0:17
आत्मज्ञान के बाद हम सहजावस्था होता पूरा
0:24
सहज अवस्था में ही चल रहा है। सहज में ही हो रहा है। हम तो फिर भी आत्मज्ञान की वेट करते हैं।
0:32
आत्मज्ञान होने के बाद ही सहज अवस्था सत्संग किया जाता है।
0:39
नहीं वो जरूरी इसलिए है आत्मज्ञान के बाद सहजा अवस्था आपकी सेफ्टी के लिए है।
0:48
नियम नहीं है। आप जंप भी मार सकते हो। डायरेक्ट सहजा में भी जा सकते हो क्योंकि सबका
0:56
अस्तित्व ही सहज है। लेकिन आत्मज्ञान के बाद सहजा अवस्था बोलने
1:04
का जो कारण है वह आपकी सेफ्टी के लिए है। किसी गलत चीज को सहज ना समझ लो। है ना?
1:17
हां। तो कैसे गलत समझा जाता है? अब जैसे अधिकतर मास्टर्स बोलते हैं जैसे हो वैसे ही रहो। है ना?
1:28
तो हम क्या सोचते हैं? हमारी आदतें जैसे है वैसे ही रहो।
1:35
तुम शराब पीते हो, पान खाते हो तो वैसे ही रहो। उसको समझते हो तुम। है ना?
1:44
जैसे जी रहे हो वैसे ही जियो। यानी आप गलत ले लेते हो। जैसे हो वैसे ही
1:51
रहो। इन द सेंस आप जैसे ही हो।
1:57
वैसे ही रहो। यस।
2:07
आप जैसे ही हो वैसे ही रहो। यस।
2:17
ये मास्टर की आप जैसे ही हो वैसे ही रहो। बस
2:26
आप कभी ऐसे होते ही नहीं जैसा देश में ही रहते हो जैसा मैं हूं
2:36
वो आत्मा का तल है हम उसको क्या समझते हैं जैसे हो वैसे ही रहो बॉडी के तल पे माइंड
2:42
के तल पे समझ लेते हैं जैसे हो वैसे ही रहो
2:52
आत्मा में भी हमारी गलत गलत समझ है तो सहजा का तो बात ही छोड़ दो।
2:58
बहुत खतरनाक है। इसलिए आत्म बोध के बाद ही दुर्लभो तत्व दर्शनम
3:06
लास्ट में दुर्लभो सहजा अवस्था
3:12
प्रथम दुर्लभो विषय त्यागा। पहले विषय का त्याग
3:19
दुनिया से दूर विषयों से दूर फिर तत्व दर्शनम तो इजी पड़ेगा आपको स्वयं
3:29
को जानने में। बार-बार विषय में जीते रहोगे ना दुनियादारी में बस यही यही बाहरी विषय तो स्वयं के साइड ध्यान ही नहीं
3:38
जाएगा। दैन तत्व दर्शनम लास्ट में फिर दुर्लभो सहजा अवस्था
3:48
सद्गुरु करुणा बिना फिर लास्ट में वह राउंड सर्कल पूरा हो
3:57
जाता है। विषय अनुभूति
4:03
भी आत्म अनुभूति है। हां लास्ट में
4:11
और सहजा वाला भी नहीं लगाता। ही लगा देता है। इतना खतरनाक होता है।
4:19
विषय अनुभूति ही आत्मानुभूति है। दिमाग चकरा जाएगा। ही कैसे लगा दिया?
4:32
बट पहले आत्मबध प्रथम प्रथम
4:43
नहीं तो आप विषय में ही जी रहे हो और सोच रहे हो कि आत्मा में हो तो गड़बड़ हो जाएगा ना
4:58
दिखाओ और डंडा
5:08
प्रथम क्या है देखो विषय अनुभूति दुर्लभ विषय
5:15
त्याग विषय का त्याग यानी आपको विषय का त्याग करना ही है। विषय का त्याग क्या है?
5:23
डंडे का त्याग। देह मन बुद्धि का त्याग।
5:29
ठीक तब तत्व दर्शनम लकड़ी का बोध स्वयं का बोध
5:37
है ना फिर लास्ट में सहजा अवस्था
5:44
डंडा भी लकड़ी है
5:52
शरीर मन बुद्धि भी आत्मा है दुनिया भी आत्मा है
5:58
मैं ही हूं। मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
6:06
वो बहुत डेंजर है करके पहले आत्मा बोध मस्ट
6:13
और आत्मा ही बोध है। बोध ही आत्मा है।
6:35
तो ये सब है ना तो हमको क्या लगता है कि यार अब फिर एक टारगेट आ गया
6:43
कहीं ना कहीं अंदर वह टारगेट आ गया ना तो टारगेट आया आया ने आप गए
6:52
अपने से दूर हो गए।
7:10
लक्ष्य के आते ही पहले विषय का त्याग के लिए क्या रख लक्ष्य रखोगे? मैं आत्मा भगवान
7:18
तो विषय का त्याग होता जाएगा। होता जाएगा। लेकिन उससे अपग्रेड होना है तो
7:28
लास्ट में ये लक्ष्य भी हटा दो। आप ही लक्ष्य हो ना तो लक्ष्य में जाना क्यों है?
7:39
अरे मछली की आंखें दिख रही है। वहीं तीर चलाना है अर्जुन को। और अगर लक्ष्य अर्जुन ही है तो किस पे तीर चलाएगा?
7:53
लक्ष्य अगर तुम ही हो तो जितना अपने से बाहर देखोगे, निकलोगे,
8:00
खोजोगे तो भटकोगे ना। सीधी साफ बात है। दूर हो जाओगे।
8:09
तो बाद में लक्ष्य भी छोड़ दो और आप तो हो ही हो।
8:31
तो मैं आत्मा भगवान शुरू में लक्ष्य बाद में लक्ष्य से भी आजादी
8:57
तब आत्म बोध और आत्म बोध का जो फल है
9:06
वो फल का क्या महिमा है कि जब आपको अपने अतिरिक्त और कुछ ना दिखाई
9:12
दे अपने अतिरिक्त किसी भी अन्य का बोध हो ही ना
9:23
कि मैं के अतिरिक्त कुछ और है ऐसा सेंस ही खत्म हो जाए
9:29
तब आत्म बोध वो फाइनल चैप्टर अपने अतिरिक्त
9:37
अन्य का बोध ही ना होना
9:49
तो पहले मैं जैसे एक वो देता था डिवाइस कि मृत्यु से भय नहीं लगेगा कोई कामना नहीं रहेगी
9:56
है ना स्वप्न नहीं आएंगे तब आप समझ जाना आप आपको आत्मबोध हो गया है सुशुप्त भी
10:03
सुशुप्ति भी टूट जाएगी है ना बट यह फाइनल है जब मैं के अतिरिक्त अन्य
10:12
का बोध क्रोध ही नहीं होगा तो कामना क्या बची
10:20
मृत्यु भी कोई अलग है नहीं आपसे अन्य कोई चीज है ही नहीं तो मृत्यु बची कहां
10:28
और स्वप्न जागरण सुशुक्ति कहां बचे जब आप ही हो तो फिर बचा क्या
10:39
तो अपने अतिरिक्त किसी भी अन्य की प्रतीति ना होना, पता ना चलना, बोध ना होना, ज्ञान ना होना एक ही बात है। स्वयं के अतिरिक्त अब कुछ पता ही नहीं चल रहा है। ना दुनिया,
10:52
ना भगवान, ना शरीर, ना मन कुछ भी पता ही नहीं चल रहा है। ना जीव का,
10:59
ना भगवान का तब आत्म बोध
11:07
अपना आप ही है बस। और इस फल से जब उसको निचोड़ते हो जो रस
11:17
निकलता है वो सहज अवस्था है।
11:28
वो ऑटोमेटिक है। सद्गुरु करुणा बिना वह संभव नहीं।
11:35
नहीं तो आप धोखा ही खाओगे।
11:57
हां जी बट इसको ना वो मत समझना प्रोसेस है लक्ष्य
12:06
है स्टेप बाय स्टेप ऐसा मत बस सुनते रहो रहो। यह तीनों अपने आप हो जाएगा।
12:12
है ना? तुम बस सुनते रहो। यह अपने आप तुम्हारे अंदर कब आ जाएगा वो
12:20
अपने आप तुमको भी पता नहीं चलेगा।
12:42
जब जीवन की कोई भी अवस्था आपसे भिन्न नहीं है तो सहजा अवस्था आपसे भिन्न कैसे हो जाएगी?
12:50
बताओ वो स्वाभाविक है।
13:31
हां जी है कोई
15:06
हां जी प्रणाम भगवन हां प्रणाम
15:13
भगवान हां बताइए हां जी भगवान
15:19
ये पहले तो से सीखा है ऑन करके Google वाला
15:26
हम और भगवान भगवान मेरी इच्छा है हेलो
15:35
हम भी आप एक बार वर्णन भी करेंगे इधर हमारे पंजाब वगैरह में और काफी लोग
15:46
हां उधर जब भी प्रोग्राम बना तो जरूर आएंगे। है ना?
15:51
हां जी। हां जी। हां जी। अच्छा एक बार और भगवान ये मैं हूं वाला मेरे से हो नहीं
16:00
रहा पर आपसे बहुत ज्यादा हो गया। कोशिश करता हूं वो क्यों क्यों बड़ा होता है?
16:05
बड़ा होता है। दिक्कत ही नहीं है। हां तो वो भी ठीक है।
16:15
तो हां अभी तक असल में सुनो ना असल में जो आसानी से हो जाता है ना वो है नहीं।
16:24
ठीक है। कहते तू ही तू हो जाता है सबको। असल में वो है ही नहीं करके हो जाता है। ठीक है।
16:32
वो ट्रैप है। ठीक है। पर उसमें कुछ आनंद तो आता है। जैसे भगवान आपने एक बार आपकी वीडियो में था मैं महक
16:41
रहा हूं कि मेरे नजदीक आ जाओ। आप कह रहे थे दूसरे साक्षियों को
16:47
आपकी एक वीडियो देखी थी। उसमें आप कह रहे थे कि मैं महक रहा हूं। मेरे नजदीक आ जाओ। खुशबू आ रही है।
16:56
हम और वैसी खुशबू मेरे में आई है। तू ही तू सही
17:05
लोगों को भी पास से गुजरे और मेरे को भी आती रही है कई दिन बाद में खत्म हो गई
17:15
हेलो हां जी हां जी हां जी ये क्या चीज है जी जैसे उस वीडियो में देखा मैंने एक संत रहते थे हमारे यहां
17:23
एक दिन उनमें से भी बहुत आई हमें ऐसे लपटें आई उनके पास जाते थे जाते थे हम
17:31
और आपकी वीडियो में मैंने देखा तो मेरी बात सर्टिफाई हो गई। पहले मेरे को ऐसे था मेरे को भ्रांति तो नहीं कोई भी बहुत बड़ी भ्रांति हो। हालांकि मेरे को खुद को आती
17:39
थी। बहुत अच्छी आती थी। और आपने उस वीडियो में कहा भी मैं महक रहा हूं। मेरे नजदीक आओ।
17:48
आपको शायद वीडियो नहीं। हां जी। ना कैसे जी?
17:55
मैं महक रहा हूं का सेंस वो नहीं है जो आप समझ रहे हो। है ना?
18:00
अच्छा हां बिल्कुल भी नहीं है वो। ठीक है।
18:05
हां जी। फिर वो मेरे साथ तो उसका देखो फिर भ्रांति थी या कोई कैसे था।
18:14
कैसे जो कभी रहे और कभी ना रहे वह भ्रांति ही होती है।
18:21
हां वो नहीं वो नहीं होता। ठीक है। ठीक है। है ना? जो 24 आवर नहीं है वो सत्य
18:29
नहीं है। हां ये बात है। बड़ी बात। कुछ भी चाहे वो कोई भी अनुभव है। मतलब सुनो सुनो पहले सुनो। जी
18:37
सुनना ज्यादा शुरू करो। बोलना कम करो। ठीक है भगवान।
18:46
जो चीज भी निरंतर नहीं है 24 आवर नहीं है
18:52
वो फॉल्स है वो भ्रम है अब तू ही तू 24 आवर रह सकता है क्या वो तो
19:01
आप ही का प्रोजेक्शन है या कोई भी खुशबू कोई भी चीज 24 आवर नहीं
19:11
रह सकती दिन की चीजें रात में नहीं रहती स्वप्न
19:18
लोक में स्वप्न की चीजें चीजें गहरी नींद में नहीं रहती जहां पूरी दुनिया गायब हो जाती है अब गहरी
19:27
नींद की चीजें जागृत में नहीं रहती तो इस बीच जो भी होता है ना वो एक भ्रम है
19:36
लेकिन जागृत स्वप्न सुशुप्ति और तू तू का अनुभव करने वाला
19:44
वह हमेशा रहता है। मेरे को तू ही तू में रस आता है, आनंद आता
19:50
है। उसका अनुभव आपने ही किया ना। है ना? वह हमेशा रहता है 24 आवर जो जागृत
20:00
स्वप्न सुशुप्ति सब का अनुभव करता है जिसको किसी से प्रेम नहीं करना है जो स्वयं प्रेम है
20:10
जो स्वयं ज्ञान है ना तो हमको पहले क्या मनुष्यों से मोह
20:17
होता है कि तेरे बगैर मैं जी नहीं पाऊंगा और फिर हम अपनी ही कल्पना का एक भगवान
20:24
खड़े कर लेते हैं बहुत रोते से गाते हैं। उससे भी मोह हो जाता है। मन के भगवान से भी मोह हो जाता है और वह थोड़ा आनंद आने
20:32
लगता है क्योंकि भगवान का नाम है उसमें। है ना?
20:39
बट वो असली नहीं है। असली तो आप ही हो।
20:45
नित्य निरंतर केवल आप ही हो। क्योंकि आप अकल्पनीय हो। आपकी कल्पना नहीं
20:53
की जा सकती। और जिसकी कोई भी कल्पना ना कर सके वही असली भगवान है। आप अपनी कल्पना कर सकते हो क्या?
21:06
नहीं कर सकते। अकल्पनीय और कल्पना की दुनिया किसकी है? मन की। मन
21:14
कल्पना करते रहता है। और कल्पना के कई भगवान हैं। फिर कल्पना के गुरु के प्रेम में पड़ जाते हो आप।
21:22
तो वो सब मोह है। प्रेमवेम नहीं है। हां थोड़ा आनंद आता है, रस आता है। वो
21:30
क्या है? वो तो आप मूवी देखते हो उसमें भी आता है। दो-तीन घंटे के लिए थोड़ा हंस लेते हो, रो लेते हो, भाव में आ जाते हो। मतलब क्या?
21:40
मूवी सही है। ये सब फॉल्स है यार।
21:47
हां। असली आप ही हो स्वयं
21:56
आप स्वयं प्रेम के सागर हो। आपको पता नहीं है।
22:02
जैसे हम रामायण पढ़ते हैं ना या भागवत पढ़ते हो या जो भी गीता पढ़ते हो आप
22:11
शिव पुराण पढ़ते हो तो वहां क्या कहा जाता है?
22:19
प्रेम के सागर हो आप ऐसा बोलते हैं ना
22:26
करुणा के सागर वो आपकी बीइंग है
22:35
प्रेम का सागर वहीं से जो थोड़ा सा प्रेम छिटकता है ना
22:41
उसी को बस आप प्रेम समझते हो और उसको बहुत जल्दी शरीर दृष्टि के कारण मोह बना लेते हो
22:52
जहां से प्रेम आता है तू के लिए किसी मनुष्य के लिए काल्पनिक भगवान के लिए
22:59
प्रकृति के लिए जहां से प्रेम निकलता है
23:08
वही प्रेम का सागर है।
23:16
वही प्रेम का सागर है। कहां से प्रेम निकलता है?
23:26
आपसे निकलता है वो दया सिंधु भगवाना कृपा सिंधु भगवाना करुणा के सागर प्रेम के सागर
23:35
आप ही हो। अब वो देखो वो सुन रहे हैं। इधरउधर बात कर रहे हैं। वो देखो यह मेरे
23:42
को सुनते होंगे। ध्यान ही इधर उधर है। हटाओ उनको।
23:51
तू ही तू में मजा आता है। बोलते हैं। अच्छी बात है भैया। आनंद ही लो।
24:01
जब तक आप सिंसियर नहीं हो कोई मतलब ही नहीं है ना।
24:09
जब मेरे को लाइव में कोई बंदा ऐसे सुन रहा है, वह मेरे को एकांत में ढंग से सुनता होगा। हां,
24:19
इसी से समझ आ जाता है। सुनने वाले का रिजल्ट ना आए। ऐसा होगा ही नहीं कभी भी।
24:29
होगा ही नहीं। बता रहा हूं क्योंकि जो भी निकला है ना वह अमृत है। बता रहा
24:37
हूं। अमृत जो पिएगा अमर ही हो जाएगा। अपनी अमरता का
24:43
उसको बोध हो जाएगा। तो जो करुणा के सागर बोलते हैं ना
24:51
परमात्मा को वह आपकी आत्मा ही है। उसी करुणा के सागर से बाहर करुणा निकलती है।
25:00
किसी के लिए
25:07
दया सिंधु भगना कृपा निधान जो अपन पढ़े हैं
25:12
ना बचपन से वो आपकी बीइंग है
25:52
जहां से प्रेम निकलता है सबके लिए करुणा निकलती है सबके लिए
26:02
या किसी के लिए जहां से करुणा और प्रेम निकलते हैं वही सागर है
26:10
वो सागर ही आप हो आपसे ही बहती है यह करुणा यह प्रेम
27:15
हे करुणा निधान ऐसा कहते हैं ना अपन वो हे है अस्तित्व है और है ही मैं है
27:25
आपकी आत्मा है सब आपके लिए कहा गया है
27:57
तो जो भी अपनी आत्मा में जाता है हां
28:03
वो वही हो जाता है जानत तुम ही हो जाए
28:17
वो लाओ तो सुंदरकांड वाली बुक दो तो मेरे को
28:40
जो रखा है वो ले। अच्छा आपको कैसे लग गया है?
28:46
पैर सो गया तो बैठो मत उठ। पैर सीधा कर लो। हां।
29:30
हम क्या होता है ना हमारी जिंदगी इतनी थर्ड क्लास हो गई है कि हमको साला यकीन ही
29:36
नहीं होता है कि मैं करुणा निधान हूं। मैं करुणा का सागर हूं। मैं प्रेम का सागर
29:44
हूं। यह तो हो ही नहीं सकता। बाकी कोई और तो हो सकता है एक बार।
29:52
हमने इतना उस चीज को अपने से हटा दिया है कि मैं करुणा का सागर हो ही नहीं सकता।
29:58
ऐसा एक सेंस डला हुआ है आपके अंदर। और आपका मैं ही करुणा का सागर है। वही असली
30:05
राम शिव है, कृष्ण है।
30:13
इतना बेकार डाला गया है अंदर में ना। ये इसको बोलते हैं संस्कार, धारणाएं,
30:20
मान्यताएं। यानी
30:26
मैं नहीं हो सकता बस। प्रेम का सागर कोई कृष्ण हो सकता है, राम
30:35
हो सकता है, मैं नहीं हो सकती। अरे राम कृष्ण आपकी आत्मा है। आप ही हो वो।
30:43
इवन पूरा चराचर अस्तित्व आपकी आत्मा है
30:57
और आपका मैं ही करुणा निधान है।
31:04
दया सिंधु है, दया का सागर है। आप चाहते हो ना करुणा करना, दया करना, प्रेम करना,
31:12
कहां से आ रही हो चाहते?
31:17
इतना प्रेम बांटना चाहते हो ना आप कि ये पृथ्वी छोटी पड़ जाए या आकाश छोटा पड़
31:25
जाए। बांटते नहीं हो अपने व्यक्तित्व को बचाने के कारण, उसकी सिक्योरिटी के कारण वह एक
31:34
अलग चीज बट उतना प्रेम है आपके अंदर
31:45
और जब तक जी भर के बांटोगे नहीं ना अनाप शनाप
31:55
जब तक बांटोगे नहीं लूट नहीं जाओगे तब तक उसका पता नहीं चलता
32:03
प्रेम के सागर का तो जैसे यहां बादल बनते हैं। है ना?
32:16
हवा चलती है। फिर समुद्र से यह सब उठता है। फिर समुद्र बादल को ले आते हैं। फिर
32:23
बारिश होती है। सेम ऐसा ही है। जितना आप प्रेम बांटते हो,
32:31
है ना?
32:32
जितना लुटा देते हो पूरा फिर वह ऐसे रोटेशन होता रहता है।
32:42
फिर नदी बन के बहता है सागर की ओर।
32:48
फिर वह बादल बनके फिर ऐसे रोटेट होता है।
32:55
बट इस पे यकीन करना कि मैं ही प्रेम का सागर हूं।
33:01
वह नारायण मैं आत्मा नारायण ही हूं।
33:07
यह आप यकीन करते ही नहीं हो और इसी पे यकीन करना चाहिए।
33:17
इसी पे यकीन करना चाहिए। और किस पे यकीन करोगे?
33:31
जामवंत कह सुन रघुराया जा पर नाथ करहु तुम दाया जिस पर तुम दया
33:39
करते हो ताही सदा शुभ कुशल निरंतर सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर
33:48
उस पर सब प्रसन्न रहते हैं सुर नर मुनि
33:59
मतलब यह पूरा प्रेम है रामायण मालूम लोग ये कचरा पुस्तकें पढ़ते हो थोड़ा सा
34:07
इंग्लिश क्या सीख गए हो वो कुछ भी पढ़ते रहते हो तुम कोई सेंस नहीं है ना बड़े
34:15
अपने को 30 मार्क हां समझते हो सिंपल चीजें पढ़ा करो गीता और रामायण पढ़ा करो
34:22
है ना उसका रहस्य और उसमें जब भी राम आए उसको अपनी आत्मा में टच करो। कृष्ण आए, शिव आए
34:31
अपनी आत्मा में टच करो। आपको बोध हो जाएगा।
34:38
यह रामायण में राम जहां पर भी नाम आए वह आपके लिए डाला गया नाम।
34:47
ताकि आप अपने राम में पहुंच जाओ। वह आपको कल्पना करके कोई स्टोरी के लिए
34:54
नहीं बताया गया है। बच्चों के लिए ठीक है। वह भी सुंदर है।
35:01
भागवत में कृष्ण हर जगह डाला गया ताकि तुम स्वयं कृष्ण तक पहुंच जाओ।
35:08
इसलिए वह डाला गया है। वह बीचबीच में ना वह सारे बीज मंत्र हैं। समझो
35:19
शिव पुराण में शिव डाला गया। ऐसे नारायण में नारायण डाला गया। नारायण उपनिषद में
35:26
वो ताकि वह मैसेज है। इशारा अभी की ओर है।
35:34
हम बस उसको एक हिस्टोरिकली समझ लेते हैं और फिर चुप जाते हैं।
35:53
मैं खुद नहीं पढ़ा हूं ढंग से। भाई मैं सच बताऊं लेकिन जितना भी पढ़ा हूं ना तो उसके जो मैसेज है मेरे को प्रत्यक्ष रहते हैं
36:01
कि वो आत्मा के ही मैसेज है। मैं बहुत थोड़ा-थोड़ा पढ़ा हूं। मेरे को तो अर्थ भी नहीं पता है ज्यादा।
37:16
तात राम नहीं नर भूपाला भुवनेश्वर कालहु कर काला
37:26
ब्रह्म अनाम अज भगवंता व्यापक अजित अनादि अनंता
37:34
देखो यह जो चार लाइन है ना तात राम नहीं नर भूपाला
37:44
मतलब विभीषण समझा रहे हैं रावण को कि राम नर नहीं है नारायण है
37:52
तू गलती कर रहा है समझने में भ्राता उसका भाई रहता है तात राम नहीं नर भूपाला
38:01
तो वही वही गलती तो आप भी कर रहे हो। मैं को शरीर समझ रहे हो, नर समझ रहे हो।
38:10
आपका मैं नारायण है, राम है।
38:17
तात मैं नहीं नर भूपाला। तात
38:26
मैं नहीं नर भूपाला मैं यानी राम
38:35
आपकी आत्मा तात राम नहीं नर भूपाला
38:47
तो अपने आप को नर क्यों समझ रहे हो? शरीर और मन बुद्धि क्यों समझ रहे हो?
38:57
भुवनेश्वर कालहु कर काला। कालों का काल है उससे पंगा मत लो।
39:04
रावण को बोल रहे हैं विभीषण ब्रह्म अनाम अज भगवंता
39:13
व्यापक अजित अनादि अनंता व्यापक अजित
39:22
उसको आप जीत नहीं सकते। व्यापक अजित अनादि अनंता
39:34
मैं के पास केवल श्रद्धा से ही जाया जा सकता है। राम के पास उसको आप जान लूंगा वो
39:42
जीतने जा रहे हो आप अजीत है वो ना समझ लूंगा पा लूंगा
39:49
वह उससे काम नहीं बनेगा। श्रद्धा विश्वास निष्ठा लेके आप मैं के
39:57
पास जाओगे। हां
40:02
तब व्यापक अजित अनादि अनंता तो इसका बोध हो जाएगा व्यापक
40:09
अजित अनादि अनंता
40:17
अनादि अनंता हूं मैं अनादि हूं आ उसका बोध होने लगेगा आपको
40:26
तात राम नहीं नर नर भूपाला अरे
40:32
आपका होना नर नहीं है नारायण है
40:42
आप भी वही गलती कर रहे हो रावण वाली रावण को क्या था कि यह नारायण हो ही नहीं
40:52
सकता यह नर है ना यही भ्रम था ना और आपको क्या भ्रम है भैया?
41:03
सेम भ्रम तो है कि मैं नारायण हो ही नहीं सकता। मैं नर ही हूं।
41:10
वो भी अहंकारी था। आप भी अहंकारी हो। वो 10 सिर वाला था। आप एक सिर वाले हो।
41:21
मैं नारायण हो ही नहीं सकता। मैं नर ही हूं। नर ही हूं। ऐसा आपका अहंकार कहता है मेरे भाई। रावण कहता है
41:31
हां वो एग्री होता ही नहीं है अहंकार। वो अपनी सीमाओं में ही जीना चाहता है।
42:07
गोविज धेनु देव हितकारी कृपा सिंधु मानुष तनु धारी
42:15
कृपा सिंधु मानुष मनुष्य मनुष्य के रूप में है।
42:22
तनु धारी कृपा का सागर है।
42:29
तो कौन है कृपा का सागर? चेक करो ना यार। कहां से कृपा निकलती है, प्रेम निकलता है,
42:35
करुणा निकलती है। आपकी आत्मा से ही तो निकलती है। जिसके लिए भी निकलती है, वह कौन है। जहां से निकलती है,
43:08
देहु नाथ प्रभु कहूं देह यानी वैदेही को दे दो सीता को
43:15
देहु नाथ प्रभु कहहु वैदेह
43:21
भजहु राम बिनु हेतु सनेही जो बगैर कारण के ही स्नेह करता है वो झपकी
43:30
ले रहा है बंद करो उसको लेफ्ट वाले को
43:41
देहु नाथ प्रभु कहूं वैदेह भजहु राम बिनु हेतु
43:49
सनेही बगैर कारण के ही जो स्नेह करता है प्रेम करता है
44:00
उसका भजन करो भजहु हूं राम बिनु हेतु सनेह
44:10
यानी बगैर कारण के जो है पहले वह देखो बगैर कारण के कौन है आपके अतिरिक्त
44:19
जो बगैर कारण के है वही बगैर कारण के स्नेह कर सकता है ना वही बगैर कारण के
44:26
प्रेम कर सकता है ना अकारण प्रेम जिसको कहते हैं अपन जो खुद ही अकारण नहीं है वह
44:33
अकारण प्रेम करेगा कैसे
44:40
भजहु राम बिनु हेतु सनेही
44:48
शरण गए प्रभु ताहु न त्यागा आ
44:54
शरण गए प्रभु ताहु न त्यागा जो शरण में गया उसको प्रभु त्यागते ही
45:03
नहीं है यार चाहे वह रावण हो पापी हो
45:11
कोई भी हो शरण गए प्रभु
45:20
ताहु न त्यागा कभी भी अपने एहसास में आप शरणागति करते ही
45:29
नहीं हो कि फाइनल मैं ही हूं वह मैं ही राम हूं नारायण हूं उसकी शरण में अपने
45:37
होने के एहसास की शरण नहीं आप में
45:48
शरणागति
45:59
शरण गए प्रभु ताहु न त्यागा
46:19
सुमति कुमति सबके उर रहह नाथ पुराण निगम अस कह
46:27
सुमति और कुमति सबके अंदर रहती है।
46:33
है ना जहां सुमति त संपत्ति नाना जहां सुमति है वहां संपत्ति आ जाएगी अपने आप
46:40
संपत्ति आ जाएगी जहां कुमति त विपत्ति निदाना वहां विपत्ति
46:48
आना शुरू हो जाएगी अपने आप
47:06
रावण भड़क गया ये सुन के आपका अहंकार भड़क जाता है ना अरे मैं कैसे राम
47:15
मैं तो शरीर ही हूं नर ही हूं
47:22
सुनत दशानन उठा रिसाई खल तो ही निकट मृत्यु अब आई
47:28
विभीषण को दे रहा है वो कि तेरी मृत्यु आ गई अब तू क्या बोल रहा है
47:50
विभीषण का प्रेम इतना कि तुम पितु सरिस भले ही मोहि मारा तुम पिता के समान हो भले ही मेरे को मारो
48:01
तुम पितु सरिस भले ही मोहि मारा
48:07
राम भजे हित नाथ तुम्हारा प्रेम ऐसा ही होता है
48:18
अस कह चला विभ विभीषण जब ही आयुहीन भय सब
48:24
तब भी जैसे ही विभीषण निकला सब आयुहीन हो गए वहां लंका में
48:33
यानी विभीषण की भक्ति के कारण ही सब जीवित थे लंका में
48:44
उसके राम प्रेम के कारण जैसे ही विभीषण निकला सब आयुहीन हो गए
49:23
ये ए ही विधि करत सब प्रेम बिचारा आया हूं सब सिंधु पारा अब राम जी के पास जा रहे
49:30
हैं ना विभीषण कप ही विभीषण आवत देखा कप यानी
49:39
नहीं वानर जाना को रुप दूत विशेष ताह रखी कपीस प आए
49:50
समाचार सब ताह सुनाए कह कह सुग्रीव सुनहु रघुराई आवा मिलन दशानन भाई
50:00
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई आवा मिलन दशानन
50:07
भाव भाई
50:15
जान न जाए निशाचर माया काम रूप के कारण आया पता नहीं किस कारण से आया
50:23
सुग्रीव बता रहे हैं राम को निशाचर माया समझ में नहीं आती
50:30
भेद हमार लेन सठ आया हमारा भेद जानने आया है विभीषण और विभीषण आ रहा है शरणागति के
50:38
लिए राख बांधी मोहि असवा सखा नीति तुम नीति
50:46
बिचारी मम पन शरणागत भय हारी
50:56
सुन प्रभु वचन हरस हनुमाना शरणागत व्सल भगवाना
51:08
कोटि विप्र ब लागह जाऊं आय शरण तजऊ नहीं
51:14
ताहु यानी जो भी
51:20
कोटि विप्र बध लागह जाऊं जिसने करोड़ों
51:26
ब्राह्मणों की भी हत्या की है आए शरण तजऊ
51:35
न ता हूं जो मेरी शरण आ जाता है उसका मैं त्याग नहीं करता
51:44
चाहे उसने करोड़ों ब्रह ब्राह्मणों की भी हत्या ना की हो तो आपके जिंदगी के पाप क्या कचरा पाप है?
51:55
है ना? पिछले जन्म के इस जन्म के वह है क्या? यहां क्या बोला जा रहा है? कोटि
52:03
विप्र बद्ध लागह जाहु आए शरण तजऊ नहीं ताहु
52:10
करोड़ों ब्राह्मणों की भी जिसने हत्या करी वो मैं आत्माराम की शरण आ गया उसका मैं
52:19
त्याग नहीं करता शरणागत का मैं त्याग
52:27
नहीं करता राम बोल रहे हैं मैं राम क्या बोल रहे हैं मैं त्याग नहीं करता क्या?
52:37
मैं वो मैं आपका भी है वही राम है। मैं त्याग
52:44
नहीं करता। सम्मुख होए जीव मोहे जब ही जन्म कोटि अग
52:51
नासह तब ही जीव जब भी मेरे सम्मुख हो जाता है हम विमुख जीते हैं शरीर मन दुनिया में
53:00
सम्मुख यानी स्वयं में जीना स्वयं में यानी राम में जीना मैं में जीना
53:07
सम्मुख होए जीव मोहि जब ही जन्म कोटि अग नाश ही तब ही
53:14
यानी करोड़ करोड़ों जन्मों के पाप और करोड़ों जन्मों को ही मैं नष्ट कर देता
53:21
हूं। तब ही उसी समय जैसे ही अपने होने के एहसास में आप गए
53:30
आपके सारे पाप खत्म है। जन्म खत्म है। क्योंकि वहां देह हुई ही
53:39
नहीं कभी भी। वहां राम ही राम है। नारायण ही नारायण है।
53:57
तब ही ततक्षण उसी समय तब ही
54:14
निर निर्मल मन जो जन सो मोहि पावा है ना निर्मल
54:22
मन जन सो मोहि पावा शुद्ध हृदय वाला मेरे को पा लेता है वो
54:29
मैं बोले तू बोले राम बोले कुछ भी बोले वो पा लेता है जिसका मन निर्मल है
54:37
ना निर्मल मन जन सो मोहि पावा
54:44
मोह कपट छल छिद्र न भावा छल कपट बस मेरे को पसंद नहीं
54:55
कभी भी छल कपट नहीं करना भैया
55:24
नाथ दशानन कर मैं भ्राता विभीषण क्या बोल रहा है हे नाथ मैं दशानन का भाई हूं रावण
55:32
का नाथ दशानन कर में भ्राता निश्चर वंश
55:37
जन्म सुर त्राता सहज पाप प्रिय तामस देहा
55:45
विभीषण क्या बोल रहे हैं यानी मेरे को सहज में पाप प्रिय है राक्षस कुल है तो वहां
55:52
सहज में क्या होता है पाप प्रिय होता है सहज पाप प्रिय तामस देहा यानी मेरी देह ही
56:02
पूरी तमस है तम तमोगुणी हूं मैं। सबसे लो गुण क्या है? तमोगुण।
56:14
यथा उल्कहम पर नेहा यानी मेरे पर कृपा कैसे की जा सकती है वाला सेंस है। विभीषण
56:21
को सहज पाप प्रिय तामस देहा
56:28
अस कह करत दंडवत देखा। ऐसे कहते ही वह दंडवत हो गया।
56:36
अस कह करत दंडवत देखा तुरंत उठे प्रभु हरस विशेषा
56:45
प्रभु तुरंत उठ जाते जब आप दंडवत हो जाते हो ना
56:52
बस सरेंडर झुक गए मिट गए किसी पत्थर के सामने किसी तू के सामने
57:01
किसी के सामने अपने सामने सब राम है वहां कोई नियम कायदा नहीं।
57:10
श्रद्धा है तो सब राम है। नहीं तो कुछ भी राम नहीं। फिर सब नर ही नर है। है ना? अस
57:18
कह करत दंडवत देखा। तुरंत उठे प्रभु हरस विशेषा।
57:25
तुरंत प्रभु उठ गए। एकदम तुरंत
57:36
दीन वचन सुनी प्रभु मन भावा यानी दीन के वचन सुन के मन को बहुत भाया
57:45
प्रभु के मन को भुज विशाल गह हृदय लगावा
57:54
विशाल भुजाओं से हृदय से लगा लिया विभीषण
58:04
जैसे यह कोई बात ही नहीं है कि तुमको सहज में पाप प्रिय है या तुम्हारी देह तमोगुणी
58:10
है। कोई मायने ही नहीं रखता वहां। तुम राइट प्लेस में आ गए अपने होने के
58:17
एहसास में राम में सब खत्म।
58:21
उसी क्षण खत्म। और विशाल हृदय से विशाल
58:29
भुझ से बाहों से राम ने तुमको गले से लगा लिया।
58:35
जैसे ही अपने होने के एहसास में गए उसी क्षण
58:51
बोले वचन भगत भय हारी भक्तों का भय हरने वाले बोलने लगे
59:00
कह लंकेश सहित परिवारा कुशल कुठहार बास तुम्हारा खल मंडली बसहु
59:09
दिन राति सखा धर्म निभऊ के भाति
59:18
मैं जानो विभीषण मैं जानू तुम्हारी सब रीति
59:23
अति नय निपुण न भाव अनीति
59:31
दुष्ट संग जन दे देवी विधाता यानी दुष्ट का संग विधाता देही मत ऐसा वो बोल रहा है
59:41
यानी विभीषण अब पद देख कुशल रघुराया जो तुम कीनु जान
59:50
जन दाया अब इसके कई के अर्थ तो मेरे को भी नहीं
59:57
पता अब मैं साफ-साफ बताऊं जो जो पॉइंट मेरे को क्लियर है वो बता रहा हूं।
1:00:12
तुम कृपाल जा पर अनुकूला ताह न व्याप त्रिविध भव सूला
1:00:18
तुम कृपाल जा पर अनुकूला हे कृपालु तुम कृपाल जा पर अनुकूला तुम
1:00:29
जिसके अनुकूल हो उस पर तीनों ताप
1:00:36
है ना भव बंधन नहीं व्याप्त माया नहीं व्याप्त
1:00:49
मैं निश्चर अति अधम स्वभाव शुभ आचरण किन नहीं पाऊ मैं एकदम अधम
1:00:58
स्वभाव का हूं बोल रहा है विभीषण
1:01:10
सुनहु सखा निज कहत स्वभाव जान भूसंडी शंभु गिर जाऊं राम बोल रहे हैं सुनो सखा निज
1:01:19
कहहु स्वभाव जान भूसंडी शंभु गिर जाऊं जो नर होई चराचर
1:01:27
द्रोही जो पूरे चराचर का भी द्रोही है जो नर होई चराचर द्रोही
1:01:36
आवे सब शरण तक मोहि तज मद मोह कपट छल नाना
1:01:42
करहु स तेह साधु समाना जो छल कपट छोड़ के मेरे पास आ जाता है
1:01:50
उसको मैं तुरंत साधु के समान कर देता हूं चाहे वह चराचर का द्रोही क्यों ना हो
1:02:05
सबके ममता ताग बटोरी मम पद मन ही बांध भरी डोरी यानी जितनी भी ममताएं हैं ना
1:02:13
जहांजहां मोह है ममता है सबको बटोर लो बोल रहा है
1:02:19
मेरे पद में आत्म पद में डाल दो
1:02:43
पद अंबुझ गई बार ही बारा हृदय समात न प्रेम अपारा
1:02:51
बारंबार पैर पड़ रहे हैं और हृदय में प्रेम समा ही नहीं रहा हृदय समात न प्रेम अपारा
1:03:04
बहुत सुंदर है ये सुंदरकांड बोलते हैं इसको और रियल में सुंदर है इसको रखो संभाल
1:03:09
के भाई ऊपर रखना नीचे नहीं रखना
1:03:27
मेरे को थोड़ा पढ़ने नहीं आता उसका समझ नहीं आता बट इसमें बहुत सारे राज छिपे हुए
1:03:33
हैं और सब आत्माराम के राज है हां
1:03:40
वो बताते हैं मेरे को उसके हर शब्द
1:03:48
तूफान
1:04:01
सम्मुख होए जीव मोहि जब ही जैसे ही अपने सम्मुख होते हो आप पूरे जन्म कट जाते हैं
1:04:09
यार सारे पाप ये वो सब कट जाते हैं जैसे ही स्वयं में आए यानी आप नारायण में आ गए
1:04:17
अब नर ने जो भी किया था वो समाप्त वहां नर है ही नहीं आत्मदेश में
1:04:25
स्वयं का एहसास बस अपना होना अपने होने का भास
1:04:44
मम दर्शन फल परम अनुपा
1:04:49
पाव निज पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:04:56
राम क्या बोल रहे हैं मम दर्शन फल परम अनुपा
1:05:02
जीव कहां पाता है उसको निज सहज स्वरूपा
1:05:10
जीव कहां पाता है निज अपने में अपने सहज स्वरूप में ही वह राम का दर्शन
1:05:19
पाता है। साफसाफ बोला गया है। पाव जीव निज सहज
1:05:28
स्वरूपा मम दर्शन फल परम अनूपा
1:05:37
यानी मेरे दर्शन का फल अनूपा है। अन यानी
1:05:43
उसका कोई पारावार नहीं है। परम अनुपा पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:05:53
अपने सहज स्वरूप में निज में स्वयं में वह पाता है मेरा दर्शन
1:06:21
जो नारायण जो राम कण-कण को नहीं त्यागता कण-कण में बोलते हैं ना राम वो आपके होने
1:06:29
को कैसे त्याग देगा यार
1:06:38
आपको कैसे त्याग देगा पाओ जीव निज सहज स्वरूपा
1:07:03
बस अपना सहज स्वरूप स्वरूप जो आपका होना है जो सहज है। सहज स्वरूप क्या है?
1:07:17
जहां पे मैं हूं का प्रैक्टिस नहीं है। जहां पर स्वरूप को जानना नहीं है, समझना
1:07:26
नहीं है। जो सहज में ही आप हो बस नेचुरली
1:07:35
जहां मैं हूं मैं हूं भी नहीं करते सहज स्वरूपा
1:07:48
मैं हूं मैं हूं करने से आप थोड़ी ना हो ये आपकी भ्रांति है कि मैं हूं मैं हूं
1:07:57
करने से आप हो। अरे नहीं जब मैं हूं मैं हूं नहीं भी करते हो कुछ
1:08:05
भी करते हो तब भी आप ही हो। वही सहज स्वरूप है।
1:08:19
एकदम सहज पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:08:58
मम दर्शन फल परम अनुपा
1:09:13
स्वयं के दर्शन का फल परम अनुपा है। आप हर चीज का दर्शन करते हो। स्वयं का
1:09:22
दर्शन कभी नहीं करते। दुनिया भर के भगवानों का दर्शन, दुनिया भर के गुरुओं का दर्शन,
1:09:31
मम दर्शन कब करोगे?
1:09:35
स्वयं का दर्शन मम दर्शन फल परम अनुपा
1:09:48
वही परम अनुपा है अपना दर्शन
1:09:55
दुनिया जहान का दर्शन कर डाले दुनिया देख डाले रिश्ते नाते देख डाले शरीर मन देख
1:10:02
डाले सब दर्शन कर डाले मम दर्शन कब करोगे भैया?
1:10:12
मम दर्शन फल परम अनुपा
1:10:19
जीव निज सहज स्वरूपा
1:10:32
जो आपका सहज स्वरूप है वही आप उसको पाते हो
1:10:38
जीव उसको पाता है सहज स्व उसका रूप क्या है?
1:10:52
सहज है तो सहज स्वरूप का दर्शन
1:11:05
सहज स्वरूप का दर्शन
1:11:15
जो आप सहज में हो ही बस जहां यह भी कहना एक खत है
1:11:24
आप तो हो ही ना
1:11:46
पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:11:57
अपने निज में सहज स्वरूप में है ना
1:12:28
तो सहज स्वरूप का दर्शन जो परम अनुपा है
1:12:44
वही तो कर रहे हो आप और क्या कर रहे हो?
1:13:02
सहज स्वरूप का ही दर्शन हो रहा है। आप कोई दुनिया शरीर और कुछ थोड़ी ना देख
1:13:10
रहे हो। अपने स्वरूप को ही देख रहे हो। यह भीतर बाहर सर्वत।
1:13:17
यह आपका निज है। यह पूरा
1:13:43
हमारा क्या सेंस रहता है? स्वरूप का दर्शन मतलब कोई ऐसी जगह होगी। फिर स्व है वहां
1:13:49
और फिर उसका कोई रूप अलग से दिखेगा। वैसा नहीं है। स्वरूप से भिन्न कुछ है ही नहीं ना।
1:13:59
स्वभाव से स्व से भिन्न कुछ है ही नहीं। तो आप स्वरूप का ही तो दर्शन कर रहे हो।
1:14:07
स्वरूप को ही राम को ही आप गलती से शरीर दुनिया यह वो भीतर बाहर बोल रहे हो।
1:14:21
पाव जीव निज सहज स्वरूप आप अपने निज में ही रहते हो सहज स्वरूप में ही रहते हो
1:14:30
और कहीं रहते ही नहीं हो आप। आप सोचते हो हम कभी मन में रहते हैं, कभी
1:14:41
शरीर में, कभी दुनिया। अरे नहीं रहते हो आप। जैसे यह लकड़ी सोचे मैं कभी डंडे में रहती
1:14:48
हूं। अरे यह लकड़ी में ही रहती है। लकड़ी लकड़ी में ही रहती है। आप भी कोई
1:14:55
शरीर मन दुनिया में नहीं रहते हो। अपने में ही रहते हो। सहज स्वरूप में।
1:15:03
आपका भ्रम है कि मैं कभी मन में रहता हूं। कभी बुद्धि में रहता हूं। अरे कहीं नहीं रहते हो आप।
1:15:16
सहज स्वरूप में ही रहते हो क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई स्थान ही नहीं
1:15:23
है। कोई जगह ही नहीं है। स्व के अतिरिक्त स्वयं के अतिरिक्त कुछ है
1:15:33
ही नहीं ना। तो रहोगे किस में और स्वयं में ही रहोगे। यह पूरा विश्व आपका स्वयं है।
1:15:43
स्वयंम विश्वदम सर्वम यह स्वयं है आपका। यह बॉडी के अंदर वाला
1:15:50
खाली स्वयं नहीं बोल रहा हूं। ये पूरा चराचर
1:15:56
स्वयं है आपका। और फिर यह बॉडी भी उसी के अंदर है।
1:16:10
मम दर्शन फल परम अनुपा अरे मैं का दर्शन परम अनुपा है भाई।
1:16:23
जब तक सहज स्वरूप का बोध नहीं होता
1:16:30
तब तक आपको केवल संशय रहता है।
1:17:04
स्वयं का दर्शन सहज स्वरूप आत्मा राम
1:17:20
जैसे आपका अहंकार सोचता है ना अहंकार के साइड से जीव के साइड से कि
1:17:27
मैं कैसे नारायण मैं तो नर ही हूं। अरे आप नारायण के साइड से सोचो आत्मा के
1:17:36
साइड से। मैं कैसे जीऊं? तुम्हें कैसे नर मैं नारायण ही हूं।
1:17:45
आत्म देश से सोचा करो।
1:17:52
आत्मा से ब्रह्म का विचार।
1:18:01
अरे मैं कैसे नर?
1:18:06
मैं नारायण ही हूं। स्वभाव है मेरा स्वरूप है राम
1:18:11
और सबका स्वरूप है राम
1:18:18
पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:18:34
अपनी साइड चेंज कर लो बस गलत साइड से जीते हो आप और कोई गलती नहीं
1:18:41
है आपकी। जीव के साइड से जीते हो आप। नर के साइड से
1:18:49
परमात्मा के साइड में आ जाओ। मैं आत्मा राम के साइड में आ जाओ। वहां से
1:18:56
जीना शुरू करो। गलत साइड से जी रहे हो और कुछ नहीं।
1:19:03
स्वरूप की साइड में आ जाओ।
1:19:10
जन्म कोटि अग नाशऊ तब ही सम्मुख होए जीव मोहे जब सम्मुख हो जाना
1:19:19
यानी साइड बदल देना है परमात्मा देश में आ जाना है स्वदेश में
1:19:30
वहां से आपको लगेगा मैं कैसे नर मैं कैसे जीव हो ही नहीं सकता। ऐसा लगता
1:19:37
है वहां से। ये मैं छोटा सा शरीर और ये जीव हो कैसे जाऊंगा भाई?
1:19:51
अब गलत साइड से व्यक्तित्व के साइड से आप जीना शुरू करते हो। वो साइड ही गलत है।
1:19:59
अस्तित्व के साइड से जियो ना। अस्तित्व के साइड से सोचो। वहां से जियो
1:20:07
तो आपको लगेगा व्यक्तित्व हो कैसे सकता है?
1:20:11
जैसे व्यक्तित्व को लगता है ना कि मैं अस्तित्व हो कैसे सकता हूं। अरे यहां उल्टा है भाई।
1:20:20
अस्तित्व को लगता है यह व्यक्तित्व हो कैसे सकता है?
1:20:27
बस सही साइड से जीना शुरू कर दो क्योंकि वही आपका स्वभाव है। स्वरूप है।
1:21:06
आप अपनी मान्यता के साइड से जीते हो इसलिए फंसते हो और कुछ भी नहीं। यह जीव और यह नर माना हुआ है।
1:21:15
स्वयं माना हुआ नहीं है। मैं मान्यता से परे मैं को मान सकते हो क्या? बताओ।
1:21:23
अरे मैं ने ही सब कुछ माना है। मैं खुद अमानीय पद है।
1:21:31
उसको पाना थोड़ी ना है। आप खुद अमानीय पद में हूं। मैं अमानीय है ना?
1:21:41
मान्यता रहित तो आपको माया से मुक्त थोड़ी ना होना है।
1:21:49
मानने से, मन से, माया से ये तीनों एक ही है। मुक्त थोड़ी ना होना है। अरे मैं
1:21:55
स्वयं अमानीय है। मैं अमानीय ही हूं।
1:22:02
अमानीय पद आपका स्वभाव है। पाव जीव निज सहज स्वरूपा
1:22:09
वो आपका सहज स्वरूप है।
1:22:57
हम लोग क्या है कई जन्मों से धारणाएं मान्यताएं इस जन्म में भी वो ऐसा डाल दिए हैं ना कि
1:23:04
मैं नारायण ये तो हो ही नहीं सकता और बात यही सच है आपका मैं ही नारायण
1:23:14
आप नर हो नहीं सकते यही यही बात सच है। कैसे आप नर हो जाओगे यार मेरे को समझ ही नहीं आता।
1:23:51
अब आप बोलते ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम का अर्थ ही है आपकी आत्मा हां
1:24:01
उसी को नमस्कार किया जा रहा है ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम राम रामाय नमः ओम नमो नारायणा
1:24:09
वो केवल आप ही के लिए है यह सब
1:24:29
तो साइड चेंज करो भैया ये बहुत हो गया ना
1:24:36
परमात्मा का स्वभाव के साइड में आओ आओ
1:24:43
नर के साइड से मत जियो। बस आप गलत साइड से जी रहे हो और कुछ नहीं।
1:24:52
हां।
1:25:05
और अपनी साइड सही रखो। अस्तित्व की परमात्मा की स्वयं की राम की बस
1:25:15
सहज स्वरूपा और आप बहुत हंसोगे मालूम
1:25:24
आप जब एकदम क्लिक होता है ना तो तब आपको लगेगा मैं कभी भी उस साइड में गया ही नहीं
1:25:32
था। कोई नर की साइड जीव की साइड में मैं गया
1:25:41
ही नहीं था। हां यानी अपने में आते ही जैसे नदी सागर में
1:25:50
गई नदी पूरी मिट जाती है ना। अपने में आते ही आपका पूरा पुराना स्ट्रक्चर पूरा गायब
1:25:59
हो जाता है। उथा ही नहीं वाली बात। कोई दूसरी साइड है ही नहीं। ऐसा लगेगा
1:26:07
आपको स्वयं में आते ही।
1:28:28
तो कृपा सिंधु भगवान
1:28:37
है ना ये सब हटाओ ये सब ब्लैंक हो गए
1:28:47
कृपा सिंधु भगवान
1:29:02
करुणा के सागर
1:29:11
दयाानिधि ज्ञान के भंडार
1:29:24
प्रेम के सागर यह सब आपकी आत्मा के लिए कहा गया है।
1:29:34
आपके लिए कहा गया है। आपकी आत्मा बोलते ही फिर आप सोचते हो कि आत्मा कुछ और है और आप
1:29:41
कुछ और है। अरे मैं आत्मा भगवान यह तीनों एक ही हैं।
1:29:48
कुछ और नहीं है आत्मा और भगवान। तो यह आपके लिए कहा गया है दया सिंधु
1:29:56
भगवान करुणा सागर
1:30:06
दयाानिधि कृपानिधि
1:30:29
यह आपके होने की बातें हैं। रामायण में जो राम कहा गया है, वह आपके होने को कहा गया
1:30:36
है। गीता के कृष्ण आपका होना है।
1:30:43
शिव पुराण के शिव आपका होना है। अस्तित्व आपका होना है।
1:30:53
आप इसको कोई और समझते हो। यही आपका भ्रम है। बस आप इसको मैं से भिन्न मानते हो ना। वही
1:31:03
आपका भ्रम है।
1:31:10
राम यानी आपकी आत्मा। मैं आत्मा राम।
1:31:20
इसको कोई और मत मानो भैया। नहीं तो यही माया हो जाएंगे। राम ही माया हो जाएंगे।
1:31:28
हां।
1:31:50
यह सब आपके लिए कहा गया है। सारे वेद, सारे शास्त्र,
1:31:59
सारे संतों का मैसेज आपका होना है।
1:32:13
सोचो सारे संतों ने जिंदगी भर जो बोला आपके होने के लिए बोला है।
1:32:20
रामायण का सार आपका होना है। वेदों का सार आपका होना है। क्योंकि असली राम वही है।
1:32:27
असली शिव वही है। असली संत वही है।
1:33:16
तो जो भी मंत्र कुछ भी दोहराते हो ना तो अपने एहसास में रहा करो स्वयं में श्री
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कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा
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ऐसे अपने एहसास में स्वयं में रहते हुए कि आपके एहसास की बात है होने की बात है।
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आपके होने को ही कहा जा रहा है श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी
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हे नाथ नारायण वासुदेवा
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सारे मंत्र आपके लिए हैं।
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पानी और आप पता नहीं क्या पाने चले।
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खुद को खो के पता नहीं क्या-क्या पाने चले।
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सब पा लेना और खुद को खो देना मूढ़ता है।
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खुद को पा लेना, पाए हुए को पा लेना, सब खो देना
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यही ज्ञान है।
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जब भी मंत्र दोहराते हो तो आपका तीर कहीं किसी कल्पना के कृष्ण में राम में रहता है
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ना कल्पना के शिव में नो तीर अपने होने के एहसास में रहना चाहिए
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राम और एहसास तीर आपके होने में होना चाहिए
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और फिर वहां से बोला करो राम श्री रामचंद्र कृपालु भजवन
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हरण भव भय दारुणम मतलब समझ रहे हो तो वहां से स्वयं से
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वो डायरेक्ट कनेक्टिविटी है। आप गलत जगह जोड़ रहे हो तार
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वो तुरंत उसका प्रभाव दिखने लगता है। जानत होई तुरंत प्रभावा
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प्रभाव तभी आएगा जब स्वयं से जोड़ोगे सारे मंत्रों को सारे नामों को
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अब अस्तित्व बोलते ही आप ऐसे देखते हो बाहर सीमाएं नापने लगते हो ये इतना बड़ा वो उतना बड़ा अरे अस्तित्व बोलते ही स्वयं
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अब स्वयं की कोई सीमा है क्या
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स्वयं के एहसास की कोई सीमा है वो तो प्रेम ही प्रेम है।
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तो मैं आपका स्वयं बोल रहा हूं और मैं आपका स्वयं सुन रहा हूं। हूं।
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मैं कोई अमित वो नहीं हूं। कहीं बैठ के दूर टेक्नोलॉजी में बोल रहा हूं। ऐसा है
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ही नहीं। मैं अंतर्यामी आपका स्वयं हूं।
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और स्वयं को ही बता रहा हूं। और स्वयं के बीच में किसी और को मत लाओ।
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मन, बुद्धि, जीव, नर हटाओ यह सब।
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कभी भी हम भगवान को स्वयं से टेली ही नहीं करते। वहां तुरंत टेली होता है।
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पता नहीं कल्पना में क्या-क्या टेली करते हैं दुनिया वाले। स्वयं से नारायण को, शिव को या जो भी है। टेली करते ही नहीं हो आप
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यार। और आपका स्वयं ही है वो।
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मतलब ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम बोलते ही स्वयं ओम यानी आपकी आत्मा का मैसेज है। ओम
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नमो भगवते वासुदेवाय। कितना क्लियर कट मैसेज है।
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वासुदेव का ही तो वास है। आपके शरीर में किसका वास है?
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और उसी को नमस्कार हो रहा है।
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और जब नारायण देश में आ गए तो वहां प्रेम प्रेम करना वरना नहीं है
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भैया ज्ञान वह तो स्वभाव है ना आपका
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शांतकारम विजग शन अब स्वभाव है एकदम
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शांति प्रेम सब पता नहीं ये
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Google में यह एहसास आप लोग को हो नहीं रहा है कि हो रहा है इसमें Google मीट
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में। यहां तो एहसास भरा हुआ है लाइव में।
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हां। एकदम लबालब है अभी।
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टू द पॉइंट सत्संग का यही रस है
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सबसे इजी मैं है मालूम शुरू में थोड़ा टफ लगता है तू वो तो एक भ्रम दे देते हैं
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सबसे इजी आपका स्वभाव है आप ही का होना है वहां धोखा खाओगे ही नहीं आप
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और ना कोई धोखा दे सकता है ना खाओगे क्योंकि एक्चुअल में वो नारायण है ना तो
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बात ही खत्म हो जाती है
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तो राम कैसा है?
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जैसा मैं हूं वैसा है।
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राम कैसा है?
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जैसा मैं हूं।
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वैसा है। नारायण कैसा है?
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जैसा मैं हूं।
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वैसा है
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मम दर्शन फल परम अनुपा
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परम मनु रूपा
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इतनी पवित्रता है आपके के होने में ना
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उसका वर्णन ही नहीं किया जा सकता। वो राम है।
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अनिर्वचनी है वो।
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और अभी आपकी बॉडी थोड़ी ना जिंदा है। राम ही जिंदा है। इसमें बॉडी तो मर जाती ना।
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आप सोचते हो बॉडी जिंदा है। अरे नहीं राम जिंदा है।
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चेतन है वह आपसे जी रहा है।
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राम तुम्हार स्वरूप बस वह आपका स्वरूप है।
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आप ही हो। आपका स्वरूप बोलने में भी आप थोड़ा सा मिस कर देते हो। आप ही हो।
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तो शरीर देश से मत जियो। मरा देश है वो। उसको उल्टा करो। राम देश से जियो।
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मैं देश से है ना?
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ठीक। सभी को प्रेम प्रणाम। सबको राम राम।
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हम मम दर्शन
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फल परम अनुपा
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अरे स्टॉप करो अभी यार फिर क्या प्रश्न बंद कर तो म्यूट कर सब
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वो चलने दे म्यूट कर हट गया क्या
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एकदम म्यूट रख सबको। पता है कोई स्पिरिचुअल कस्टमर केयर है।
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कभी भी कोई भी कुछ भी बोलता है। वक्त की नजाकत को आप लोग समझते ही नहीं हो। क्या मूवमेंट चल रहा है? क्या है?
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एकदम से वो तुम्हारा जो नर है ना जीव वो जीने नहीं देता तुमको।
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डर लगता है। यह सब सच्चाई सुन के ना तुम्हारी हालत खराब होती है। और हालत खराब में तुम एक
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प्रश्न पैदा कर लेते हो। मैं तुमको राम बता रहा हूं। और तुम फिर कहां खोपड़ी में आ रहे हो?
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तुम्हारा होना राम बता रहा हूं। किसी और का होना नहीं बता रहा हूं। जहां धोखा खाओगे ही नहीं।
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हम हम
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तो आपकी बींग राम तुम स्वयं राम राम
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सारा चराचर राम राम का भाव राम ही सत्य
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राम ही तुम्हारा होना
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आ जाएगा यकीन आ ही जाएगा। है ना?
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क्योंकि आप भी थक चुके हो यकीन कर कर के कल्पनाओं के भगवान
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दिखने वाले गुरु में दिखने वाले उसमें आप देर अबेर खुद पर यकीन करोगे
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आपके पास कोई उपाय नहीं है कैसे नहीं करोगे यार
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राम हो आप यकीन होगा ही अस्तित्व हो आप
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कैसे नहीं होगा यकीन असंभव
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और यकीन की ताकत बहुत होती है हां
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शिव केवलो शिवोह शिवोह शिव केवलो हम
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स्वयं शिव शिव मैं ही हूं
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का मंत्र है शिवोहम शिवोहम शिव केवलोम
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अहम हरि सारे सूत्र आपके लिए हैं।
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तो देवों का देव महादेव और महादेव का देव आत्मदेव
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महादेव जब भी समाधि लगाते हैं स्वयं में आत्मदेव देव
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और आपके मैं में
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और महादेव के मैं में रति भर भिन्नता नहीं
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वह एक ही मैं है जिसको आपका मैं कहा जा रहा है और महादेव का मैं कहा जा रहा है
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तो जैसे इस कमरे का आकाश,
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उस हॉल का आकाश और बहुत बड़ी बिल्डिंग का आकाश
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आकाश तो एक ही है ना। इसका आकाश, उसका आकाश
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नहीं होता। शिव का मैं नारायण का मैं आपका मैं, बुद्ध पुरुष का मैं एक ही है।
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इसका उसका वाला बात ही नहीं है। वहां मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
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तो पाव जीव निज सहज स्वरूपा है ना सहज स्वरूप
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फल परम अनुपा
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प्रेम प्रणाम सभी को है ना स्वयं पर निष्ठा रखो
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कि आपका हो ना ही राम है ऐसी निष्ठा निष्ठा रखो ना आपका होना नारायण शिव अस्तित्व
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आपका होना ज्ञान है प्रेम है ऐसे निष्ठा रखो और ऐसा है
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तो भगवान को अपने से भिन्न मत मानो। केवल एकमात्र अज्ञानता है भगवान को अपने से
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भिन्न मानना।
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ओके प्रेम प्रणाम।