कुछ थोड़ी ना देख रहे हो आप राम ही देख
35:45
रहे हो और राम ही देख रहा है
36:02
राम तुम्हार स्वरूप
36:24
और इसको कभी भी ना समझने की वस्तु नहीं बनाना कि यह हम समझ गए ना
36:32
नहीं नहीं
36:57
तो अपने प्रति भी राम का भाव रखना। सबके प्रति तो रखना ही है। अपने प्रति भी उसको नहीं छोड़ देना। वह सबसे ज्यादा
37:06
इंपॉर्टेंट है।
37:38
दो-तीन चीजों में एकदम अवेयर रहना। राम के भाव के लिए एक अपने प्रति स्वयं को
37:47
कभी भी जीव छोटा मोटा प्राणी ऐसा नहीं समझना। राम।
37:54
सेकंड मन और माया के प्रति भी राम। यह दोनों में तो हाई अलर्ट रहना।
38:03
हां। मन में फिर दुखवख ये सब आ गया मन के अंदर। है ना? सुखदख जो भी है वो तो राम है
38:10
ही है। तो ये दो के प्रति एकदम अलर्ट।
38:19
और कभी भी राम को अपने से अलग मत समझना। है ना?
38:27
इस अस्तित्व को परमात्मा को अपने से अलग मानना ही मत।
38:35
आपकी जिंदगी की एक ही भूल है बस कि आपने
38:41
अस्तित्व को अपने से अलग मान लिया है।
38:46
परमात्मा को अपने से अलग मान लिया।
38:54
अब वह अलग मानने का परिणाम 84 लाख योनियां
39:03
साधनाएं, ध्यान, धारणा। अब सोचो ना भगवान आपसे अलग ही नहीं है। तो क्या भगवान को याद करोगे?
39:18
नहीं करोगे ना? अलग है करके करते हो ना?
39:25
तो वह अलग मान्यता बहुत डेंजर है।
39:31
भगवान का जो भगवत स्मरण कहते हैं हम वो तो भगवान को खुद से अलग मान के ही होता
39:39
है ना। भगवान का ध्यान भगवान को खुद से अलग मान के ही करते हो ना?
39:52
तो अलग मानो ही मत ना
40:06
मानो ही
40:16
और अलग है भी नहीं वरना वो खंडित हो जाएगा भगवान परमात्मा त्मा अस्तित्व हमेशा अखंड
40:24
होता है। वह खंडित नहीं होता। वह आपको छोड़ नहीं देगा।
40:31
यह आपकी केवल मान्यता है। एक गहरी खाई खोद देते हो अलग मान के।
40:43
अलग मानो ही मत। बस इतना कर लो कि वो परमेश्वर मेरे से अलग है ही नहीं।
40:53
हो ही नहीं सकता।
41:24
अलग मान के ही तो खोजने निकलते हो यार। कहां है भगवान? कहां है?
41:32
कहां है असली सत्य? परमात्मा अस्तित्व कहां है?
41:40
यह खोज यहीं से तो शुरू होती है ना अलग मानने से
41:49
और अलग हो ही ना तो
42:02
और अलग है ही नहीं। अरे परमात्मा तुमसे अलग है ही नहीं। हो
42:11
सकता नहीं। तब कौन सी समाधि लगाओगे?
42:28
हां। कौन सा ध्यान करोगे? कोई मंत्र तंत्र
42:36
अलग ही नहीं है जब पूरा अस्तित्व आपसे परमात्मा
42:41
कोई ऐसे बीच में कोई ऐसा खंड है ही नहीं
42:53
और सच में नहीं है केवल आप माने हो
43:09
जिसको भी आप परमात्मा कहते हो राम है, शिवा है, कृष्णा है, बुद्धा है,
43:17
अस्तित्व है। वह आपसे अलग है ही नहीं।
43:39
दो
44:06
ये पूरा अस्तित्व है ना इसको बस अलग मत मानो।
44:14
अलग मान के ही पूरी फाइट शुरू हो जाती है। फिर
44:34
अलग बिल्कुल नहीं मानना
44:42
मतलब आप लोग सुन रहे हो हांस सही में अभी तक पागल कैसे नहीं हुए?
44:57
अरे ये सुन के तुरंत पागल हो जाना चाहिए। पागे गल जाता है ना आदमी
45:04
कि परमात्मा मेरे से अलग है ही नहीं। यह पूरा चराचर मेरे से भिन्न है ही नहीं।
45:16
जो भी आज तक सुने थे नारायण शिव अस्तित्व यह वह जो भी मेरे से भिन्न है ही नहीं।
45:26
अरे है ही नहीं। अरे यह आकाश देख रहे हो ना यह आपसे अलग नहीं है।
45:33
यह धरती यह सितारे,
45:38
यह पूरी प्रकृति यह आपसे अलग है ही नहीं।
45:54
हर मनुष्य हर देवता यह सब कुछ
46:01
आपसे अलग है ही नहीं।
46:23
पागल नहीं हुए अभी तक।
46:37
एक लाइन बहुत होती है क्या? यह जरूरत से ज्यादा है।
46:45
फिर और कुछ समझना है और कुछ जानना है वो आपके खेल है मन बुद्धि का। है ना?
46:58
नारायण मेरे से अलग है ही नहीं। यह पूरा एकिस्टेंस
47:08
अलग है ही नहीं।
47:23
मेरे तो जब मुक्ता का एक लाइन पढ़ा मैं अपने गुरुदेव का मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
47:31
ठीक। मैं पागल हो गया यार। सच बता रहा हूं मैं।
47:38
मास्टर बोल दिया ना बात खत्म हो जाती।
47:45
वो उतर जाती है लाइन। यानी मैं ऐसे बार-बार ऐसे भाव से कि यह
47:53
आकाश मेरे से अलग है ही नहीं। इतना बड़ा आकाश मेरे से अलग नहीं है। मैं नाचता था।
48:01
हां। ये धरती ये सितारे मेरे से अलग है ही
48:07
नहीं। मैं नाचता था मालूम। ऐसे बार-बार निहारता था आकाश को, धरती को,
48:18
सितारों को, नाचता था मैं। यार, मेरे से अलग नहीं है यह। समझ रहे हो?
48:32
हां। फिर परमात्मा फिर सब का सेंस आता था मेरे को जिसको भी मैं भगवान मानता था। नारायण
48:41
है, रामा है, परमात्मा है, जो भी अरे मेरे से अलग है ही नहीं।
48:54
मैं तो तुरंत पागल हो गया था। ऐसे पागलपन चाहिए ना मतलब ऐसे समझदारी
49:04
नहीं चाहिए यहां। बोले और निष्ठा हो गई और पागल हो गए। समझ रहे हो?
49:15
अब पागल ही नहीं हुए तो क्या हुए? हां पागल ही नहीं हो पाया जिंदगी में तो क्या
49:24
हुए ज्ञानी बनने आए हो क्या धानी मेडिटेटर
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बुद्धा क्या बनने आए हो यहां हम केवल पागल बनाते हैं भैया बता देते हैं
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बस ज्यादा मत सोचना ज्ञान सीख लेंगे और प्रेमव सीख लेंगे
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मतलब समझ रहे हो जो भी आपको दिख रहा है वो देखने वाले से आपसे अलग है ही नहीं
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क्या सुन रहे हो मार दूंगा अब मैं
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सही में सुन रहे हो सही में सुन रहे
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इतना बड़ा अज्ञात है, अव्यक्त है। ये तो आप जानते हो ना।
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बैकग्राउंड में चारों ओर अनंत गुना इससे बड़ा अज्ञात है। अव्यक्त है जिसको आप नहीं
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जानते हो। वो भी आपसे भिन्न नहीं है यार।
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और आप ऐसे बैठे हो। हां।
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अव्यक्त आपसे भिन्न नहीं है। अज्ञेय आपसे भिन्न नहीं है।
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ये अनंत सितारे ये सारे मनुष्य देवता सारे आपसे अलग है ही
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नहीं। है ही नहीं। किसी कीमत में नहीं है। हो
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सकते नहीं। आप चाहोगे भी तो नहीं होगा अलग।
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हां सही बात है भाई। और आप लोग ऐसे ही बैठे हो
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सिंसियर ज्ञानी। मैं कोई ज्ञान सिखा रहा क्या आपको?
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एक्टिंग तो नहीं कर रहे हो पागलपन की?
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नहीं ना? हां। ईमानदार रहना। पागल ही हो? ओके। ठीक है।
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मैं बता रहा हूं जिसके लिए आप मरे हो जिस इनलाइटेटनमेंट के लिए वो आपसे अलग है ही नहीं।
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जिस मोक्ष के लिए कैवल्य के लिए परमात्मा के लिए वो आपसे अलग है ही नहीं। और आप ऐसे बैठ कैसे सकते हो सुन के?
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अजीब विचित्र बात है यार। क्या कोई मैं सीरियस करने वाली बात बोला क्या?
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अरे आनंद की बात है। इतना विराट आकाश आपसे अलग नहीं है।
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और आप ऐसे बैठे हो। हां ठीक है। ये क्या है? अरे पागल हो क्या?
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हां ठीक है। समझ गए। समझ गए। क्या समझ गए?
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ये तो हम जानते हैं। अरे क्या जानते हो?
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अरे नाचने की बात है ये।
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यानी पागल तुरंत हो जाना चाहिए सुन के तुरंत
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उसी समय मैं बोला और उसी समय
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अब आधे लोग पागल हो रहे हैं यार। ऐसे आधे में मजा नहीं आएगा ना।
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भय लगता है भैया पागल होने में। लोग क्या समझेंगे?
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ठीक है।
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मतलब सुनो मेरे को जैसे ही मास्टर का मैं पढ़ा हूं मेरे को तुरंत एहसास होने लग गया
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मालूम कि ये आकाश अलग नहीं है मेरे से एकदम एहसास होने लग गया
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मैं बहुत प्रसन्न होता था मेरे को कभी किसी ने बताया ही नहीं ऐसा
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मेरे को कोई झूठ में भी ये बोल देता ना मैं उसको मान लेता मालूम क्योंकि मेरे को आनंद आता है ऐसे में कि यार ये आकाश ये
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सितारे ये राधा ये कृष्ण ये मेरे से अलग है ही नहीं
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हर मनुष्य कोई भी मनुष्य मेरे से अलग नहीं है। यह प्रकृति
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मेरी आत्मा है। मेरे से अलग नहीं है।
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मेरे को कोई बोला ही नहीं मालूम। बस पढ़ा और वो एहसास होने लग गया कि मैं
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ऐसे भिन्न कुछ भी नहीं।
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मतलब वो तुरंत है। तुरंत है वह बात। बात भरोसे की है। आपका भरोसा है कि यह सब
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अलग है। उस पर है भरोसा। कैसे अलग हो जाएगा आपसे यह सब?
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कोई भी नजारा नजरों से अलग कैसे हो सकता है?
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ऐसा ही है कुछ भी अलग नहीं है मालूम हम
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जो परेशान हुए हैं ना स्पिरिचुअलिटी में जो दर्द हैं उसके जो यातना है ध्यान साधना
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क्रियाएं योगा अब फिजिकल तक ठीक है हेल्थ के लिए बट प्रभु के लिए ठीक नहीं है ये ये
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सब परमात्मा को अलग मान के अपने से
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अपने से ही भगवान को अलग कर दिए यार साला जिंदगी में कोई बोला नहीं मेरे को
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मैं बहुत नाराज हूं पुराने सारे सारे मास्टर से
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इतनी सी बात यार उसके लिए इतनी परेशानियां झेलना ये ध्यान
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वो ध्यान वो ध्यान वो साधना वो टॉर्चर वो हठ योग मतलब क्या यार तीन-ती घंटे में
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सिद्धासन लगा के बैठता था 3 आवर अरे मास्टर बोला है लगाना है लगाना
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है देखा जाएगा ठीक है रिलीफ मिलता था मेरे को बट वो रिलीफ है बस
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मतलब ना पूरी जिंदगी का सारे शास्त्रों का
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पूरे धर्मों का सार है कि अस्तित्व मेरे से अलग ही नहीं है।
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सत्य फाइनल ट्रुथ मेरे से अलग नहीं है। मैं ही वो ट्रुथ हूं।
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अब यह सच है, वह सच है, वह सच है। जिंदगी भर खोजता रहा। अरे तू ही सच है। ऐसा साला बोलने वाला ही
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नहीं मिलता कि तू ही सच है और असली सच है और परम सत्य तू ही है।
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और है यह मार्ग सही, ज्ञान मार्ग सही, भक्ति मार्ग सही,
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योग का मार्ग सही, तंत्र का मार्ग सही,
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विपसना सही, मैं बस गलत। बाकी सब सही और मैं मंजिल है।
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बहुत बहुत पीड़ा है मालूम भटकने की पीड़ा जो होती है ना
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बहुत खतरनाक है वो कोई सही गाइड करने वाला नहीं मिलता मालूम
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और ये अननोन जगत है स्पिरिचुअलिटी का तो और मिसगाइडेंस होते हैं बहुत सारे एक
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एक इंच में एक शब्द में मिसगाइड हो जाओगे एक शब्द में मात्र एक शब्द आपका 10 जन्म
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खा सकता है। बता रहा हूं
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और एक शब्द आपके अनंत जन्मों को बचा सकता है। वह शब्द यही है कि परमात्मा मेरे से
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अलग है ही नहीं। होता ही नहीं। हो सकता नहीं।
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अभी सब बाहर जाओ और कोई किसी से बात नहीं करना। सब अलग-अलग जगह जाना मंदिर के साइड
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ही चले जाओ इधर और देखना ये आकाश को यार मेरे से अलग नहीं है ऐसा बात करना जाओ
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तो सब वृक्षों से आकाश से सब जाओ और चुप रहना
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इस भाव में इस सत्य में जीना है इसको
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पागलों की तरह मंदिर भी जाओ, शिव को देखो, ऊपर दुर्गा
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मां को देखो कि आप मेरे से अलग ही नहीं हो।