Prabhu Shree
0:20
मन को कभी भी स्थिर करने का प्रयास ना करें। है ना?
0:30
मन को स्थिर करने का प्रयास ही अस्थिरता है, चंचलता है।
0:51
मन को रोकना ही मन है। याद रखो
0:58
है ना और ना रोकना मन को ना रोकना ही अमन है
1:11
तो मन को ना रोकने का प्रयास
1:21
करो तो भला मन को ना रोकने का अभ्यास
1:36
एकदम फ्री रहो कि अब मन को रोकना ही नहीं है और मन को ना रोकने का ही अभ्यास करना है।
1:46
ऐसा करो तो जी देखो
1:54
मन को ना रोकने का अभ्यास
2:04
है कहीं पे मन नहीं नहीं मिलेगा यस
2:13
क्योंकि रोकना ही मन है रोकना ही मन है
2:21
मन है ना रोकना मन को ना रोकना ही अमन है।
2:29
तुरंत उसका रिजल्ट आ जाता है। है ना?
2:37
तो कभी भी मन को रोकना मत। ना रोकने का अभ्यास। कभी भी मन हावी हो तो
2:48
फ्री हो जाना नहीं रोकना है बस तो मन गायब हो जाएगा
2:58
रोकना ही मन है याद रखो
3:15
ओके प्रणाम
3:30
तो हम बेवजह के प्रयास करते रहते हैं।
3:37
यानी रोकोगे तो ही मन हावी होगा। मन तो आपका नौकर है ना।
3:43
उस पर ध्यान मत दिया करो। जितना ध्यान दोगे उतना वो चंचल होगा।
3:53
ऐसे जिए करो कि मन का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे जिया करो।
4:02
ऐसे जिया करो कि मन का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
4:10
यस मन के अस्तित्व का इनकार कर दो
4:24
क्योंकि मन पर ध्यान देना ही मन है।
4:32
मन को याद करना ही मन है। मन पर ध्यान देना ही मन है
4:43
और मन के अस्तित्व का ही इंकार करता है।
4:51
और वैसे भी मन कहीं है ही नहीं।
5:02
तो जो चीज नहीं होती है तो आप क्या कहते हो उसके बारे में
5:14
जैसे मृग तृष्णा का जल नहीं होता है ना
5:21
या कोई भी चीज नहीं होती है उसको आप क्या कहते हो
5:27
नहीं यानी आप कहते हो ना नहीं है वह बस ऐसे ही मन नहीं
5:38
उसके अस्तित्व का ही इंकार कर दो
5:48
ओके अच्छा है मजेदार नहीं बनाया हो यार
5:58
कोई बात नहीं थोड़ी सी बना दो ना
6:09
शक्कर कम है। हां जी
6:21
प्रेम प्रणाम प्रेम प्रणाम
6:28
कैसे हो गुरुवर हां हम आनंद में है आप बताइए कैसे हो आप भारती जी
6:36
नाम है गुरुवर आपका दिन गुरु गुरु दक्षिणा सत्संग सुना आपने कुछ स्नान करा दिया है सास में
6:43
बिल्कुल इतना अच्छा हां हां बहुत अच्छा जी आज
6:52
रात के रोज सुबह रात सब सत्संग सुनते रहते हो बहुत-बहुत धन्यवाद
7:01
हां भारती जी अपना ख्याल रखें और
7:08
जब भी सुने सत्संग तो एकांत में साइलेंस में है ना काम करते हुए नहीं सुनो।
7:16
जितनी रिस्पेक्ट आप सत्संग की करोगे उतना वो आपके भीतर जाएगा।
7:25
ठीक है। हां जी। प्रेम प्रणाम जी।
8:06
आप लोग कैसे खामोश बैठे हो बताओ स्व
8:14
राहुल तू तो कुछ बोल ही नहीं रहा है। कितने दिन हो गए ऐसा कैसे चलेगा
8:21
हम
8:42
हम हम
9:02
प्रणाम
9:18
हां ये इधर हटा दिया करो ऐसा जो लोग टाइम पास करते रहते हैं।
9:28
सिंसियर नहीं है उसको लाना ही मत। है ना?
9:37
यहां मेरे साथ बैठते हो पूरी दुनिया जहान छोड़ के बैठो
9:42
बस आप हो मैं हूं कोई दुनिया नहीं है
9:50
और सच में ये दुनिया नहीं है तो आज मैं वॉक कर रहा था अभी इवनिंग में
10:00
तो मेरे को एक सेंटेंस एक विचार ऐसे आया कि
10:08
मेरी दुनिया मैं ही हूं
10:16
और सच में आपकी दुनिया आप ही हो और हर किसी की अपनी एक दुनिया है
10:26
और वो दुनिया आप ही हो। जो भी दुनिया आप समझते हो ना आपका घर,
10:34
आपकी फैमिली, आपका ऑफिस,
10:38
आपके मित्र वो आप ही हो। मेरी दुनिया मैं ही हूं।
10:47
दुनिया को अपने से अलग मत समझना। बहुत मार्मिक पॉइंट है यह।
10:57
कि आपकी जो दुनिया है उसको अपने से अलग मत समझना। वह आप ही हो।
11:06
इसलिए जिस दुनिया का अनुभव आप कर रहे हो वह आप ही की दुनिया है।
11:16
दूसरे की नहीं है। दूसरा अपनी दुनिया का अनुभव करता है।
11:22
जितने लोग हैं उतनी दुनिया है। और सब की अपनी दुनिया है। और आनंद यह है
11:32
कि मेरी दुनिया मैं ही हूं। समझ रहे हो जोत? आप जो अनुभव करते हो ना आपके लिए जो सत्य है, सच है, रियल है,
11:45
अनरियल है वो आप ही हो। आपकी पूरी दुनिया जिस स्ट्रक्चर से आप
11:52
जीते हो जो भी आपका सेटअप है पूरा वो आप ही हो
12:03
मलंग जो आप जीते हो डॉक्टर की दुनिया या जो भी है आपका वर्ल्ड फैमिली वो आप ही हो
12:12
मेरी दुनिया मैं ही हूं हमेशा याद रखना रखना इस बात को
12:21
तब कोई भी दुनिया आपको परेशान नहीं करेगी क्योंकि आप ही हो ना।
12:32
हां जी। अब अपने आप को आप कैसे परेशान करोगे भाई?
13:01
अजूबा है ना भाई आज मैं वॉक कर रहा था ये वाला ये विचार कैसे आ रहा है मेरे को बड़ा
13:08
काम का विचार लगा मेरे को कि यार मेरी दुनिया मैं ही हूं आ
13:16
क्योंकि मैं नहीं हूं तो मेरी दुनिया नहीं है। कॉमन सेंस। इट मींस मेरी दुनिया में ही हूं।
13:26
रात को आप सो जाते हो गहरी नींद में कहां जाती है? आपकी दुनिया खत्म हो जाती है। जब
13:32
सपने भी नहीं होते, गहरी नींद होती है। तब आपकी दुनिया कहां जाती है? बताओ।
13:43
अगर यह दुनिया सच है जिसको आप अपनी दुनिया कहते हो तो गहरी
13:51
नींद में भी वो दुनिया होनी चाहिए। कहां आ जाती है?
13:59
बताओ ना दुनिया रहती, ना शरीर रहता, ना मन रहता,
14:06
कुछ भी नहीं रहता।
14:14
तब आप ही गहरी नींद बन जाते हो। सुशुक्ति बन जाते हो।
14:24
फिर सुबहेरे नींद खुलती है तब आप यह दुनिया बन जाते हो जिसको आप अपनी दुनिया कहते हो। है ना? आप
14:33
यह दुनिया बन गए। फिर रात होती है। पहले सब सपने देखते हो। बहुत सारे आप
14:42
तब आप स्वप्न हो जाते हो। स्वप्न यानी मिक्स रहती है चीजें उसमें।
14:50
थोड़ा रियल थोड़ा अनरियल ऐसा मिक्स रहता है। है ना?
14:57
आपकी जो इच्छाएं बची रहती है वह सब मिला के एक स्वप्न बन जाता है। तब आप स्वप्न लोक हो जाते हो।
15:05
फिर आप फिर गहरी नींद में जाते हो तो सुशुप्त हो जाते हो
15:13
और फिर सुबह उठते हो तो आपकी ये दुनिया आ बोलते हो मेरी दुनिया
15:20
आप ही दुनिया बन गए माय डियर आप ही कोई और दुनिया नहीं बना है
15:30
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं मेरी दुनिया
15:38
मैं ही हूं।
15:49
वो दिखाओ मेरा मोबाइल।
16:00
तो अब बताओ दुनिया परेशान करेगी क्या हम
16:09
यार तुम लोग बोली बोलते ही नहीं हो ऐसा थोड़ी ना होता है
16:19
प्रणाम प्रेम प्रेम प्रणाम प्रभु जी प्रेम प्रणाम
16:25
फिर भी हमें पता रहता है फिर भी दुख क्यों होता है? दुख क्यों होता है? दुख क्यों होता है?
16:36
कोई कुछ गलत गलत व्यवहार कर देता है। आपको पता नहीं है। सुनो सुनो।
16:43
कहने का मतलब यह है पता होना मतलब क्या होता है मालूम?
16:50
यह ज्यादा ही रोशनी हो रही है। इधर कर दूं क्या?
16:56
हां ये ठीक है। राइट। जैसे पता चल गया ना किसी को
17:05
कि यह रस्सी है, सांप नहीं है। तो फिर काहे को दुख होगा? काहे को भय होगा?
17:15
आपको पता नहीं चला है। केवल बुद्धि से अभी सुने हो।
17:21
हां। एक्चुअल पता चलना कि मेरी दुनिया मैं ही हूं। मतलब कोई सांप नहीं है, कोई दुख नहीं है,
17:30
कोई दुनिया नहीं है, मैं ही हूं। तो मैं ही हूं तो कौन सा दुख यार? कौन सी दुनिया?
17:40
एक्चुअल पता चलना और उसी क्षण
17:47
एकदम श्योरिटी आ जाना कि जब मैं ही हूं।
17:53
तो फिर क्या दुख क्या सुख क्या दुनिया
18:01
एक्चुअल ज्ञान एक्चुअल पता चलना बिल्कुल अलग है
18:08
बार-बार सुनोगे बार-बार सुनोगे ना क्या शुरू में आप बुद्धि से समझते हो लेकिन जो
18:15
जान लिए उसको फिर जानना है और फिर उसको जानना है फिर जानना है जाने हुए को जानते रहो फिर से बार-बार बार-बार
18:24
जैसे गाय जुगाली करती है ना चबाए हुए को चबाती है तब अचानक से आपको क्लियर हो जाएगा
18:33
कि यार मेरी दुनिया मैं ही हूं
18:40
ये ये बात अभी अंदर चली गई है आपके आप जो भी सुन रहे हो मेरी इस बात को याद रखना
18:46
जिंदगी भर याद रखना अचानक से यह पॉइंट आपके आपके अंदर से आएगा यार हां मेरी
18:53
दुनिया तो मैं ही हूं और आप श्योर हो जाओगे
19:00
अचानक से उभरेगा किसी भी समय और आप श्योर हो जाओगे
19:34
सत्संग अगर सुने नहीं तो फिर माइंड बहुत कैसे भी वर्क करता है कभी कभी कुछ भी विचार आते हैं फिर
19:43
आएंगे ना जब तक आपकी लाइफ में सत्संग प्रथम नहीं है
19:50
रोज सुनते हैं। हां रोज सुनो दिन रात जियो प्राथमिकता सत्य को दो। है ना?
20:10
अब आपका क्या कहना रहता है? मन में विचार आए ही ना। अरे पहले आप अपनी आत्मा में तो जियो ना
20:18
वहां तो आपका ध्यान रहता नहीं है। अब अपना होना है जो आपका होना है
20:28
वो मौन है कि विचार है देखो
20:37
मौन है ना तो मौन में जिओगे तब तो विचार से परे रहोगे ना
20:45
ऐसा बार-बार जैसे आप लोग परेशान होने की भी एक आदत हो जाती है मालूम हां
20:52
कि हां मेरे मन जाता ही नहीं मेरा मन जाता ही नहीं होता ही नहीं अरे ऐसा नहीं है
20:58
आपको जीना है मौन में साइलेंस में मौन को जियो ना
21:07
तो जितना मौन गहरा होगा वहां फिर विचार है ही नहीं फिर एक दिन आता है कि आप विचार
21:14
खोजोगे और विचार रहता ही नहीं है। हमारा इंटरेस्ट मौन में रहता ही नहीं है।
21:26
बल्कि आप देखो आपके होने में मौन है। यह धरती मौन है। या आकाश मौन है। आपके घर
21:35
की दीवारें मौन है। पूरी प्रकृति मौन है।
21:42
तो इस मौन को जियो ना हर जगह एक मौन है नेचुरल स्वाभाविक
21:52
पूरा अस्तित्व मौन है और आपका होना भी
22:02
इसी मौन में मौन हो जाओ। इसी मौन में
22:11
मौन हो जाओ। भीतर और बाहर एक स्वाभाविक मौन है। नेचुरल मौन है।
22:21
इसके लिए आप कोई साधना नहीं कर रहे हो।
22:26
भीतर और बाहर एक नेचुरल मौन है। स्वाभाविक
22:36
है ही। इसी मौन में मौन हो जाओ बस
22:47
तो इंटरेस्ट विचारों की बजाय मौन में रखो तब विचार शांत होंगे ना
22:57
ऐसे हाय तौबा बार-बार मचाने से थोड़ी ना शांत होंगे
23:04
जब आपका प्रेम साइलेंस से होगा मौन से होगा
23:11
तब आप विचारों के परे रियल में आप फील करोगे खुद को
23:22
तो एक दो महीना दो महीना कोई भी सत्संग मत सुनो मेरा भी मत सुनो
23:30
केवल मौन को सुनो मौन को देखो मौन को जियो समझ रहे हो आप?
23:42
आपके लिए बोल रहा हूं मैं। मौन हां जी। है ना? मौन में आपको जीना है।
23:51
जी किचन में हो, घर में हो, ऑफिस में हो, हर
23:57
जगह एक मौन होता है। उसको पीते रहो। जी। है ना?
24:05
भीतर से पियो, बाहर से पियो, उसको सिप करते रहो, पीते रहो।
24:15
तो एक महीना में बहुत होता है।
24:22
एक महीना अगर दिल लगा लिए ना मौन से तो पूरा जीवन फिर मौन में बीतेगा आपका। ठीक है?
24:34
जी प्रभु बहुत-बहुत शुक्रिया। हां जी। प्रेम प्रणाम।
24:41
प्रेम प्रणाम। अब चाय अच्छी बनी है।
24:49
बगैर शक्कर की चाय पिलाते हुए। शुगर वाला समझे क्या मेरे को?
25:04
अरे यार मैं क्या पॉइंट बता रहा था। क्या था वो?
25:08
अरे मेरी दुनिया मैं ही हूं। क्या
25:15
मेरी दुनिया अरे मैं ही हूं। यहां कोई दुनिया नहीं है। इस गलती में मत
25:23
रहना। आप ही हो जिसको आप दुनिया समझ रहे हो। ठीक।
25:32
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं। मेरा मन मैं ही हूं।
25:41
मेरा मन मैं ही हूं। यहां कोई मन मन नहीं है।
25:50
मैं ही हूं। मेरी माया
26:02
मैं ही हूं। मैं ही हूं। मायापति
26:11
मायापति मैं आत्मा भगवान।
26:24
अरे मेरी दुनिया मैं ही हूं। अब किससे मुक्त होगे?
26:34
मेरा मन मैं ही हूं। मेरी माया मैं ही हूं। अरे यार नाचो गाओ मस्त रहो।
26:46
कहां लगा दिया?
26:52
क्योंकि मैं ही हूं। हां। बगैर आपके ये दुनिया, ये मन, ये माया हो
26:58
सकते हैं क्या? हो ही नहीं सकती।
27:05
बगैर आपके आपकी दुनिया नहीं हो सकती। पहले मैं हूं। पहले मैं हूं तभी बोलता हूं
27:13
ना मेरी। फिर बाद में बोलता हूं दुनिया।
27:31
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं। अब और गहरे चलना है।
27:38
हम मेरा मन मैं ही हूं।
27:46
मेरी माया मैं ही हूं। अरे मेरी शांति
27:55
मैं ही हूं। जिस शांति का आप अनुभव करते हो वह आप ही
28:03
हो। जिस आनंद का आप अनुभव करते हो वह आप ही हो।
28:19
अरे मैं ही हूं यार। मैं के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी है ही
28:30
नहीं। कुछ है ही नहीं। हुआ ही नहीं।
29:07
तो जमता कि नहीं जमता?
29:10
जमता ना बराबर। अब खत्म ना मामला फाइनल वाला।
29:22
अब मेरे पास कोई आता है। ये दुनिया मेरे को बहुत परेशान कर रही है। वो हो रहा है। ये अरे
29:30
तेरी दुनिया तू ही है। पागल मेरी दुनिया मैं ही हूं। जब मैं ही हूं तो मैं अपने आप को कैसे परेशान करूं?
29:45
तो आप क्या चाहते हो? फिर दुनिया में यह क्यों होता है? वो क्यों होता है? ऐसा क्यों होता है? वैसा आप डिटेलिंग में गए
29:56
फंसे। उसी समय फंसे सीधा मैं ही हूं। तलवार उठाओ काट दो।
30:05
मैं के शस्त्र से सब कट जाता है तुरंत। ज्यादा डिटेलिंग में जाओगे तो उसको सच मान
30:16
के ही जाओगे। दुनिया को सच मान के ही आप उसकी डिटेलिंग में जाते हो। अरे यहां युद्ध क्यों हो रहा
30:24
है? इधर यह क्यों हो रहा है? उधर प्यार क्यों नहीं हो रहा है? इधर प्यार क्यों हो रहा है? आप डिटेलिंग में गए तो आप गए।
30:37
डिटेलिंग में गए तो आप गए गई भैंस पानी में हां सीधा दुनिया का सेंस आया या जो भी
30:48
अरे मैं ही हूं मेरी दुनिया मैं ही हूं आज
30:59
मेरा मन मैं नहीं हूं। अरे यह परम सत्य है। नाचा करो। खाली सुना
31:09
मत करो। झूमा करो ये सुन के। पागल हो जाओ ये सुन के।
31:20
कि मेरा मन मैं ही हूं। आ मेरी दुनिया मैं
31:26
ही हूं। जागृत स्वप्न सुशुप्ति मैं ही हूं।
31:35
अरे माया भी मैं ही हूं। माया भी भगवान है। मैं यानी मैं आत्मा भगवान।
31:43
माया भी मैं ही हूं।
31:50
मेरी माया मैं ही हूं। तो अब किस चीज से मुक्त होगे?
32:04
अब जिससे आप मुक्त होना चाहते थे मन माया दुनिया वह तो आप ही हो।
32:23
इसलिए मुस्कुराया कर। तू मुस्कुराया कर।
32:35
अरे सही बता रहा हूं मैं। मत सोचना कि इसको सिद्ध करना है, सॉल्व करना है, कुछ
32:42
करना है। ऐसा है। मेरी दुनिया मैं ही हूं। आ
33:03
बगैर आपके यह दुनिया हो नहीं सकती। दिखाओ यार।
33:10
बगैर लकड़ी के डंडा हो नहीं सकता। है ना? तो यह
33:19
डंडा लकड़ी की दुनिया है। डंडा लकड़ी की दुनिया है।
33:30
तो लकड़ी की दुनिया कौन है? लकड़ी ही है। बगैर मैं के ये दुनिया हो सकती है क्या
33:39
आपकी? नहीं हो सकती। तो ये दुनिया मैं ही हूं ना। पागल नाचो।
34:10
अरे आपके बगैर हो सकती क्या दुनिया मन माया नहीं हो सकती ना तो आप ही हो ना और
34:17
कोई थोड़ी ना है इतनी सी बात के लिए हाय तौबा मचाए बैठे
34:27
हो। इतनी सी बात है। हां।
34:38
चाय पीते पीते हम बता दिए। सारे रहस्य इस अस्तित्व के
34:45
और इसके लिए हाय तौबा मचाए बैठे हो। साला ये ध्यान वो साधना ये गुरु वो भगवान ये
34:51
ऐसा वो वैसा वो वैसा ये ऐसा
35:15
ठीक है काम तो हो गया अब आज जल्दी क्लोज करें। नहीं
35:27
आज तो जल्दी निपट गए ना सब नहीं निपटो।
36:08
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं बस।
36:16
अरे ये ये लाइन आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते।
36:39
हम हम हम
37:09
अब कोई आर्टिस्ट होता है, कोई उसकी दुनिया पूरी आर्ट होती है। है ना? कोई एक्टर होता है, कोई प्लेयर होता है,
37:19
कोई क्रिकेटर है तो उसकी दुनिया ही क्रिकेट है। कोई फुटबॉल का प्लेयर उसकी दुनिया ही
37:25
फुटबॉल है। कोई क्रिकेट का फैन है तो उसकी दुनिया ही वो फैन है। वो देखता ही रहता है
37:34
क्रिकेट। है ना? तो आप ही अपनी दुनिया हो ना यार।
37:41
वैसी किसी की दुनिया स्पिरिचुअलिटी है। किसी का नाम जप है। किसी का यह भगवान है। किसी का वह भगवान है। तो आप
37:50
ही अपनी दुनिया हो। हां।
38:32
हां जी कोई है?
38:46
अब कोई ड्रग्स लेता है, कोई शराब पीता है उससे पूछो तो वो बोलेगा यार शराब ही जिंदगी है।
38:57
कोई जुारी है तो बोलेगा जुआ ही जिंदगी है। उसका प्राथमिक है ना दिन रात वो बस उधर ही
39:03
ध्यान है। कोई शेयर मार्केट वाला है तो दिन रात उसका
39:10
उधर ही ध्यान उसको सपने भी शेयर के आते हैं।
39:30
कोई आध्यात्मिक है, कोई कृष्ण भगवान वाला है तो उसको सपने भी कृष्ण भगवान के आते हैं।
39:39
और कोई खास फर्क नहीं है शेयर और इधर इस सपने में और उस सपने में वही आपकी दुनिया हो गई ना।
39:47
अरे आप ही अपने कृष्ण हो। आपको पता नहीं है। हां। आप ही अपने राम हो।
39:57
कोई राम प्रेमी है, कोई शिव प्रेमी है तो वह राम के पैटर्न से जीता है। दिन रात राम
40:04
राम करता है। है ना? और पूरा रामायण है उसका जीवन फिर उस ढंग से सोचता है। वैसे
40:12
जीता है। अरे आपकी रामायण आपका राम आप ही हो।
40:22
सीधी बात कोई जीसस वाला है तो वो स्वयं जीसस है ना
40:32
स्वयं राम है तो आपकी जो राम की दुनिया है जो राम राम करते हो वो आप ही हो
40:42
जीसस जीसस करते हो वो आप ही हो कोई ओशो प्रेमी आते हैं जैसे मेरे पास वो
40:49
वो आप ही हो भैया
40:59
रमना वाले हैं जय कृष्ण मूर्ति वाले वो सब आप हो यह भी एक दुनिया है और क्या है
41:07
आध्यात्मिक दुनिया है
41:18
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं। याद रखना अब मेरे पास सीख गए हो। मैं मैं हूं मैं
41:27
हूं। सीख गए हो। ये भी आप ही हो। हां। और क्या?
42:08
अब आप जैसे बोलते हो ना मेरा गुरु मेरा गुरु अरे मेरा गुरु मैं ही हूं पागल
42:15
समझ रहे हो मेरा गुरु मेरा यह गुरु मेरा वो गुरु अरे
42:27
ये वो नहीं मेरा गुरु मैं हूं मेरा परमात्मा मैं ही हूं हां
42:59
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं बस।
43:18
आप सोचते हो गुरु आपके बाहर से कहीं से बोल रहा है और कहीं बाहर से आप सुन रहे हो ऐसा नहीं है।
43:46
मैं जो भी देखता हूं वो मेरे से अलग हो कैसे सकता है?
43:56
क्योंकि किसी चीज से आप अलग होकर तो उसको देख ही नहीं सकते
44:04
और एक भी हो गए तो भी नहीं देख सकते क्योंकि एकता आ गई तो फिर दिखेगा कैसे?
44:14
आप अपने आप को ही देखते हो जिसको फिर दृश्य कहते हो।
44:20
देखने वाला ही दिख रहा है।
44:31
देख के आओ ये क्या चल रहा है सौरभ जी
44:45
थोड़ा सा थोड़ा ध्यान दो कोई भी गाड़ी आती है अंदर या तो
44:54
हम क्या पेड़ पौधे हैं ना इन लोग को होश नहीं रहता पेड़ पौधों का कहीं भी गाड़ी चला
45:02
देते हम
45:12
जल्दी आ जाना
45:21
हम हम हां जी है कोई
45:29
कि मैं ही हूं है कोई कि मैं ही हूं
45:42
मस्त रहा करो यार क्योंकि आप ही हो बस मैं के अतिरिक्त ना कभी कुछ हुआ है,
45:54
ना हो सकता है, ना कभी कुछ होगा।
46:01
बस मैं ही हूं।
46:30
इसलिए तो कोई भी अपने पर संदेह नहीं कर सकता।
46:37
आप अपनी दुनिया पर संदेह कर सकते हो। अपने मान्यता के भगवान पर कर सकते हो। अपने
46:44
माने हुए गुरु पर भी कर सकते हो। डाउट कर सकते हो और करते ही हो यार। क्या कर सकते
46:50
हो? करते ही हो। हमको क्या नहीं पता है कि क्यों होता है ऐसा मालूम?
47:00
क्योंकि केवल एकमात्र मैं ही असली गुरु है। असली परमात्मा है।
47:12
बाकी हर जगह कहीं ना कहीं कुछ तो डाउट तो होगा ही आपको और वो डाउट होना गलत
47:21
नहीं है। आप उसको गलत समझते हो। आपको लगता है कि आपको अपने भगवान पर डाउट है। अपने गुरु पे डाउट है। वो गलत नहीं है। वो सही
47:29
है डाउट। पूछो कैसे?
47:37
तभी तो आप तभी तो आप मैं पे निष्ठा करोगे ना कि क्या ऐसा है जिस पर डाउट हो ही नहीं
47:46
सकता। तब आप मैं पर निष्ठा करोगे तब आत्मनिष्ठा होगी। है ना?
48:00
यानी आपके मैं को परमात्मा और गुरु से भी ऊपर रखा गया है। वह मैं बताना चाह रहा
48:07
हूं। संत से, सद्गुरु से, परमात्मा से ऊपर रखा
48:16
गया है आपके स्वयं को। ऐसा है।
48:24
मैं नहीं बोलता गुरु पर निष्ठा मत करो। परमात्मा पे मत करो। मैं ये नहीं कह रहा हूं। लेकिन उससे भी अपग्रेड जो है वह आपका
48:34
मैं इसलिए तो उस पर डाउट ही नहीं होता।
48:40
संशय ही नहीं होता।
48:49
सच है वो सच है। उसमें क्या है? हां। मैं तो बता रहा हूं आप सब पर संदेह कर
48:59
सकते हो और आप कहीं ना कहीं सब पर संदेह करते हो वो उचित है। कहीं ना कहीं से वो संदेह आ
49:08
जाता है। वो उचित है। बुरा नहीं है वो। तब तो आप स्वयं पर निष्ठा करोगे ना। कि क्या
49:15
ऐसा है यार जहां मैं चाह के भी डाउट नहीं कर सकता। संदेह नहीं कर सकता। कुछ तो ऐसा
49:22
होगा ना और वह मैं ही हूं। यस।
49:30
इसलिए तो हम बता रहे हैं कि मैं ही अपनी दुनिया हूं।
49:38
मैं ही मेरी दुनिया हूं। तो जिस पर कभी भी संदेह नहीं होता, शंका
49:47
नहीं होती। जिस पर कभी भी शंका नहीं होती वही शंकर
49:54
है। शिव है। स्वयं है। शंकर पे भी शंका कर सकते हो आप। स्वयं पर
50:03
नहीं कर सकते। और वह स्वयं जिस स्वयं की मैं बात कर रहा
50:16
हूं वही तो आप हो। वो आपको होना होना नहीं है।
50:22
उसमें कोई सींग विंग नहीं उगेगा। बम वम नहीं फटेगा। कोई कैवल्य मोक्ष नहीं होने वाला है। वो
50:29
धोखा है सब। वहां ना त्याग है ना भोग है।
50:37
वो तो मैं सहज में हूं ना।
50:46
वह होना नहीं है। वह मैं हूं।
50:57
तो जो आप नहीं हो वो आपको होना है। मैं ऐसा कुछ नहीं बता
51:05
रहा हूं। जो आप सदा से हो वही हो। मैं ऐसा कुछ बता रहा हूं।
51:18
यह होना होना नहीं है। इसमें कुछ जानना नहीं है, समझना नहीं है, होना नहीं है। ऐसा है।
51:26
अरे मैं हूं यार। मस्त रहा करो।
51:36
मैं तो सबकी पोल खोल देता हूं। इसलिए क्योंकि मैं भी अपनी जिंदगी देखा ना यार।
51:44
मेरे को भी यार बीच-बीच में अपने गुरु पर डाउट हो जाता था। मेरे को इतना बेकार लगता
51:50
था कि यार कितना बेकार इंसान हूं मैं। अपने ही गुरु पर डाउट कर रहा हूं।
51:58
वो पे कर लेता था। महर्षि मुक्त पर कभी कर लेता था। बहिर चरित्र को देखता था। कुछ चीजें
52:06
इधरउधर तो डाउट हो जाता था। तो ऐसे खुद में गिल्टी होती थी ऐसा वैसा
52:14
तो मेरे को यह रहस्य कभी समझ ही नहीं आया।
52:21
फिर जब स्वयं में स्वयं में निष्ठा हुई तब इसका रहस्य पता चला। अच्छा हुआ डाउट
52:30
हुआ। हां उसको गलत मत समझना।
52:38
अच्छा हुआ डाउट हुआ तब तो आपकी निष्ठा सही एग्जैक्ट मैं पर
52:46
होगी ना जो असली गुरु है जो असली परमात्मा है
53:01
तो अपने पर निष्ठा रखो भैया मेरे को छुट्टी दो
53:22
ये सच तो खतरनाक होता है ना एकदम लेकिन सच तो सच है ना सत्य से कभी कंप्रोमाइज नहीं
53:31
करना तभी आत्मनिष्ठा होगी
53:40
सत्य मतलब काली की खड़क है वो एकदम काट देती है सबको
53:47
लेकिन जब शिव आते हैं ना तब रुक जाती है महाकाली शिव आ गए यानी मैं हूं वो शिव है वहां आ
53:56
गई स्टॉप हो गई काली जीभ निकल गई जीभ निकलना मतलब अब संदेह है ही नहीं स्टॉप
54:09
मैं आ गया अब आप स्टॉप हो जाओ अब दिमाग मत लगाओ जी
54:17
हां साइलेंस रहो आप कब क्या बोलना है थोड़ा अवेयर रहा करो
54:25
तो कहां थे अपन मैं आ गया तो आपको स्टाफ हो जाना चाहिए
54:35
अब वहां चू चा नहीं करना बता रहा हूं। वह भगवानों का भगवान है। आपका मैं गुरुओं का गुरु है। नारायण का नारायण है। शिव का शिव
54:44
है। अस्तित्व का अस्तित्व है। बस मैं स्टॉप
55:08
यस यस
55:43
तो जब आप अपने मैं पे निष्ठा करते हो फिर आपका मैं ही सर्व का मैं है।
55:53
है ना? तभी आप अपने मास्टर को पहचान सकते हो। उससे पहले नहीं पहचान सकते।
56:03
उससे पहले आप केवल उसका बहिर चरित्र देख रहे हो। बहिर चरित्र में माया घेरती है।
56:11
वो ऐसा करता है। वो वैसा ऐसा वैसा वैसा उसमें घेरती है माया।
56:24
तो आप अपना भी बहिर चरित्र मत देखो। मैं भी निष्ठा
56:33
कंप्लीट निष्ठा। अच्छा
56:43
जिस पर श्रद्धा करने को दिल करे प्राण करें।
56:51
वही तो मैं हूं जिस पर श्रद्धा करने को आपका मन भी कहे
56:58
बुद्धि भी कहे वही मैं हूं। आपका मन बुद्धि मैं से एग्री रहता है। वो
57:08
डाउट करता ही नहीं मैं पे। उसका पिता है ना मैं। अपने पिता पर कैसे डाउट करेगा मन बुद्धि?
57:16
आपका मन कहां डाउट करता है? बाहर की चीजें जो अभी है अभी नहीं होंगी।
57:24
बाहर के लोग बाहर के गुरु बाहर का भगवान आपके भाव का आपके स्वप्न का आपकी कल्पना
57:31
का उस पर डाउट करता है आपका मन तो क्या गलत करता है बताओ
57:38
सही तो करता है मन और अपने पिता के हमेशा पैर छूता है मैं हूं के
57:49
जब भी मैं हूं की बात आती है मन उसमें समा जाता है। पैर छूता है गायब हो जाता है।
58:06
उसको डाउट ही नहीं है मैप पे। किसी को भी अपने पर डाउट होता ही नहीं क्योंकि वही असली सद्गुरु है और असली
58:15
भगवान और यह वाला जो गुरु आप जो देख रहे हो ना
58:28
यह केवल उसकी ओर इशारा कर रहा है आपकी ओर
58:36
है ना लक्ष्य आप हो हमेशा याद रखो
58:47
मेरे चक्कर में ज्यादा नहीं रहना अपने चक्कर में रहो
59:23
हम पानी पिलाओ यार मेरे से भी आजाद रहो और है ना
59:34
प्रेम से भले मिलते रहो जब मिलना है लेकिन मेरे से बंधना नहीं आजाद रहना
59:41
फ्री टोटल फ्री अगर मैं आपके बंधन का कारण बनता हूं तो वो
59:48
रॉन्ग है।
59:58
तो अपने प्रेम को बंधन से मुक्त करो। प्रेम को प्रेम रहने दो।
1:00:04
है ना? बंधना नहीं मेरे से। स्वतंत्र रहो एकदम आजाद
1:00:11
मेरे से भी आजाद जब सत्संग नहीं सुनना है नहीं सुनना है
1:00:23
बोला करो हां सुनना है सुनना है कोई बाउंडेज नहीं है सत्संग
1:00:31
एकदम फ्री रहा करो मेरी मौज है मैं बोल रहा हूं बस और कुछ नहीं है मेरा मेरा आनंद
1:00:38
है तो भैया मेरी दुनिया
1:00:47
क्या मैं ही हूं मेरी दुनिया
1:00:55
मैं ही हूं
1:01:20
तो जितने भी धर्म है दुनिया में जैनिज्म बुद्धिज्म कृष्णिज्म अभी ओश्म भी चलता है।
1:01:27
है ना? वो आप हो तब है ना तो उसकी आत्मा तो आप ही हो ना जितने भी
1:01:37
इज्म है नास्तिक भी हो तो आप हो ना
1:01:46
तो सर्व का सार तो आप हो तो आप ही अपना धर्म हो
1:02:05
स्वधर्म
1:02:16
तो कृष्ण बोले ना कि स्वधर्म में मर जाना भी श्रेष्कर है। पर धर्मो भयाव
1:02:28
कितनी फाइनल बात वह बोल दिए गीता में भगवत गीता में कि
1:02:35
फाइनल मैं ही है स्वधर्म ही है उसमें मर जाना भी श्रेष्कर है बोले
1:02:44
वो इसलिए वह बोले कि तरह से अपने में ही जाओ
1:02:54
स्वधर्म में और पर धर्मो भयाव
1:02:59
जितने भी माने हुए धर्म है आरोपित है वो भयाव है
1:03:12
खाली ब्राह्मण शूद्र क्षत्रिय उसकी बात नहीं है उसमें वो भी परधर्म
1:03:20
देह का धर्म, मन का धर्म यह भी पर धर्म।
1:03:44
एक मैं धर्म ही सबका धर्म है क्योंकि हर कोई मैं ही है। बाकी सब भयावह
1:03:53
पर धर्म है। मेरा यह धर्म, मेरा वो धर्म, मेरा वो धर्म। अब धर्मों में भी लड़ते हैं यार लोग।
1:04:02
हर धर्म का संदेश ऑलमोस्ट प्रेम तो है ही। अहिंसा तो है ही। अब उसमें भी मेरा ज्यादा सही तेरा ज्यादा
1:04:11
कम वह किस्सा कहानी चलता है।
1:04:16
एकमात्र मैं ही धर्म है। बता रहा हूं क्योंकि आप मैं ही हो।
1:04:26
सबका एक धर्म है। वह मैं ही है। निर्विरोध जिसका कोई भी विरोध ना कर सके
1:04:35
वही असली धर्म होता है। नास्तिक भी इसका विरोध नहीं कर सकता अपना।
1:04:41
ना कोई धर्म वाला कर सकता है। तो निर्विरोध सिद्धांत है।
1:04:48
निर्विरोध है। स्वधर्म
1:05:13
तो अपने भी श्रेष्ठ कर है अर्जुन
1:05:29
यानी स्वयं के सत्संग में सत्य में या
1:05:36
जो भी आप जी रहे हो अगर स्वयं में आप भटक भी गए मर भी गए तो वह भी श्रेष्ठ कर
1:05:43
और पर धर्म जो मैं के अतिरिक्त वाला धर्म है उसमें आप पहुंच भी गए तो वह भयावह
1:05:53
खतरनाक है। वो वो भ्रम होगा यह हो गया वो हो गया। सब नाटक है।
1:06:22
एक भटकना एक बोला गया यह और मैं देश में
1:06:29
तो भटकन है ही नहीं। वो तो मंजिलों की मंजिल है। परमात्मा का परमात्मा है।
1:06:38
वो एक लो स्टेज में भी बोला जा रहा है कि यार तुम गलती भी करो तो यहां करना। मैं
1:06:46
उसके आसपास भी रहोगे तो कल्याण हो जाएगा। समझ रहे हो?
1:06:59
हां जी। है कोई?
1:07:11
प्रणाम गुरुजी। जी प्रणाम जी गुरु जी आत्म अनुभव की अनुभूति क्या कैसे होती है?
1:07:22
अरे हम आत्मानुभूति तो करा रहे हैं।
1:07:28
मैं जो बता रहा हूं मैं वो आत्मा ही है। है ना?
1:07:37
तो जैसे सूर्य में प्रकाश ही प्रकाश होता है ना ऐसी मैं में अनुभव ही अनुभव होता है।
1:07:46
आत्मा में अनुभव ही अनुभव होता है। इसलिए आप निरंतर अखंड अनुभव करते ही रहते हो। शरीर का, मन का, दुनिया का, इसका,
1:07:59
उसका निरंतर आप अनुभव करते ही रहते हो।
1:08:08
हां तो सारे अनुभवों का जो केंद्र है वह मैं
1:08:16
स्वयं आत्मा
1:08:38
तो अपनी लाइफ में अनुभव को भी प्राथमिकता मत देना। मैं को
1:08:48
प्राथमिकता देना। अनुभव करने वाला
1:08:55
अनुभव करता कौन है?
1:09:01
मैं हूं ना
1:09:11
तो अनुभव इसका अनुभव उसका अनुभव उसका अनुभव फिर कैवल्य का अनुभव बंधन का अनुभव
1:09:19
मोक्ष का अनुभव यह सब हटाओ। सीधा एक काम करो। अनुभव का अनुभव करो तो
1:09:34
तो अनुभव भी गायब हो जाता है। केवल अपना आप ही रहता है।
1:09:51
यही सामान्य अनुभव है। आत्म अनुभव है। जहां कोई अनुभव है ही नहीं।
1:09:59
मैं हूं तो फिर भूल जाते हैं। क्योंकि मैं हूं को याद करने की जरूरत ही
1:10:05
नहीं है। वो आप हो ही।
1:10:14
इसलिए आप आनंद से अपने आप को भूल जाते हो। क्योंकि आपका मैं
1:10:22
उसको याद की जरूरत ही नहीं है। याद की जरूरत किसी परमात्मा को होती है,
1:10:29
किसी आत्मा को होती है। जिसको हम आत्मा कहते हैं नॉर्मली
1:10:37
लेकिन आपके स्वयं को मैं को याद की जरूरत ही नहीं है।
1:10:43
वो याद का गुलाम है ही नहीं। वह सहज है।
1:10:50
इसलिए तो सबका स्वामी है।
1:11:02
याद कर लो तब है ना करो तब है
1:11:21
मैं का इंकार हो ही ही नहीं सकता। मैं नहीं हूं। बोलने के लिए भी मैं तो
1:11:31
चाहिए ना भाई। कई लोग जैसे मृत्यु ध्यान करते हैं। मैं नहीं हूं। मैं नहीं हूं। नहीं हूं। मैं
1:11:40
मिट गया हूं। मैं मिट गया हूं। मैं मिट गया हूं। वह ठीक है। अपने अहंकार को व्यक्तिगत मैं
1:11:49
को मिटाना एक ठीक है। बुरा नहीं है। है ना? नॉट बैड। लेकिन जो एक्चुअल आप हो वह कैसे मिट जाएगा?
1:12:02
और वो मिट गया। यह बताने वाला अगर कोई है कि वो मिट गया तो मैं तो है ही।
1:12:12
जो कहेगा कि मैं मिट गया। है कि नहीं?
1:12:18
तो इसलिए आपका मैं यानी आप अमर हो। अमर वमर का आपको अमृतवमृत नहीं पीना है।
1:12:29
ध्यान साधना करके अमर नहीं होगे या कोई ज्ञान मिलेगा तो अमर नहीं होगे। आप अमर ही हो।
1:12:37
आप स्वयं अमृत हो। नेचुरली।
1:12:44
जैसे यह आकाश है। यह धरती है। ऐसे ही आप अमर हो। इतना सहज है ऐसा है ही।
1:12:57
अजर अमर अविनाशी आदि अंत को जासु न पावा।
1:13:07
यानी जिसका आदि अंत कोई पा ही नहीं सका वो आप हो। अभी आपने जितना भी सत्संग सुना ना
1:13:14
मैं का या पहले जब भी सुनेगे वह भी आपका अद अंत नहीं है।
1:13:23
यह तो आपके थोड़े से हिस्से को बताया जा रहा है।
1:13:29
अरे आदि अंत को जासु ना पावा।
1:13:35
जिसका आदि अंत कोई पा ही नहीं सकता। वह मैं सहज में हूं।
1:13:44
वह आप सहज में हो।
1:13:55
तो मैं याद का मोहताज नहीं। मैं अनुभव का भी मोहताज नहीं।
1:14:04
याद मुझसे है। अनुभव मुझसे है। मैं अनुभव से नहीं। मैं याद से नहीं। शरीर से मैं
1:14:12
नहीं। शरीर मुझसे है। तो मैं अनुभव का मोहताज नहीं।
1:14:24
अनुभव मेरा मोहताज है। अनुभव
1:14:31
मेरे से है। मैं अनुभव से नहीं।
1:14:38
यही आत्मानुभव है। यही आत्मानुभूति है।
1:14:48
जहां अनुभूति की आवश्यकता ही नहीं है। यही मैं हूं।
1:15:01
हां जी।
1:15:17
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं।
1:15:32
मैं
1:15:47
हम प्रेम प्रणाम
1:16:07
इसलिए तो मैं बोलता हूं यार पहले भी मैं तुमसे मिला हूं
1:16:19
क्योंकि ना कोई पहले है ना कोई बाद है मैं ही हूं ना समय है कहां
1:16:28
और हम लोग ध्यान कैसे करते हैं? एक घंटे का ध्यान करना है।
1:16:34
समय के भीतर हम ध्यान करते हैं। समय का क्या करते हो यार? समय का स्वामी समय में
1:16:43
बैठ के ध्यान कर रहा है। शर्म आनी चाहिए।
1:16:49
अपने अपनी महत्ता को पहचानो भाई।
1:16:56
हम पर भरोसा करो ना करो श्रद्धा करो ना करो अपने पर
1:17:02
अटूट निष्ठा रखना अटूट श्रद्धा
1:17:09
क्योंकि आपका स्वयं ही नारायण है शिव है परमात्मा है और उससे भी परे
1:17:18
वही सद्गुरु है वही सब कुछ यही बताने हम आए हैं बस।
1:17:42
कोई है
1:17:56
क्या बोलते हो मलंग जी
1:18:07
तो यार मुरमुरे कौन खिलाएगा मेरे को हम
1:18:15
क्या विजय जी क्या सोच क्या रहे हो आप यार
1:18:26
प्रणाम जी ठीक है।
1:18:53
और बताओ जब आपको सुनते हैं तो सब ढूंढे नहीं
1:19:04
मिलते।
1:19:14
कोई प्रश्न नहीं बस सुनते रहते हम
1:19:34
तो भैया देखो असली सज बता दे रहे हैं।
1:19:45
गुरु गोविंद दो खड़े का के लागू पाव। गुरु को भी छोड़ देना। गोविंद को भी छोड़ देना।
1:19:52
अपने पैर पढ़ लेना। तो दोनों के भी पढ़ा जाएंगे और अपने भी पढ़ा जाएंगे। ठीक है?
1:20:02
ठीक। फ्री रहो भैया हमसे भी गोविंद से भी
1:20:10
और अपने ही पैर पड़ो स्वयं के
1:20:18
आत्म पद बस
1:20:42
हम हम
1:21:03
हम हम इतनी सी बात है
1:21:12
इसके लिए इतना है तो होगा दुनिया भर का
1:21:21
ये समाधि वो समाधि सब विकल्प निर्विकल्प
1:21:29
6000 किस्म के ध्यान 6 लाख किस्म की साधनाएं
1:21:38
लेकिन आप भूल गए ना ये साधनाएं ये ध्यान ये समाधियां किसके लिए है आपके लिए है तो
1:21:47
आप इंपॉर्टेंट हो ना ये मंत्र ये तंत्र ये नाम जप आप ये किसके
1:21:54
लिए किसके लिए आपके लिए तो आप इंपॉर्टेंट हो ना
1:22:05
ये सब इसलिए है कि आपको अपना ख्याल आ जाए लेकिन इनसे नहीं आता
1:22:14
ख्याल हां अपना ख्याल के लिए क्या है सत्संग होता है
1:22:22
आपके बारे बारे में राइट गाइडेंस होता है। तुरंत ख्याल आ जाता है। ख्याल शब्द में बोल रहा हूं। तुरंत उसमें निष्ठा आ जाती
1:22:30
है। हां।
1:22:40
तो साधनाएं जिसके लिए हैं ध्यान जिसके लिए है आप उसको तो भूल गए।
1:22:50
आपके लिए है मैं के लिए। अब साधना साधना साधना एक हैबिट फॉर्म बना
1:22:58
ली है। ध्यान ध्यान ध्यान अब वो सांस को ही देख रहे हो और सांस के बीच के गैप को देख रहे हो।
1:23:08
अब वो गैप कब बड़ा हो जाए सोच रहे हो और देखने वाले पे आपका ध्यान ही नहीं है।
1:23:17
जो आप हो आप में गैप ढूंढने की जरूरत ही नहीं है। वह सांस के
1:23:25
बीच में, विचार के बीच में जो आप गैप बड़ा करते रहते हो ना, आप में
1:23:32
वो सहज में है। यानी
1:23:38
उतना करने देखने की जरूरत ही नहीं है। वहां ऐसा कोई बीच-बीच में गैप नहीं देखना
1:23:46
है। आप में वो है ही नेचुरल जो गैप के अंदर एक क्षण को देखते हो ना आप वो आप में
1:23:52
निरंतर सहज में है और अपने पे आपका मतलब ही नहीं अपने से
1:24:02
तो भटको कौन क्या कर सकता है?
1:24:37
तो अपना ख्याल रखा करो भैया। है ना?
1:24:42
हम हम
1:25:07
गुरु मिल गया कोई ठीक है मिल गया अच्छी बात है अरे अरे भैया गुरु मिला लेकिन
1:25:17
गुरु किस लिए है? आपके लिए है ना वो और आपका अपने में ध्यान ही नहीं है। अब गुरु गुरु में पागल हो गए सब। ठीक है। बाकी सब
1:25:25
चीजों से बेहतर गुरु में पागल हो जाना है। लेकिन गुरु से भी बेहतर अपने में पागल हो जाना है।
1:25:35
अपनी आग में खुद जल जाए। तू ऐसा दीवाना बन जा।
1:25:44
वो अभी का सॉन्ग है ना सुनते हैं हम लोग क्या
1:25:53
परमात्मा परमात्मा परमात्मा उसमें पागल हो गए। परमात्मा में पागल होना इस दुनिया के
1:26:00
पागलपन से बहुत बेहतर है। लेकिन उससे भी बेहतर है अपने
1:26:07
में पागल हो जाना। अपने में पागल
1:26:14
हो जाना है ना यह मस्ट है
1:26:22
अपने प्रति श्रद्धा निष्ठा और अपने प्रति परम भरोसा
1:26:34
परम जितने भरोसे से आप अपने भगवान के पास जाते
1:26:42
हो, अपने गुरु के पास जाते हो, उतने ही भरोसे से अपने पास जाया करो।
1:26:53
आपका स्वयं ही एक्चुअल परमात्मा और गुरु है, सद्गुरु है।
1:27:02
और तभी आप अपने बाहर वाले गुरु को भी पहचान पाओगे। फिर आपसे भिन्न कुछ है ही नहीं।
1:27:10
फिर पूरा जगत नारायण है सब कुछ। बट प्रथम आप हो
1:27:18
तो अपनी महत्ता अपनी कद्र करो।
1:28:17
तो मैं ऐसे पहले रिसर्च करता था
1:28:25
मेरा भयंकर प्रेम अपने गुरु से ओशो से महर्षि मुक्त से मैं खतरनाक प्रेमी हूं।
1:28:32
लेकिन फिर भी कभी ऐसा डाउट आ जाता था यार यह ऐसा कैसे
1:28:39
है ना अब कुछ वीडियोस देख लिया इधर-उधर के तो एक
1:28:47
डाउट आ गया या कुछ हो गया किसी भी चीज में तो मैं कैसे करता था मालूम
1:28:55
यार यह डाउट आ गया तो एकदम गिल्टी होती थी मेरे को अपने गुरु के प्रति डाउट
1:29:03
मेरे को माजरा समझ ही नहीं आता था। यह भी गुरु की कृपा होती है
1:29:11
कि आप लास्ट में पहले नहीं भाई आप लास्ट में गुरु के प्रति भी डाउट करो और फिर
1:29:18
अपने प्रति आपकी श्रद्धा हो जाए। तब वहां से हटा मैं गुरु से भी हटा मैं
1:29:28
क्योंकि एक जीव का गुरु जीव से ज्यादा नहीं होता।
1:29:35
एक जीव का भगवान जीव से ज्यादा नहीं होता। तब मैं असली अपने मैं आत्मा गुरु या मैं
1:29:43
आत्मा भगवान में मेरी निष्ठा हुई जहां डाउट होता ही नहीं है। तब मैं रियल में ओशो को और महर्षि मुक्त
1:29:51
को पहचान पाया लास्ट में। एक्चुअल बात है क्या?
1:30:03
तो ये कितना सुंदर है ऐसा टर्न होना हर चीज से।
1:30:17
गुरु के प्रति नारायण दृष्टि ही होनी चाहिए। मैं यह नहीं कर रहा हूं कि आप डाउट करो लेकिन आपको डाउट होगा वह डाउट शुभ है
1:30:27
ताकि आप असली सच्चाई अपने में आप जा सको इसलिए वह डाउट को क्रिएट किया गया है आपके
1:30:36
भले के लिए या परमात्मा पर भी जो डाउट होता है अस्तित्व पर भी जो डाउट होता है कि यह क्या हो रहा है यार यहां
1:30:46
यह सही यह गलत यह सारी चीजें इसलिए हैं कि आपको अपने
1:30:54
प्रति श्रद्धा हो जाए। तब आप एक्चुअल
1:31:01
जो एक्चुअल मास्टर है आपकी बीइंग आपका स्वयं मैं आत्मा भगवान
1:31:09
उस पर आप जब कंप्लीट हो जाते हो फिर कुछ बचता ही नहीं।
1:31:18
फिर तो जर्राज जर्रा जर्रा जर्रा परमात्मा है
1:31:31
अद्भुत है अलौकिक है और लाभ आया है फिर सब कुछ
1:31:50
तो शिष्टाचार व हम बोलते हमको गुरु पर डाउट नहीं होता वो सब फालतू की बात हकीकत तो हकीकत है
1:32:00
सबको होता है किसी को कम ज्यादा बट होता है और वो शुभ है
1:32:08
ताकि आप असली अंतर्यामी गुरु के पास जा सको असली असली परमात्मा के पास और सबको
1:32:15
अपने माने हुए परमात्मा में भी डाउट होता है।
1:32:30
तो जो होता है अच्छा ही होता है यार। प्रेम प्रणाम प्रभु जी।
1:32:40
हां प्रणाम जी। मैं से बोल रहा था
1:32:49
तो मेरा एक छोटा सा प्रश्न था। अभी रुको यार रुको रुको
1:32:55
है ना फिर पूछना बोलेंगे तब
1:33:02
अब प्रश्न प्रश्न की जो बीमारी है मैं जैसे कि मैं आपने बोला ना जैसे कि मैं
1:33:09
मैंने रोक दिया अब अपने मैं पर कोई प्रश्न होता है क्या किसी का?
1:33:17
और मैं के अतिरिक्त आप हर चीज पर प्रश्न कर सकते हो। यानी समझ जाओ मैं के अतिरिक्त सब फाल्स है। आप आत्मा भी जिसको समझते हो
1:33:26
उसमें भी प्रश्न कर सकते हो। परमात्मा में भी कर सकते हो। गुरु में, दुनिया में,
1:33:31
प्रपंच में। किस चीज पे आप प्रश्न कर ही नहीं सकते?
1:33:40
बताओ मैं क्योंकि आप प्रश्न से रहित हो और उत्तर से
1:33:48
भी रहित हो। इसलिए फाइनल चैप्टर मैं ही है।
1:33:59
फाइनल चैप्टर आप ही हो। मंजिल केवल आप ही हो।
1:34:24
ये थोड़े से कठोर सत्य मैंने कहे आज आप लोगों से बट यह बताना जरूरी है। मैं कुछ
1:34:32
भी ऐसा गुप्त नहीं रखना चाहता अपने पास है ना
1:34:43
क्योंकि मैं जहांजहां भटका हूं ना मैं चाहता ही नहीं आप वहां पर रत्ती भर भी भटको
1:34:51
तो आप इस पॉइंट पर भी कभी भटके होगे
1:34:56
है कि नहीं सच्चाई है सबकी सच्चाई है
1:35:15
तभी तो मैं पे स्वयं पे आपकी नजर पड़ जाती है। अरे यार असली
1:35:25
एक्चुअल तो मैं ही हूं।
1:35:33
और मेरी दुनिया मैं ही हूं। मेरा मन मैं ही हूं।
1:35:50
मेरी सच्चाई मैं ही हूं।
1:35:57
आप सच ही खोज रहे हो ना? तो आपकी सच्चाई कोई दूसरा हो कैसे सकता है?
1:36:07
आपकी सच्चाई आप ही हो ना। दूसरे को आप सच मान ही नहीं सकते। चाहे
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कुछ भी हो जाए। वो तो आपको बहुत कालांतर में पता चलता है
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कि दूसरा है ही नहीं। अदर अदरनेस है ही नहीं। जब अपने पर पूर्ण निष्ठा होती है।
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इसलिए मेरी सच्चाई जिस सच को आप ढूंढ रहे हो वह मैं ही हूं।
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और मेरा परमात्मा भी मैं ही हूं। जो ईश्वर, परमात्मा, भगवान, आत्मा जो आप
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खोज रहे हो ना वह भी मैं ही हूं।
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तो मेरा परमात्मा या मैं परमात्मा
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मैं परमात्मा क्योंकि मेरा में दूरी हो गई ना गैप्स हो
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गए मैं परमात्मा अब मैं परमात्मा कि मैं
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वहां पर परमात्मा का भी सेंस नहीं है। फिर परबह्म बोलते हैं ना इसको अपन परमात्मा से
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भी पर वह कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है। परमात्मा से भी परे वह आप ही हो। मैं बस
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मैं जहां ना कोई प्रश्न उठता है ना कोई संदेह
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ना कोई शंका ना मैं का कोई विरोध कर सकता है निर्विरोध है
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और मैं निरंतर हर किसी को प्रिय है
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एक क्षण को भी कोई भी ऐसा नहीं है जिसको अपना मैं अप्रिय लगे।
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सहज प्रियता है स्वयं से सबकी। इतनी प्रियता है कि मैं और प्रियता मिल गए
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हैं। अलग है ही नहीं। मैं और प्रेम मिल गए हैं। अलग है ही नहीं।
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इतना मैं का ज्ञान है कि मैं और ज्ञान मिले हुए हैं। अलग है ही नहीं। इसलिए किसी को मैं का ज्ञान नहीं होता क्योंकि मैं ही
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ज्ञान है और ज्ञान ही मैं है।
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तो प्रिय लाग मोहे राम वो आपके मैं की बात है जो राम की बात
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सहज स्नेह है ये तुम संग सहज स्नेह वो स्वयं की बात है
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जिसमें किसी को भी एक क्षण को भी अप्रियता नहीं लगती उसी उसी से तो आप प्रेम करोगे
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ना उसी उसी से तो आपका प्रेम अखंड होगा ना।
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जहां प्रेम खंडित ही नहीं हो रहा है। बाकी आपके कल्पना का भगवान, आपका गुरु, आपकी
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दुनिया, आपके प्रेमप्रेमिका, आपका परिवार सब जगह प्रेम खंडित रहता है।
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केवल स्वयं में ही प्रेम अखंड रहता है। क्योंकि प्रेम हमेशा जो असली परमात्मा है
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आपका स्वयं उसी के साथ चिपका रहता है। उसके चरणों में
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मैं के चरणों में जन्मजनम रति राम पद मैं का पद है वो
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तो वो बोलते हैं ना भरत धर्म ना अर्थ ना काम ना मोक्ष ना चाहूं निर्वाण
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जन्म जन्म रति राम पथ आत्म पथ
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जिससे रति अलग ही नहीं होती यार भाई मैं हूं
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तो सारा प्रेम, सारा ज्ञान मैं से भिन्न है ही नहीं। एक्चुअल प्रेम की बात कर रहा हूं मैं। अब इससे प्रेम,
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उससे प्रेम, वो सब खंडित प्रेम है। वो मोह को ही आप प्रेम समझ रहे हो। है ना? जहां
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इससे उससे चलता है ना कभी यह कभी वह
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जिसकी साधना की ही नहीं जा सकती वही भगवान होता है मालूम मैं की साधना कर सकते हो क्या
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वह साध्य है ना साध्य की कैसे साधना करूं उस पर निष्ठा होती है श्रद्धा होती है
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सत्संग सुन के किसी आत्मवान का सत्संग सुन के
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उसकी साधना नहीं होती साधना हमेशा पर की होती है याद रखना
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स्व की नहीं होती स्वभाव भाव की साधना होती ही नहीं है
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यारों पर भाव की साधना होती है खुद को शरीर मान के ही तो साधना करते हो मन बुद्धि मान के
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ही तो साधना करते हो पर भाव की स्वभाव की साधना आज तक बनी ही नहीं क्योंकि वहां
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जरूरत ही नहीं है। स्वभाव में तो प्रेम होता है, श्रद्धा होती है, निष्ठा होती है।
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निरंतर प्रियता होती है अपने आप से।
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प्रिय लाग्यो मोहे राम।
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तो मेरी इस बात को हमेशा याद रखना हर किसी को बता रहा हूं हमेशा याद रखना। मैं को मैं से ही जानना।
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और किसी और वस्तु से मत जानना। सेकंड अगर यह टिपिकल लगे थोड़ा सा समझ ना आ रहा
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हो तो मैं को ज्ञान या प्रेम से बस
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उससे डाउन मत जाना कई जन्म खराब हो जाएंगे।
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साधना ध्यान ये वो तो बहुत आप अंधकार में चले गए।
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मैं ज्ञान और प्रेम से जानने योग्य हूं। है ना?
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और सर्वश्रेष्ठ तो मैं को सीधा मैं से ही जानू। और मैं मैं को जानता ही हूं।
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तो आत्मज्ञानी कौन होता है? मालूम आत्मान क्या होता है? आप मैं को नहीं जानते और आपको जना रहा है ऐसा नहीं होता।
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आप मैं को जानते ही हो। इसी को जनाता है बस।
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आप स्वयं को नहीं जानते और आपको स्वयं को जानना है। ऐसा आत्मवान नहीं होता। आप
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स्वयं को जानते ही हो। इसी को जन्म आता है कि आप जानते ही हो।
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इसी को लखाता है। मैं बोलते ही आप स्वयं को जान गए ना।
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फिर आप बोलते हो मैं स्वयं को नहीं जानता। नहीं जानता। आपकी बुद्धि लगा रही है। मन बुद्धि
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जैसे आप बोलो मैं डंडे को नहीं जानता
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मैं लकड़ी को नहीं जानता मैं डंडे को नहीं जानता तो जान के ही बोले ना नहीं जानता कि मैं
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डंडे को ऐसे ही आप बोल रहे हो मैं मैं को नहीं जानता
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नहीं जानता आपके मन बुद्धि बोल रहा है। अब नहीं बोल सकेंगे यह सुनने के बाद।
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अरे मैं मैं को जानता ही हूं। यही जानना है बस। और यह भी जानता ही हूं। तो यह ज्ञान हुआ। है ना?
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यह अब ज्ञान से जानने चले। इससे पहले प्रेम था वह निरंतर प्रियता जिससे है।
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जिसका यानी जिसका कोई कभी त्याग कर ही नहीं सकता वही भगवान होता है असली
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जिससे कभी भी किसी को भी वैराग्य हो ही नहीं सकता। अपने आप से आपको वैराग्य हो सकता है क्या?
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क्योंकि आपका अपना आप ही असली आनंद है। आनंद से आपका कभी वैराग्य नहीं होता।
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सच्चिदानंद केवल आप हो।
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असली आनंद आप हो।
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तो अभी आप जो भी सुने अपने आप को ही सुने हो। हमने अपने आप को ही
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कहा है। तो मैं ही बोल रहा है, मैं ही सुन रहा है।
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और बीच में जो भी चीज आ रही है वह कटती जा रही है। क्योंकि बीच में कुछ और है ही नहीं। इसलिए
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कटते जा रही है। बस अपना आप है।
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स्वयं
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तो मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान उसको ना देह मान ना
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जीव मान ना मन बुद्धि मान ना आत्मा परमात्मा मान
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ना गुरु शिष्य मान मैं को मैं जान
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और मैं को मैं जानकर मैं से संतुष्ट हो जा,
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तृप्त हो जा। तेरा मैं ही विश्राम है।
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परम विश्राम है। असीम विश्राम है
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तू विश्राम को प्राप्त हो
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मैं को मैं जानकर मैं से संतुष्ट हो जा।
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तो मैं को कुछ भी ना मानना
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ही मैं को मैं जान लेना है।
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मैं को कुछ भी ना मानना।
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मैं को पहचान लेना।
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तो मैं मैं ही था। मैं मैं ही हूं और मैं मैं ही रहूंगा।
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मैं कभी भी कुछ और हुआ ही नहीं।
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यही आत्म निष्ठा है।
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कि मैं सदा से मैं मैं ही हूं। यह सारी मान्यताएं केवल एक भ्रम है जो अब
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नहीं है। सदा से मैं
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मैं ही तो हूं और क्या आप आप ही तो हो।
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माशा्लाह
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तो सभी को खूब सारा प्यार
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प्रेम प्रणाम आत्म नष्टिक को भव
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आत्मा ही निष्ठा है। मैं ही निष्ठा हूं।
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जैसे सूर्य में प्रकाश ही प्रकाश है। ऐसी मैं में निष्ठा ही निष्ठा है। श्रद्धा ही
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श्रद्धा है। अनंत श्रद्धा है।
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अनंत निष्ठा है। संदेह के लिए
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एक इंच मात्र जगह नहीं है। इतनी निष्ठा है। मैप
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हर किसी की तो जैसे
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सूर्य में प्रकाश ही प्रकाश ऐसी आत्मा में
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मैं आत्मा भगवान में निष्ठा ही निष्ठा अनंत निष्ठा
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है ही है ही है ही
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व सभी को प्रेम प्रणाम।
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ठीक है। अब वाणी को विश्राम दें अगर आप लोगों की आज्ञा हो तो