Prabhu Shree
0:18
तो सब कुछ खो जाता है ना जिस दुनिया में हम हैं
0:28
कोई भी आवाज आज आपके कानों तक जाती है और अंदर कहीं खो
0:35
जाती है। कोई भी समझ आपकी बुद्धि तक जाती है और फिर
0:44
अंदर कहीं खो जाती है।
0:53
आप कुछ खाते हो, पीते हो यहां तक ऐसा पता चलता है। फिर अंदर खो जाता है।
1:07
आप रोज कुछ नया अनुभव करते हो और वह अनुभव फिर कहीं खो जाता है।
1:15
सब लापता हो जाता है। खो जाता है।
1:35
आपकी दुनिया, आपके रिश्ते बनते हैं,
1:38
बिगड़ते हैं, खोते हैं।
1:48
जिस भगवान को आप याद करते हो, वह भी कहीं खो जाता है।
1:55
जिस मैं को भी आप याद करते हो मैं हूं मैं हूं वह मैं भी कहीं खो जाता है। वह असली
2:03
नहीं है। सब कुछ तो खो जाता है।
2:24
जैसे यहां सब कुछ खोने के लिए ही बना है।
2:35
एक दिन यह पृथ्वी भी खो जाएगी। इसकी भी एक उम्र है। यह सूर्य भी खो जाएगा।
2:41
इसकी भी एक उम्र है।
2:49
सब कुछ यहां खो जाता है।
3:14
यह पल, सत्संग का पल यह भी खो जाता है।
3:28
जिंदगी किसी भी चीज को टिकने देती ही नहीं है।
3:51
बट सब कुछ खो जाता है। सब का सब कुछ जो भी आप जानते हो, समझते
4:00
हो, अनुभव करते हो। सब का सब कुछ खो जाता है।
4:08
इसका अनुभव करने वाला क्या खो जाता है?
4:18
खो जाने का भी अनुभव करने वाला। क्या खो जाता है? क्या मिट जाता है?
4:36
वो मिटता ही नहीं, खोता ही नहीं, डूबता ही नहीं। कहीं
4:46
वही मैं हूं।
5:31
सब कुछ लापता है बट लापता का अनुभव करने वाला लापता नहीं।
5:39
हां।
6:38
तो सब कुछ मिट जाता है। खो जाता है।
6:52
सब का सब कुछ समाप्त हो जाता है। मिट जाता है।
7:00
कि मिटा हुआ ही है। हम क्या सोचते हैं यह शरीर की एक उम्र
7:10
होगी 100 साल 80 साल तो मिटेगा
7:16
कि यह मिटा हुआ ही है
7:31
हम ये सोचते हैं कि इस पृथ्वी की उम्र है करोड़ों साल।
7:40
उसके बाद ही मिटेगी कि मिटी हुई है।
7:52
ये सब मीठा हुआ ही है। कहीं है ही नहीं।
7:58
मैं के अतिरिक्त सब शून्य है।
8:06
ऐसा नहीं कि बाद में मिटेगा। उसका स्वभाव ही मिटना है ना। जैसे तुम अमरता से बने हो ना। यह सब मिटने
8:15
से बने। इनकी आत्मा ही मिटना है।
8:21
यह बने ही मिटने से हैं। बिखरने से
8:28
खो जाने से जैसे वो बादल होता है ना खो जाने से ही बना होता है और ऐसे बिखर
8:37
जाता है। ऐसा ही है ये सब कुछ बादलों जैसा।
8:44
इनमें ज्यादा दिल मत लगाना नहीं तो दिल टूटेगा
8:58
टूटेगा
9:15
यह सब घड़ी भर का स्वप्न है और कुछ भी
9:54
प्रणाम प्रभु प्रणाम जी
10:29
जब प्राण भी पराए लगने लगे ना तब समझना वैराग्य आ गया जीवन में
10:37
और विपसना हो गई। असली विपसना जब प्राण भी पराय हो जाते
10:45
हैं। इनसे भी भरोसा उठ जाता है।
10:53
जब प्राण ही अपने नहीं है तो बाकी क्या मेरा तेरा करोगे?
11:02
नाटक बेवजह का
12:05
तो तो ये सब कभी बाद में खो जाएगा। ऐसा नहीं है। यह अभी से खो चुका है।
12:14
जिसके पास दृष्टि है ना उसके लिए यह अभी से खो चुका है।
12:26
मिट चुका है सब कुछ। वो बुद्ध जा रहे थे ना उसका सारथी पूछा।
12:34
इतना बड़ा महल छोड़ के जा रहे हो और यह सब तो बुद्ध बोले कहां है महल? मुझे तो केवल
12:42
आंख की लपटें दिखाई दे रही हैं।
12:51
तो वो दृष्टि कि मुझे तो सिर्फ आग की लपटें दिखाई दे रही है। सब कुछ भस्म हो
13:00
चुका है। खो चुका है।
13:20
तो यहां किसी से भी दिल मत लगाना। दिल टूटेगा।
13:38
यहां हर जगह सुख के नाम पर दुख ही मिलता है।
13:47
नाम सुख का रहता है। मिलता दुख है। तुम हर इच्छा अपनी पूरी कर लो। मालूम तुम
13:57
अपनी हर इच्छा पूरी कर लो। लेकिन कोई भी इच्छा तुमको पूरा नहीं कर
14:04
पाएगी। कोई भी इच्छा तुमको कंप्लीट नहीं कर पाएगी। तुम सारी इच्छाओं को कंप्लीट कर सकते हो,
14:16
पूरा कर सकते हो। कोई भी इच्छा तुमको पूरा नहीं कर सकती।
14:38
तो बस कैलाश में जहां किसी की आस नहीं उसी कैलाश में बैठा रहो शिव के समान बैठे
14:48
रहो जहां किसी की आस नहीं
14:55
बस बस अपने ही आप में विश्राम
15:04
और यह सब कुछ तो आग की लपटे है ना यह सब कुछ मिट चुका है मिटेगा नहीं
15:11
यह शरीर मन बुद्धि ये जो भी चारों ओर दिख रहा है इवन अज्ञात भी यह सब मिट चुका है
15:23
यह है कहां यह सब भस्म हो चुका है।
15:32
भस्म को लगाओ जैसे शिव लगाते हैं ना।
15:46
भस्मांग रागाय नमः शिवाय
15:52
ये सब भस्म है यार ये सब ज्यादा दिल मत लगाना किसी भी चीज से
16:02
यह सब सुंदर सपने हैं। हसीन धोखे
16:13
कोई भी इच्छा तुमको कंप्लीट नहीं कर सकती। पूरा नहीं कर सकती। तुम सारी इच्छाओं को
16:21
पूरा कर सकते हो। करते आए हो।
16:41
आत्मवान होना है ना तो दूसरों की इच्छा पूरा किया करो। अपनी नहीं
16:47
है ना। दूसरों की इच्छा पूरी करना भी धर्म है।
16:57
अपनी व्यक्तिगत नहीं।
17:09
और हमेशा याद रखो कि यहां सब कुछ मिट चुका है। कोई मृत्यु ध्यान करने की जरूरत थोड़ी ना है यार। यहां तो सब मर चुका है। मिट
17:18
चुका है। है क्या यहां? बताओ ना।
17:25
देखो अपने पुराने सालों को 20 साल, 40 साल,
17:31
60 साल कहां आ गए? है कहां? अभी मिट गया ना
17:41
तुम्हारे विचार। तुम्हारे पुराने भाव
17:48
तुम्हारे नए विचार भी मिटे ही हुए हैं। वह बने ही मिटने से हैं। उनकी आत्मा ही मिटना है।
17:58
यह जगत बना ही मिटने से है।
18:18
कुछ नहीं रखा है यहां पर। व्यर्थ समय मत गवाओ।
18:51
याद रखो कि कोई भी रिश्ता तुम्हारी स्वतंत्रता से ज्यादा कीमती नहीं है।
18:57
सम्मान करो। सब में राम देखो, स्वयं को देखो। वहां तक ठीक है। बट कोई भी रिश्ता
19:04
तुम्हारी स्वतंत्रता से ज्यादा कीमती नहीं है।
19:12
नहीं हो।
19:51
तो याद है जब तुम पति नहीं थे, पत्नी नहीं थे तब भी तुम थे।
20:02
सेम अभी भी है। अभी भी ना तुम पति हो ना पत्नी हो। केवल माना हुआ है ये। है कहीं नहीं। मिटा
20:10
हुआ है। ये
20:22
जब तक मान्यताओं से मुक्त नहीं होंगे तब तक प्रेम असंभव है। हां
20:42
और प्रेम कभी भी पति पत्नी पिता पुत्र माता नहीं देखता।
20:50
प्रेम केवल परमात्मा ही देखता है। उसको और कुछ दिखता ही नहीं है।
20:58
यह तो मोह की आंखों से देखा गया स्वप्न है। यह रिश्ते, यह नाते
21:13
प्रेम अंधा होता है। उसको उसको राम ही दिखता है। उसको कुछ दिखता ही नहीं है। वह क्या करें?
21:49
तो सब कुछ मिट गया है, जल गया है, भस्म हो गया है
21:57
राख और समाप्त अभी
22:14
वो जो तुम्हारी लाश को जलाया जाएगा,
22:17
दफनाया जाएगा या जो भी है तो उस जलती हुई लाश को उस राख को भस्म को अभी देख लो ना
22:27
वो तो अभी है ये क्या सोच रहे हो ये 2550 साल कहां जाएंगे तुमको हवा नहीं लगेगी
22:37
वो राख ही तो है अभी ये भस्म ही तो है ये शरीर और क्या है इसको क्या समझ रहे हो नाम
22:44
वाम दे रहे हो संध्या यह वो
22:54
इसकी सुरक्षा कर रहे हो। राख की कोई सुरक्षा करता है क्या?
23:11
मुर्दे की सुरक्षा हर कोई कर रहा है।
23:53
तो यह सब कुछ समाप्त हो चुका है। कहीं है ही नहीं।
24:28
सब कुछ प्रलय की अग्नि में भस्म है। सब कुछ ये पूरा ब्रह्मांड।
24:40
इवन आपके पास कल्पना करने को भी कुछ नहीं है। सब कुछ भस्म है ही नहीं।
25:01
एकमात्र मैं विराजमान हूं।
25:13
सुनसान शमशान में
25:19
भस्म को लपेटे हुए स्वयंभू
25:28
यह शरीर भस्म है।
25:52
इस पूरे चराचर में एक मात्र मैं
25:58
शांत विश्राम में
26:21
मेरे अतिरिक्त कोई है ही नहीं। यह भी मैं किससे कहूं?
26:53
बस मैं
27:05
बुद्ध को तो दिखा कि पीछे मेरा पूरा महल आग की लपटें हैं। महल है कहां?
27:17
बट वह जहां जा रहे थे वह भी आग की लपटें थी। उसका बोध उनको बहुत अंत में हुआ।
27:26
आध्यात्मिक लपटे
27:35
कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। सब ऑलरेडी
27:43
अग्नि है, राख है। सिंस
27:55
सुपर सेंस से जिओगे ना तो उसको ईली देख सकते हो आप
28:04
वो दृष्टि
28:21
सब सब कुछ जहां मिट गया और केवल एकमात्र मैं
28:48
शांत निश्चिंत
29:35
तृप्त अपने ही आप में
29:44
और आजाद
29:53
अपने आप से भी आजाद
30:14
सब कुछ मिट गया, खो गया। लेकिन मिटना भी मुझ में मिट गया।
30:24
खोना भी मुझ में खो गया।
30:31
अब ना मिटना है ना खोना है। ना राख है ना भस्म है।
30:39
बस मैं हूं।
31:28
समाप्त भी अब समाप्त हो चुका है। केवल अपना आप भास रहा है।
31:38
एहसास हो रहा है। अपने आप का
32:24
परम विश्राम अनिर्वचनी विश्राम
33:14
बस इसी जगह आप सदा से रहते हो।
33:20
यह स्वदेश है। आत्म देश है।
33:33
यह ना कहीं आता ना जाता। अपने को कुछ मान लेने पर भी यह वह बन नहीं
33:42
जाता। मैं वह बन नहीं जाता। मैं तो सदा से विश्राम हूं। शांति हूं,
33:55
तृप्ति हूं। मैं वहां रहता हूं जहां कोई दूसरा है ही
34:05
नहीं।
34:20
और मैं सदा से वही रहता हूं। जहां कोई दूसरा है ही नहीं।
35:24
प्रशांत निर्मल
37:24
ओके कम बैक
37:39
अब ब्रह्मा जी को ले आओ खुद को जीव मानो तो ब्रह्मा जी आ गए जीव मानते ही यह
37:48
सृष्टि पैदा हो जाती है और
37:58
अपने शरीर का पालन करो,
38:03
बुद्धि का, मन का तो विष्णु आ गए।
38:13
अब लीला करो
38:23
और जब भी विश्राम करना हो तो बस सब भस्म कर दो। शिव
38:34
हो जाओ। अपने आप में विश्राम
38:48
सब सहज है, सुंदर है। ब्रह्मा जी का काल जो पैदा होना है।
38:57
अपने आप को कुछ भी मान लेना ही पैदाइश है।
39:02
जीव की देह तो बाद में पैदा होता है।
39:09
मन की जीव की पैदाइश है। अपने आप को ही कुछ भी मान लेना। लेकिन अब जान के मान रहे हो। मान के नहीं
39:19
मान रहे हो। तो अब आनंद है मानना।
39:26
क्योंकि जीवन में सब जगह रहना है, सबके साथ रहना है तो यह आनंद है और उस मान्यता का पालन भी कर रहे हो,
39:37
विष्णु भी हो और जब आपको मिटाना होता है आप मिटा देते।
39:48
शिव हो जाते हो। यह सब सहज में चलता रहता है।
39:56
बस स्वयं पर निष्ठा रखो कि यह पूरी लीला आप स्वयं हो। लीलाधारी की
40:05
लीला है।
40:18
हां जी।
40:34
कीर्ति जी थोड़ा सा चाय तो पिला दो है ना थोड़ा बैठे मित्रों के साथ
40:52
थोड़ी सी
41:04
तो आओ फिर से गुरु शिष्य बन जाते हैं। है ना?
41:11
और कोई पूछ लो कि मैं कौन हूं?
41:17
ये प्रेम है अब। है ना? अब ये अज्ञानता नहीं है। यह रस है, प्रेम है।
41:25
हां। आनंद है। बहुत सुंदर है यार सब कुछ।
41:33
अब माता बनना, पिता बनना, पुत्र बनना, पति पत्नी बनना। अब सब रस है, आनंद है।
41:41
जीव बनना, परमात्मा बनना। बहुत आनंद है। अब
41:49
42:52
प्रेम प्रणाम आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन बहुत सारा प्यार
43:01
हां प्रणाम है चेतन कैसे हो
43:07
बहुत आनंद हूं बच्चे में हूं
43:16
बस आपका प्रसाद पीछे जा रहा हूं
43:27
बहुत बहुत भगवान तो नहीं मिल रहा है। हां
43:44
बस ये जो भी अद्भुत हो रहा है अलौकिक
43:55
उसके लिए मैं भी कृत कृत हूं। है ना?
44:00
सहज में सब हो रहा है। और बहुत सॉफ्टली हो रहा है। कोई एफर्ट है
44:11
ही नहीं। सहज में एकदम
44:17
जैसे कोई फूल सुबह ऐसे खिल जाता है बस
44:48
ऐसे ही आप पूरे अस्तित्व के लिए ऐसे ओपन हो जाते हो।
44:55
और फिर तरह-तरह के भवरे आते हैं रस पीने को।
45:06
बहुत बहुत आनंद है, बहुत रस है।
45:19
समाता नहीं है आनंद। छोटी सी देह में,
45:22
छोटे से आकाश में।
45:34
प्रणाम है चेतन प्रणाम
45:50
हम हम हम हम हम हम हम
46:28
हमेशा याद रखो कि सीखा हुआ ज्ञान हमेशा मिट जाता है।
46:40
जो भी सीखा आपने मुझसे या किसी से भी लेकिन जो सहज ज्ञान है, आत्मज्ञान है, वह
46:50
आपका स्वभाव है। वहां मिटना मिटना होता ही नहीं है।
47:09
किया हुआ प्रेम भी मिट जाता है और सच कहूं तो होने वाला प्रेम भी मिट
47:18
जाता है। है प्रेम नहीं मिटता। अस्तित्व
47:29
मैं प्रेम नहीं मिटता। अस्तित्व वहां मिटना मिट जाता है। प्रेम ही प्रेम
47:38
रहता है। वो खुशबू है, रस है।
47:55
यानी स्वयं की खुशबू से जब यह अस्तित्व महकता है ना उसको प्रेम कहते हैं।
48:03
नेचुरली अस्तित्व अपने आप को धन्य महसूस करता है।
48:18
बहुत खूबसूरत है यार।
49:06
हां जी कोई है?
49:36
हम बताओ यार कुछ हां
49:54
आज आप सबको मेरी नजरों के पास होना चाहिए था मालूम एकदम नजदीक
50:06
ठीक है ये टेक्नोलॉजी बट फिर भी
50:36
हम्म हां चेंज करो विराज।
50:47
भाई सब मौन हो गए हैं। हा
50:56
प्रणाम हां प्रणाम
51:11
हा कैसे हो शुरू से
51:19
सुन रहे हो शुरू से शुरू से तो नहीं पर श्री का
51:28
ओके और बीच में बहुत बहुत जैसे अभी भी एक फोन
51:35
आया मैंने साइड पर किया जैसे ऐसे सृष्टि ने नक्की किया होगा कि आज दे ऐसा था एक
51:45
कोई ऑफिस में दरवाजा खटखट रहा है कि WhatsApp कॉल कर रहा है मतलब हर तरह तरफ
51:51
से और हर तरफ से लोग ऐसे उसी टाइम पे सबको
51:57
मतलब अनवॉइड मत करना। ऐसे फिर डिवाइड कर दिया था कि एक आपके साथ रहे
52:05
और मम्मी का कॉल आया तो शांति से बात करके
52:12
तो दर्शी मेरे को जब मेरे सारे संशय गिरे ना
52:19
जब मैं आकाशवत स्वयं को महसूस कर पाया
52:28
तब तब उस क्षण मेरे अतिरिक्त तो कुछ था ही नहीं कुछ भी
52:37
नहीं था और आज तक कुछ भी नहीं है। फिर भी उस क्षण
52:44
मैंने पूरे चराचर को एक-एक चीज को ध्यान रख के धन्यवाद दिया।
52:52
एक एक मच्छर को भी मैं प्रणाम किया कि तुमने उस क्षण मुझे काटा नहीं।
53:03
अपने एक-एक विचार को मैंने प्रेम से प्रणाम किया कि तुम उस समय आए नहीं।
53:11
एक-एक भाव को कुभाव को सबको प्रणाम किया कि यार उस क्षण तुम
53:18
ना आके तुमने मेरा सहयोग किया। अपने परिवार वालों को पूरी सृष्टि को सबको
53:28
प्रणाम किया मैं कि
53:35
इस पल में किसी ने किसी भी तरह का डिस्टरबेंस पैदा किया ही नहीं
53:46
तो अद्भुत है ये सब जब आप दिलो जान से कुछ चाहते हो ना तो सच
53:52
में फिर कोई डिस्टर्ब नहीं करता है।
54:05
और करता भी है तो आप होते नहीं हो। वहां
54:33
सर बहुत अच्छे ऐसे कौन आदमी का मैसेज हो ही नहीं पाया
54:44
मैं कभी नहीं हो सकता हाथ में फोन दिया तब तो कुछ
54:57
ओके ये भी सुंदर है। सब सुंदर है। है ना?
55:45
आज
56:00
थैंक यू मास्टर हां प्रणाम
56:08
प्रभु मैंने ये लिखा है कि आप अपने
56:16
डिसाइल को आप लगा सकते हो डिसाइपल को
56:23
अपनी देन जो अपना सेल्फ है उसके अलावा आप उसको अपने डिसाइपल को हर
56:32
जगह काटते हो जब वो ज्यादा भाव में आ जाता है तब भी आप काटते हो जब वो ज्यादा प्रेम
56:40
में आ जाता है तब भी मतलब आपको ये सिखाया है कि आपकी गेम में ही सब कुछ है
56:49
गुरु जैसे हमारा गुरु से बहुत ज्यादा प्रेम है तो वह भी आपने हमारे अंदर ही
56:56
नहीं पाया है। एक दफा जैसे मैंने ये नोट किया है कि मेरा
57:02
बहुत भाव आ रहा था आपके प्रति तो आपने फ़ौरन काटा उसको फिर क्या हुआ कि मेरे को इतना रोना है कि
57:10
मास्टर ने काटा मतलब उसने अपने भावों को काटा मास्टर की डांस जैसे मम्मी पापा की डांस से भी बुरी लगती है
57:19
मतलब सुनो सुनो असल में ना
57:31
कई बार बहुत लगाव हो जाता है। जैसे रामकृष्ण को महाकाली से बहुत लगाव हो गया था।
57:41
कुछ ऐसे भाव होते हैं कि एक समय तक उसको सींचा जाता है और एक समय
57:50
के बाद उसको काटा जाता है। कब सींचना, कब काटना,
57:59
यह हमारा धर्म है। अब बेरहमी से कई बार काटना पड़ता है। वह क्या करें?
58:10
और डिसाइपल को कई बार ऐसा लगता है कि यह तो बहुत बेरहमी है। है ना?
58:19
किसी घाव को लेकिन बेरहमी से काटना पड़ता है। जब सर्जन काटता है ना
58:29
वहां दया नहीं रखी जा सकती। यही दया है।
58:36
कई बार कई भावों को सींचा जाता है। डेवलप किया जाता है। भरा जाता है आपके भीतर
58:44
ताकि आप भाव से रहित भी ना हो जाओ।
58:50
डेड ना हो जाओ। प्रेम से रहित ना हो जाओ। तो वह हमारा काम है। है ना?
59:03
वह भी सहज में होता है। हम कुछ ऐसा करते नहीं हैं। ऐसा होता है बस अपने आप होता
59:10
है। वहां कुछ गड़बड़ दिखती है तो यहां से वह करेक्ट हो जाता है। बस और क्या
59:18
कुछ सही दिखता है तो यहां से सम्मान होता है।
59:39
तो तोतापुरी बोले ना देख राम कृष्ण मैं ऐसा गुरु नहीं हूं जो बार-बार आऊंगा तेरे
59:46
पास उठा तलवार और काट दे
59:59
जहां से काली को लाया वहीं से तलवार ले आ और काटते
1:00:07
गुरु आज्ञा मींस गुरु आज्ञा तब वो भावातीत हो गए राम कृष्ण आत्मा में
1:00:17
आ गए उसके बाद भी वह पूजा पूजा करते थे।
1:00:25
वो एक अलग अलग डायमेंशन हो गया। फिर उस पूजा का आरती का
1:00:34
जैसे कोई आईना देख के पूजा कर रहा हो। उस मूर्ति
1:00:41
में वो आईना हो गई मां काली। है ना?
1:00:48
तो बहुत अद्भुत है जीवन और बहुत डेलिकेट भी है।
1:00:55
बहुत डेलिकेट है। बहुत भरोसे से चलना पड़ता है।
1:01:16
और आप लोग इतना चल पाते हो, बहुत सुंदर है। बहुत सुंदर है।
1:01:22
इतना सुन पाते हो, ग्रहण कर पाते हो। मैं बहुत खुश हूं।
1:01:40
प्रणाम जी।
1:02:22
हां जी प्रणाम गुरुदेव
1:02:29
हां प्रणाम जी गुरुदेव
1:02:36
मैंने आपको लगभग एक महीने से सुनना शुरू किया हुआ है
1:02:44
ऐसा लगता है कि जैसे जीवित होना ही कितने बड़े और कुछ पाना है तो
1:02:54
और उसके गुरु का जीवन परम सौभाग्य की बात
1:03:06
अभी सुनिए आप
1:03:38
हेलो अभी सुनिए आप एक छोटा सा
1:03:47
ना अभी सुनिए दो चार महीने आपसे रिक्वेस्ट है अभी मौन रहें दो चार महीने सुने है ना
1:03:57
ठीक है क्योंकि ये मोमेंट अलग है और इधर-उधर की
1:04:05
बातें उचित नहीं है जब भी यार एक चीज बताऊं जिंदगी में ना
1:04:17
कहीं पर भी दो प्रेमी बैठे हो ना तो वहां कुछ ऐसा नहीं करना कि जिससे वो
1:04:24
डिस्टर्ब हो। उनका साइलेंस, उनका प्रेम किसी भी तरह से
1:04:33
डिस्टर्ब देखना भी मत वहां। उनको हर्ट होगा।
1:04:40
प्रणाम करते हुए निकल जाना।
1:04:51
दो प्रेमी ऐसे बैठे थे तो मैं बाइक से जा रहा था। मेरा मित्र था कामजीत और मैं रोका
1:04:58
और वो दोनों प्रेमियों के ना पैर पड़ा। और
1:05:07
वो उनको ऐसा लगा कि यार शुरू में उनको थोड़ा सा लगा ये आ कैसे रहा है यहां बाद
1:05:15
में ऐसे पैर पड़ा मैं और मैं ये भी बोला कि मैं क्षमा चाहता हूं कि मैं डिस्टर्ब किया आपको
1:05:23
बट उनको जो रिस्पेक्ट मिली ना वो प्रेम की रिस्पेक्ट
1:05:31
वो एहसास उनकी आईज में आ गया।
1:05:39
बाद में थोड़ा सा मेरे को लगा कि यह भी नहीं करना था। अंदर ही से प्रणाम कर लेना
1:05:46
था। ऐसा मेरे को बाद में सेंस आया। हां। वो हल्का सा वो डिस्टर्ब हो गए। उनकी
1:05:53
प्राइवेसी डिस्टर्ब हो गई। बहुत नाजुक होता है प्रेम। और यहां तो कई
1:06:01
प्रेमी बैठे हुए हैं। और प्रश्नों को लाकर तुम केवल डिस्टर्ब ही
1:06:08
करोगे।
1:06:20
दिखता नहीं है यह प्रेम तुमको बहता हुआ।
1:06:26
अंधा भी देख ले।
1:06:41
हां जी
1:06:57
हम
1:07:08
हम
1:07:23
तो पहले सत्य की शांति स्वयं की शांति,
1:07:30
आत्मा की शांति और तब उसी शांति में प्रेम की वीणा बजाई
1:07:38
जाती है। बहुत ही आहिस्ते से।
1:07:48
बहुत नाजुक मामला है। बहुत तो पहले आत्मा में आए हम सब और फिर यह
1:07:56
वीणा बज रही है।
1:08:40
आ तो प्रेम में बातें थोड़ी ना होती है।
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गुप्त गु होती है। एहसास होता है।
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एक अलग ही पागलपन है यह।
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एक उड़ान होती है। देह वहीं रहती है लेकिन कुछ उड़ जाता है
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एकदम से।
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ऐसा प्रेम दुर्लभ है।
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परमात्मा के देश में ही यह संभव है। सुलभ हो पाता है।
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स्वदेश में
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आज मैं
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मैं बहुत खुशनसीब हूं मालूम जो मेरे को तुम जैसे शिष्य मिले
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मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियां हैं ये कि तुम जैसे डिसाइपल मिले मेरे को
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जो ऐसा सुन पाते जिनमें उतर जाता है
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और छा जाता है चारों ओर अपने आप
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तुमको पता है बगैर ध्यान साधना के तुम्हारे चारों ओर सहज छाया हुआ है। देखो
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क्या हो यार तुम
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ऐसे शिष्य पाके मैं तो धन्य हो गया।
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असंभव है ऐसा हो पाना।
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देखो ना अपने चारों ओर कैसे छाया हुआ है सब कुछ यह रस यह प्रेम
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यह तुम्हारी आत्मा यह ऑलमोस्ट असंभव है।
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पॉसिबल ही नहीं है। हां जो सहज में तुमको यह हो गया है ना यह
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पॉसिबल है ही नहीं। बता रहा हूं। कई जन्म ले लो।
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और यह नेचुरल हो रहा है। इससे इससे बड़ा और क्या आनंद होगा?
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वाओ
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ठीक है। सबको प्रेम प्रणाम।
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किसी को कुछ कहना है तो मैं मौजूद हूं।
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प्रणाम हां आप साइलेंट रहें बोला हूं आपको दो-तीन
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महीने साइलेंट रहने को अपनी अनुभूतियों का प्रदर्शन मत करो
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साइलेंट रहो और उनको भी बोला हूं मैं वह फिर आ गई थी
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अभी दर्शना जी दो-तीन महीना साइलेंस
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बार-बार अपने आपको क्या बताना है? है ना?
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हां। कुछ नए मित्र हो तो वह बता सकते हैं।
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उनको तो मैं सुनना चाहता हूं।
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क्योंकि मैं क्लियर हो गया हूं। मैं ये पा लिया हूं। ये ये भी कई बार ट्रैप हो जाता है।
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मेरे को हो गया है। तो थोड़ा इससे भी बचो। हां।
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हम
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हम
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हम हम हम
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तो साइलेंस और प्रेम
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यह इंपॉर्टेंट है आपकी लाइफ में। कंप्लीट साइलेंस होना चाहिए अपने होने
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में। क्योंकि अपना होना साइलेंस ही है
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और उसमें प्रेम के फूल भी खिलने चाहिए तब कंप्लीटनेस आती है। पूर्णता आती है
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और जब शांत अपने होने में रहोगे ना तो वो फूल अपने आप सहज में खिलते हैं।
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स्वभाव है वो जैसे सूरज के आने से फूल खिलते हैं ना ऐसे
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ही शांत होते ही प्रेम के फूल खिलते हैं।
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अपने आप महक लगते हो
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और आपका होना ही वह सूर्य है। उसके आने से सारे प्रेम के फूल खिल जाते।
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फिर पूरी जिंदगी आप प्रेम में गुजार देते हो।
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गीतों में नृत्य में
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मुस्कुराते हुए फिर सब कुछ
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बस एक
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अलग ही दिव्यता लिए रहता है आपके जीवन में एक रस
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एक तृप्ति
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तो बहुत सारा मेरा प्यार आप सभी को प्रेम प्रणाम