Prabhu Shree
0:03
[संगीत]
0:09
[संगीत]
0:14
[संगीत]
0:17
प्रभु महर्षि मुक्त कहते हैं कि कोई कुछ देखा, कोई कुछ देखा हम तो आत्मज्ञानी क्या देखता है?
0:32
आप क्या देखते रहते हो?
0:35
नहीं, हम कुछ देखते नहीं है यार।
0:37
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
0:40
ऐसा कुछ मतलब इस जहां [नाक से की जाने वाली आवाज़]
0:46
में या भीतर या कहीं और या अननोन में या किसी रहस्य में
0:55
मैं देख नहीं रहा हूं। है ना?
1:03
देखा तब जाता है कि जब कुछ और हो आपके अतिरिक्त
1:11
जब आपको लगे कि आपके अलावा कुछ और है, कोई भगवान है, कोई दुनिया है, कोई रहस्य है।
1:20
तब आप देखते हो।
1:32
कोई देवता है या कुछ भी तभी आप देखते हो
1:50
अब मैं कुछ नहीं देखता एक नेगेटिव साइड है कि मैं कुछ देखता नहीं या कुछ दिखता नहीं है। वह एक नेगेटिव साइड है। ऐसा भी नहीं है। है ना?
2:02
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
2:14
पता नहीं बस मैं हूं और देखना दिखना कहीं है नहीं।
2:21
तो फर्स्ट स्टेप होता है मैं देखता हूं तब दिखता है। है ना? सेकंड स्टेप होता है कि
2:30
देखने वाला ही दिख रहा है। थर्ड होता है
2:36
मैं दिखता हूं तब दिखता है।
2:43
और फोर्थ में देखना दिखना समाप्त हो जाता है।
2:50
और द फोर्थ आप सहज में हो। वहां देखना, दिखना, जानना, जनाना ऐसा कुछ
2:59
नहीं है। होना भी नहीं है।
3:14
वहां मैं हूं। एग्जैक्ट
3:22
वह मैच करेगा बस मैं हूं से और किसी से मैच नहीं करेगा।
3:30
और हम उसको दूसरे से मैच करना चाहते हैं। करके डिफिकल्टी होती है। आप फाइनल ट्रुथ
3:36
को परमात्मा को या अस्तित्व को मैं हूं से टेली करो। तुरंत हो जाएगा क्योंकि वही है वो।
3:44
हम किसी और से कुछ और से उसको टेली करने का प्रयास करते हैं। इसलिए इतना
3:53
समय लगता है। अब मैं हूं किसी से टेली होगा नहीं।
4:05
क्योंकि वह मैं हूं ना। पिलाओ ना यार। ऐसे रखने का क्या मतलब?
4:15
मैं हूं किसी से टैली नहीं होता। इवन परमात्मा से
4:22
भी नहीं होता। और मैं हूं को मैं हूं से टैली की
4:29
आवश्यकता नहीं है क्योंकि वो मैं ही हूं।
4:41
प्रणाम चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम बहुत-बत सारा थैंक्स और प्यार बहुत सारा
4:50
प्यार बहुत-बहुत शुक्राना जो आपने दिया है उसका कोई मोल ही नहीं
4:58
दुनिया में कोई कंपैरिजन नहीं उसके लिए बहुत-बहुत थैंक्स इतना
5:12
प्रणाम थैंक यू सो मच सो मच
5:24
मैंने कुछ नहीं दिया है से
5:38
मैं दे दिया और इससे ऊपर तो कुछ है ही नहीं। मैं तो दे दिया।
5:47
वो तो स्वभाव है। वो दिया लिया नहीं जाता।
5:57
देने को बहुत सारी चीजें रहती है जीवन में
6:06
बट यह ना लिया जाता है ना लिया जाता है।
6:16
इसका केवल बोध होता है। पहचान हो जाती है कि मैं वही हूं।
6:25
प्राप्ति की प्राप्ति और इसकी पहचान होते ही
6:34
आपके सारे संशय गिर जाते हैं। सारे भ्रम
6:42
गिर जाते हैं। और एक अलौकिक शांति आपको घेरे रहती है। एक
6:51
दिव्यता एक पवित्रता
7:14
काश ये मैं किसी को दे सकता।
7:22
तो आप नहीं करवाओ। यानी
7:31
ये देने की वस्तु होती ना तो मैं कब का दे चुका होता।
7:40
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
7:42
एक बार हनुमान जी को भाव आया तो
7:49
उनको कुछ देना था तो उन्होंने अपने जिंदगी के सारे पुण्यों को
7:58
हर जन्म के और इस जन्म के भी पुण्य को दान कर दिया है।
8:06
दे दिया है। बगैर सोचे बगैर
8:16
कुछ इसके बदले मिलेगा और उन्होंने दे दिया बस प्रेम से भाव से
8:26
कि देने का ही एक आनंद होता है ना देना
8:33
प्राप्त करने से बड़ा आनंद होता है बहुत बड़ा आनंद होता है जो भी आप देते हो
8:46
तो हनुमान जी उसके बाद से फिर ज्ञान गुण सागर कहना कहलाने लगे
8:59
[गला साफ़ करने की आवाज़]
9:05
तो ये अलग ही दुनिया है। सुनो सुन सुना करो।
9:14
एक बार बोल लेते हो तो सुना करो। नहीं तो जो आ रहा है वो पता नहीं कहां चला जाएगा।
9:26
एक पेशेंस एक तरीका होता है
9:34
पूछने का और फिर चुप रहने का भी। हेलो
9:52
हां आगे बढ़ो। नेक्स्ट वो गया कहीं। बहुत नाजुक होता है। है ना?
10:05
इतनी लेयर्स है ना वह ढक जाती है चीज से। फिर उतली चीजें बोलना मेरे को पसंद नहीं
10:13
है। हां यानी फिर टेंपरेरी बोलना मेरे को पसंद नहीं।
10:21
मेरा ऐसा रहता है बताऊं तो कुछ सॉलिड ही बताओ।
10:26
नहीं तो बताने को तो पूरा एंटरटेनमेंट है।
10:40
हां यह लेनदेन की चीज नहीं है। इसको ख्याल रखना। यह तो तुम्हारा अधिकार है।
10:50
तुम खुद हो। तुम्हें तुमको कौन दे सकता है?
11:11
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
11:43
हां जी
11:50
[गहरी सांस लेने की आवाज़]
11:54
क्या लोग थे वो कभी उपनिषद पढ़े हो या कभी रामायण या कुछ उपनिषद में
12:04
प्रणाम करके बोलते हैं कि हे गुरुवर कृपा करके इसे बताइए।
12:14
कभी भवानी बोलती है वेदों में महादेव से हे देवों के देव इसका रहस्य
12:24
कृपा कीजिए और फिर साइलेंट
12:30
वो वो तरीका अलग ही होता है पूछने का एक एक अलग ही तरीका है वह तो जब वैसे पूछा
12:40
जाता है तो वैसा कुछ बताया जाता है और टेंपरेरी ऐसा पूछते हो तुम क्या देखते
12:50
हो आप क्या देखते हो वो तरीका लो है एकदम
12:56
वो एक ना ऐसा ही है
13:12
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
13:23
एक-एक लफ्ज एक-एक भाव भंगिमा एक तरीका और फिर चुप रहना
13:33
स्टैंडर्ड हो रे
14:29
आज
15:50
तुम्हारे चुप रहने की सीमा है। मेरे चुप रहने की सीमा नहीं है। याद रखना।
16:53
ओम
17:11
प्रणाम प्रभु हां प्रणाम
17:19
प्रभु जी एक घटना बताना चाहता हूं उसके कुछ अर्थ समझ पाया कुछ नहीं समझ पाया
17:29
हम जैसे कि मान लो कमरे में मैं था
17:38
और पहले क्या था जब सब कुछ नॉर्मल था तब तो आराम से था सब कुछ पर जैसे ही लाइट चली गई तो थोड़ी गर्मी
17:47
हुई तो मैंने उस कमरे की खिड़की खोली तो उस खिड़की में से थोड़ी बहुत तो ठंडी
17:57
हवा आती रही और थोड़े टाइम तक तो अच्छा लगा पर फिर भी उस कमरे में गर्मी ज्यादा थी।
18:05
तो फिर मैंने गेट खोल के बाहर जाके बाहर चला गया।
18:13
तो बाहर तो बहुत ही अच्छा मौसम था। मतलब बहुत ही सही लगा। फिर अब जब अंदर आके बैठ
18:20
गया फिर कोई दिक्कत नहीं रही। मतलब मुझे जहां तक यह समझ में आया इस चीज
18:27
से कि जब तक तुम संसार में हो तब तक तो जब तुम संसार
18:35
में सब ठीक चल रहा होता तब तक कोई दिक्कत नहीं होती। जैसे ही कोई दिक्कत शुरू होती है तुम खिड़की खोलते हो तो मुझे जहां तक लगता है जो उन्होंने खिड़की खोली वो ध्यान
18:44
था। और जब ध्यान भी जब कुछ टाइम तक तो अच्छा
18:52
लगता है पर वह पूरी तरीके से तुम्हें सेटिस्फाई नहीं कर सकता तो तुम्हें एंड में गेट खोलना पड़ता है तो वो जो गेट खोल
19:01
के मैं बाहर गया तो वही मैं हूं और जब गेट खोल के मैं बाहर से अंदर आ जाता
19:09
हूं और फिर लेट जाता हूं तो अंदर आके भी कोई दिक्कत नहीं होती वही मेरे को लगता है वो सहज जो अवस्था थी
19:18
तो मेरा यह मानना ये जानना चाहता हूं कि जो वो अंदर बाहर जा रहा है
19:25
तो वो मैं क्या बॉडी तो नहीं मान रहा मैं उस चीज को मुझे इस चीज में थोड़ी वो है कि वो एक स्पेस वो मैं हूं है या जो जो बॉडी
19:34
अंदर वो जो जो बाहर अंदर आ रही है वो
19:43
हम हिस्टोरिकल आपने बना लिया ये इतना विचार मत किया करो है ना
19:51
आने जाने वाला मन होता है मन के पीछे बॉडी आती जाती है
20:00
और मैं ना आता ना जाता है ना
20:08
मैं ना कमरे में ना खिड़की ना बाहर
20:15
मैं की कोई कैटेगरी नहीं है कि मैं यहां था और वह यह सब मैं के भीतर है। है ना?
20:24
यह सब मैं के भीतर है। यह बाहर यह कमरा और यह खिड़की
20:33
और कमरे के भीतर एक बॉडी है। उसके अंदर एक बुद्धि है। जिसने यह विचार किया। है ना?
20:46
यह सब भीतर है मैं के यह अननेसेसरी के कैलकुलेशन मत बैठाया करो
20:54
मैं हूं बस सिंपल है अपने होने का एहसास है ना उसमें कुछ है ही नहीं ये सब
21:04
खिड़की और बाहर और हवा ऐसा कुछ नहीं
21:11
हमारा हमारा इंटरेस्ट यानी मन का इंटरेस्ट कहानियों में टेक्निकल चीजों में बैठालने
21:19
में चीजों को बहुत रहता है।
21:28
पूरी कहानियां किस्से हमको बहुत प्रिय होते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़]
21:46
लेकिन मैं कोई कहानी किस्सा नहीं हूं। है ना?
22:17
अब कहानी किस्सों में कई जन्म निकल जाते हैं। भी बता रहा हूं। गौतम बुद्ध ने इतनी कहानियां बता दी। ओशो
22:25
ने अभी इतनी कहानियां बता दी। 810 जन्म आराम से निकल जाता है आदमी का।
22:33
उसको पता भी नहीं चलेगा। वो मार्ग ही खोजता रहेगा। मंजिल वंजिल तो बहुत दूर की बात है
22:42
क्योंकि मन का प्रिय है। कहानियां और ये किस्से बहुत प्रिय है मन को।
22:52
कहानी के माध्यम से सत्य को बताया गया है। मन तो उसके सत्य तक आपको पहुंचने ही नहीं देता।
23:03
पहुंचने ही नहीं देता है। हां
23:10
कि मैं सोया था और फिर गर्मी मेरे को गर्मी लगी। फिर मैंने खिड़की खोली। फिर
23:18
मैं बाहर गया। सब में मैं है ना। सत्य तो सब में है ही। वहां मन को इंटरेस्ट नहीं
23:24
रहता। कि मैं सोया था। मैंने खिड़की खोली। मैं बाहर गया। मैं तो तीनों जगह है ना।
23:37
उसको मन को उसमें इंटरेस्ट नहीं है। ये अवस्था सहजा है। वो आत्मा वाला है। वो
23:44
दुनिया है। वहां पे भी किस्सा कहानी बना लेता है। वो हां
23:56
बहुत गहरी स्टोरी भी हैं। बट उसमें मन असली चीज को छोड़ ही देता है। मन त्याग कर
24:06
देता है सत्य का और फिर आपको दूसरी कहानी में ले जाता है कि हां यह कहानी में बड़ा आनंद आया।
24:14
अब ऐसे ही कुछ और खोजूं मैं दूसरी कहानियां।
24:21
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
24:24
तो मैं जैसे ओशो अगर बहुत पढ़ता था ना बचपन में तो आज जैन पर बोल रहे हैं आज बुद्धा पे आज महावीरा पे मीरा पे फिर वो
24:35
हर हर चीज में एक नया वर्ल्ड नया वर्ल्ड नए किस्से कहानियां
24:41
फिर कृष्णा पे फिर कई साल मैं 8आ घंटे सुनता ही रह गया
24:49
आनंद भी आता उसके बीच में सत्य भी उन्होंने बताया बट
24:57
वह तो निकल ही गया। वो नहीं पकड़ सकते। ओशो सन्यासी तो और नहीं पकड़ सकता
25:05
क्योंकि वो ओशो का सन्यासी है। ओशो ही उसके लिए ट्रैप हो गया है।
25:13
जो बेपर्दा हो सकता था वही पर्दा हो गया है। अभी क्योंकि अभी झाड़ने वाला नहीं है ना उनको
25:22
कोई वह अपने ही हिसाब से सोचेगा अभी ओशो तो है नहीं ओशो रहते तो झाड़ते वो अपने हिसाब से
25:31
अपने किस्से कहानी मेरे लिए यह सही यह मार्ग सही वो अपना ही चुन लेता है
25:41
मास्टर लाइफ होता है तो करेक्ट करता है झाड़ता है प्रेम भी करता है
25:48
इसलिए लाइव होना बहुत जरूरी है। तुम कहां पर अटक रहे हो और तुम अटक ही रहे हो?
25:58
हां, तुम अटक ही रहे हो। तभी तो यह सारे
26:04
संशय हैं, डाउट हैं।
26:25
तो अभी जैसे मैंने अपने बारे में बताया ना कि मैं मैंने यह गलती की है। मेरे साथ ऐसा हुआ।
26:32
मन इसको भी कहानी बना लेता है। इसमें भी फिर आप सोचोगे अपने ढंग से कि
26:39
हां ऐसा मैं नहीं करूंगा। ऐसा करूंगा।
26:43
[हंसी]
26:44
मन मतलब समझ रहे हो?
26:47
जैसे शतरंज में अच्छे से अच्छा प्लेयर सामने वाले और अपने की पांच चालों का ख्याल रखता है। आने वाली पांच चालों का
26:56
और बहुत जीनियस है तो 1520 चालों का भी ख्याल रखता है आगे।
27:06
सुपर कंप्यूटर मैक्सिमम 100 चालों का आगे का ख्याल रखता होगा।
27:14
मन करोड़ों चालों से चलता है। क्यों चलता है?
27:24
क्यों चलता है?
27:30
क्योंकि आप चाहते हो चले। आपने ही माना है ना खुद को कुछ।
27:37
उसी का नाम तो मन है।
27:54
तो मैं जैसे ओशो को पढ़ा किस्से कहानी में मन मेरे को उलझाया उलझाया उलझाया ओशो ने सत्य
28:01
बताया है ओशो की कोई गलती नहीं है वो मेरा फौल्ट है ना कि मैं कैच नहीं कर पाया
28:10
अब मैं महर्षि मुक्त को पढ़ा। वह डायरेक्ट वेदांत बोल रहे हैं और टिपिकल लैंग्वेज है।
28:17
थोड़ा वैदिक है और उसमें मन बोर हो जाता है। मन वहां टिकने नहीं देता।
28:26
जो स्ट्रेट सत्य है ना डायरेक्ट घी है। वहां ऐसा नहीं है कि दूध फिर मक्खन, दही
28:33
फिर बाद में घी जो भी होता है प्रोसेस वह डायरेक्ट घी है।
28:39
उसमें मन आपको बोर कर देगा। यह क्या मैं हूं मैं हूं यार। समझ रहे हो?
28:49
जब देखो भाई मैं हूं मैं हूं। ये बोकस है। बोरिंग है। उसमें मैं 15 साल खराब किया।
29:00
जहां मेरे को इंटरेस्ट लेना था वहां मैं बोर हो रहा था।
29:06
[हंसी]
29:07
[अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]
29:08
यानी अजीब जिंदगी है ये।
29:15
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
29:19
तो इस बार जो मैं आया हूं तो इन दोनों का कॉम्बिनेशन आया हूं।
29:25
तो मेरे साथ आप लोग को रस प्रेम भी आएगा। सत्य का भी पता चलेगा
29:36
ताकि यह दोनों का मैचिंग हो जाए कुछ ऐसा कि आप एंटरटेनमेंट में भी मत जाओ और आपको
29:44
सत्य भी रसपूर्ण लगे आनंदित लगे।
30:06
क्योंकि आत्मा वाला मन की चाल को चलने ही नहीं देता है। पहली ही चाल चलने नहीं देता
30:12
उसको। करोड़ों चाल को तो साइड करो। वो तो पहली ही नहीं चल पाया तो आगे की कैसे चलेगा?
30:22
ना अपने मन की चलने देता है ना तुम्हारे मन की चलने देता है। स्टॉप
30:32
वो ऐसे ही गायब मन
30:45
डायरेक्ट आत्मा को बताने वाला मास्टर असंभव है। मिलता ही नहीं है।
30:53
मास्टर ही नहीं मिलता है। आत्मा को बताने वाला डायरेक्ट तो भूल जाओ। लखाने वाला तो भूल जाओ।
31:06
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
31:13
हर मास्टर को आप उसके मरने के बाद ही पहचान पाते हो।
31:24
आपका मन ढकता ही रहेगा। ढकता ही रहेगा। सामने भी रहेगा ना वह ढकेगा, ढकेगा। हजार बार
31:32
बहुत कम लोग पहचान पाते हैं। जीते जी लाइव
31:39
मरने के बाद ही आप पहचान पाते हो। या तो बहुत लंबा गैप
31:46
हो जाता है 15 20 साल का तब
32:05
और कई बार तो लोग मरने के बाद भी नहीं पहचान पाते। आज ओशो को आज भी कई लोग नहीं पहचान पाते।
32:13
महर्षि मुक्त को नहीं पहचान पाते।
32:22
तो यह सब चलता रहता है। असली जो बात है डायरेक्ट
32:31
वहां आपका इंटरेस्ट होना चाहिए।
33:09
कोई भी कहानी हो हमेशा याद याद रखना कोई भी अच्छे से अच्छी कहानी हो
33:18
कहानी सुनने वाला सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट है
33:26
या कहानी पढ़ने वाला सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट कहानी से भी ज्यादा
33:35
रामायण जो पढ़ रहा है वो पढ़ने वाला राम गीता जो सुन रहा है सुनने वाला कृष्ण
33:45
शिव महिमा को जो गा रहा है वो गाने वाला वो इंपॉर्टेंट है।
33:55
कभी भी इसलिए बोलता हूं लक्ष्य को मत भूला करो। मैं आत्मा भगवान लक्ष्य
34:04
कभी नहीं भूलना। हम
34:20
हम
34:56
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
35:30
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
35:46
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
36:28
हां जी
36:44
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
36:51
प्रणाम
37:14
हां गोविंद जी यार क्या कुछ बता नहीं रहे हो यार हम्।
37:27
हम् आवाज ही नहीं आ रही आपकी। इधर आओ।
37:37
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
37:37
मैं बैठो ना। हां अब बताओ।
37:51
मेरे सामने बुद्धि काम नहीं करती। इन लोग की तो करती है कि नहीं करती? नहीं करती।
38:04
हृदय रहता है। अच्छी बात है।
38:14
तब तो मेरे पास हो। और मेरे पास भी अगर बुद्धि काम कर रही है
38:20
तो आप कहीं और हो। मेरे पास जो भी बैठा है उसका मन बुद्धि
38:27
चलेगा ही नहीं। तब समझ जाना कि आप मेरे पास हो।
38:35
एक्चुअल में हो। और चल रहा है तो आपका शरीर यहां है और आप
38:43
कहीं और
38:48
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
38:50
कई लोग का इसमें भी काम नहीं करता है। मन बुद्धि यह क्या बोलते हो ये वीडियो जो
38:57
कॉलिंग है उसमें भी कई लोग का नहीं करता है। वो लोग भी मेरे पास है।
39:04
मैं उनके पास हूं।
39:19
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
39:26
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
39:37
प्रेम प्रणाम गुरु जी प्रेम प्रणाम। मेरी आवाज आ रही है?
39:44
हां आपका चेहरा नहीं दिख रहा है। आवाज आ रही है। ओके। वो यहां से नहीं हो रहा है मुझसे।
39:53
हां बताइए। पहले तो आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
40:00
मैं आपको लगभग एक बरस से सुन रही हूं और
40:06
आपकी तरह बहुत ओसो से चाह थी और अभी भी है
40:12
लेकिन ओसो को इतना सुना कि आपको जब सुना कि आप ओसो के बारे में जो वो बोले हैं तो
40:20
बिल्कुल ऐसा लगा कि आपने जो बोल रहे थे वो मेरी बात थी ऐसा फिर
40:28
आपको सुनते सुनते वो एक दिन गुरु ज्ञान आर भाव जी आए थे आपके आश्रम पर तो मैंने उसको
40:37
भी लाइव सुना था तो तब वो उसने जो बोला ना एक क्षण में हम
40:44
वो हो जाते हैं खुली आंख से कि हम किसी भी चीज को देखते हैं तो जो आंख
40:54
से हम वह जो चेतना है उसका प्रकाश वह बोध प्रकाश है वह मुझे रियलाइज हो गया
41:04
और तब से मैं दो महीने हो गए इस बात को मैं आपसे बात करना चाहती थी लेकिन आज मौका
41:12
मिल गया तो तब से ऐसे सब कुछ देखती हूं एक एक क्षण जी रही हूं कोई पास्ट नहीं है कोई
41:20
फ्यूचर नहीं है और यह पूरा चेतना का आकाश जो है ना वो दिख रहा है जैसे माया तो
41:28
बिल्कुल ऐसा ऐसा जैसे कोई सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट कुछ है ही नहीं। ऐसा कोई फिजिकल
41:36
बॉडी कि कोई वृक्ष है कि जिसको भी देखती हूं वो मुझे ऐसा लगता है कि मैं वही हो
41:44
जाती हूं। हम हम और मैं वहां ऐसे प्रकाश से पहुंचती हूं और
41:52
विध विदिन अ सेकंड और टाइम भी नहीं लगता और बिल्कुल मुझे वह ज्ञान हो जाता है एक
41:59
सेकंड के 10वें भाग में जैसे मैंने वह चांद को देखा तो मुझे रियलाइज हो गया कि
42:05
यह चांद है। यह तो उसमें ज्ञान भरा हुआ है उस प्रकाश में जो हमें सब कुछ ज्ञान
42:15
उस चेतना से जब से कनेक्शन हो गया तब से सर वो इतना वो क्या जैसे आपको कोई भी
42:23
क्वेश्चन का आंसर किसी को किसी भी को आप ऑनलाइन देते हैं तो आपका और मेरा आंसर भी तब से
42:31
एक ही हो रहा है। ऐसा हो रहा है। आप आज मेरी इच्छा है कि आप मुझे एक दो क्वेश्चन पूछे।
42:39
मैं जैसे मेरे जैसे गुरु जी परीक्षा करते हैं आप भी करें। मेरी ऐसी ही मेरी इच्छा है। कुछ पूछे मुझसे कि क्या मैं वो आंसर
42:48
ऐसा कर पाती हूं मेरी समझ से कि नहीं ऐसा
42:56
सर आपसे मिलने को और गुरु ज्ञानवीर पाव जी के चरणों को एक बार प्रणाम करने को बहुत
43:03
जी चाहता है। मैं गुजरात राजकोट से हूं। हम हम लेकिन अभी बच्चे थोड़े छोटे हैं तो चाहती
43:11
हूं कि वेकेशन में भी जो ट्राई करती हूं पहुंच जाऊं तो वरना ऐसे भी बहुत आनंद है
43:19
और बहुत ये जो वो होता है ना अलगाव मुझसे कुछ अलग ऐसा वो बिल्कुल निकल गया
43:27
जैसे ये पूरा जो है ना वो वो एक हो गया कुछ अलग से नहीं दिखता और अगर अलग है भी
43:36
तो वह सिर्फ हमें खेलने के लिए है। ऐसे प्ले करने के लिए है। ऐसा लगता है।
43:46
और कुछ नहीं है। बहुत ये बहुत अमेजिंग है। क्या मैं इसको बोलूं कि ये आपको बहुत-बहुत
43:55
धन्यवाद गुरु ज्ञान आविर्भाव को। मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। आप बोल देना।
44:03
ना आप उनको सुनो उनका भी चैनल वगैरह है अच्छा और उनको सुना करो जो भी क्लियरिटी आपको
44:12
उनसे आई है ना हां हां उनको आप सुना कीजिए है ना हां हां
44:20
अच्छा सर आप मुझे आप आप क्वेश्चन पूछेंगे नहीं
44:32
ऐसे ही कुछ कुछ भी आप जो सत्संग करते हैं उसके बारे में कि
44:40
मैं आपको सुनती हूं और गुरु ज्ञान आर भाऊ जी को भी सुनती हूं। कभी-कभी ओसो को भी अभी भी सुन लेती हूं। ओसो को मैंने बहुत
44:49
सुना आपकी तरह ऐसे ऐसे प्यार किया कि क्या बोलते हैं ना गोदी में वो मुझे भी वो बहुत
44:56
महसूस हुआ। हम पोसो का प्यार और मुझे तो आपको जब से देखा आपसे जब से
45:06
आपको सुनने लगी आप में भी मुझे वो ओसो ही दिखते हैं। मुझे लगता है कि आप ही ओसो है।
45:13
मैं भी ओसो हूं। सब ये सब एक ही है।
45:22
बहुत-बहुत धन्यवाद। सुंदर है। अच्छा है। बहुत ही अच्छा है। है ना? आपकी कृपा सब
45:32
गुरु कृपा बहुत ज्यादा है। बहुत ज्यादा जैसे मैं उसको क्या शब्दों में नहीं ऐसे
45:41
बोल सकती लेकिन बहुत ज्यादा है। बहुत आपका प्रेम ना मुझे बहुत महसूस होता
45:48
है सर। बहुत वो क्या ऐसे वह सब फीलिंग है और महसूस
45:56
होता है बहुत ही बहुत-बहुत धन्यवाद
46:05
अच्छा प्रेम प्रणाम प्रेम प्रणाम
46:13
चालू रहना तुमको बंद क्यों कर रहे हो
46:22
आप जो प्रेम के बारे में बोलते हैं ना वो सुनना बहुत अच्छा लगता है। बहुत
46:30
एक भक्त और भगवान के बारे में आप जो बोलते हैं ना बहुत अच्छा लगता है।
46:39
ऐसा लगता है कि बस वो सुनने में इतना आनंद है कि और कोई चाह ही नहीं कि और कुछ ऐसा
46:47
होता ही नहीं। अभी अभी तो ऐसा अचार जैसा हो गया है। मन बिल्कुल खाली हो गया। कुछ
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चाहिए ही नहीं। बस सत्संग मिल जाए गुरु जी का और घड़ी दो घड़ी की ये प्रेम की बातें
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बहुत अच्छी लगती है। अच्छा है। बहुत सुंदर है। सही जा रहे हो। है ना?
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सर मुझे ऐसा ऐसा ऐसा जैसे आपके आश्रम में आके आपके चरणों में ऐसे बैठी रहूं। ऐसी
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बहुत इच्छा है [हंसी]
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एक ही इच्छा है वो जैसे सबरी क्या वो
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जब भी आइए मोस्ट वेलकम है आपकी कृपा
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आज
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सर ओसो की यात्रा बिल्कुल आप जैसी रही। मैं एक लेडीज हूं फिर भी इतना प्रेम करती
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थी हर एक को बोलती थी सुनो सुनो सुनो इसको सुनो। तो मुझे भी बहुत बदनामी सहनी पड़ी और यह वो
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लोग ना क्या होता है बहुत वो आपको जब सुनती थी तो ऐसा लगता था कि जैसे मेरी
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स्टोरी आप बोल रहे हैं ऐसा लगता था। फिर आपको सुनना
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भी इसलिए स्टार्ट किया कि चलो सुनते हैं।
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और बहुत आज आज दो महीने हो गए लेकिन पूरा खाली हो गया है सब कुछ जैसा कुछ है ही
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नहीं कुछ सब प्लेन हो गया है हम हम
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कुछ कुछ है ही नहीं जैसे ये सब कुछ गिरा हुआ है ऐसे दरिया की तरह मुझे और मैं
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उसमें हूं उस प्रेम के सागर में जैसे ऐसा फील होता है बैठे-बैठे खुली आंख से कोई
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साधना ऐसे कोई बैठ के कुछ नहीं किया तब मुझे ऐसा लगा कि गुरु कृपा से एक क्षण
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में पहले एक बार ही हुआ एक क्षण में फिर मैंने उसको ऐसे बैठ के उसका अभ्यास किया
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तो मुझे वो परमानेंट अभी ऐसे ही रहती हूं मैं बस ऐसे देखती रहती देती हूं तो जैसे
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सब कुछ है लेकिन कुछ भी नहीं है। हम हम ऐसा
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और जो भी अभी दिख रहा है वो माया है और वो वहां पर वो सबकी चाह से वो होता है। कुछ
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भी जो है यहां पर एग्जिट वो चाह से है।
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किसी किसी की कोई चाह है तो यह सब एकिस्टेंस है ऐसा लगता है।
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बाकी तो सब सब है बस उसमें हूं बस सब बहुत अच्छा है और क्या यह यह सब कुछ देखती हूं
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ना दुनिया का तो ऐसे जैसे रास लीला चल रही है ऐसा लगता है पहले बहुत दुखी हो जाती थी
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देख देख के अभी क्या संसार में है दो बच्चे हैं
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परिवार है तो पहले बहुत पारिवारिक और ये सब होता था तो बहुत हमें स्ट्रेस अभी तो ऐसे लीला जैसे लग रहा है कि सब खेल है और
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दूसरा जो है वह खेलने के लिए है
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नहीं अच्छा है बहुत सुंदर है आनंद में रहिए और बहुत अच्छा है
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आपकी कृपा आपकी कृपा है सब आपकी कृपा कृ मैं रियली मेरे क्या बोलूं क्या आपकी कृपा
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ही है यह और कुछ नहीं मेरी कोई कृपा नहीं है इसमें आपकी रिसर्च
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है आपने इतना ओशो को सुना और फिर उनको सुना ज्ञानवीर भाव जी को या जो
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भी आपको क्लिक हुआ वो वो आपकी रिसर्च है आपकी प्यास है बहुत
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सुंदर सुंदर फिर भी एक क्या वो लाइव गुरु का सानिध्य
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तो सबसे ऊपर है ऐसा लगता है कि परमात्मा क्या वो पता तो नहीं लेकिन गुरु का जो
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सानिध्य है वो सबसे ऊंचा है सबसे अच्छा है मींस वो इतना अच्छा लगता है
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कि और आप प्रेम की जो बात करते हैं ना वो तो
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बिल्कुल मैं पागल हो जाती हूं। आपको सुनते सुनुनते ऐसे कभी-कभी मैं झूमने
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लगती हूं नाचती हूं ऐसे बहुत अच्छा लगता है सर। सुनो अभी और है ना?
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हां जी। हां जी। हां अभी नहीं सुना है आपने मेरे को ढंग से और सुनो।
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बाकी बहुत सही जा रहे हो। बहुत सुंदर है। थैंक यू। थैंक यू।
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हां जी। प्रेम प्रणाम। प्रणाम जी। बहुत-बहुत धन्यवाद।
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क्या नाम प्रभु?
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हां प्रणाम जी आत्म निष्ठा महान बनाइए प्रभु
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हां सफर तय करवाइए अच्छा
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क्या नाम है आपका?
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ज्योति ज्योति जी
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दो लाइंस बोल दूं पहले आपके लिए हां बताइए मन गुनगुना रहा है अंदर से आपके लिए सुबह
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उठती हूं तो आपको अपने पास सबसे पहले आपको अपने साथ लेती हूं और ऐसे लगते कि एक
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कंप्लीटनेस आ गई है। चाहे मैं अब तक मैं को प्राप्त नहीं कर पाई हूं लेकिन मैं से
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मिलवाने वाले को प्राप्त कर चुकी हूं। तो अगर मैं से मिलवाने वाले को प्राप्त कर चुकी हूं तो मैं भी जल्दी मिल जाएगी। मेरे
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को विश्वास है। हम तो मेरे इस विश्वास की लाज रखिएगा।
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अच्छा की कृपा
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मोहे करो ऐसी
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कृपा मोहे करो संत [गाना गाने की आवाज़]
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चरण हमारो माथा
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संत है चले हमारो माथा
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नैना दरसन [गाना गाने की आवाज़]
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भयो ऐसी कृपा [गाना गाने की आवाज़]
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करो