0:18
गुरुदेव हां जी प्रभु जैसे आप कहते हैं ना कि स्वयं में
0:26
जाओ अपने स्वयं में तो जैसे हम वहां पे जाते हैं मतलब अपने आप
0:34
को जैसे ढूंढने की कोशिश करते हैं तो वहां पर हमें कोई सेंटर नहीं मिलता। मींस एक
0:40
व्यापकता का अनुभव होता है एक के कोई यहां है नहीं जिसको मैं तलाश करूं एक फैला हुआ
0:49
है कुछ ऐसा फील होता है यस तो वो 24 आवर रहता है अगर जैसे मैं अपना
0:58
अनुभव बता रही हूं अगर मैं मौन में रहूं तो वो ऐसे ही एज इट इज रहता है हम हम
1:06
लेकिन जैसे थोड़ा सा व्यवहार में आए कुछ भी किया ऐसे तो फौरन वहां से स्लिप हो
1:13
जाते हैं कि वो मौन जैसे टूटा तो वो व्यापकता मतलब हमें कंजर्व लगती है कि वो
1:20
फील नहीं आता। हम हम तो एक तो मेरा यह था और दूसरा था कि जैसे
1:29
एक शिष्य अपने गुरु को याद करता है एवरी टाइम मतलब उसका भाव होता है गुरु के प्रति
1:38
तो उसमें वो आंसू भी आ जाते हैं और मतलब बहुत याद करता है एक शिष्य अपने गुरु को
1:46
तो मास्टर को पता चलता है कि कहीं किसी दूसरे कंट्री में उसका का शिष्य बैठा हुआ है और उसको याद कर रहा है।
1:55
नहीं उसको कुछ पता नहीं रहता मास्टर।
2:01
हां रियल में पता नहीं रहता। हम याद करते हैं ऐसे कोई शिष्य तो मास्टर
2:10
को नहीं पता चलता। बिल्कुल नहीं पता चलता।
2:19
तो आपको लगता होगा आप बेवजह याद करते हो। नहीं वो तो हमारा प्रेम है। हम करते हैं
2:26
पर मास्टर को पता चले ना चले।
2:42
मास्टर मींस क्या मालूम? अंतर्यामी। है ना?
2:48
अंतर्यामी को सब पता रहता है। आप क्या सोचते हो, क्या याद करते हो?
2:55
क्या कल्पना करते हो? आपका एक एक विचार,
3:00
एक एक भाव अंतर्यामी को याद रहता है। और अंतर्यामी ही जब बहिर्यामी के रूप में
3:09
कहीं मिलता है, उसको सद्गुरु कहते हैं। मास्टर कहते हैं।
3:15
सेम अंतर्यामी जैसा कोई बाहर मिल जाए सेम है ना
3:23
तो वह मास्टर होता है
3:34
आप याद करते हो आप कौन से सपने देखते हो आप क्या विचार करते हो क्या भाव करते हो
3:43
यह सब पता रहता करता है मास्टर को बट मास्टर कभी भी आपकी प्राइवेसी को डिस्टर्ब
3:51
नहीं करता। मास्टर का ध्यान केवल आपकी आत्मा में होता
3:59
है। आपके होने में होता है। आपका होना जो स्वयं मास्टर है। परमात्मा
4:07
है। मास्टर का ध्यान आपकी स्मृति पे, आपकी यादों पे या आपके विचारों भाव पर नहीं
4:17
होता। हालांकि आपका कोई भी विचार
4:26
बगैर मेरे जाने वो जा नहीं सकता। ये और बात बट फिर भी
4:37
हमारा ध्यान आपके होने में होता है जो साक्षात परमात्मा है।
4:53
आज
5:07
तो आपका हो ना हां बोलिए बोलिए नहीं आप बोले
5:16
तो जो आपका का होना है वही मेरा होना है।
5:29
होने में भेद है ही नहीं।
5:34
जो तू सो मैं जो मैं सो तू
5:45
मेरा थोड़ा और देना तो मेरे को है ना
5:52
तो जो तू सो मैं
6:11
तो मैं तो यहां चॉकलेट खाता रहता हूं। कहां किसको याद करता रहूंगा? ये देखो चॉकलेट खाता रहता हूं।
6:21
अच्छा। आपका क्या नाम है?
6:32
आपको पता होगा प्रभु नहीं पता है बताइए।
6:39
दर्शना पाकिस्तान से कितनी बार बात की है आपसे?
6:43
यस यस यस हां
6:54
मेरी मेमोरी बहुत खराब है। मैं बहुत जल्दी भूल जाता हूं।
7:02
नहीं प्रभु हां सही बता रहा हूं।
7:11
बार-बार हम तो भाई याद करेंगे मास्टर को पता चले ना चले। यह तो हमारा प्रेम है ना।
7:20
हम
7:38
तो आपकी
7:49
आपकी यादें मेरे तक पहुंचे ना पहुंचे आपका प्रेम
8:00
पहुंच जाता है। और क्या करना है? बाकी चीजों का, यादों का, सपनों का, विचारों का क्या करना है?
8:14
आप सबका प्रेम मुझ तक पहुंच ही जाता है।
8:28
दर्शनाथ जी अब हम नहीं भूलेंगे इस नाम को।
8:36
यही चाहते हैं प्रभु कि आप हमें कभी ना भूलें। मास्टर ने कह दिया मतलब बात खत्म।
8:44
हां तो वीडियो कॉल कैसा लगता है? पहले तो
8:53
टेलीग्राम पे बातें होती थी। हम अच्छा लगता है प्रभु लाइव आपको देखते हैं
9:02
और ऐसे ही मतलब आपको देखते हैं ना रोना आ जाता है एक वो मतलब पहले टेलीग्राम पे था
9:09
सिर्फ आवाज थी आपकी अभी जैसे ही मतलब देखते हैं ना तो आंसू आ जाते हैं पता नहीं
9:16
हम हम तो ये अच्छा है टेलीग्राम से बहुत आपने
9:22
इतना सब हमारे लिए किया अपने भक्तों के लिए आपका आभार है। हम हम
9:30
और मैंने देखा कि मतलब आप तीन-तीन चारचार घंटे मतलब बिना कुछ खाए ऐसे बैठे रहते थे
9:37
कि कुछ खाना ना पीना मतलब वो तो एक गुरु ही कर सकता है। वरना आजकल के
9:44
ऐसा कुछ नहीं है। मैं खाते पीते रहता हूं। कुछ ना कुछ चाय मुरमुरे
9:51
अभी चॉकलेट मेरा चलता रहता है। मैं बड़ा लग्जरी में रहता हूं
9:59
और बहुत अच्छे से सत्संग कराता रहता हूं। यही मेरा आनंद है। यही मेरा प्रेम है। है ना?
10:10
और तो कुछ मेरे को भाता नहीं।
10:18
थैंक यू मास्टर। आज
10:30
तो आपने शुरू में मेरे से पूछा था कि अपने आप में जाते हैं तो वहां कुछ नहीं मिलता
10:36
है। ऐसा कुछ आपने पूछा था तो अपने आप में जाना नहीं है।
10:46
अपने आप में जाने का प्रयास ही दूर हो जाना है।
10:54
आप अपने आप में ही तो हो और कहां हो?
11:01
अपने आप में ही हो। स्वयं में ही तो हो।
11:13
तो लोग पूछते हैं अभी हमारे मलंग जी पूछ रहे थे भाई बाइक में कि क्या पूछे आप ध्यान का
11:23
हम हां कि मैं अभी से पहले हूं अभी के बाद में हूं फिर इन्होंने पूछा कि यह ध्यान
11:31
करता था मैं ओमकार का फिर नाद का फिर प्रकाश का ऐसा ये बता रहे थे
11:44
तो मैंने इनको एक बात बोली कि आप इतने ध्यान किए जो भी किए
11:58
क्या बोला था मैं आपको हम
12:13
अगर मैं ही ध्यान हुआ तो अगर मैं ही ध्यान निकला तो
12:24
मैंने ये कहा था हम ध्यान करते हैं ना इसका ध्यान उसका
12:31
ध्यान फिर ओमकार का ध्यान फिर प्रकाश का ध्यान, फिर अस्तित्व का ध्यान। अरे मैं ही
12:38
ध्यान निकला तो अगर मैं ही ध्यान हूं तो तो आप किसका ध्यान करोगे?
12:53
फिर आप बोलते हो परमात्मा का ध्यान। अरे मैं ही परमात्मा हुआ तो
13:04
अगर मैं ही हुआ तो
13:16
मैं ही ध्यान हूं तो अब किसका ध्यान करोगे? मैं ही परमात्मा हूं तो किसका ध्यान करोगे?
13:24
मैं ही अस्तित्व हूं तो किसका ध्यान करोगे?
13:33
और यकीनन मैं ही अस्तित्व हूं। मैं ही बुद्धत्व हूं तो क्या पाओगे?
13:46
और मैं ही बुद्धत्व हूं। जिसको आप मैं कहते हो ना
13:54
बस वही बुद्धत्व है। एग्जैक्ट वही
14:04
आपका मैं ही बुद्धत्व है।
14:13
बाकी सब सपना है। आपका होना ही इनलाइटनमेंट है।
14:34
मैं ही बुद्धत्व निकला तो मैं ही परमात्मा निकला तो
14:45
तब क्या करोगे और मैं ही हूं बस
14:55
वह बुद्धत्व, वह परमात्मा, वह अस्तित्व,
14:58
वह ध्यान, वह समाधि केवल मैं हूं।
15:07
केवल मैं मुझे ना देखना है, ना जानना है, ना समझना
15:14
है, ना मैं मैं होना है। बस मैं हूं।
15:28
हां जी यानी मैं की ओर इतना सा भी नहीं देखना है।
15:38
इवन मैं भी नहीं कहना है।
15:45
वह तो मैं हूं ही।
16:04
तो चश्मा आप पहने ही हुए हो और चश्मा खोज रहे हो
16:17
परमात्मा आप हो ही और परमात्मा खोज रहे हो
16:27
तो हर कोई चश्मा पहन के चश्मा खोज रहा है।
16:38
हर कोई बुद्धत्व होके बुद्धत्व को खोज रहा है।
16:45
अस्तित्व होके अस्तित्व को खोज रहा है। यह खोज केवल एक भ्रम है।
16:58
एक भ्रम बस
17:11
तो मैं ही बोध हूं। मैं ही बुद्धत्व हूं। बगैर बोध के आप हो सकते हो। क्या बताओ?
17:24
हम बोध है ना आपको हर चीज का प्रतिपल बोध हो
17:32
रहा है। तो बोध ही बोध तो आप हो।
17:45
मैं ही बोध हूं और मैं ही बुद्धत्व हूं।
17:52
मैं ही
18:03
मैं ही ज्ञान हूं और मैं ही आत्मज्ञान हूं।
18:14
मैं ही प्रेम हूं और मैं ही परमात्मा हूं।
18:24
बस मैं
18:50
तो मैं को तलाशो मत। आप मैं ही हो।
19:00
मैं का ध्यान मत करो। आप मैं ही हो।
19:12
मैं की याद भी मत करो।
19:22
आप केवल मैं सहज में
19:36
हां जी
19:46
तो मैं के अतिरिक्त कभी भी कुछ भी हुआ ही नहीं है। कुछ हुआ ही नहीं है।
19:56
कुछ भी नहीं है। कुछ भी नहीं।
20:15
तो प्रभु ये जो हम कहते हैं कि हम स्वयं में जाएं तो जाना है ही नहीं वो तो है ही
20:22
वो फॉल्स है मतलब जैसे ही आप ने कहा कि मैं स्वयं में
20:32
जा रही हूं वह स्वयं अलग हो गया कुछ
20:42
जाने का भाव आया और वह अलग हो गया। स्वयं को देखने का भाव आया तो स्वयं अलग
20:49
हो गया। आप स्वयं ही तो हो। को वहां जानावाना नहीं
20:56
है। देखना वेखना नहीं है। यही उसका देखना है। समझ लो कि उसको देखना
21:03
नहीं है। यही स्वयं में जाना है। ऐसा समझ लो कि वहां जाना नहीं है।
21:12
ओके। आप स्वयं ही तो हो। अब मैं आपको बोलूं आप दर्शना के पास जाओ तो आप कैसे जाओगे?
21:22
आप दर्शना ही तो हो। बस ऐसे आप स्वयं ही तो हो।
21:32
ऐसे ही आप बुद्धत्व के पास जाओ। ऐसा बोलते हैं। परमात्मा के पास जाओ। अरे आप बुद्धत्व ही तो हो।
21:40
परमात्मा ही तो हो।
21:52
क्योंकि आनी जानी सो माया वहां आना जाना कुछ नहीं
21:59
देखना तक नहीं है सोचना तक नहीं बस ऐसा है
22:06
स्वाभाविक
22:18
हां जी हेलो
22:25
तो आपको इसमें कोई डाउट
22:35
नो डाउट तो जहां डाउट होता ही नहीं वही ही परम
22:42
सत्य होता है। अनडाउटेबल पॉइंट
22:55
इवन अनटचेबल पॉइंट आप खुद को टच नहीं कर सकते।
23:01
अननोएबल पॉइंट खुद को जान नहीं सकते। खुद को देख नहीं सकते।
23:09
नहीं तो वह सीमित हो जाएगा। असीमित चीजें दिखती है। विराट नहीं दिखता।
23:25
तो खुद का देखना या खुद को देखना क्या है?
23:33
खुद को जानना क्या है? खुद में होना क्या है?
23:44
बताओ। अब अब आपको बताना है। नहीं पता
23:54
हम
24:05
नहीं पता प्रभु। देखो भाई आप बगैर खुद को देखे भी आप हो कि नहीं हो?
24:15
बगैर खुद को जाने भी आप हो कि नहीं हो?
24:21
बगैर कुछ भी किए आप हो कि नहीं हो?
24:28
तो वही तो आप हो। जो बगैर जाने हो सकता है उसको जानना क्यों है?
24:41
जो बगैर देखे हो सकता है जो आप हो ही उसको देखना क्यों है?
24:49
जो बगैर कुछ किए है उसके लिए कुछ करना क्यों है?
25:02
यही आत्मनिष्ठा है कि जो बगैर जाने हैं आपका होना जो आप हो बगैर जाने हो बगैर
25:11
सोचे समझे हो उसको जानना क्यों है
25:18
समझना क्यों है यानी कुछ ऐसा है जो बगैर देखे भी हो सकता
25:30
है, बगैर जाने भी हो सकता है, बगैर समझे भी हो सकता है, बगैर कुछ किए भी हो सकता
25:36
है, वही आप हो। इन सब के बगैर
25:45
आप हो ही बट ये सब आपके बगैर नहीं हो सकता।
25:56
आप इनके बगैर हो सकते और आप हो
26:09
तो खुद को देखो मत जानो मत समझो मत कुछ करो मत जो आप हो वह हो ही
26:17
जैसे के तैसे
26:38
ओके हां बताइए
26:47
यह डाउट था प्रभु के हम स्वयं में जाए और आज यह क्लियर हो गया। एकदम क्लियर।
26:54
हां। अरे जहां जाना है वहीं खड़ा हूं।
27:03
वहीं बैठा हूं। जहां जाना है वहीं बैठी हूं ना।
27:13
जो देखना है वही तो देख रही हूं। और जो होना है वही हूं।
27:28
ओके यस एनीबडी
27:40
प्रेम प्रणाम आपको
28:14
एक सेकंड एक सेकंड यह उसका पीक पॉइंट तो लास्ट में है। मेरे
28:23
हर सत्संग को मैं सबको एक गाइड करना चाहूंगा कि मेरा सत्संग शुरू होता है उसको लास्ट
28:31
तक सुनो क्योंकि उसका पीक पॉइंट लास्ट में आता है और आप पूरे उड़ जाते हो। मेरे किसी
28:38
भी सुनो सुनो सुनो आपके लिए नहीं है। ये सबके लिए है। है ना? मेरा कोई भी सत्संग पूरा उसको
28:48
कंप्लीट करोगे तो आप भी कंप्लीट हो जाओगे। यह मैं सबको कहना चाह रहा हूं। है ना?
28:56
ठीक है। यह सब आप बताइए। आत्मा हम
29:12
अपने लेकिन फिर भी लगता है जैसे
29:22
आप थोड़ा सा अपने हमेशा से
29:30
आप सब कुछ है सब काम करते हैं
29:37
आप लेकिन फिर भी थोड़ा सा अपने
29:44
थोड़ा सा है उसमें डालने का
29:57
हमेशा
30:07
तो आप लाइव कभी मेरे पास आके सत्संग अटेंड नहीं किए होस
30:20
नहीं जो भी समस्या आए हो दोती साल से अगर आप मेरे को सुन रहे हो और मेरे पास भी
30:29
नहीं आ सके इतनी बड़ी तो कोई समस्या होती नहीं है।
30:36
और समस्याओं के बावजूद भी आया जा सकता है। पहली चीज तो यह है। है ना? केवल बुद्धि से
30:44
आप सोचते हो हम सॉल्व कर ले वह YouTube में सुन सुन के सॉल्व कर ले तो वैसा होने वाला नहीं है। है ना?
30:56
हमको क्या होता है ना घर बैठे शॉर्टकट सब मिल जाए। हमको जाना भी ना पड़े। इतनी सी
31:02
भी कीमत ना चुकानी पड़े। हमारे अंदर वो भरा हुआ है। बल्कि हम घर की शादियों में, रिश्तेदारों
31:12
में घूमने के लिए चले जाएंगे। लेकिन सत्संग के लिए 10 दिन निकालने में भी ना हमारे प्राण छूटते हैं। तो ऐसे शख्स
31:22
को तो मैं मिलता ही नहीं हूं। मैं मतलब मैं अस्तित्व। इसको ख्याल रखो आप।
31:31
पहली चीज आप यह ख्याल रखिए। हां। और ये मैं हर किसी को कहना चाहूंगा।
31:43
आपको पता ही नहीं है कि आप क्या सुन रहे हो। हां
31:51
ना वो बौद्धिक पता होना अलग चीज है।
31:58
बौद्धिक पता होना अलग चीज है। हां ना
32:10
तो फर्स्ट तो यह है और मैं को मैं जान उसको और कुछ भी मत मान
32:19
आपने मैं को मैं जाना ही नहीं तभी आपको एकांत में बैठना है। जागृत
32:26
सुशुक्ति में जाना है या 10 मिनट मौन में जाना है। अरे मैं को मैं जान
32:32
उसमें सब कुछ समाया हुआ है।
32:37
बस मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान।
32:47
उसको कुछ भी मत मान। मींस कुछ भी मत मान।
32:54
ना जागृत ना स्वप्न ना सुशुप्ति ना जागृत सुशुप्ति। उसको कुछ भी मत मान ना समाधि ना
33:01
बुद्धत्व ना परमात्मा ना अस्तित्व बस मैं
33:08
को मैं जान कि मैं मैं ही हूं बस
33:20
मैं ही हूं बस
33:34
और उसके बाद मैं को मैं जानकर मैं से संतुष्ट हो जा। इधरउधर अपनी आंखें मत गड़ा कि यह हो जाए,
33:46
कुछ वो हो जाए। बस मैं से संतुष्ट हो जा।
33:54
अपने ही आप से संतुष्ट।
34:11
कि मैं मैं हूं बस मैं और कुछ नहीं ना देह ना मन ना बुद्धि
34:20
ना आत्मा ना परमात्मा ना अस्तित्व मैं को बस मैं जान
34:31
बस मैं
34:45
उसको कुछ भी मत मान। अरे मैं मैं ही हूं बस।
34:57
क्या शरीर, क्या मन, क्या अस्तित्व, क्या परमात्मा, क्या समाधियां,
35:05
मैं ही हूं बस।
35:25
तो मैं को मैं जान उसको व्यक्तित्व मत मान नहीं तो अस्तित्व
35:33
खोजेगा। मैं को जीव मत मान नहीं तो परमात्मा खोजेगा।
35:40
मैं को जागृत मत मान नहीं तो जागृत सुशुक्ति खोजेगा।
35:49
मैं को कोई समाधि मत मान, ध्यान मत मान
35:56
बस मैं को मैं जान कि मैं
36:08
ही हूं बस
36:14
और मैं से संतुष्ट ष्ट हो जा
36:24
अपने ही आप से संतुष्ट हो जा
36:40
यानी आपको आपको या हर किसी को क्या प्रॉब्लम मैं
36:46
मालूम हर किसी की एक बेसिक प्रॉब्लम है
36:55
कि आपको कुछ और होना है। अरे
37:05
मैं को कुछ और होना ही नहीं है। वह अपने आप में संपूर्ण है।
37:18
और कुछ और होना या कुछ और पाना या कुछ और जानना या कुछ और अनुभव करना
37:29
ही संसार माया जगत
37:42
तो मैं को मैं जानकर मैं इस संत संतुष्ट हो जा।
37:48
अपने आप से ही संतुष्ट हो जा बस।
37:58
और कुछ मत चाह। कुछ भी मत चाह।
38:12
कुछ भी मत चाह।
38:26
कुछ भी ना चाहना
38:39
ना संसार ना परमात्मा
38:44
कुछ भी ना चाहना ना बंधन ना मोक्ष
39:02
कुछ भी ना चाहना
39:10
और अपने आप में संतुष्ट दुष्ट हो जाना कि मेरे को अब कुछ नहीं चाहिए। कुछ चाहिए
39:19
ही नहीं। ना यह समाधि ना वो समाधि।
39:32
ना आनंद ना शांति
39:43
मुझे कुछ चाहिए ही नहीं।
39:48
चाहना ही अपने से दूर हो जाना है।
40:02
मुझे कुछ चाहिए ही नहीं। बस मैं हूं।
40:11
अरे मैं हूं। क्या चाहते हो और
40:18
मैं हूं पर्याप्त से ज्यादा, पूर्ण से ज्यादा, परमात्मा से ज्यादा,
40:27
इस अस्तित्व से ज्यादा। क्योंकि बगैर मेरे अस्तित्व नहीं हो सकता।
40:37
पूर्णता नहीं हो सकती। परमात्मा नहीं हो सकता। बगैर मेरे शून्य भी नहीं हो सकता। यह जगत
40:45
भी नहीं हो सकता। मैं के बिना कुछ भी नहीं।
40:57
अरे जो भी आप चाहते हो ना पहले चेक तो कर लो। वह चीज आपके बिना हो सकती है क्या?
41:04
चाहे वह बुद्धत्व हो, कैवल्य हो, परमात्मा हो, अस्तित्व हो, दुनिया हो,
41:12
कोई भी वस्तु जो भी आप चाहते हो, वह क्या आपके बिना हो सकती है? क्या?
41:23
आपके बिना यह कुछ भी नहीं हो सकता।
41:34
कुछ भी नहीं हो सकता।
41:48
तो इनकी आत्मा भी आप स्वयं हो।
41:57
अस्तित्व की आत्मा भी आप हो। परमात्मा की आत्मा भी आप हो। परमात्मा में आत्मा लगा
42:05
हुआ है ना पीछे
42:13
शांति की आनंद की सबकी आत्मा सर्व आत्मा
42:21
आप हो। मैं हूं।
42:28
इसलिए मैं पर्याप्त से ज्यादा हूं। पूर्ण से ज्यादा हूं। अस्तित्व और
42:37
परमात्मा से ज्यादा मैं ओवर फ्लो हूं। क्योंकि मैं ही हूं और कुछ कहां है?
42:55
जिसको आप ध्यान समझते हो वह मैं ही हूं।
43:03
ध्यान करना नहीं है। ध्यान मैं ही हूं। मैं स्वयं ध्यान हूं तो मैं किसका ध्यान करूं?
43:35
बस मैं हूं।
43:54
तो मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान
44:06
और अपने ही आप से संतुष्ट हो जा। मैं को मैं जानकर
44:17
मैं से ही अपने से ही संतुष्ट हो जा।
44:32
क्योंकि मैं के अतिरिक्त सब कुछ एक भ्रम है, एक सपना है।
44:41
एक हसीन धोखा है। एक हसीन धोखा।
45:03
ओके।
45:15
और मैं उसी को मिलता हूं। मैं मतलब मैं
45:24
मैं उसी को मिलता हूं
45:33
जो मैं के अतिरिक्त कुछ और चाहता ही नहीं।
45:52
और आप मैं ही तो हो और क्या हो
46:31
तो शुरू में मैं सबसे शुरू में जब जब आप मैं को सुनते हो,
46:39
मैं में ट्राई मारते हो तो सबसे शुरू में मैं कुछ नहीं जैसा लगता हूं।
46:57
मैं कुछ नहीं जैसा लगता हूं।
47:10
मैं का सत्संग शुरू में आपको बोर करेगा क्योंकि वह कुछ नहीं है ऐसा लगेगा।
47:20
लेकिन सत्य में टिके रहे कंप्रोमाइज नहीं किए किसी भी चीज से
47:30
तब तब और सिर्फ तब
47:38
मैं रस पूर्ण लगने लगता हूं। मैं प्रेम पूर्ण लगने लगता हूं।
47:48
नहीं तो उससे पहले मैं केवल बौद्धिक समझ रहता हूं। उसमें टेस्ट नहीं आएगा आपको।
48:02
और फिर भी लगे ही रहे हैं। रस पूर्ण लग रहा है। फिर आप उस रहस्य को जान ही जाओगे
48:09
कि मैं इस अस्तित्व से ज्यादा हूं। मैं प्रभु से ज्यादा हूं।
48:22
मैं ओवरफ्लो हूं। पूर्णता से कई ज्यादा
49:08
सबसे बस इतनी इतनी मेहनत कर रहे हो अपने तक
49:15
अपने सच में बहुत बहुत
49:22
जैसा कोई डमी है डमी डमी हो जाता है ना जैसे
49:31
हां डमी हो जाता है राइट अच्छा आपने एक अच्छी बात कही मैं हूं इसके
49:42
बिना हम डमी हो जाते हैं और मैं हूं इसके बगैर ये परमात्मा ये बुद्धत्व ये
49:49
इनलाइटनमेंट केवल ये सब डमी है। है ना?
49:56
यह रस, ये प्रेम, ये ज्ञान, ये भक्ति सब डमी है।
50:01
इन सब की आत्मा आप ही हो। हमेशा याद रखो। यस।
50:11
तो मैं पे निष्ठा, स्वयं पे निष्ठा। कि मैं के बिना यह सब डमी है।
50:19
क्या डमी है।
50:28
यही मैं पे निष्ठा है।
50:45
तो यह देखो भाई यह मेरी मेहनत नहीं है। यह मेरा आनंद है। मेरा प्रेम है। और
50:54
आप कोई और नहीं हो जो सुन रहे हो। आप मेरी आत्मा हो।
51:01
जो भी सुन रहे हो ना आप लोग। आप मेरी आत्मा हो। कोई अलग नहीं हो मेरे से या कोई
51:08
अलग व्यक्तित्व नहीं हो।
51:16
मैं आप सब में जी रहा हूं और अपने आप को ही उधर से करेक्ट कर रहा हूं। इधर इस बॉडी
51:23
से मैं करेक्ट हूं। मैं उधर से भी अपने को करेक्ट कर रहा हूं। ये मेरे मेरी लीला है। मेरा आनंद है। मेरा
51:33
प्रेम है। मेरी मेहनत नहीं है।
51:43
जा सकता है।
51:56
नहीं रहेगा। नहीं देखो यहां लेनदेन कुछ नहीं है। ऋण
52:06
कुछ नहीं है। बस ये एक प्रेम है। सहज प्रेम है। सहज प्रीति है। है ना?
52:24
एक सहज प्रीति होती है। मतलब सहज प्रेम जिसको किया नहीं जाता वो बहता
52:31
ही रहता है। उसको मैं भी नहीं रोक सकता। मैं मरता भी रहूंगा ना तो वह प्रेम मेरे
52:37
को ऐसे खड़ा कर देगा और बहने लगेगा। हां। तो वह सहज प्रीति जो है ना
52:45
वह यह सब कराती रहती है। अब किससे प्रेम है? कौन प्रेमी है, कौन
52:52
प्रेमिका है? ऐसा यहां कुछ नहीं है। बस प्रेम ही प्रेम है। बस
53:00
उसका कोई पकड़ नहीं है उसकी। निरंतर प्रेम है।
53:10
और प्रेम है और प्रेम है बस।
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और रखा क्या है इस दैहिक जीवन में थोड़ी देर का नाटक है। कुछ समय बाद ना हम इस पृथ्वी में रहेंगे
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ना आप रहोगे। तो उत्तम तो यही है कि निरंतर एक सत्संग
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चलता रहे। सत्य और प्रेम की यह धारा बहती रहे।
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बट यहां ऋण जैसा कुछ नहीं है। लेनदेन जैसा कुछ नहीं है।
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बस मैं अपना सब कुछ दे रहा हूं। आप अपना सब कुछ दे रहे हो। उसी मीटिंग पॉइंट का
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नाम परमात्मा है। जहां गुरु अपना सब दे देता है। अपना गुरु पद दे
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देता है। शिष्य अपना सब दे देता है। अपना जीवन दे देता है।
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अपनी प्यास, अपने प्राण।
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तो गुरु और शिष्य का जो मीटिंग पॉइंट है
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वही प्रेम है, वही परमात्मा है। वही मैं हूं। एक्चुअल मैं हूं।
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जहां कोई सौदा नहीं है, शिष्य को कुछ चाहिए नहीं। शुरू में शिष्य
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को कुछ चाहिए होता है। तब वो जुड़ता है मेरे से।
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शुरू में कुछ गुरु को कुछ देना होता है। तब वह बोलता है।
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बाद में ना शिष्य को कुछ चाहिए होता है ना गुरु को कुछ देना होता है।
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और बस यूं ही बैठे रहते हैं दोनों और बैठे-बैठे
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गुरु भी खो जाता है, शिष्य भी खो जाता है
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और सर्वत्र एक परमात्मा घेरा रहता है। भीतर बाहर
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एक रस एक प्रेम
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बस घेरा रहता है और कुछ नहीं रहता
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बस एक बस एक प्रेम
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निरंतर बहता हुआ प्रेम
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तो इस प्रेम का एहसास यह अलौकिक है।
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इसको ना हम बता सकते हैं ना आप। यह लाभ बया है।
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बट है
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नहीं प्लीज अब प्रेम की दुनिया है। अब यहां प्रश्न खत
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है। सारे प्रश्न यहां जुर्म है। कभी भी जब प्रेम का वर्ल्ड आ जाए,
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प्रेम के स्पेस में आ जाओ तो वहां प्रश्न को कभी मत लाना नहीं तो तुरंत बुद्धि में आ जाओगे।
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और बुद्धि यानी पूरा संसार
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जिंदगी भर प्रश्न उत्तर यह पोइजन है। बी अलर्ट
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यह डूबने का समय है। पूछने का नहीं।
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यह खो जाने का समय है। हो जाने का नहीं।
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क्योंकि प्रेम में खो जाना ही हमेशा के लिए हो जाना है।
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आत्मा में हो जाना वहां फिर सब कुछ खो जाना है।
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प्रेम में खो जाना खो जाना है।
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तो बस खो जाओ।
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और प्रेमी खो जाना चाहता है किसी भगवत मूर्ति में, किसी पत्थर में, किसी प्रेमी में, किसी अस्तित्व में, किसी गुरु में,
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किसी परमात्मा में। बस खो जाना चाहता है।
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बचा मत लेना अपने आप।
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उनको स्टॉप करो आप विराज आप साइलेंस रहो
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खो जाओ ना मत हो भले यह ध्यान खो तो जाओ बचा क्यों रहे हो खुद को
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खोने वाला खो जाता है मालूम
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वो समा जाता है बस डूब जाता है।
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वह ऐसे सवाल नहीं करता। सवाल करने वाला अपनी सेफ्टी देख रहा है।
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वह डर रहा है डूबने से, खोने से। भय है,
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तो कई बार हम अंतिम छलांग भी लगाने वाले होते हैं ना
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तो पीछे रस ही बांध लेते हैं।
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कब तक बचाओगे खुद को?
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तो ज्ञान की दुनिया में हो जाना स्वयं में हो जाना वहां फिर सब कुछ खो जाना है
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और प्रेम की दुनिया में खो जाना ही हो जाना
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ओके प्रेम प्रणाम सभी को प्रेम प्रणाम
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बस बहुत सारा प्यार मेरा बहुत सारा प्रेम
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अब वाणी को विश्राम देते हैं।