Prabhu Shree
0:20
तो परमात्मा नींद की तरह
0:26
उतरता है। जैसे नींद
0:36
उतरती है ना आप लाते नहीं हो ऐसी परमात्मा
0:47
उतरता है नींद की भांति
0:58
ऐसा नहीं है। ऐसा
1:05
नहीं है। ये सारे शब्द बोलने में बड़े अच्छे लगते हैं। बट हकीकत ऐसी
1:14
नहीं है। तुम परमात्मा हो।
1:24
वह कोई उतरता उतरता नहीं है। चढ़ने उतरने वाली वस्तु नहीं है।
1:38
तुम अर्थात मैं देह मन नहीं मैं आत्मा। भगवान
1:47
तो मैं परमात्मा हूं। में मैं इंपॉर्टेंट है। परमात्मा
1:56
इंपॉर्टेंट नहीं है।
2:07
तो असली एक्चुअल परमात्मा क्या है मालूम?
2:16
वहां मैं परमात्मा हूं। ऐसा नहीं है। मैं हूं।
2:25
बस यही परमात्मा है। जहां परमात्मा का भी भाव नहीं है। बस मैं
2:34
हूं। सिंपल
2:49
एकदम कॉमन। जैसे हवा सबके लिए कॉमन है। आकाश सबके लिए
2:57
कॉमन है। ऐसी मैं सबके लिए कॉमन।
3:03
इसलिए हर कोई कहता है मैं
3:14
हूं बस और पूर्ण विश्राम
3:29
मैं हूं। अब मैं देह हूं, मैं मन हूं, मैं बुद्धि
3:40
हूं भी गया। अब मैं आत्मा हूं, मैं परमात्मा हूं, मैं ब्रह्म हूं। यह भी गया।
3:49
बस मैं हूं। सामान्य पद सिंपल।
4:01
बस मैं हूं।
4:14
बगैर प्रयास के बगैर सोचे समझे
4:26
सहज सरल जो मैं हूं
4:36
बस यही सिंपलनेस
4:47
कॉमननेस सिंपल
5:32
तो जो अनुभूति किसी को हो और किसी को ना हो वह
5:39
है विशेष अनुभूति। यानी किसी को इनलाइटनमेंट हुआ और किसी को
5:47
नहीं हुआ। कोई आत्मज्ञानी हुआ, कोई नहीं हुआ।
5:56
यह विशेषानुभूति है। सामान्य अनुभूति
6:08
जो सबको हो ही रही है।
6:13
सामान्य अनुभूति की अनुभूति
6:22
जो सबको है इसी क्षण
6:31
तो मैं हूं। यह सामान्य अनुभूति है ना सबको है।
6:37
इसी की अनुभूति बस ये फाइनल है।
6:46
ज्ञानी को है, अज्ञानी को है, परमात्मा को है, जीव को है,
6:53
जो सबको है कि मैं हूं।
7:00
सामान्य अनुभूति की अनुभूति
7:18
तो मैं सर्व में सर्व रूप से
7:26
सर्व होकर हूं। मेरे को ऐतराज ही नहीं है किसी से।
7:37
सर्व में मैं सर्व में
7:45
सर्व रूप से यानी उसी रूप से जैसे वृक्ष में वृक्ष के
7:55
रूप से आकाश में आकाश के रूप से धरती में धरती मनुष्य में मनुष्य देवता में देवता
8:04
अज्ञात में अज्ञात उसी रूप से तो मैं सर्व में
8:13
सर्व रूप से सर्व होकर हूं। वही होकर हूं।
8:32
मैं को ऐतराज ही नहीं है किसी चीज से।
9:00
तो बस सिंपल जो मैं हूं एकदम सिंपल
9:07
बस जो मैं हूं हूं कॉमन
9:17
जहां परमात्मा का भी ख्याल नहीं है। अस्तित्व का भी ख्याल नहीं है। बस मैं हूं
9:26
प्योर जहां आपको कुछ मिल नहीं रहा है। कुछ समझ
9:38
नहीं आ रहा है। कुछ पता नहीं चल रहा है। बस हूं।
9:55
सामान्य पद विशेष नहीं।
10:03
परमात्मा कम ज्यादा नहीं होता किसी में।
10:08
देख ब्रह्म समान जग माही सब में एक समान
10:19
और यहां तो परमात्मा का भी भाव नहीं है। बस मैं हूं।
10:36
तो हम क्या करते हैं? यह तो मैं हूं ही। इसमें क्या है? देखो फिर आपको विशेष
10:44
चाहिए। तभी यह बोले आप है ना कि मैं हूं मैं आपको कुछ
10:52
एक्साइटमेंट चाहिए। कुछ पावरफुल कुछ बड़ा विशेष
11:00
अरे मैं हूं बस और बाकी का क्या करना है?
11:11
बस सामान्य सिंपल
11:23
तो क्या यही सत्य है? यही फाइनल है? यही परात्पर है?
11:29
अरे फिर आपको विशेष चाहिए।
11:41
आपको चाहिए कि आपका मैं परमात्मा मैं परात्पर हूं। मैं ब्रह्म हूं। अस्तित्व हो। अब आप आए विशेष
11:49
अब गया। अरे मैं हूं। अरे बस मैं हूं।
11:58
क्या करना है बाकी आत्मा परमात्मा यह वो करना क्या है
12:11
अरे भाई मैं हूं ना
12:18
बस यही सिंपलनेस अब ठीक है। मैं नित्य है, सत्य है, बुद्ध है,
12:31
शुद्ध है। जो वह है वह तो वह है ही। उसमें कोई आपके सोचने से फेरबदल तो हो नहीं
12:39
जाएगा। है ना? बट यह भी विशेष पद है। कि मैं नित्य हूं, मैं शुद्ध हूं, मैं
12:47
बुद्ध हूं, मैं हरि हूं। यह विशेष पद है
12:56
क्योंकि भैया कोई हरि होता है और कोई नहीं होता है और असली परमात्मा तो सब में एक समान होगा
13:04
ना। कोई शुद्ध होता है, कोई नहीं होता है।
13:11
कोई बुद्ध होता है, कोई नहीं होता है। ये तो विशेषता है। असली
13:19
बस मैं बस मैं सिंपल।
13:54
एकदम सिंपल में
14:03
वहां खोना पाना जानना समझना कुछ होता ही नहीं।
14:21
तो ज्ञान जैसा भी नहीं है कि सब जान गए जानने वाला ऐसा भी नहीं वो भी विशेष है
14:29
भक्ति प्रेम जैसा भी नहीं आप डूब गए समा गए ना
14:36
बस सिंपल मैं हूं
14:57
तो मैं और हूं के बीच में सवाल डालोगे तो बुद्धि में आ जाओगे कि मैं क्या हूं? कैसा हूं? कौन हूं। है ना?
15:12
अब मैं शुद्ध हूं, बुद्ध हूं, नित्य हूं,
15:15
मैं हूं के बीच में डाले तो आप सतोगुण में आ जाओगे। मैं दृष्टा हूं, मैं साक्षी हूं। यहां तक सतोगुण है ना?
15:28
ठीक है। नॉट बैड। बट
15:35
यह माया का क्षेत्र है। यहां तक मैं साक्षी हूं, मैं दृष्टा हूं। यह माया का क्षेत्र है।
15:43
इवन मैं माया हूं, मैं भगवान हूं। यह भी माया का क्षेत्र है।
15:50
मैं ब्रह्म हूं, मैं परबह्म हूं। यह सब माया का क्षेत्र है। बस मैं हूं।
16:02
सिंपल
16:37
तो मैं हूं से आप कोई भी और ख्वाहिश रखें।
16:47
तो वह ख्वाहिश विशेष की ही है। है ना?
17:03
और मैं हूं सिंपल है। एकदम सिंपल। कॉमन मैन से भी ज्यादा सिंपल।
17:16
क्योंकि याद रखना विशेष सब जगह नहीं रह सकता।
17:23
सिंपल ही सब जगह रह सकता है। विशेष कैसे सब जगह रहेगा?
17:39
सिंपल सब जगह रहता है। कॉमन सब जगह रहता है। सामान
18:00
तो प्रभु व्यापक सर्वत्र
18:08
समाना सर्वत्र
18:14
एक समान व्यापक है और व्याप्त है। यानी
18:22
प्रभु चींटी में कम नहीं है और ब्रह्मा में ज्यादा नहीं है।
18:30
प्रभु चींटी में कम नहीं है। नारायण में ज्यादा नहीं है।
18:35
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना बुद्ध पुरुष में ज्यादा है, अज्ञानी में
18:44
कम है, ऐसा प्रभु नहीं होता। गुरु में ज्यादा है, शिष्य में कम है। ऐसा
18:53
प्रभु हो ही नहीं सकता। प्रभु व्यापक
19:01
सर्वत्र समान
19:09
तो जो सिंपल है वही तो सर्वत्र एक समान होगा ना।
19:16
जैसे आकाश सब जगह एक समान है। सिंपल है। हवा हर प्राणी के लिए एक समान है। किसी के लिए कम ज्यादा है क्या?
19:28
भेदभाव करती है क्या?
19:32
कि जीव जंतु को कम मिले, मनुष्य को ज्यादा मिले। नहीं ना?
19:38
जब यह बड़ी शक्तियां भेदभाव नहीं करती। वायु देव है, आकाश देव है।
19:45
तो परमात्मा कैसे करेगा तो तो अभेद है एकदम
20:00
जो सब में एक समान है तुम में और मुझ में जो एक समान है उसको टच कर लो
20:11
बस वह फाइनल है असली परमात्मा जो तुम में मुझ में एक समान है। क्या है?
20:22
एक समान है। यानी तुम में और मुझ में कुछ तो एक ऐसा है ना जो एक समान है। बस वही
20:31
खत्म बात। अब और देखो जो भीतर
20:40
और बाहर एक समान है। देखो भीतर कुछ चीज आपको जो ज्यादा लग रही है वो नहीं।
20:50
जो बाहर कम लग रही है वो नहीं। जैसे भीतर आपको शरीर के भीतर आपको जीवन ज्यादा
20:57
लगेगा। प्राण ज्यादा लगेंगे। है ना? और
21:05
चेतनता ज्यादा लगेगी और बाहर चेतनता कम लगेगी। ठीक?
21:14
तो यह एक समान तो नहीं हुआ। तो क्या भीतर है ऐसा जो बाहर है जो एक
21:23
समान है? बताओ। जल्दी बोलो।
21:31
बस होना है ना सिंपलनेस अब इसको मेरा होना बोलना छोड़ दो होना तो
21:43
सिंपल है ना अब बाहर इसका अस्तित्व का होना हो या इधर
21:49
आपकी देह का होना हो बात होने का इंपॉर्टेंट इसका होना उसका होने की बात ही नहीं है
21:58
होना होना मात्र होना
22:04
जिसको बोलते हैं है अस्तित्व अब है
22:16
सिंपल है कि विशेष है सिंपल है
22:26
क्योंकि सिंपल का भी है। है अरे ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है। है
22:33
को ब्रह्मा बोल रहे हो ना? है को विष्णु है को महेश धरती है, आकाश है, चींटी है,
22:40
मक्खी है, मनुष्य है। है को यह सब बोल रहे हो ना आप?
22:48
अब है अस्तित्व।
22:56
सब जगह कॉमन है ना। अब इसका कोई सेंटर नहीं है। सेंटर हुआ तो
23:06
विशेष हो जाएगा। समझना है। है कॉमन है और सब जगह इसका सेंटर है।
23:16
ऐसा बोल सकते हो। सेंटर लेस सेंटर। वो वर्ड्स हैं सब है ना बस है।
23:30
सिंपल
23:42
तो भीतर और बाहर में कौन सी चीज कॉमन है?
23:48
है अस्तित्व। जो
23:59
कम ज्यादा नहीं है कहीं पर भी
24:07
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना प्रभु क्या है? अस्तित्व है।
24:14
सब जगह एक समान है और व्यापक है।
24:29
तो है अस्तित्व ही सहज में आपसे कहता है मैं हूं है ही हूं बोलता है आप क्या सोचते
24:38
हो आपकी बॉडी हूं बोल रही है या बॉडी मैं हूं बोल रही है ना अस्तित्व ही मैं हूं
24:44
बोलता है इसलिए वह भी सामान्य है हर जगह से मैं हूं बोलता है।
24:55
है ही हूं है। हूं ही है।
25:15
तो जैसे प्राण वायु है ना यह वायु बॉडी में ज्यादा लगती है अंदर बैली से यहां
25:25
नाक तक ना यहां ज्यादा फील होती है ना लेकिन यहां भी तो हवा है
25:33
यहां पता नहीं चलता यहां पता चलता है
25:42
और यहां पता नहीं चलता बट यहां हवा है तभी तो यहां ले
25:48
रहे हो ना तो यहां पता ना चलने के रूप में है। यहां
25:58
पता चलने के रूप में है। अब इन दोनों में कॉमन क्या है?
26:10
जैसे है अस्तित्व। पता ना चलने के रूप में है और मैं हूं पता
26:19
चलने के रूप में है। है का पता कहां चलता है? लेकिन है।
26:30
और हूं मैं हूं का पता चलता है। अब इन दोनों में कॉमन क्या है?
26:41
हम हैपन बताओ थोड़ा और दोनों में जो एक समान
26:51
होगा वही असली चीज होगी।
26:58
हालांकि दोनों एक ही है। अस्तित्व ही मैं हूं कहता है। फिर भी और शार्प चलो।
27:07
हां। तो मैं हूं
27:18
विशेष चेतन है ना और है सामान्य चेतन
27:31
तो इन दोनों में कॉमन क्या है ना चेतन नहीं
27:40
चेतन और फिर जड़ आ जाता है। जड़ और चेतन। फिर उन दोनों में कॉमन क्या है?
27:58
तो मैं हूं और है अस्तित्व में।
28:06
कौन सी ऐसी चीज है जो एक समान है बेटा
28:17
हम ये फिर भी ज्यादा बेहतर आंसर है ज्ञान
28:31
सही आ रहे हो अब गड्डी करेक्ट हो रही है ज्ञान को ही आप क्या बोले?
28:44
मैं हूं। ज्ञान हुआ उसी को क्या बोले?
28:50
है अस्तित्व। है ना?
28:56
तो ज्ञान को ही देह बोलते हो, मन बोलते हो तो ज्ञान को ही ज्ञान ही नहीं होगा तो मैं हूं। बोलोगे किसको?
29:05
और ज्ञान ही नहीं होगा तो अस्तित्व बोलोगे किसको?
29:14
तो ज्ञान सामान्य है ना दोनों में है और हूं मैं।
29:25
हूं यानी मैं हूं। है और हूं। ज्ञान को ही तो बोल रहे हो आप।
29:37
हम अब थोड़ा एक स्टेप आप ऊपर आए है ना ज्ञान
29:47
बगैर ज्ञान के आप कह ही नहीं सकते मैं हूं या है
29:57
अस्तित्व और ज्ञान ही दोनों में कौन कॉमन है
30:05
तो ज्ञान ही प्रभु है परमात्मा है
30:12
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना
30:20
सब जगह एक समान है ज्ञान अरे मक्खी को भी ऐसे उड़ाओ तो उड़ती ना
30:26
उसको भी ज्ञान है ना कि मक्खी में
30:32
कम है क्या और बुद्ध पुरुष में ज्यादा है
30:41
तो ज्ञान ज्ञान सर्वत्र एक समान है। उसी को कहते हैं अखंड ज्ञान।
30:49
ज्ञान अखंड एक सीतावर। अब ज्ञान सामान्य है।
30:58
सामान्य ज्ञान की बात चल रही है। विशेष ज्ञान की नहीं। विशेष ज्ञान क्या होता है?
31:05
यह जाने, वह जाने, वह जाने, वह जाने, वह जाने, वह जाने, वो नहीं जाने, वो नहीं जाने, वो नहीं जाने। ये सब विशेष ज्ञान
31:14
है। और सामान्य ज्ञान अखंड है।
31:23
खंडित होता ही नहीं है। उसका टुकड़ा नहीं होता। एकदम सिंपल
31:37
और सामान्य ज्ञान को पढ़ा नहीं जाता। किसी शास्त्र में, पुस्तक में
31:44
या कोई उसको सिखाता नहीं है। जिस ज्ञान को सिखाना ना पड़े वही सामान्य ज्ञान है।
31:55
गुरु का भी काम नहीं है। वो जिस ज्ञान को
32:02
सिखाना ना पड़े वही सामान्य ज्ञान।
32:21
और निरंतर जो ज्ञान हो ही रहा है ना उसको आपको सिखाना पड़ता है। अखंड है नेचुरल है।
32:33
प्रयास रहित है। तो नेचुरल ज्ञान सिंपल है ना भरा हुआ है।
32:47
अरे ज्ञान विशेष को जिसने जाना सामान्य को जिसने जाना वो ज्ञान है ना। तो विशेष और सामान्य का स्वामी कौन?
33:01
ज्ञान। जैसे अवतार विशेष होता है
33:10
और संत सामान्य होता है बट ज्ञान है तभी तो आप यस बोले ना
33:18
इन दोनों बातों को तो संत और अवतार का आधार कौन हुआ ज्ञान
33:28
इसलिए गुरु नानक जी बोले ज्ञान ही परमात्मा है सीधा डायरेक्ट वेद बोलते हैं ज्ञान ही परमात्मा है।
33:37
रामायण कहती है ज्ञान अखंड एक सीतावर।
33:45
सीतावर यानी राम। राम ही ज्ञान है। ज्ञान ही राम है।
33:55
जो सब में रमा हुआ है। तो प्रभु व्यापक सर्वत्र
34:06
समाना प्रेम ते प्रगट होई मैं जाना।
34:21
जब सामान्य ज्ञान से प्रेम होता है तभी प्रकट होता है।
34:31
सिंपलनेस से प्रेम सामान्य ज्ञान से प्रेम।
34:41
हम जिंदगी भर विशेष ज्ञान में धक्के खाते हैं।
34:48
जिंदगी भर कुछ ऐसा जान जाऊं वो हो जाए ऐसा हो जाए।
34:58
ये सब विशेष ज्ञान है। अरे वह जानो जिसके बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। वह जानना क्या है?
35:10
वह जानना पना ही तो मैं हूं। मैं स्वयं जानना पना हूं। अब मुझे क्या जानना है?
35:26
तो परमात्मा कैसा होता है? उसको कुछ भी नहीं जानना है। इसीलिए वह सब जानता है।
35:35
अंतर्यामी सब जानता है ना। उसको कुछ भी जानना है इसकी रिक्वायरमेंट
35:44
रहती है क्या अंतर्यामी को वो तो तुरंत जानता है
35:54
अखंड ज्ञान है ना अंतर्यामी
36:03
तो अंतर्यामी प्रभु ही तो
36:11
सामान्य है।
36:22
सबके उर अंतर बस हूं जानहु भाव कुभाव
36:30
सबके उर अंतर में बसा हुआ है। अंतर्यामी सिंपल
36:53
तो सामान्य ज्ञान ही प्रभु है। परमात्मा है। विशेष ज्ञान, ये सीखे, वो सीखे, ये पढ़े,
37:06
वो पढ़े सब विशेष है। अज्ञानता है।
37:20
अब सामान्य ज्ञान बुद्ध पुरुष में ज्यादा होता है। अज्ञानी में कम होता है क्या?
37:26
बताओ। सब में एक समान है ना? यही परमात्मा है ना?
37:38
अब शिव में ज्यादा है और मनुष्य में कम है वह सामान्य ज्ञान नहीं है।
37:48
दोनों में एक समान है। कम ज्यादा जो होता ही नहीं
37:56
अभेद एकदम अखंड
38:13
अब आप बोलते हो सामान्य ज्ञान हमेशा कैसे बना रहे तो आपने सामान्य ज्ञान को टच किया
38:22
ही नहीं हमेशा हमेशा का भी जो स्वामी है उसको
38:32
हमेशा नहीं होना होता है।
38:44
एकदम सिंपल है। याद करो तब नहीं करो तब।
39:11
सामान्य ज्ञान में यार इंटरेस्ट नहीं आता है। अरे मन को नहीं आता है। मन को
39:17
एंटरटेनमेंट चाहिए। विशेष चाहिए।
39:36
तो सामान्य ज्ञान कैसे प्राप्त करें? अरे सामान्य रहो ना भैया।
39:47
एकदम सामान्य सिंपल हो जाओ बस।
39:55
तो सिंपल हो जाना परमात्मा हो जाना है।
40:05
सामान्य हो जाना परमात्मा हो जाना है।
40:15
एकदम सिंपल सिंपल से भी ज्यादा सिंपल।
40:31
यानी आकाश से भी ज्यादा सिंपल
40:55
आकाश में भी एक विशेषता है। वह सबको अवकाश देता है, स्पेस देता है।
41:03
है ना एक बारीक विशेषता
41:19
हवा में भी विशेषता है स्पर्श की हवा चलती है तो बारीक
41:27
लेकिन परमात्मा में कोई विशेषता नहीं होती एकदम एकदम सिंपल होता है।
41:35
सिंपल से भी सिंपल वो एक्चुअल परमात्मा बता रहा हूं मैं।
41:45
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना एकदम सिंपल।
41:53
उसको ख्याल ही नहीं है। मैं परमात्मा हूं। इतना सिंपल मैं हूं का भी ख्याल नहीं।
42:19
अंतिम दिक्कत क्या है मालूम? सामान्य ज्ञान का अर्थ यह है
42:32
कि जैसे ही आप टच किए सामान्य ज्ञान को उसमें विशेषता के लक्षण आ गए।
42:46
अरे जो है सो है ना उसको टच वच क्या करना यादवाज क्या करना
42:54
बस बस
43:10
हम क्या करते हैं? हां। सामान्य ज्ञान हो ही रहा है। निरंतर ज्ञान का ज्ञान।
43:18
और फिर अखंड ज्ञान। अब सेंस अखंड में जा रहा है। अब अखंड यानी विशेषता।
43:28
निरंतर ज्ञान का ज्ञान अब निरंतर यानी विशेषता
43:36
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना अब देखो सर्वत्र समान है ऐसा विशेषता बारीक आ रही
43:43
है थोड़ा अपन और अपग्रेड हो रहे हैं ना अब एकदम बारीक माइनर
43:54
तो अब इन सबको भी हटा
44:03
अब सिंपलनेस है फाइनल एकदम सिंपल पता नहीं क्या कैसे क्या क्यों
44:12
प्रभु ज्ञान वो कुछ पता नहीं मस्त सिंपल
44:19
है ना एकदम सिंपल
44:47
तो जैसे शांति सिंपल है ना तो मैं कह रहा था ना कि शांत हो जाना
44:57
परमात्मा हो जाना वही बात है सिंपल हो जाना परमात्मा हो जाना
45:07
शांति चरम है याद रखना अब नारायण डूबते हैं अपने आप में शांति
45:17
में डूबते हैं ना शाकारकारम शिव समाधि लगाते हैं शांति में सारे बुद्ध
45:23
पुरुष पूरा अस्तित्व शांति ही शांति है। यह फाइनल मैसेज है साइलेंस।
45:33
देखो साइलेंस कितना सिंपल है।
46:12
तो सिंपल हो जाना ही परमात्मा हो जाना। और वहां परमात्मा होने का सेंस ही नहीं
46:20
है। कायदा से इतनी सिंपलनेस है।
46:45
तो यही सामान्य अनुभूति की अनुभूति है। सामान्य
46:54
जो सब जगह सामान्य है।
47:01
विशेष एक जगह होता है। सामान्य सब जगह होता है। तो जो सब जगह सामान्य है
47:11
उसी की अनुभूति। सामान्य अनुभूति की अनुभूति।
47:21
यह अनुभूति भी सामान्य है। यह विशेष नहीं है।
47:29
सिंपल है। सहज। ओके।
48:07
तो हमेशा सिंपल रहना और सिंपल रहना
48:16
एकदम सिंपल। एकदम सिंपल
48:33
तब जान जाओगे कि परमात्मा क्या है? उसकी व्यापकता क्या है?
48:41
हम जो व्यापक होने का प्रयास करते हैं ना वह विशेषता है
48:47
और सिंपलनेस में व्यापक सहजता है। बहुत डिफरेंस है।
48:55
सिंपल रहो ना एकदम सहज व्यापकता रहेगी। जैसे आकाश सहज में व्यापक है।
49:04
सिंपलनेस में सहज व्यापकता रहती है। एकदम सिंपल। पता ही नहीं क्या है, कौन है, कौन क्या
49:12
है, मैं कौन हूं? का सेंस ही नहीं।
49:29
और सिंपलनेस से जिसको प्रेम हो गया उसी को परमात्मा से प्रेम हुआ।
49:36
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना महादेव बोलते हैं
49:47
सिंपलनेस से जिसकी मोहब्बत हुई उसी की मोहब्बत परमात्मा से हुई असली वाले
49:56
परमात्मा से तुम जो ये रोते गाते हो उस परमात्मा से नहीं
50:04
अब परमात्मा त्मा बोध पूर्ण है। सिंपलनेस से मोहब्बत
50:13
प्रेम प्रेम ते प्रगट होई मैं जाना
50:22
बस
50:36
तो सिंपलनेस में तो भैया कौन इनलाइटेंड है, कौन नहीं है वह तो घटिया बात है। कचरा बात
50:44
यह आत्मज्ञानी है, यह नहीं है कचरा। यह परमात्मा है, यह जीव है। कचरा बात है।
50:55
हां। यह नर है, ये नारायण है ना?
50:59
सिंपलनेस। एकदम इवन यह सब जगह है। यह एक जगह है। यह भी
51:09
कचरा बांध है। बस सिंपलनेस
51:16
अरे जिसको सब जगह है का सेंस है वो सब जगह है ही नहीं।
51:23
क्या सिंपल एकदम
51:37
हां जी
52:09
तो सिंपल हो जाना परमात्मा हो जाना
52:16
एकदम सिंपल रहो संसारी भी मत बनो आध्यात्मिक भी मत बनो
52:25
जीव भी मत बनो, परमात्मा भी मत बनो,
52:31
विशेष भी मत बनो, सामान्य भी मत बनो। यही असली सामान्यता है।
52:40
सिंपल। ज्ञानी भक्त तो बनना ही नहीं। ना ज्ञानी ना भक्त।
52:48
बस कुछ बनो ही मत। बनना ही विशेषता है।
53:02
कुछ और होना ही विशेषता है। कुछ बनो ही मत।
53:12
और जैसे हो वैसे तो हो ही कुछ बनो ही मत।
53:21
बी सिंपल बस सिंपल
53:30
कुछ बनना ही नहीं है यार कुछ होना ही नहीं है
53:56
हम
54:19
ओम शांति शांति
54:27
शांति
54:56
सिंपल हो जाना ही परमात्मा हो जाना। ाना है।
55:09
बस सिंपल रहना। परमात्मा हो जाना है को भी छोड़ दो। बस
55:16
सिंपल रहो। कुछ बनो ही मत।
55:25
कुछ होना ही नहीं है, कुछ बनना ही नहीं है। और आप सिंपल हो ही
55:35
प्रेम प्रणाम