0:19
अरे कोई है कि नहीं है भैया?
0:22
जी गुरुदेव। हां जी तो बताओ ना कुछ यार।
0:28
गुरुदेव आज अपना एक अनुभव बताऊं। क्या बताऊं?
0:34
अनुभव। हां बताइए। जी गुरुदेव। सुबह मैं उठा और एक दो
0:41
प्राणायाम करके फिर हरि ध्यान करने के लिए मैं बैठ गया। और हरि ध्यान कर मैं लेट के
0:48
कर रहा था गुरुदेव। तो लेट के करते करते आज मैं सो गया था और सोने के बाद मैं ऐसा
0:56
टाइम था कि मैं सपना भी देख रहा था और आपका बातें भी सुन पा रहा था और अचानक से
1:03
मुझे यह रियलाइज हुआ कि मैं तो दोनों काम एक साथ कर रहा हूं और उतने में ही एक दादी
1:10
आके मेरा गेट ठकठकाई तो फिर मैंने आंखें खोली तो मैं देखा कि मैं ही हूं बाहर मतलब
1:18
मैं 1 मिनट के लिए मेरा सारा डाउट क्लियर हो गया था और फिर धीरे-धीरे वह धुंधला
1:26
होते गया सवाल जवाब में फंसते-फंसते पर 1 मिनट के लिए सब एकदम क्लियर हो गया था गुरुदेव लग ही नहीं रहा था कि सब कुछ इतना
1:34
आसान कैसे हो सकता मतलब सारे रहस्य खुल गए थे गुरुदेव एक मिनट के लिए तो मतलब मोक्ष
1:41
ही मिल गया था हां तो अच्छा है बेहतर है
1:49
एक बार भी एड्रेस पता चल जाए ना तो फिर आप रिलैक्स हो जाते हो।
1:57
बहुत बढ़िया है। हम हम
2:09
बस मस्त रहा करो। निश्चिंत रहा करो।
2:22
उसके बाद से गुरुदेव मैं सोच लिया कि मायापति को ही आनंद है माया का तो यह सोच
2:28
के छोड़ दिया वो सब और एकदम मजा आ रहा है।
2:36
अरे माया भी भगवान है तो निश्चिंत रहो बस। जब माया भी भगवान है तो फिर बचे क्या?
2:46
हमेशा मस्त रहा करो निश्चिंत रहा करो 1 मिनट जो हुआ वो सुंदर उसके बाद जो नहीं
2:56
हुआ वो भी भगवान है जिसको आप कुछ माया या दुनिया समझते हो वो भी सुंदर है ना सब
3:05
सुंदर ही सुंदर
3:15
ओके मस्त रहो बस
3:28
हम हम दिए को गलत जगह रखे हो तुम
3:35
जगह हमने फिक्स की यानी वही रहेगा भाई ठीक है ध्यान रखना।
3:50
हां जी।
4:12
बस मस्त रहा करो आनंद में निश्चिंत
4:46
ऐसा मुंह लटका के मत रहा करो। है ना?
4:52
जानू मानो घर में कोई मर गया हो। रास्ते चलते लोगों को ऐसे देखोगे ना तो
5:03
उनका चेहरा ऐसे लटका रहता है। जैसे उनके घर में कोई मर गया है।
5:08
पता नहीं इतने सीरियस क्यों रहते हैं। कुछ समझ आता नहीं आता। इतनी सुंदर जिंदगी
5:19
तो है। जिंदगी से बड़ा क्या सरप्राइज है?
5:29
इतनी खरबों पृथ्वीयां अभी साइंटिस्ट लोग खोजे हैं। करोड़ों
5:36
ग्रह नक्षत्र जो भी बोल लो और उनमें इस पृथ्वी में जीवन है और इसी पृथ्वी में आप हो।
5:44
कितने आनंद की बात है। मुंह लटकाए बैठे हो साला मरे खुरे टाइप से।
5:53
बेमतलब का
6:09
इस जिंदगी में जिंदगी का सरप्राइज सबसे बड़ा है।
6:18
वो सबको मिला हुआ है। इसलिए हमेशा आनंद में रहा करो।
6:31
यह हो गया, हमारे यहां वो हो गया, हमारे यहां यह हो गया। बस वही वही नजर गड़ा के रखे रहते हो। कुछ नहीं हुआ है। सब चलता
6:40
रहता है।
7:22
हम तो बताओ ना यार कुछ कैसे खामोश बैठे हो कुछ बताओ प्रेम प्रणाम
7:31
प्रेम प्रणाम प्रेम प्रणाम स्वास्थ्य कैसा है आपका हम स्वास्थ्य कैसा आपका स्वास्थ्य है
7:40
यार यार ये ऐसा बकवास मत पूछा करो है ना क्या मैं बुड्ढा दिखता हूं क्या
7:49
आप आपसे ज्यादा फिट हूं मैं नहीं बिल्कुल इधर
7:58
इधर उधर की बात नहीं मेरा एक प्रश्न था प्रभु जी
8:05
हम मोहन और सन्नाट में क्या फर्क होता है?
8:12
क्या मौन और सन्नाटे में सन्नाटे में
8:22
क्या अंतर है पूछ रहे हो कि क्या पूछ रहे हो वॉइस नहीं आ रही है मतलब फर्क मतलब क्या चीज कुछ जैसे एक होता
8:30
है खुद मौन हो जाना एकदम वो खुद सन्नाटा सा आता है बिल्कुल देखो सन्नाटे से बेहतर मौन है मौन से
8:39
बेहतर शांति है और शांति से बेहतर मैं हूं। अब आगे समझ जाओ। ठीक है।
8:48
एनीबडी
8:59
प्रेम प्रणाम प्रभु जी। हां जी। प्रेम प्रणाम प्रभु जी। हम
9:08
प्रभु जी मैं ये पूछना चाहती हूं कि मैं आवाज इनकी कम क्यों आ रही है सबकी?
9:13
हेलो हां अब आ रही है बताइए। प्रभु जी
9:21
प्रभु जी मैं आपसे बहुत दिनों से बात करना चाहती थी। हेलो
9:30
आपकी आवाज नहीं आ रही। इनको ड्रॉप करो। प्रणाम
9:42
कौवे की आवाज इतनी बढ़िया आ रही है।
10:18
चेंज करते जाओ। इनको टॉक नहीं करना है तो दूसरे को लाते जाओ। हमारे साथ टॉक करो
10:24
यार। ऐसे समाधि मत लगा रहो।
10:33
प्रेम प्रणाम प्रभु जी। प्रेम प्रणाम। मेरी तो दररोज ही दररोज अब तो बात हो रही
10:41
है। कल भी हुई थी। आज भी मैं मुझे तो चमत्कार ही मिल गया है। और आपसे बात ही हो गई। मैं लाइव में आ जाती हूं। मेरा मैं
10:50
आपसे मुख आपका मुखारविंद मेरे आमने सामने आ जाता है। मैं तो भाग्यशाली हो गई हूं।
10:59
हां जी। बहुत बहुत प्रेम में डूब गई हूं। इसीलिए तो मुझे यह चमत्कार मिला है। नहीं तो यह
11:06
कैसे हो सकता है? जो मैंने सोचा भी नहीं था। बहुत आनंद आ रहा है। बहुत आनंद आ रहा है।
11:14
प्रेम प्रणाम प्रभु से। प्रेम प्रणाम। बस हमेशा आनंद में रहो,
11:20
मस्त रहो। हां जी। भाग्य चमक गया मेरा तो
11:27
कि ऐसे मैं सोचती भी नहीं थी तो मैं लाइव में आ गई।
11:36
नहीं बहुत अच्छा है। मैं आपके पास ही हूं गुरु जी।
11:53
हम हम
12:38
जय प्रणाम प्रभु जी हां प्रणाम जी
12:45
प्रभु जी जब अभी आपने ने कहा ना कि इस दिए की जगह हमने फिक्स की है। तो
12:52
फिक्स की आपने अभी बताया ना कि ये दिए की जगह हमने फिक्स की है।
13:00
तो उस फिक्स शब्द से आपने कुछ समय पहले जो बताया था ना हर चीज फिक्स है। ऑलरेडी
13:06
फिक्स है। तो मतलब सब कुछ फिक्स है। मतलब जो आप अभी
13:13
आनंद ही है। एक्चुअली आनंद है ना तो हर चीज बहुत अच्छी है क्योंकि आपने
13:20
फिक्स की है। वाली बात नहीं है। कोई
13:30
सरप्राइज वाली बात है। फिक्स वाली कोई बात नहीं है। है ना?
13:34
मतलब मैं शब्दों को सही से शायद बोल नहीं पा रही हूं। मतलब हम सब कुछ बहुत एक्यूरेट है इस इससे मतलब
13:43
जो नजर जाती है हमारी गलत की तरफ तो गलत कुछ है नहीं एक्चुअली सारा कुछ बहुत
13:48
एक्यूरेट है और जो हमारा सनातन का जो है एक और चीज आज जो आपके सत्संग से ही क्लियर
13:56
हुई थी काफी समय पहले कि अतिथि देवो भव हम कहते हैं तो
14:04
मतलब जो आप कहते हो ना सभी परमात्मा है सभी भगवान है तो और एक अतिथि जब है तो उसको होस्ट करने
14:13
वाला होस्ट भी है तभी अतिथि है। तो इन दोनों का एक साथ होना बहुत सुंदर है। बहुत ही सुंदर है। तो ये सुंदरता तो सदा ही सदा
14:23
है। तो हर एक मतलब जो गेस्ट है वो मेरे लिए भगवान है।
14:31
तो जो कुछ दिखाई दे रहा है मेरी सृष्टि में वह मेरा गेस्ट है तो मेरे लिए भगवान तो है।
14:39
बस वही आज लग रहा है बार-बार और कुछ दिख ही नहीं रहा है। उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
14:48
दिल से धन्यवाद।
15:07
अरे हम आप ही को ख्याल कर रहे थे यार लिखे नहीं हो बहुत दिन से विशाल जी
15:18
प्रेम प्रणाम प्रभु प्रेम प्रणाम यार क्या हाल क्या हालचाल?
15:26
एकदम बढ़िया प्रभु। एकदम बढ़िया। हां तो कुछ बता दो यार।
15:36
अभी सुन रहा था आज जरा नींद जल्दी खुली तो अभी अभी को सुन रहे थे ऐसे मैसेज आने से
15:43
पहले। तो बहुत सुंदर कि अह जो कहा गया है कि जीना शुरू कर दो अभी।
15:53
और कितना हम ढूंढेंगे और कंफर्म क्या करना है तो वो बहुत सुंदर और ये हुआ कि हम कंफ
16:02
मिल जाता है फिर हम रिकंफर्म करना चाहते हैं कि इतना सारे सुंदर अनुभव हो रहे हैं। इतना सुर सुंदर है तभी भी हम राम को
16:10
कंफर्म करना चाहते हैं और और कोई कंफर्मेशन की जरूरत नहीं है। राम ही है। राम ही है। जो है सो राम ही है।
16:20
तो तो बहुत सुंदर हुआ सुबह का आज शुरुआत बहुत
16:26
सुंदर हुई और आज आपके दर्शन हुए कोटि-कोटि धन्यवाद। हां
16:37
हां कंफर्म कितना ही करोगे वो बात सही है। अपना
16:44
सेलिब्रेशन शुरू कर दो। हम कंफर्म नहीं भी होता है तो भी सेलिब्रेट
16:52
करो बस मस्त होके रहो निश्चिंत
17:00
जो आपका है जो आप हो उसको कोई छीन नहीं सकता और जो आप नहीं हो उसको कोई दे नहीं सकता
17:09
इसलिए मस्त रहो करना क्या है
17:19
जो आप हो वो हो ही ना भाई उसको उसको कोई डिस्टर्ब कर ही नहीं सकता। आपका
17:26
जो स्व है स्वभाव है या मैं बोलते हो जिसको बचपन से अभी तक उसको कोई भी डिस्टर्ब कर
17:34
पाया। कोई कर ही नहीं सकता ना। किसी में दम ही नहीं है कि उसको डिस्टर्ब कर दे। वह
17:42
परमात्मा का भी परमात्मा है। आपका स्वयं
17:50
और जिस जगह आपको डिस्टरबेंस होता है वहां डिस्टरबेंस होता ही रहता है। इसलिए मस्त रहो। है ना?
18:03
आप में डिस्टरबेंस नहीं है। यह आनंद की बात है।
18:12
आपके मैं में कोई खरोच भी नहीं पैदा कर सकता। दुख की, डिस्टरबेंस की,
18:20
मृत्यु की। वो वो वस्तु आप सदा से हो, पहले से हो।
18:26
उसको कोई नहीं बदल सकता। 33 करोड़ देवी देवता भी आपको श्राप दे दे ना तो भी नहीं बदलेगा वो।
18:36
और 33 करोड़ देवी देवता वरदान दे दे तो वह बढ़ नहीं जाएगा। कुछ एक्स्ट्रा नहीं हो जाएगा।
18:44
एज इट इज ही रहता हूं मैं। इसलिए मस्त रहो यार।
18:58
जहां घट नहीं होती। जहां घट नहीं होती।
19:07
वही तेरा स्वभाव है। हां। वहां कुछ होता ही नहीं है।
19:17
यह हो गया, वह हो गया, दुनिया आ गई, वो हो गया। कुछ नहीं होता है वहां।
19:28
स्वयं में आज तक कुछ भी हुआ ही नहीं। ना शरीर हुआ, ना मन हुआ, ना कोई दुनिया हुई,
19:37
ना कोई माया हुई। इसलिए तो स्वयं बचपन से अभी तक एज इट इज
19:46
है। इवन सदा से एज इट इज है।
20:06
तो जैसे आज से एक साल पहले आपने क्या सपना देखा था रात को याद है क्या
20:14
नहीं ना बट आप तो थे ना ऐसे ही जन्म के पहले आप कौन थे क्या थे
20:23
याद नहीं है लेकिन आप तो थे ना हां
20:31
आप सदा से हो उसका कोई भी बाल भी बाका नहीं पड़ता उसको कोई डिस्टर्ब कर ही नहीं सकता। वह आप
20:39
हो यार। हजारों मन आ जाए, हजारों मायाएं आ जाए,
20:44
आपको डिस्टर्ब नहीं कर सकती। असंभव
20:59
तो जैसे शरीर में जब तक कोई रोग ना हो तो शरीर का पता नहीं चलता। कहीं दर्द, कहीं पेन
21:07
है ना अस्वस्थता में ही शरीर का पता चलता है ना। कहीं कोई
21:16
प्रॉब्लम है या कुछ लग गया या कुछ तो पता चलता है।
21:24
तो शरीर तो अस्वस्थ होता है। मैं आज तक अस्वस्थ हुआ ही नहीं।
21:32
इसलिए मैं का पता किसी को नहीं चलता। मैं सदा से स्वस्थ हूं ना।
21:42
है ना? सदा से स्वस्थ हूं। मैं में कोई विकार, कोई बीमारी, कोई रोग, कोई पाप,
21:51
पुण्य कुछ आया ही नहीं। आज तक ना आ सकता है कभी।
22:01
वही मैं हूं। सदा निर्विकार
22:12
सदा निरंजन निर्लेप लेप चढ़ता ही नहीं है। दुनिया आई।
22:20
कितने बार दुख आया जीवन में। कितने बार विपरीत परिस्थितियां आई।
22:28
मैं पर लेप चढ़ा क्या किसी का भी क्या क्या नहीं आया होगा सोचो कुछ भी लेप
22:34
चढ़ा क्या स्वयं में निर्लेप हूं ना यार मैं
22:41
हां निर्लेप हूं चाय दो यार
22:50
हां
23:00
एकदम निर्लेप
23:13
कितने बार मन परेशान किया, कितने बार क्या किया? लेकिन मैं तो एज इट इज हूं।
23:22
तो ये आप सहज में हो। इसमें कुछ करना वरना है ही नहीं। सोचना
23:29
समझना भी नहीं है।
23:48
तो मैं में कुछ हो ही नहीं रहा है। तू मुस्कुराया कर।
23:56
मैं में कुछ हो ही नहीं रहा है। तू मुस्कुराया कर।
24:08
इस अन हो रहे तमाशे को देखकर मुस्कुराया करो।
24:18
कुछ होता ही नहीं है। मैं को आप कुछ मान लेते हो तब भी कुछ नहीं होता है।
24:24
जैसे चीनी को कप मान लिए, डंडे लकड़ी को डंडा मान लिए तो लकड़ी क्या खराब हो जाता
24:31
है क्या? दिखाओ लकड़ी आज इसको हम डंडा मान लिए लकड़ी को तो लकड़ी
24:38
खराब हो गई क्या? लकड़ी में कोई दोष आ गया क्या? तो मैं को आपने शरीर मान लिया तो मैं में दोष आ गया क्या?
24:49
अरे होता ही नहीं है यार।
25:02
मैं को जीव मान लो, देह मान लो, कुछ भी मान लो। कोई दोष लगता ही नहीं है। मैं में फिर भी
25:10
वो सदा निर्दोष है और निर्दोष ही रहेगा। है ना? लकड़ी को डंडा मान लो, फर्नीचर मान लो,
25:21
विंडो मान लो,
25:23
दरवाजा मान लो। लकड़ी में दोष थोड़ी ना आ जाएगा।
25:38
तो दोष किस में लगता है? डंडे में। किस में
25:47
डंडे में बहिर चरित्र में जो हमारा व्यक्तित्व है बॉडी है इसमें रोग
25:56
होता है बहिर चरित्र में दोष होता है कुछ ना कुछ तो दोष रहेगा ना यार बहिर चरित्र
26:03
में
26:16
और सबको बहिर चरित्र देख के ही मोह हो जाता है। बहिर चरित्र में क्या दोष है? अब ये शरीर
26:25
मरेगा। मन चंचल है। है ना? ये सब दोष है। इसके
26:34
शाश्वत नहीं है यह सब। लेकिन
26:42
मैं फिर भी निर्दोष हूं। असली चीज तुम निर्दोष हो।
26:51
असली तो तुम ही हो ना। हां।
27:14
हां जी क्या बोलते विशाल जी बताया करो कुछ यार
27:21
हां आपको सुनते ही मस्त लगते बहुत मस्त
27:29
बहुत मस्त तो खुद को कुछ मान लेने पर भी मैं पे खुद
27:38
में कोई दोष लगता नहीं है। है ना?
27:46
लग सकता नहीं है।
27:59
आईने में कुछ भी देख लेने पर आईने में वो दृश्य नहीं रहता है ना।
28:08
आईने के सामने आप कोई भी कर्म करो तो आईने में कुछ भी चढ़ता है क्या?
28:18
नहीं चढ़ता है।
28:34
आईना कोरा का कोरा रहता है। ऐसी मैं पर कुछ नहीं चढ़ता है
28:44
और मैं पे ही यह सारे दृश्य देख रहे हो आप ये शरीर मन ये दुनिया
28:51
मैं रूपी आईने में ही तो यह सब देख रहे हो क्या बिंब प्रतिबिंब तो यह चढ़ रहा है क्या मैं पे
29:02
मैं तो एज इट इज है हां
29:10
यह दिख रहा है तो भी एज इट इज है।
29:27
तो मेरे को कुछ होता ही नहीं है यार। और आप क्या सोचते हो? मैं मेरे को यह हो गया। मेरे को वह हो गया। अरे आपको कुछ हो
29:36
ही नहीं सकता। वो शख्सियत हो आप।
30:13
अब आप क्या बोलते हो? मेरे को माया घेर ली। ऐसा नहीं होता। मैं माया में फंस गया। ऐसा नहीं होता। मैं को कैसे माया घेर देगी?
30:25
लकड़ी को क्या यह डंडा घेर देगा?
30:32
लकड़ी को यह दरवाजा ये फर्नीचर घेर देगा तो मैं को यह शरीर मन माया ये कैसे घेर देगी फिर?
30:51
अरे डंडे का सब कुछ लकड़ी, मन का, शरीर का, माया का सब कुछ मैं तो यह मेरे को कैसे घेर देगी?
31:04
इनका अस्तित्व ही मैं हूं। सारी मान्यता, मान्यता यानी माया। मान्यता
31:11
यानी मन। सारी मान्यताओं का अस्तित्व तो मैं हूं भैया।
31:22
तो मान्यता कैसे आपको घेर देगी भैया?
31:27
तो माया ने आपको घेरा है। बस यही माया है।
31:35
घेरावेरा कहीं नहीं है। माया में हम फंस गए हैं। बस यही माया है।
31:45
है ना? फंसे वसे कहीं नहीं है। आपको कौन फंसा सकता है? पागल हो क्या? अब यह लकड़ी
31:55
को डंडा फंसा देगा। डंडा मान्यता है लकड़ी की।
32:02
शरीर मान्यता है, जीव मान्यता है मैं का। तो जीव कैसे फंसा देगा मैं को?
32:11
तो मैं को आपने पहली गलती की कि मैं को जीव माना, गलत बटन लगाया। अब सब बटन गलत
32:19
लगेंगे। वह बात ही फाल्स है। हां क्योंकि
32:28
मैं जिस चीज को मान रहा हूं वो मेरे को कैसे बांध सकता है यार?
32:34
मैं खुद को जीव मान रहा हूं। देह मान रहा हूं। तो ये मेरे को बांध कैसे सकता है? बताओ ना
32:43
आप। बकवास की बात है ये सब। हां।
32:50
मैं माना हूं ना यार मेरी मौज है। ऐसे कैसे बांध देगा?
33:26
तो मैं सदा से अमान्य पद में रहता हूं। जहां कोई मान्यता
33:34
नहीं है। है ना? मेरा नेचर क्या है? मैं का स्वभाव क्या है? अमानीय पद
33:44
जहां किसी भी तरह की मान्यता नहीं है। किसी भी तरह की माया
33:50
नहीं है। किसी भी तरह का मन नहीं है।
33:58
तो मैं सदा वहीं रहता हूं। अमानीय पद में। तो फिर यह माया क्या है?
34:12
अरे माया कहीं है ही नहीं।
34:20
माया को है बोलना ही माया है।
34:27
माया को कहीं नहीं है बोलना कहीं नहीं है। हां सही बता रहा हूं मैं।
34:43
अरे मन को याद करना ही मन है। नहीं तो मन कहां है बताओ
34:52
अभी तक आधे घंटे पहले किसी को मन याद आ रहा था क्या मन था क्या कहीं
35:00
बताओ याद करते हो तो आ जाता है मन मन मन करते
35:06
हो तो मन मन मन हो जाता है
35:14
हां मृत तृष्णा का जल कहीं होता है क्या?
35:25
ऐसी माया कहीं नहीं होती। समझ रहे हो?
35:31
लगती है कि है लेकिन होती कहीं नहीं।
35:56
तो मैं की मान्यता मेरी मान्यता मुझे कैसे बांध सकती है? आप
36:05
बताओ असंभव क्योंकि मैं बंध गया हूं भी एक मान्यता
36:15
है। मैं कहीं अटक गया हूं, उलझ गया हूं। कुछ
36:23
मेरे को हो गया है। यह भी एक मान्यता है।
36:32
ये सब मान्यता जगत है। और अंत में मान्यता भी एक मान्यता
36:40
है। जब मान्यता भी एक मान्यता है तो अब बचा क्या है?
36:58
मानना भी बस मानना है।
37:26
हम बताओ विशाल जी जमता कि नहीं जमता हां
37:34
मान्यता मान्यता मान्यता यस इसलिए मस्त रहो
37:43
इसलिए मान्यता नाम की कोई चीज नहीं है ना?
37:50
हां। अरे पागलों
37:57
मृग तृष्णा का जल भी मृग तृष्णा का जल है।
38:15
मृग तृष्णा का जल भी एक मृग तृष्णा का जल है बस
38:22
मान्यता भी मान्यता है हां
38:36
वहां ऐसा थोड़ी ना सारी मान्यता से एक-ए करके आप मुक्त होते जाओगे कि मैं देह नहीं हूं। मैं मन नहीं हूं। मैं यह नहीं हूं।
38:43
मैं वह नहीं हूं। अरे मान्यता भी एक मान्यता है। मान्यता मिट गई उसमें।
38:50
हां।
39:10
अमानीय पद
39:25
तो मैंने खुद को क्या माना है?
39:31
जीव माना है, देह माना है, परमात्मा भी माना है। समझ लो शरीर, मन, बुद्धि माना, मैंने खुद को जीव
39:39
माना। मैंने खुद को जो भी माना तो मैंने खुद को जीव माना है, देह माना
39:48
है, मन माना है। यह भी एक मान्यता है कि मैंने माना है।
39:55
हां। मैंने माना ही नहीं है पागलों
40:03
क्या मैंने खुद को कभी भी कुछ भी माना ही नहीं
40:12
है यार माना ही नहीं है।
40:30
मैंने खुद को कुछ माना है। यह भी एक मान्यता है कि मैंने खुद को कुछ माना है। जो भी माना
40:39
है व्हाटएवर। यह भी एक मान्यता है। हां।
40:47
और अंततः मैंने खुद को कुछ भी कभी भी कभी भी माना ही नहीं है यार।
41:01
हां, मैं सदा से आजाद हूं हर मान्यता से।
41:42
इसलिए मान्यता भी एक मान्यता बस
41:51
उसको बंद करो। करो गेट को यार आशीष का पेड़ दिख रहा है देखो देख तो
41:58
देख हां बंद करो
42:14
अरे मैंने क्या सुन रहे हो यार तुम लोग जिंदा हो कि मर गए मैंने आज तक अपने आप को कभी भी कुछ भी
42:24
माना ही नहीं है यार। मैंने अपने को कुछ माना है। यह भी एक मान्यता है
42:33
कि मैंने खुद को कुछ माना है। फिर मैं यह मान लिया हूं तो अब मैं इसमें फंस गया हूं। फिर यह फंस गया हूं तो उसके अंदर और
42:41
उस उस चीजों में फंस गया हूं। यह सब फॉल्स है। मैंने माना ही नहीं है खुद को कुछ भी।
42:55
मैंने खुद को कुछ भी कभी भी माना ही नहीं है यार।
43:06
माना नहीं है तो फिर जानने की भी जरूरत नहीं है। मानू खुद को कुछ और
43:13
तब तो खुद को जानने निकलूं ना। जब मैंने खुद को कुछ और माना ही नहीं है तो जानना भी क्या है?
43:32
मैंने खुद को कुछ माना ही नहीं है। क्या तमाशा है ये?
44:22
तो खुद को कुछ भी ना मानना।
44:30
खुद को भगवान जानना है। मैंने कहा है पहले खुद को कुछ भी ना मानना।
44:37
खुद को भगवान जानना है। अरे मैंने खुद को कभी कुछ माना ही नहीं
44:45
है। तो भगवान क्या जानूंगा खाक?
44:52
मानू तब तो जानू। अरे लकड़ी को डंडा मानोगे तब तो इसको
45:00
लकड़ी जानोगे। लकड़ी को डंडा मानोगे तब तो इसको लकड़ी
45:09
और लकड़ी ने खुद को कुछ माना ही नहीं है। लकड़ी से पूछो। लकड़ी ने खुद को कुछ माना
45:17
ही नहीं है। तुम्हारा दिमाग घुमा हुआ है डंडे में। पूछो लकड़ी से खुद को कुछ माना है क्या?
45:28
नहीं माना है ना लकड़ी ने ने लकड़ी ने ने
45:35
खुद को कुछ माना ही नहीं अरे मैंने खुद को कुछ माना ही नहीं है यार
45:45
कुछ भी नहीं माना है ना जीव ना भगवान कुछ भी नहीं
45:55
क्यों मानू मैं फालतू खुद को कुछ भी तो आप जो सोचते हो ना मैं मान लिया हूं
46:02
फंस गया हूं ये हो गया हूं वो हो गया अरे तूने माना ही नहीं है मेरे भाई कुछ खुद को
46:08
कुछ भी फालतू की बकवास है ये सब तो मैंने खुद को कुछ माना है ये भी एक
46:16
मान्यता है कि मैंने खुद को कुछ मान लिया और मैं फस
46:22
गया हूं। यह भी एक मान्यता है।
46:43
अब किसी मनुष्य को बोलो कि तू अपने आप को गधा मान ले, घोड़ा मान ले। तो मान लेता है क्या?
46:51
अब मैं आत्मा जब मनुष्य नहीं मानता मैं आत्मा भगवान खुद को देह मानेगा बेवकूफ
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समझे उसको हैं
47:07
तो मैंने खुद को कभी भी कुछ भी माना ही नहीं है यार
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खत्म हो गया अध्यात्म का तमाशा टोटल फिनिश
47:23
क्या बोलते हैं क्रिकेट में? क्लीन स्वीप। क्या बोलते हैं? स्वीप यानी क्या होता है?
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सूपड़ा सांप। साला सीरियस बैठे रहते हो। एकदम से ध्यान,
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समाधि लगाए हो जैसे। बहुत बड़ी चीज समझ रहे हो जैसे। अरे कुछ माने ही नहीं हो खुद को यार। कुछ हुआ ही नहीं है।
48:18
तो मैंने खुद को कुछ माना है। यह भी एक मान्यता है। कि मैंने खुद को कुछ माना है।
48:27
यह भी एक मान्यता है।
48:47
तो मैंने कभी भी खुद को कुछ भी नहीं
48:54
माना है। यह भी एक मान्यता है।
49:01
हां बारीक जाओ ना और कि मैंने खुद को कभी भी कुछ भी नहीं माना है। मान्यता के बेस
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पर ही तो बोल रहे हो नहीं माना है। तो यह भी एक अंतिम वाली मान्यता है।
49:21
दूसरी लाइन समझ नहीं आई हो तो कंफ्यूज मत होना नहीं तो माया घेर लेगी।
49:28
पहले में जी लेना इसलिए मस्त रहो यार
49:39
तुम जो हो सो हो ही बताया ना सारे देवता मिलकर श्राप दे दे
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आपको तो तो भी तुम्हारा कोई बाल बाका नहीं हो सकता और तुमको सब आशीर्वाद दे दे तो तुम्हारे
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में कुछ बढ़ाई नहीं हो जाएगी। तुम सुप्रीम नहीं हो जाओगे कुछ और
50:23
तो मैं की मान्यता जीव की मान्यता देवता भगवान है ना?
50:34
और भगवान की मान्यता माया।
50:42
हां। और मैंने कुछ माना ही नहीं है।
50:50
ना कोई जीव ना भगवान ना माया।
51:03
हां जी
51:25
तो मृग तृष्णा कृष्णा का जल भी मृग तृष्णा का जल है।
51:55
मैं क्या बोल रहा हूं? रस्सी आपको सांप दिख ही नहीं रही है। रस्सी आपको रस्सी ही दिख रही है।
52:07
हम आप क्या करते हो? रस्सी सांप दिख रही है। अब साला सांप से रस्सी में कैसे आए? ज्ञान
52:15
का प्रकाश जलाएं और क्या-क्या करें? मैं यह बोल रहा तुमको कि तुमको रस्सी सांप दिख
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ही नहीं रही है। रस्सी रस्सी दिख रही है। लकड़ी लकड़ी दिख रही है। मैं मैं दिख रहा हूं। पागलों
52:33
तुमने कभी भी रस्सी में सांप देखा ही नहीं है।
52:41
मैं में कभी भी जीव देखा ही नहीं है। दुनिया देखी ही नहीं है। आपको मैं मैं ही दिख रहा है। ये मैं ही
52:49
है। अरे मैं ही है।
53:03
मैं कुछ और दिख रहा हूं।
53:09
मैं कुछ और दिख रहा हूं। यह आपकी मान्यता है। है कहीं नहीं। मैं मैं ही दिख रहा हूं
53:18
सर्वत्र। हां जी।
53:28
तो देखो कल माया पे चला आया। आज भगवान भगवान प्लस वन होता है। हमेशा याद रखना।
53:35
विजय भगवान की ही होती है। मायापति की माया का पति है ना
53:46
तो कल माया को जिताया मैं पहले फुल कल पूरा विनिंग थी माया है ना आपको भी लग
53:55
रहा था यार सॉलिड है। लेकिन मायापति प्लस वन है। है ना?
54:03
और मायापति ही है जिसको आप मायावाया कहते रहते हो।
54:13
हां जी। तो जब रस्सी रस्सी ही दिख रही है।
54:25
मैं मैं ही दिख रहा हूं।
54:33
तो और क्या देखना है और क्या जानना
54:40
बजने दे बजने दे बजने दे मैं मैं ही
54:48
दिख रहा हूं तो और क्या देखना है भैया
54:55
और क्या जानना है और क्या होना है
55:12
मोरे कह ही संशय जा
55:21
मोरे कह ही संशय जाही
55:53
तो संशय का मतलब ही होता है जो कमजोर है। उससे फाइट थोड़ी ना करनी है। संदेह का
56:00
मतलब ही है जो कमजोर है। पहले से ही टूटा हुआ है। उसको क्या तोड़ रहे हो?
56:10
पानी पिलाओ यार। मेरा मुरमुरे कहां? कल लाए थे जो लाओ तो।
56:17
ऐसे सेवा करते रहा करो। हां।
56:46
तो मैं कभी उलझ जाता हूं। मैं कभी सुलझ जाता हूं। यह दोनों बातें मैं में होती ही नहीं है। समझ रहे हो?
57:09
तो मैं का पतन हो जाता है मानने पर और जानने पर उत्थान हो जाता है। यह दोनों
57:16
बातें फॉल्स है। मैं को कुछ मानोगे तभी मैं देश से आत्म देश से पतन होगा। है ना?
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मैं को कुछ माने ही नहीं तो पतन हो सकता है क्या?
57:33
बताओ। ठीक। अब जब माने ही नहीं तो अब मैं को जानोगे
57:42
क्या? तो जब पथन पतन नहीं हुआ तो आप अपग्रेड हो गए या मैं में पहुंच गए वह भी
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तो फॉल्स बात हुई ना। यह टोटल फॉल्स है। अध्यात्म सबसे बड़ा फॉल्स है। दुनिया से बड़ा फॉल्स अध्यात्म
57:58
है। हालांकि सबका स्वभाव है।
58:07
लेकिन जिसको हम अध्या अध्यात्म समझते हैं वो अध्यात्म फॉल्स है। मान्यता वाला एक
58:12
अध्यात्म है। एक स्वभाव वाला अध्यात्म है।
58:20
टोटल फॉल्स तो सबसे बड़ी फॉल्स चीज क्या होती है?
58:32
सत्संग सबसे बड़ी फॉल्स चीज होती है। जो है ही नहीं उसको अब बताया जा रहा है। है ही
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नहीं। सबसे बड़ा फाल्स तो वही हुआ ना।
58:55
सत्य का संग सबसे बड़ी फॉल्स चीज है। सत्य का संग कौन करेगा?
59:07
जो अलग है वही करेगा। अलग कुछ होता नहीं है। सब फॉल्स लैंग्वेज है। लैंग्वेज ही फॉल्स
59:17
है। मौन उससे बड़ा फॉल्स है।
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हां, मैं को छोड़ के सब फॉल्स है। और मैं का संग करने की जरूरत है ही नहीं
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भाई। वही तो मैं हूं जिसको संग की आवश्यकता ही नहीं।
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तो मैंने
1:00:07
ना कभी भी खुद को कुछ माना ना मानता हूं।
1:00:14
ना मानूंगा। मैंने कभी भी खुद को कुछ भी कभी भी माना
1:00:26
ही नहीं है। क्योंकि मैंने खुद को कुछ माना है। यह भी
1:00:33
एक मान्यता है। और अंत में मान्यता भी एक मान्यता है।
1:00:55
हम तो क्या बोलते हो विशाल जी बताओ
1:01:10
धन्यवाद हां जी बताइए
1:01:20
अब मैं किसके लिए रीड सीधी करूं हां
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सब तमाशा है यार। कौन से गुरु के पास जाऊं अब मैं?
1:01:57
अरे खुद को कुछ मानूंगा। जी व्यू फिर खुद को कभी शिष्य विष मानूंगा। तभी तो किसी
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गुरु के पास जाऊंगा ना। साला मैं आज तक खुद को कुछ माना ही नहीं
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है। यानी कुछ सीखना ही नहीं है। कुछ जानना ही
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नहीं है। कुछ समझना ही नहीं है। कुछ होना ही नहीं है।
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अरे बताओ विशाल जी क्या बोलते हो?
1:02:41
अरे फेस चेंज करो तो विशाल जी को छोड़ के। सब मौन में चले जाते हैं।
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हां विशाल जी बताओ। अरे उसको क्यों हटा दिया भैया?
1:03:08
विशाल जी घायल हो गए लग रहा है।
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नमस्ते प्रभु जी हां भगवन सॉरी मेरा म्यूट पर चला गया था।
1:03:39
हां विशाल जी बताओ। हां प्रभु कभी मेरे ऊपर कभी मान्यता चढ़ ही नहीं सकती। कभी भी नहीं चढ़ सकती। मैं
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अमारी पद हूं। श्योर हां एकदम श्योर।
1:03:56
और कल परसों कभी भी फिर ये नहीं बोलना मैं दुनिया में गया तो यह हो गया वो हो गया वो हो गया।
1:04:08
हां तो दुनिया है ही नहीं।
1:04:14
हां तो होगा क्या? है ना? हां।
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तो मैंने खुद को कुछ माना है। यह भी एक मान्यता है। मान्यता है।
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मैं खुद को कुछ जानता हूं। यह भी एक मान्यता है। है ना? हम
1:04:47
ज्ञान मान जहां एक ना जानना मानना जहां होता ही नहीं है। मैं वहां विश्राम करता हूं। यार यह क्या जानना और मानना है?
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तो ऐसा थोड़ी ना सत्संग किए और मान्यता हट गई। मान्यता कभी थी ही नहीं।
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कभी थी ही नहीं। थी ही नहीं। तो कैसा लग रहा है बताओ विशाल जी?
1:05:30
एकदम एकदम बहुत बहुत बढ़िया एकदम कि अभी-कभी मान्यता
1:05:39
थी ही नहीं तो फिर क्या बाकी कुछ है ही नहीं मान्यता को छुड़ाने का जो प्रयास है वो भी छूट गया
1:05:48
यस
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चलाते हैं नहीं चलाते हैं तो सारे ज्ञान ध्यान सत्संग किस में होते
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हैं मान्यता मान्यता देश में होते हैं खुद को कुछ मान लिए शरीर व
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जीव व्यू उस देश में मान्यता देश में मान्यता रूपी सत्संग होते रहते हैं।
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हां। अब जब खुद को माने ही नहीं हो तो क्या किस चीज का संग करोगे? किस चीज को जानोगे?
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तो सत्संग से भी आजादी हो गई भैया। सत्य का संग क्या करोगे? सत्य के स्वामी हो तुम। उसका संग क्या करोगे?
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है ना?
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संग तो किसी और का किया जाता है ना। हम और कोई और तो सत्य होता नहीं है।
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और संग भी आप तभी करते हो जब आप कुसंग में पड़े रहते हो। तभी सत्संग करते हो ना।
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अब आप आत्मा ही आत्मा हो। मैं ही मैं हो तो वहां फिर कुसंग यांग है कहां?
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हम तो यार लेकिन विशाल जी
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हां बोलो भगवान यार साला मैंने खुद को कभी भी कुछ माना ही नहीं है यार
1:08:31
अब कोई फंसा नहीं है और सब समझ रहे हैं कि हम फंस गए है ना हम यह हाल है दुनिया का
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खांस ले खांस ले बैठ ना बैठ के खास खासे कर प्रेम प्रणाम गुरुदेव
1:09:07
प्रेम प्रणाम प्रभु आपको
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भेंट देना था हमने हम भेट देना था आपको
1:09:23
हां बताइए एक्सेप्ट करें थैंक यू
1:09:31
आज प्रभु एक बात कहें हां जी कहिए
1:09:40
प्रभु यह अर्जुन अपने माधव से बहुत प्रेम करता है। कौन किससे?
1:09:49
मतलब आप हमारे माधव है ना ये अर्जुन अपने माधव से बहुत प्रेम करता है। ओके
1:09:57
हां जी पता है मतलब कल भी जैसे आपका सत्संग ऑन
1:10:04
हुआ ना तो एक बस मास्टर की वो दृष्टि होती है ना वही बस एक डिसाइपल चाहता है कि एक
1:10:10
मास्टर की दृष्टि हमें मिल जाए बस हम
1:10:19
और प्रभु जैसे आपके सत्संग हुए थे लास्ट दो तीन जो सत्संग हुए थे उसमें जैसे ही
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सत्संग खत्म हुआ ना तो आपने ऐसे बोला कि चलो फिर से अजनबी बन जाते हैं। ऐसे लास्ट
1:10:35
में आपकी वेडिंग थी। हम हम
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प्रभु मेरे को बस वो जैसे ही आपने बोला ना तो एकदम ऐसे जड़ कर गई कोई चीज कि एक
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मास्टर के लिए अपना डिसाइपल वो अजनबी तो कम से कम नहीं आना चाहता
1:10:59
हां ठीक है वो हम कोई कोई गीत गाते रहते है ना आपका क्या नाम है
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दर्शना प्रभु दर्शना जी ओके
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तो विशाल जी ओ विशाल जी हां बोलो भगवंत
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यार कुछ बताओ ना यार तो बताने के लिए मानना पड़ेगा फिर बताना
1:11:54
पड़ेगा कि आपसे प्यार है मान के करना पड़ेगा कि आप प्यार में हम आपके प्यार में हैं।
1:12:12
असली प्रेम मान्यता जगत का हिस्सा नहीं है। आत्म जगत का हिस्सा है। आत्मा के फूल
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हैं। फ्लावर्स हैं प्रेम। वह किससे प्रेम? उससे प्रेम वो मान्यता
1:12:28
जगत वाला है। बस प्रेम वो आत्मा जगत वाला है।
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ओके।
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वो मार्ग हम बोलते हैं ना ज्ञान मार्ग योग मार्ग प्रेम मार्ग यह मान्यता जगत वाले
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मार्ग है। असली प्रेम आत्मिक होता है।
1:13:04
आत्म प्रेम के अतिरिक्त और कोई भी प्रेम संभव नहीं है।
1:13:28
तो आत्मा में जैसे आनंद रहता ही है वैसी प्रेम शांति यह सब रहते ही है। यह आत्मा
1:13:36
की छायां हैं। है ना? यह सब रहते हैं।
1:13:51
हम चेंज करो तो बाकी सबको इनको रहने दो बस
1:14:32
यानी आप लोग सुने नहीं लगता मैंने खुद को कभी भी पास्ट में भी
1:14:43
और अभी मैंने खुद को कभी भी कुछ भी माना ही नहीं है।
1:14:52
ना माना था ना माना है। मैंने खुद को कभी
1:14:57
कुछ माना था या भी एक मान्यता है।
1:15:05
कि मैंने खुद को कुछ मान लिया है। यह भी एक मान्यता है।
1:15:13
मैंने खुद को कुछ माना ही नहीं यार। कभी भी कुछ भी माना ही नहीं यार।
1:15:35
अब वो अष्टावक्र बोलते हैं बंधा अभिमानी बद्ध है मुक्त अभिमानी मुक्त वो तो मान्यता देश है ना मैंने खुद को कभी भी
1:15:45
कुछ भी माना ही नहीं है यार क्या बंधन क्या मुक्ति
1:16:31
ठीक है तो वाणी को विश्राम ओके सभी को प्रेम प्रणाम
1:16:38
प्रेम प्रणाम भगवान धन्यवाद कोटि-कोटि धन्यवाद प्रेम प्रणाम मस्त रहो
1:16:46
प्रेम प्रणाम ओके यस प्रणाम
1:16:53
प्रणाम बस याद रखना अपने अपने आपको कभी भी कुछ भी
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माना ही नहीं टोटल फ्री
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प्रणाम ये लीजिए।