0:00
ओम
0:17
प्रणाम भगवान प्रणाम जी
0:26
प्रभु मैं ना थोड़ा सा शेयर करना चाहता हूं कि जैसे ना पहले क्या था कि समझ में नहीं आता था
0:35
तो सुनते जाता सुनते जाता सुनते जाता अब ऐसा होता है कभी अचानक से जो है ना कुछ पॉइंट अपने आप अंदर से रेस हो जाता है।
0:44
बिल्कुल एकदम समझ आ जाता है ना समझे तब एकदम समझ में आ जाता है कि क्लिक हो जाता है। कुछ ना कुछ
0:52
क्लिक हो जाता है। अगर दोबारा कभी वीडियो सुनो या कभी आपने दोबारा से वो वाला पॉइंट बोला है तो अचानक से वो रेस हो जाता है और
0:59
अनुभव में आ जाता है। ये बहुत अच्छा है। जी
1:06
वो अचानक ही क्या होता है ना आपका नाम क्या है? दिनेश दिनेश जी अचानक
1:14
ही नजरें मिलती है और प्यार हो जाता है ना जी तो इसमें भी ऐसा ही होता है कुछ अचानक से
1:22
वो प्रकट हो जाता है जब आपका ध्यान भी नहीं है जब आप कोई सत्संग भी नहीं कर रहे हो इवन उसका विचार भी नहीं कर रहे हो
1:31
जी और जी रहे हो और अचानक से अंदर से वो अंतर्यामी प्रकट कर देता है उसको वो बहुत
1:38
ही परफेक्ट है ऐसा ही होता है और यह ऑथेंटिक है एकदम
1:46
जी भग बहुत सही है दिनेश जी हां जी भग
1:53
अब जब मैं मैं सुन सत्संग सुनता हूं तो उस समय मैं सिर्फ सुनता हूं खाली मैं कुछ भी अपना दिमाग मन इधर-उधर कर देता हूं सिर्फ
2:02
सुनता हूं खाली और वो चीजें अंदर कभी-कभी अचानक से आ जाती है तो तब मुझे समझ समझ में आता है कि उस टाइम पे क्या बोला गया
2:10
था। हम हम बेस्ट है। बस भगवान आपका आशीर्वाद और आपकी कृपा है।
2:19
नहीं बहुत सुंदर है। जी प्रभु प्रणाम प्रभु।
2:26
प्रणाम दिनेश जी। बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके। जी प्रणाम। ऐसे ही स्टार्ट होती है और अचानक से
2:36
बीच-बीच में वो पॉइंट रेस होते हैं। जी जी बहुत बढ़िया ओके प्रणाम जी बहुत-बहुत धन्यवाद प्रणाम
2:44
प्रणाम प्रणाम प्रभु प्रभु
2:52
हां प्रणाम जी प्रभु दो लाइनें सुनाऊं हां सुनाइए
3:00
तो ऐसा है मतलब जो मेरा एक्सपीरियंस है उसको मैं दो लाइनों में बोल रही हूं के ऐसा है
3:06
मैं मैं सुनती मैं गया मैं मैं सुनते मैं गया और मैं मैं करते
3:16
रहा ऐसे पाया मैंने स्वयं में विश्राम
3:23
आज तो जो मैंने जी
3:30
मतलब मुझे आज तक जितना आपको सुन के जो समझ में आया मतलब जो मैंने एक्सपीरियंस किया जो मेरे जीवन में घटा वो तो यह हुआ कि एक
3:39
बार हम मैं मैं आप बहुत बार फिर मैं को भी खारिज कर देते हो हम तो वो सुनते सुनुनते एक पॉइंट ऐसा आ गया
3:48
कि मैं भी गया और इसी को सुनते सुनते जो हम जो अलग-अलग
3:54
हमारी मान्यताओं वाले भगवान में रहते हैं अलग-अलग वो भी चला गया हम
4:01
और इस तरीके से हमने अपने आप में विश्राम पाया क्योंकि अल्टीमेट जो लगता है वो है कि आप विश्राम में आ जाओ
4:10
हम तो मैंने सही समझा हां थोड़ा सही थोड़ा गलत
4:20
हां तो मेरी गलती को सुधारे भगवान
4:29
हां हां बहुत बारीक है जी
4:36
बाकी मैं कहीं चला नहीं जाता। मैं का कभी अभाव
4:46
नहीं होता है ना। जो डूबता ही नहीं है, खोता ही नहीं है,
4:53
मिटता ही नहीं है। वही मैं हूं। है ना?
4:59
जिसको ना माया डूबा सकती है, ना ध्यान डूबा सकता है, ना समाधि डूबा सकती है, ना
5:06
कोई विचार, ना कोई भाव जिसको कोई डुबो ही नहीं सकता, वही मैं हूं।
5:14
जो एब्सेंट होता ही नहीं है, खोता ही नहीं है।
5:21
और वो कथा थी ना
5:28
प्रहलाद की कि उसको उधर से फेंक दो पहाड़ से तो कुछ नहीं
5:36
होता। अग्नि में बैठा दो होलिका के साथ तो कुछ नहीं होता। पोइजन दे दो तो कुछ नहीं होता। है ना?
5:48
वैसा कुछ है मैं। हां।
5:55
तो जो मैं की भक्ति में जीता है ना उसको कुछ नहीं होता। मैं ही असली भक्ति है। मैं ही असली भगवान
6:04
है। और अल्टीमेट है। मैं भी खो गया। वो वैसा नहीं खोता जैसा
6:12
अपन समझते हैं ना जो मैंने सहजावस्था की बात की थी आई थिंक कल कल की थी हां तो
6:20
वैसा वहां नहीं खोता मैं है ना मैं मैं जैसा ही खोता है
6:29
ना कुछ अलग बात है वह सहजा अवस्था को अभी ड्रॉप कर दो अभी मैं की प्रतिष्ठा बस है
6:37
ना और मैं में विश्राम वह पॉइंट सही है आपका स्वयं में विश्राम
6:46
है ना और अंतत मैं के अतिरिक्त सब कुछ खो जाता
6:57
है। बात उल्टी है। खोना भी खो जाता है। अपना आप ही बस भासता रहता है।
7:07
पहले यह चीज कंफर्म हो जाए। यह एकदम प्रत्यक्ष हो जाए आपके जीवन में। देन
7:14
लास्ट में सहजावस्था वो एक अलग ही चैप्टर है। उस उस चक्कर में अभी नहीं पड़ो।
7:23
ठीक है। पहले आत्मनिष्ठा आत्म बोध प्रथम प्रथम।
7:32
बाकी वह सुंदर है जो स्वयं में विश्राम आपने कहा। ओके
7:41
जी जी भगवान प्रणाम जी प्रणाम प्रभु
7:50
गया स्वामी जी प्रेम प्रणाम प्रणाम हां प्रेम प्रणाम
7:58
मैं सोनिया हां सोनिया जी
8:05
कल वाला भी सत्संग सुना सुना था उससे मतलब बिल्कुल विश्रांति सी आ गई है जैसे
8:13
एक ठहर रहा इससे समुद्र एकदम ठहर जाता है ऐसे महसूस हो रहा है
8:21
यस लग रही है हां जी और मतलब बुद्धि तो बिल्कुल जैसे गायब है मन बुद्धि कोई भास
8:30
ही नहीं रख मतलब प्रतीत ही नहीं हो रही है ये बहुत उत्तम है और वही सत्संग अभी
8:39
इवनिंग में फिर से डला है। उसको हर किसी को बार-बार सुनना चाहिए।
8:47
जी बट शुरू शुरू से आखरी तक एकांत में और
8:55
धैर्य पूर्वक ये इन चीजों को हर कोई याद रखे एकांत में और धैर्य पूर्वक शुरू से
9:04
आखरी तक तो उसका रिजल्ट यह आ जाएगा जो इन्होंने बोला ना कि समुद्र भी वहां शांत
9:12
लग रहा है चेतना का समुद्र उसका फल है निश्चित आएगा।
9:21
कोई लहर अगर उठती रही है दिन में व्यवहार में काम करते हुए तो वो एक लग रहा है कि
9:27
हां ये आई बहुत चली हुई है। हम ऐसे कभी ऐसे कभी पहले महसूस नहीं हुआ था।
9:36
मतलब हम लोग लहरों में मैं जैसे बह जाती थी। कुछ भी जिन में हुआ तो उसके साथ बह गए तो फिर बाद में ध्यान आता था। अरे मैं तो
9:44
बह गई। मैं ये थोड़ी हूं लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ।
9:52
नहीं बहुत ही सुंदर है। हां बहुत ही सुंदर है वो।
9:59
जैसे मतलब मैं शब्दों में नहीं बता पा रही हूं आपको। जैसे एक आत्म शांति सी महसूस हो रही है।
10:07
ठहराव था। मैं यह अनुभव बताना चाह रही थी आपको अपना।
10:17
बहुत सुंदर है और इस सत्संग में हर चीज का समाधान है। उसमें सब चीज इंक्लूड है। शुरू
10:27
में आत्मज्ञान से शुरू होता है और फिर पीक पूरा सहजा अवस्था में जाता है। वो
10:35
हां बहुत ही अद्भुत है। तो
10:41
ये स्वामी जी मतलब तत्व मसीह का जो हम लोगों ने बहुत सुना हुआ है ये तत्व मसीह
10:48
को भी टच कर रहा है। हां बात तो वही है ना तत्व मसी कह लो या
10:56
अहम ब्रह्मास्मि कह लो या जो भी कह लो बल्कि उसके भी बियों्ड है यह सत्संग
11:07
तो मेन उसका जो लक्ष्य है जो शांति है वह है ना आपके जीवन में
11:15
उस पर निष्ठा रखो है ना वो अभी जो सब शांत हो गया है ना उस पर भरोसा रखो तो वो और
11:22
गहरा होता है। है ना?
11:26
जी बाबा जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका आो भाव बहुत सादर
11:33
नमन मतलब मैं शब्दों में भी बोल सकती हूं आपको। हां जी।
11:41
प्रेम प्रणाम स्वामी जी। प्रेम प्रणाम सोनिया जी।
12:20
प्रणाम प्रणाम कुछ बताऊं प्रभु?
12:32
हां बिल्कुल बताइए। जब मैं का सत्संग चलता है
12:42
तो पता नहीं मन बुद्धि तो कुछ होता ही नहीं है। अपने होने के एहसास पर है।
12:51
क्या हो रहा है, आनंद आ रहा है, नहीं आ रहा है, वह कुछ नहीं पता चलता है। लेकिन जब वो धीरे-धीरे पीक पकड़ने के बाद
12:59
में आप उस पर प्रेम का जब श्रृंगार करते हो ज्ञान के ऊपर प्रेम का श्रृंगार होता है
13:08
हम तब तब तब फिर आंखों से आंसू रुकते नहीं है।
13:16
और पता नहीं फिर कहां बह जाते हैं। लेकिन बताना यह है कि मतलब मैं वाले जो
13:25
प्रवचन जब चलता है तब तक ऐसे जैसे मुड़ के जैसे बैठे रहते है ऐसा लगता है। कुछ समझ में आता है नहीं आता है कुछ पता नहीं।
13:34
लेकिन बस फिर जब बाद में क्या प्रेम का शरणा निकलता है ना कि बस आंखों से आंसू निकलते
13:43
ही रहते हैं। जैसे मैं उसी में लिप्ति हुई हूं। उसके साथ ही लिपटी हुई हूं और
13:51
विजुअलाइज नहीं कर रही हूं। महसूस कर रही हूं। ऐसा हम हम
13:57
तो पता नहीं सही है क्योंकि मैं कुछ नहीं समझ में आ रहा है प्रभु।
14:04
हां तो अच्छा तो है। हम लेकिन मैं जो समझ नहीं आ रहा है उसी में
14:14
जीना है। है ना?
14:19
बाकी वह प्रेम वगैरह तो है ही मैं में सब इंक्लूड है।
14:25
ये बहुत गलत जा रहे हो आप कि मैं मुर्दे जैसा लगता है मैं वाले में। अरे आप जिंदा
14:32
हो कि मुर्दा हो पहले यह बताओ। प्रेम के प्रेम के पीछे मत पगलाओ। हम लोग
14:38
क्या है ना बड़ा शॉर्टकट प्रेम के पीछे जल्दी पागल होते हैं। है ना? वो ठीक है
14:46
बुरा नहीं है बट बगैर बोध का प्रेम जहर ही होता है याद
14:53
रखना हां खतरनाक होता है वो मोह ही होता है
15:01
अब आप हो नेचुरल बताना समझना समझना मत आप जिंदा हो कि मुर्दा हो
15:11
जिंदा हो ना तो कैसे खुद को मुर्दा हो जाता है सोच रहे हो वो गलत सेंस है और
15:19
सुनो सुनो कुछ भी शब्द यूज करते हो ना तो हम यूज़ मत
15:27
किया करो मेरे को यह लग रहा है ऐसा बोला करो है ना हम मुर्दा हो जाते हैं वो गलत
15:34
मैसेज सबकी फीलिंग में आने लगता है वो तीसरी चीज मैं
15:43
जो है वो चैतन्य है चेतन है महाजीवन है वह मुर्दा हो ही नहीं सकता बाकी सारी चीजें
15:52
एक बार मुर्दा हो जाए आपका स्वभाव आपका होना मुर्दा हो ही नहीं
15:59
सकता इवन आपकी बॉडी में भी जो जीवन है आपके होने के कारण जीवन है।
16:09
आपका होना महा जीवन है और देह में जो जीवन है आपके होने के कारण जीवन है।
16:18
इसलिए किसी को भी यह नहीं लगता कि मैं जड़ हूं। हर किसी को यही लगता है कि मैं
16:27
चेतन हूं। जीवंत हूं। क्योंकि आप हो।
16:34
पहचानो। इसलिए मैं बार-बार बोलता हूं मैं को मैं जानू।
16:43
आप लोग को क्या रहता है? एक बीमारी क्या है? एंटरटेनमेंट वाले सत्संग थोड़ा प्रेम थोड़ा किस्सा कहानी ये वो बताओ थोड़ा भाव
16:51
में आकर आप लोग रोते हो ना तो आप लोग को लगता है एकदम सही जगह आ गए।
16:57
लेकिन मैं ऐसा टेंपरेरी प्रेम
17:04
नहीं चाहता। जब तक आपको बोध नहीं है आपका प्रेम केवल
17:11
एक मोह है। उस प्रेम में 10 किस्म की दिक्कतें होंगी।
17:24
इसलिए पहले पहचान पहले परमात्मा की पहचान फिर प्रेम
17:32
जाने बिन ना होए प्रतीति बिन प्रतीति होए नहीं प्रीति
17:39
और परमात्मा की पहचान होते ही प्रेम अपने आप आ जाता है। असली वाला आता है।
17:49
असली प्रेम आता है। तो पहले स्वयं की पहचान
17:57
मैं आत्मा भगवान एक्चुअल जो आप हो उसकी पहचान होनी चाहिए। उसका बोध
18:05
होना चाहिए। उसका एहसास में जिओगे ना प्रतीति उसके एहसास में कि यार मेरा होना ही परब्रह्म है,
18:15
परमात्मा है, राम है। तब उसमें से प्रेम फूटेगा। वो उसका फल है।
18:25
एक्चुअल वाला आएगा। उसमें ज्ञान भी है, प्रेम भी है, आनंद भी
18:33
है, रस भी है, सब कुछ है। उसमें पूरा अस्तित्व है।
18:43
बाकी क्या है? दो चार ऐसे रोने धोने वाली कहानियां बता के रुला धुला दूं। बहुत रो दोगे सब कोई। कोई बड़ी चीज थोड़ी ना है।
18:52
चलता है मार्केट में ये। लेकिन वह आपके भावों के साथ खेलना बस है।
19:01
मैं भाव दूंगा जरूर लेकिन भावातीत के साथ दूंगा। भगवान के साथ दूंगा।
19:08
तब भावों की एक पवित्रता होती है। जब वह भगवान के साथ होता है। मैं आत्मा
19:17
भगवान के साथ बहुत डिफरेंसेस है। बहुत डिफरेंस
19:28
तब प्रेम की क्वालिटी कुछ और ही होती है। तब आपका होना ही प्रेम होता है।
19:37
और अपने आप आपसे बहता है। आपको किसी को करना नहीं पड़ता। इवन भाव भी नहीं करना पड़ता, बहाना भी नहीं
19:46
पड़ता। वह अपने आप दसों दिशाओं में बहता रहता है प्रेम। और वह केवल परमात्मा से ही बहेगा और किसी
19:55
से नहीं बह सकता। जब तक आप अपने होने को परमात्मा नहीं
20:03
जानोगे तब तक एक्चुअल प्रेम सर्वत्र बहेगा ही नहीं।
20:13
थोड़ा सा टफ लगता है शुरू में। मैं समझता हूं
20:20
जो मैं या शुरू में बस लगता है बट उस पर श्रद्धा रखो ना।
20:28
तो फूल जैसा एकदम कोमल है। बहुत इजी है।
20:36
हां। ओके।
20:48
अच्छा प्रेम प्रणाम। बहुत बारीक-बारीक पॉइंट्स है ना इन सबको ख्याल रखना।
20:57
क्या है प्रेम की चर्चा करना दो चार कहानियां दो चार वो मैं नहीं चाहता वैसा
21:04
फाइनल टच होना चाहिए प्रेम में भी परमात्मा में भी
21:14
और जीव का प्यार होगा ही किरा क्या प्यार करेगा जीव बताओ
21:20
जीव का प्यार जीव जितना ही होगा
21:28
प्यार केवल परमात्मा के पास होता है जो आपका होना है।
21:35
जब तक उसका बोध नहीं है आप प्रेम से अनुभिज्ञ हो। आत्म प्रेम के अतिरिक्त कोई भी प्रेम संभव
21:44
नहीं है। क्योंकि जीव प्रणाम स्वामी
21:54
हां रुकिए जीव का भगवान भी खतरनाक है। जीव का ज्ञान भी खतरनाक है। बुद्धि का ज्ञान और जीव का
22:04
प्रेम भी खतरनाक है। मोह जीव देश में जी रहे हो वही खतरनाक है।
22:15
हां। तो पहले आत्मा में स्वयं में
22:23
स्वयं ही सच्चिदानंद है। एक्चुअल प्रेम है। एक्चुअल
22:32
परमात्मा है। जब आपको पता होता है ना अपनी अमरता का कि
22:40
मैं अजर हूं, अमर हूं। साक्षात परमेश्वर हूं।
22:46
ओ तो प्रेम की बाढ़ आती है मालूम चारों साइड बाढ़ अपने आप लानी नहीं पड़ती
22:56
कि यार मैं हूं हरि अहम हरि
23:04
तो हरि की उपस्थिति ही तो अनंत प्रेम है।
23:20
एक्चुअल प्रेम। हां, यह और बात है कि नॉर्मली भी प्रेम से
23:30
आपको जीना चाहिए। है ना?
23:36
वह भी सुंदर है। लेकिन यह इंपॉर्टेंट है। बहुत इंपॉर्टेंट।
23:50
तो मैं मुर्दे जैसा नहीं परमात्मा जैसा लगता है। हूं। उसमें नहीं हो आप।
23:58
हां। शरीर को मैं समझ रहे हो तो मुर्दा ही लगेगा वह।
24:08
मैं को मैं जानोगे ना तो वह साक्षात परमेश्वर है। परम चैतन्य है।
24:18
परम प्रेम है।
24:43
मैं परमात्मा में ही प्रेम का श्रृंगार करूंगा। हां
24:54
मैं आत्मा भगवान में
25:08
और यह सब जो आपको हो रहा है ना या कुछ लोग को होता है ये सबसे मैं भी गुजरा हूं।
25:15
होता है। है ना?
25:19
हम कंफ्यूज रहते हैं। पल्ले नहीं पड़ता।
25:27
थोड़ा नाच लो, थोड़ा गा लो, थोड़ा रो लो तो थोड़ा अच्छा लगता है। थोड़ा भाव में आ जाओ तो लेकिन वो टेंपरेरी है। है ना?
26:01
हां जी यस कोई कुछ कह रहा था
26:11
प्रेम प्रणाम स्वामी जी प्रेम प्रणाम
26:18
स्वामी जी स्वयं में स्वयं का पता पता नहीं चलता पता चले अभी मैं ही हूं
26:27
और मैं हूं ये भी अलग अलग है मैं हूं वर्ष और भी अलग
26:36
अलग है सब कुछ नहीं लगता है हम
26:44
क्योंकि मैं हूं सत्संग सत्संग सुनते सुनते सुनते
26:51
बहुत आ रहा है हम समझ आ रही है
27:02
ऐसा शांत हो गया है ऐसा उसकी याद करने की जरूरत नहीं है वो तो सदैव आनंद है
27:16
पूरा है आनंद
27:23
ऐसा लगता है कि दृश्य कहां कोई दृष्टा
27:32
है ऐसा लगता है हम और मैं हूं मैं बोलने की जरूरत नहीं आपको
27:42
वहां कुछ है सब कुछ है हम
27:55
ठीक है। बढ़िया है ये। है ना?
28:05
सत्संग का महिमा है। सत्संग की सत्संग सुनते सुनते
28:15
ही यहां पर यह सत्संग की ही महिमा है। है ना?
28:31
कुछ करने की जरूरत ही नहीं स्वामी जी। बस कुछ मन अप
28:40
ऐसा लगता ही नहीं कि कुछ निरंतर
28:50
आनंद नहीं लगता है ऐसा कुछ
28:56
साइलेंस थोड़ा ज्यादा है साइलेंस ऐसा लगता है कभी कभी मुझे साइलेंस पकड़
29:05
गया तो भी हो जाती है साइलेंट
29:13
है साइलेंटली नहीं रहता जब आप तो साइलेंस रहती हूं और साइलेंस में भी ऐसा मन चल
29:21
जाएगा ऐसा लगता है कभी पर कभी कभी ऐसा चले जाता है और कुछ भी नहीं देता बस
29:32
हम हम नहीं अच्छा है
29:42
कभी-कभी लगता है साइलेंस पकड़ लिया क्या गलत
29:49
लगता है साइलेंस भी कभी कभी होना चाहिए ऐसा लगता है कभी लगता है क्या साइलेंस को
29:56
पकड़ने की क्या अनंत है अखंड है वो पकड़ने की जरूरत भी
30:03
नहीं है जो है
30:25
जा तो आपका पता नहीं पता नहीं लगता है कि
30:36
नहीं माइक को बोले तो वहां से सोच नहीं थी एकदम शांत नहीं थी जब विचार आया तो मुझे
30:45
कुछ प्रॉब्लम नहीं है विचार का आता है चले जाता है वो मोह से भी आता है मोहन में चले जाता है वैसा रहता नहीं है ऐसा लगता नहीं
30:54
उसका कुछ प्रॉब्लम ही नहीं है
31:08
इसका मान नहीं तो यहां पे कुछ ऐसा डाउट जैसा नहीं
31:17
रहता है ना डाउट भी होता है हो गया तो आपका सत्संग है
31:25
ना सत्संग के मुझे बहुत क्लियर हो जाता तो कोई प्रश्न नहीं आपके प्रश्न
31:35
आया तब तक सुनते ही नाउ चले जाता है डाउट तो आता ही नहीं ऐसा लगता
31:42
है सत्संग आगे आगे चले जा रहा है
31:50
हम
32:03
हां ठीक है यानी जो आप बोल रहे हो ना कि कभी विचार आ
32:15
भी जाते हैं तो कुछ वो नहीं रहता। कभी डाउट आ जाते हैं तो भी सत्संग सुन
32:23
लेती हूं। वो ठीक है। शुरू में ऐसा होता है। है ना?
32:37
कुछ भी आ जाता है, कुछ भी हो जाता है,
32:47
जिसको आप लोग बताते हो कि मेरे को यह हो गया, वह हो गया। कई लोग बताते हैं
32:58
ऐसा हो गया, वैसा हो गया। तो कुछ भी हो जाता है, कुछ भी आ जाता है
33:08
तो वह आपसे अलग नहीं है। जो भी हो जाता है, विचार है, दुनिया है,
33:22
मन है,
33:26
कुछ भी जो भी आपको हो जाता है, वह आपसे अलग नहीं है।
33:36
क्योंकि आप हो तभी हो जाता है।
33:43
आप हो तभी हो जाता है।
33:53
तो जो भी हो रहा है वह आप ही हो।
34:00
आपसे भिन्न नहीं है वो। आपसे अलग कुछ नहीं हो गया है। जिसको आप सोचते हो ना मन
34:09
की कोई अलग चीज आ गई आपके जीवन में ना मन आपसे अलग ही नहीं है।
34:22
मूल जड़ आपको जो प्रॉब्लम जो लगती है ना मन ही लगती है ना। मैं यह बताना चाह रहा हूं कि वह अलग ही
34:31
नहीं है मन आपसे। उसको अलग मानना ही
34:40
परेशान होना है। अगर कहूं तो मन को अलग मानना ही परेशान
34:52
करने वाला मन है। है ना?
34:58
और मैं यह बता रहा हूं जो भी आपको हो जाता है, मन आ जाता है, दुनिया आ जाती है, वह आपसे अलग ही नहीं है। तो क्या दिक्कत है?
35:11
यह पूरा अस्तित्व आपसे अलग नहीं है
35:26
तो यह हो जाता है, वह हो जाता है। कुछ नहीं हो जाता है आपको। सब आप ही हो।
35:35
यह सब आपके भीतर है। बोल लो या यह सब आप ही है बोलो वह ज्यादा बेहतर है। मैं से
35:42
भिन्न कुछ भी नहीं। जैसे मैं आपको कहूं कि
35:52
अस्तित्व कहे मैं हूं। पूरा एग्जिस्टेंस विराट अनंत ब्रह्मांड
35:59
कहे मैं हूं। है ना?
36:03
तो अनंत ब्रह्मांड के अंदर जो भी हो रहा है वह मैं ही है ना।
36:15
अस्तित्व के अंदर जो भी हो रहा है वो मैं ही है ना। बस अस्तित्व के अंदर ही सब कुछ हो रहा है
36:23
और आपका मैं ही अस्तित्व है। मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
36:40
आप क्या है पर्सनल मैं को मैं समझ लेते हो बॉडी वाले मैं को अहंकार को
36:48
मैं उस मैं की बात कर रहा हूं जिससे भिन्न कुछ भी नहीं है। अस्तित्व नहीं है। पूरा
36:55
ब्रह्मांड नहीं है। परमात्मा भिन्न नहीं है।
37:01
अब आपसे अलग ही नहीं है।
37:14
तो ना दुनिया आपसे अलग है, संसार ना संसार आपसे अलग है, ना परमात्मा आपसे
37:22
अलग है। तो किससे मुक्त होगे और क्या पाओगे?
37:40
संसार को अलग मान के उससे मुक्त होना चाहते हो। परमात्मा को अपने से अलग मान के
37:48
उसको पाना चाहते हो। और दोनों अलग है ही नहीं।
37:58
मैं बेफिक्री दे रहा हूं। दोनों अलग
38:05
है ही नहीं यार। अलग हो तो पाऊं ना परमात्मा को।
38:12
परमात्मा या अस्तित्व मुझसे अलग हो तभी तो उसको मैं जानने चलूं या पाने चलूं। और जब
38:20
अलग ही नहीं है तो तो
38:28
तो दुनिया भी मुझसे अलग नहीं है। तो क्या मुक्त हूं मैं फिर
38:36
मैं से भिन्न कुछ भी नहीं हूं।
39:03
सारी प्रॉब्लम्स की जड़ यही है।
39:09
अलग मान लेना। बार-बार मैं बताता हूं। क्योंकि बार-बार
39:19
आप अलग मान लेते हो। अलग कुछ मानो ही मत।
39:32
ना कोई अस्तित्व आपसे अलग है, ना कोई परमात्मा आपसे अलग है, ना यह दुनिया आपसे अलग है।
39:40
आप ही आपकी दुनिया हो। आप ही आपका परमात्मा हो। आप ही आपका अस्तित्व हो।
39:50
आपसे अलग कुछ है ही नहीं। समझ रहे हो? आपसे अलग कुछ है ही नहीं।
40:07
जब आपसे अलग कुछ है ही नहीं।
40:43
तो तो क्या जानोगे किससे मुक्त होगे क्या पाओगे
41:00
मतलब मैं कितनी बार बताता हूं ये जो भी देख रहे हो ना आप अपने चारों साइड
41:07
देखो अच्छे से भला ये आपसे अलग ही नहीं है आप भी इसको अलग नहीं कर सकते अपने से
41:23
थोड़ा मुमरद है ना यानी आपसे अलग
41:32
यह जो भी है वह हो ही नहीं सकता। हो ही नहीं सकता।
42:00
पानी देना तो
42:14
आपसे अलग ही नहीं है कुछ भी यार भगवान भगवान करते हो ना वो आपसे अलग ही
42:22
नहीं है। इस सच को स्वीकार करो।
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अस्तित्व अस्तित्व चिल्लाते रहते हो। अरे आपसे अलग कहां है? देखो ना कहां है
42:40
अस्तित्व आपसे अलग।
43:14
अलग मानने से यह अस्तित्व अलग लगने लगता है।
43:23
खुद से अस्तित्व को परमात्मा को अलग मानने से
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अस्तित्व परमात्मा अलग लगने लगता है। यह आपका पावर है।
43:41
यह कोई वीकनेस नहीं है
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और अलग ना मानने से परमात्मा को भगवान को अस्तित्व को अपने से
44:03
अलग ना मानने से अलग नहीं लगता है।
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इतनी सी बात है उस और कुछ नहीं है अध्यात्म में
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सारा राज इसी बात में है। परमात्मा को अपने से अलग ना मानने पर वह
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अलग नहीं लगता है। अपना आप ही लगता है।
44:51
और देना बस इतना सा है इतनी सी बात
45:21
ओके मतलब समझ रहे हो?
45:40
अरे कृष्ण आपसे अलग नहीं है। राम अलग नहीं है। शिव अलग नहीं है।
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जगदंबा अलग नहीं है। नारायण अलग नहीं है। अस्तित्व अलग नहीं है।
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जितने भी बुद्ध पुरुष हुए वह आपसे अलग नहीं है। है ही नहीं।
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इन सब का होना आप ही का होना है और आपका होना इन सब का होना
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यह अस्तित्व आपके शरीर से अलग है।
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परमात्मा आपके शरीर से अलग है। मैं से अलग नहीं है।
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और आप शरीर नहीं हो। आप मैं हो
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तभी तो आप कहते हो ना मैं हूं। मैं हूं शरीर नहीं है।
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लकड़ी डंडा नहीं है। दिखते साथ-साथ है।
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लेकिन लकड़ी डंडा नहीं है। इवन डंडा तीन काल में है ही
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नहीं। शरीर तीन काल में है ही नहीं
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तो मैं से भिन्न कुछ है ही नहीं।
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अलग मानो ही मत। बात ही खत्म हो जाएगी।
48:32
तलाश ही खत्म हो जाएगी कि परमात्मा तुमसे अलग है ही नहीं। मैं से
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अलग है ही नहीं। तलाश ही समाप्त हो जाएगी।
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इवन कुछ भी मैं से अलग नहीं है।
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कोई भी वस्तु, कोई भी चीज मैं से अलग नहीं है। जो भी आप सोच सकते हो, कल्पना कर सकते
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हो, विचार कर सकते हो, भाव कर सकते हो। मैं से अलग कुछ है ही नहीं।
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अलग ही नहीं है यार। कुछ भी अलग नहीं है।
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कोई भी अलग नहीं है।
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आप ध्यान करते हो। ध्यान आपसे अलग है ही नहीं।
51:11
अरे ध्यान आप करते हो कि कोई और करता है?
51:21
ध्यान आपसे अलग कहां है? अब आप कर कर के उसको गड़बड़ कर डालते हो।
51:32
ज्ञान आपको होता है किसी और को होता है?
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किसी और को होता है। इसका भी ज्ञान आपको होता है। तो ज्ञान आपको होता है ना। आपका
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स्वभाव है ना ध्यान ज्ञान प्रेम आपसे अलग है ही नहीं ज्ञान
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और आपको क्या अलग वाला ज्ञान चाहिए जो कहीं से मिल जाए
52:01
समझ रहे हो यह दुविधा है विडंबना है जो मिल जाए
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आपको अलग अलग वाला परमात्मा चाहिए जो आपसे ऐसे बाहर से आके आपको मिले।
52:21
ये बेसिक नीड है मनुष्य की।
52:30
अब परमात्मा अखंड है। वह अलग हो कैसे जाएगा?
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अलग वाला परमात्मा अलग ही रहेगा मेरे भाई।
52:46
और जो परमात्मा आपसे अलग है ही नहीं एक ही है
52:52
वो एक ही रहता है। जो ज्ञान आपसे अलग है ही नहीं
53:06
वही तो आत्मज्ञान है। जो प्रेम आपसे अलग है ही नहीं वही तो आत्म
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प्रेम है।
54:14
तो आपकी तलाश अलग वाले ज्ञान की है। अलग वाले परमात्मा की है।
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अलग वाले अस्तित्व की है। खुद को आप बॉडी मानते हो, जीव मानते हो तो फिर यह अलग-अलग वाला परमात्मा, मिलने वाला परमात्मा,
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मिलने वाला अस्तित्व उसकी रिक्वायरमेंट पैदा हो जाती है। है ना?
54:41
खुद को जीव मानने पर।
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मतलब क्या होता है ना लकड़ी को डंडा मानने पर
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अब डंडे को मिलने वाला परमात्मा चाहिए कुछ बड़ा विराट
55:05
डंडा क्या चाहता है बड़ा दरवाजा मिले बहुत बड़ा दरवाजा लकड़ी का जहाज मिले बहुत
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बड़ा जिसकी कल्पना भी ना कर सके है ना?
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यह डंडे की तमन्ना है। तो जो जिसको आप परमात्मा समझ रहे हो वो
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जीव की तमन्ना है। लेकिन लकड़ी को
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लकड़ी को मैं को मैं से लकड़ी से कोई भी दरवाजा भिन्न है क्या?
55:54
खिड़की, कोई लकड़ी का जहाज, लकड़ी से कुछ भी भिन्न है क्या?
56:00
इसमें तो लकड़ी से बनी हुई वस्तुएं हैं। और मैं में तो मैं से भिन्न कुछ भी नहीं है।
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कुछ भी नहीं। तो आपका डायरेक्शन ही गलत होता है। डंडे
56:15
साइड से चलते हो आप। जीव के साइड से चलते हो तो रिक्वायरमेंट पैदा हो जाती है कि
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मिलेगा परमात्मा। एनलाइटनमेंट होगा। अस्तित्व में कभी मेल्ट होगा। वह नमक का
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पुतला सागर में जाता है। घुल जाता है। यह सब जीव वाली सोच है।
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मैं वाली रेंज में तुम पहले से सागर हो। घुलना वुलना नहीं है। पहले से घुले घुलाए
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हो। तुमसे सागर अलग है ही नहीं।
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तो आप रॉन्ग डायरेक्शन में मत चलो। मतलब डंडे के साइड से मत चलो। लकड़ी के साइड से। जीव के साइड से नहीं मैं के साइड से।
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मैं के साइड में सब राइट है यार। सब सब का सब मैं यानी उससे भिन्न कुछ है
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ही नहीं।
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ना मोक्ष भिन्न है, ना केवल भिन्न है, ना आत्मा परमात्मा भिन्न है,
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ना ज्ञान प्रेम भिन्न है, ना भक्ति भिन्न है, ना अस्तित्व भिन्न है, मैं से भिन्न
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कुछ है ही नहीं।
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मतलब मैं बोलता हूं ना कि अहम हरि जो ध्यान भी किए हो
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तो हरि ही अहम है। अहम ही हरि है।
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हरि और आप अलग हो ही नहीं। मैं ये बता रहा हूं। ये नाचने वाला सूत्र है। आप लोग बैठे कैसे हो?
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आपको सत्यवत को तलाशना नहीं है। सत्य और आप अलग हो ही नहीं। यही एक सत्य है भाई।
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बाकी सब असत्य है कि सत्य और आप अलग हो ही नहीं।
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हां।
59:03
आप और आनंद अलग हो ही नहीं। आपका होना ही आनंद है। तुम हो यही तो आनंद
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है। और खोजने वाला आनंद ही दुख है। जिस आनंद को आप खोजते हो ना आनंद चाहिए,
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आनंद चाहिए। खोजने वाला आनंद ही तो दुख है।
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खोजने वाला परमात्मा ही संसार है भैया। आध्यात्मिक संसार है और क्या
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और हजारों जन्मों के बाद भी यही पता चलता है कि परमात्मा आपसे अलग था ही नहीं।
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अब बेवजह खोज रहे थे और खोज के कारण ही अलग मानने के कारण ही
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यह भ्रम हो रहा था। पता इतना ही बस चलता है कि प्रभु आपसे अलग
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है ही नहीं। बस और है ही नहीं।
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जिस धरती पर बैठे हो, जो आकाश को आप देख रहे हो, जिस ब्रह्मांड में अभी हो,
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आपसे अलग है ही नहीं मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
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ठीक है सबको प्रेम प्रणाम है ना अलग बस मत मानो
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और अलग है भी नहीं ओके वाणी को विश्राम देते हैं। सभी को
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प्रेम प्रणाम।