0:16
पूछ लेता हूं हम हम मतलब मैं सहजता से जो आता है फिर वो सोचने में पढ़ता हूं तो सहजता छूटती है हम
0:23
तो मैं चूज़ तो सहजता ही करता हूं हां हां लो हाई के बारे में नहीं सोचता तो आप बोलते हो कि ये लो तरीका है तो अगर तरीके
0:33
में जाता हूं हम हम तो सहजता वाला वो मिस होती है मिस होती है ठीक है।
0:44
हां ठीक है। तो सहजता होनी चाहिए कि तरीका होना चाहिए?
0:51
जब प्रेम होता है ना तो दोनों होता है। तरीका भी होता है और सहजता भी होती है।
0:59
और जब अहंकार होता है तो हमेशा एक मिसिंग होता है।
1:06
ये पूछने का तरीका भी आपका लो है। है ना?
1:15
ये बहुत नाजुक है ना? बहुत नाजुक है। बहुत ज्यादा नाजुक है।
1:26
तो देर लगने का मुख्य कारण यही है कि हम उस तरीके से नहीं पूछ पाते या उस
1:35
तरीके से हम सामने नहीं बैठ पाते। एकदम खाली होके
1:45
रिक्त होके और प्रेमपूर्ण भी
1:57
देरी इसी को सीखने में लगती है। बस
2:03
सरलता और वो प्रेमपूर्ण वो तरीका
2:10
वो एक लवेबल ढंग है पूछने का
2:18
या सामने बैठने का
2:32
जैसे पहाड़ों के नीचे वैली अपने आप होती है ना
2:39
वो रिसेप्टिविटी वो एकदम खाली
2:47
अपने आप से भी खाली जिसको हम अपना आप समझते हैं।
3:11
उसी में समय लगता है। बाकी सत्य में या स्वयं में उसके बोध के
3:20
लिए समय नहीं लगता। सर
3:54
तो एक मास्टर अपने डिसाइपल को सिखाता है ना कि देख मैं रात को आऊंगा।
4:05
और मारूंगा तेरे को डंडा। तेरे को सजग रहना है। है ना?
4:16
और कब आऊंगा यह फिक्स नहीं है। तो अब वह सजग रहता है। कब आ जाए मास्टर
4:25
पता नहीं। अब नींद तो आ ही जाती है। मारता है डंडा।
4:31
कई दिन तक वह डंडा खाता है। फिर
4:41
वो दिन आ जाता है कि उसको पता चल जाता है मेरे मास्टर आ गए।
4:50
वो आंख खोल देता है।
5:01
बट यह पता चलते तक उसको बहुत डंडे खाने पड़ते हैं
5:07
और उसको स्वीकार करना पड़ता है हां उसमें ईगो वाली बात नहीं होनी चाहिए
5:16
कि मेरे को ऐसा क्यों बोल दिए या वो क्यों बोल दिए
5:33
ऐसा मास्टर उसको सजग करता है एक-एक विचार के प्रति। है ना?
5:46
फिर वह क्या सोचता है मालूम?
5:52
डिसाइपल मास्टर बैठे रहते हैं। फिर वह अपने मन में सोचता है कि
6:01
इस बार मैं ना किसी पेड़ में बैठ जाऊंगा मास्टर को मारने के लिए।
6:08
देखता हूं उसको पता चलता है कि नहीं चलता।
6:18
मास्टर उसी समय रुक जाता है। ऐसा मत सोच भाई।
6:28
भूल के ऐसा मत करना। तुरंत उसको रोक देता है।
6:42
तो ऐसा जैन स्टोरियां हैं। बहुत लंबी स्टोरी है ये। मेरे को शॉर्ट में जो ख्याल आया मैं बताया।
6:56
तुम तो इतने में ही सोचने लग गए
7:01
सोचना नहीं है जैसे मैंने कुछ हम
7:10
हम तो क्या था वो मैं बताया ना क्या नहीं था
7:19
उसमें में और क्या था? हां हां हां
7:36
तो बहुत नाजुक मामला रहता है। है ना? बहुत नाजुक मामला रहता है।
7:50
पानी
8:06
माइक दो इनको जैसे आपने बताया सहजता से बताया जाता है
8:16
सहजता से पूछा जाता है और वह भाव से जो पूछा जाता है हम एक जो तरीका होता है पूछने का अपने आप को
8:25
बयां करने का अगर वो सहज रहता है जब भी हम तब उसका जो उत्तर आता है या जो बताया जाता
8:32
है वो भी सहजता से ग्रहण होता है यस नहीं तो अगर वह तरीका नहीं है वह भाव नहीं है
8:40
तो फिर जो सही बताया जाता है तो भी वह ग्रहण नहीं होता ग्रहण नहीं होता क्योंकि वह ब्लॉक हो जाता
8:46
है एक हां कि आप तरल नहीं हो आप अपने को पकड़ के कुछ ईगो से पूछ रहे हो हम तो
8:57
चीजें जो होनी चाहिए वो नहीं होती उस पर देखो एक्चुअल सहज होना यानी आत्मा में
9:04
होना है और आत्मा में होना यानी प्रेम में होना है
9:11
ना ज्ञान में होना वहां से जब कुछ पूछा जाता है तो वहीं से कुछ बता दिया जाता है
9:22
क्योंकि जो पूछा जाता है उसका मूल्य है ही नहीं कहां से पूछा जा रहा है उसका मूल्य
9:33
और कहां से बताया जा रहा है उसका मूल्य
9:44
और वही अमूल्य आपका होना।
9:50
बाकी में कोई दम नहीं।
10:10
तो मैं बताया ना समय उसी में लगता है कि आप कैसे बैठते हो मास्टर के सामने
10:19
खाली होके अपनी मान्यताओं से अपनी धारणाओं से अपने ईगो से
10:27
और एक प्यार का फूल लिए वो राइट वे है
10:36
तब कुछ अलग आनंद आता है बताने में पूछने में भी एक आनंद है और बताने में भी
10:44
एक आनंद आप रिक्त भी हो और एक फूल लिए हुए भी हो
10:51
एक प्रेम का फूल
11:25
हां जी चाय आई क्या हमारी?
11:36
पानी थोड़ा दे दो।
11:49
हम हम
12:15
मतलब जैसे नारायण की मूर्ति है, राम की मूर्ति है, शिवलिंग है। आप कैसे बैठते हो उसके सामने?
12:29
क्या तरीका होता है बैठने का? झुकते हो, एक फूल ले जाते हो, चढ़ाते हो, है ना?
12:38
मूर्ति में और नारायण ही बैठे हो तो सामने तो आप कैसे बैठोगे?
12:48
कैसे पूछोगे?
12:52
जैसे शिव से आप टॉक कर रहे हो तो कैसे पूछोगे?
13:00
तो वो वैसा पूछने वाला
13:08
ही शिष्य होता है। एक्चुअल वैसा पूछने वाला रियल डिसाइपल
13:21
और ऐसा शिष्य सबसे कीमती है। ऐसा भक्त बोल लो, शिष्य बोल लो
13:30
वो सबसे कीमती है। ऐसा कोई शिष्य मिलता है ना तब कृष्ण बोलते
13:40
हैं उद्धव से कि तू अपने पैर की धुली को मेरे माथे में लगा दे मैं ठीक हो जाऊंगा। है ना?
13:50
तो उद्धव बोलता है मेरा तो समझ ही नहीं आ रहा है। आप मेरे सर्वस्व हो
13:59
और आप ये क्या कर कह रहे हो ये मैं सोच भी नहीं सकता।
14:08
फिर वह रोते हैं कृष्ण और फिर उसको उद्धव को भेज देते हैं वृंदावन।
14:31
तो बहुत रहस्य होता है तो हम लोग क्या एक ही कैटेगरी से सोचते
14:40
हैं गुरु श्रेष्ठ है और भगवान ही श्रेष्ठ है ना ऐसा डिसाइड पल
14:47
और श्रेष्ठ होता है। ऐसा भक्त और श्रेष्ठ होता है कि अवतार को
14:54
भी बोलना पड़ता है कि उसके चरणों की धोली को मेरे को अपने माथे में लगाना है।
15:03
ऐसा भी होता है। यहां उल्टा पुल्टा होता है।
15:10
राम जब बोलते हैं हनुमान को कि कपि तुमसे उण हम नाही
15:20
समझ रहे हो भगवान बोल रहे हैं कपि तुमसे उण
15:28
हम ना सारे राम काज हनुमान जी कैसे कर देते हैं?
15:44
सीता जी को अंगूठी देकर आना है,
15:48
पहाड़ उठाकर लाना है या जो भी है।
15:53
राम को कहना पड़ा कि कभी तुमसे उण हम नाही
16:03
ऐसा भी होता है कि गुरु शिष्य को कहे कि तुमसे ऋण हम नाही
16:11
आप बोलते हो ना हम आपका ऋण कैसे चुकाएंगे उल्टा भी होता है भैया
16:17
बट वो रेयर क्वालिटी ऑलमोस्ट गिने चुने लोगों में ही आती है।
16:25
बस मेरे को क्वांटिटी थोड़ी सी बढ़ानी है। ज्यादा नहीं थोड़ी सी थोड़ी भी बढ़ गई तो
16:33
बहुत बढ़ गई। है ना?
16:37
क्योंकि मेरा माथा छोटा सा है। और धुली भी थोड़ी सी लगेगी। है ना?
16:53
तो बहुत कुछ होता है इस जीवन में। अद्भुत है यह जीवन।
17:43
हां जी तो कभी तुमसे ऋण हम ना
18:25
हम और बताइए कोई है?
18:38
आप लोग क्या एक तरफ प्रेम जानते हो आपका गुरु के प्रति गुरु का शिष्य के प्रति
18:45
क्या प्रेम है वो बड़ा मुश्किल है जान पाना बहुत गहरा होता है आप सोच ही नहीं सकते
18:53
कल्पना भी नहीं कर सकते बहुत गहरा होता है
19:44
मेरे जीवन में भी कुछ लोग हैं जो
19:50
वक्त आने पर मैं ये लाइन कहूंगा कि तुमसे उण हम ना
19:57
है अभी है मेरे जीवन में अब वहां कोई लेनदेन नहीं है, वह नहीं है।
20:04
ये वो एक अलग लैंग्वेज है आत्मज्ञान की। फिर भी एक लैंग्वेज होती है। है ना? और राम जी भी कुछ बोलते हैं। शिव
20:13
जी भी बोलते हैं। हनुमान जी भी बोलते हैं। अब सब एक ही है। अब क्या बोले? ऐसा थोड़ी ना होता है। है ना? मौन समाधि लगा लिए
20:22
खत्म। ऐसा तो नहीं है ना। फिर भी कुछ कहा जाता है। कुछ सुना जाता है।
20:29
उस तल से
21:25
मतलब गुरु क्या होता है मालूम तुम अपने पाप और अपनी बुराई के साथ तुम
21:33
खुद खड़े नहीं रह सकते। गुरु तुम्हारे साथ खड़ा रहता है।
21:42
तुम गलत करते हो तो भी, पाप कर दिए हो तो भी या कुछ भी कर दिए हो तो भी। तुम नहीं
21:48
खड़े रह सकते। मास्टर खड़ा रहता है। अरे कोई बात नहीं। अब मत करना गलती।
21:58
मतलब बहुत विराट चीज होती है मास्टर।
22:17
वह तो इवन देखता तक नहीं है गलतियों को। क्या तू पास्ट में जी रहा है क्या? ऐसा
22:24
हटा देता है बस।
23:11
आज यस एनीबडी है कोई
23:21
इस जहां में क्या हाल है भक्ति मां?
23:32
हां जी।
23:45
वो नाराज होकर गई तो आज दो महीने बाद आ रही है। ना लेकिन उसने जो लास्ट मंथ का सत्संग जो
23:54
खोया है आपने भी और इसने भी आपका तो एक रीजन था तबीयत खराब थी मां की
24:02
उसका तो वो पता नहीं किन हजारों जन्मों के बाद वो
24:13
निकलता है निकलेगा और आपको ग्रहण होगा उसका कोई
24:18
वो ही नहीं है दायरा ही नहीं अब सोच ही नहीं सकते
24:34
तो कभी भी नाराजगी को हमारे बीच आने नहीं देना समझ रहे हो बहुत छोटी चीज होती है नाराजगी
24:41
तुच्छ होती है
24:49
और मेरा रोल है ना मारपीट कुटाई प्रेम क्या करें रोली वैसा है
25:14
पर अभी तो मैंने नींद में डंडे भी नहीं मारे हैं। कम से कम सोने देता हूं। उतना बहुत बड़ी
25:24
बात है यार। हां। अच्छे से सोते हो। बढ़िया नाचते भी हो मेरे साथ।
25:34
साधना की यातना भी नहीं देता। साधना यानी यातना है।
25:42
साधना की यातना भी नहीं देता। हंसते हंसते कुछ बता देता हूं।
25:50
नहीं तो जैन मास्टर क्या करते थे? दो साल तू यह पीसते रह गेहूं को बस। दो साल तू
26:00
दीवाल को देखते रह। किसी को खिड़की से उठा के फेंक देते थे। दो साल तक उससे कुछ कराते थे। फिर एक लाइन
26:08
बोलते थे। समझ रहे हो?
26:14
फिर अगले दो साल के बाद दूसरी लाइन बोलते थे। 25 लाइन कोई मुश्किल से सुन पाता था और
26:24
उसका मरने का टाइम आ जाता था। और वह भी जो बोलते थे 25 लाइन पूरे जीवन
26:34
किसी डिसाइपल के जीवन में उससे गहरी लाइनें हैं जो मैं कह रहा हूं।
26:43
अभी उतनी कद्र नहीं है आपको। मैं जो कह रहा हूं उसकी गहराई का आप माप
26:50
ही नहीं सकते। हां। मैं कोई कंपटीशन नहीं कर रहा हूं कि मैं
27:00
उनसे हायर बोल रहा हूं। मैं हायर बोल रहा हूं ना यार। ऐसा है तो मैं क्या करूं? है तो है ना?
27:07
उन्होंने उस समय जो बोला वह भी सुंदर था।
27:17
25-50 लाइनें तो 1520 मिनट में हो जाती है।
27:26
हां।
27:38
क्योंकि मैं बोल रहा हूं और मैं सारे मास्टरों की तरफ से बोल रहा हूं। इकट्ठा होके हां सब इंक्लूड है मेरे में। सारे जैन,
27:51
सारे बुद्धाज, सारे ऋषि, सारे वेद,
27:55
शास्त्र, सारे अवतार सब इंक्लूड है। इकट्ठा बोला जा रहा है। हां।
28:05
तुम भी इसलिए इसका इंकार नहीं कर पाते। कोई नहीं कर पाता इसका इंकार। कोई मूड ही
28:12
करेगा।
28:21
और यह सहज में निकल रहा है। एकदम
28:43
तो राधा बोलती है उद्धव को कि उद्धव तुम्हारा ज्ञान अधूरा है। तुम्हारे ज्ञान में प्रेम नहीं है उद्धव।
28:51
तब उद्धव रहता है वहां कई समय वृंदावन में।
28:57
और तब उसके ज्ञान में प्रेम के फूल खिलते हैं। तब वापस जाता है गोविंद के पास।
29:05
पूरी स्टोरी है यह और फिर पैर छूता है कि आपने सिखाने
29:14
नहीं सीखने भेजा था। है ना? तो बहुत राज होते हैं।
29:51
हां
30:02
कम से कम 10 बार आपको उस बीच याद कियाऊंगा मैं उस महीने में क्या कब आ रहे हैं क्या
30:09
है कैसा है नो एक्सक्यूज नो
30:16
आपको पता ही नहीं है ना आप क्या चुके हो तो मैं इनको फोन करके बोला कि यार एक काम करो ना इसको सुन लेना जो भी वीडियो डल रहा
30:26
है कम से कम वहां सुन लेंगे वह भी नहीं सुनी है
30:33
नहीं सुनी हम
30:46
कोई बात नहीं फिर बरसेगा कहां जाएगा
31:11
जयदेव में वो क्वालिटी है। साक्षी में वो क्वालिटी है। साक्षी भाव में वो क्वालिटी है।
31:18
वह सुनने की वह रहते हैं ना वह एकद महीने मेरे साथ तो क्या से क्या हो जाता
31:25
क्या वो दुकानदारी कर रहा है जयदेव जी हमारे यार साक्षी जी मुंबई मुंबई खेल रही हैं हो गया
31:35
खेला हो ही जाता है फिर माया खेलती है फिर आप सोचते हो आप खेल रहे हो फिर माया
31:44
खेलती है पता ही नहीं चलने देते।
32:03
कब तक हम माया को भगवान बनाते रहेंगे? या कब तक हम माया को भगवान जनाते रहेंगे?
32:12
तुम पहले ही भगवान देश में रहो ना। माया बनने का मौका ही ना मिले। बात ही खत्म हो जाएगी। माया को आने ही क्यों देना?
32:23
पहले ही मैं आत्मा भगवान में रहो। बात ही खत्म हो जाएगी। आत्मनिष्ठ
32:32
हम कि मैं हूं बस।
33:37
इस दैहिक जीवन को ना बहुत लंबा मत समझो। समझ रहे हो?
33:44
यह ऐसा नहीं है कि बहुत लंबा है। और इस दैहिक जीवन में यह मिलन जो हो गया
33:54
है हम लोगों का और इसको अब ज्यादा खो मत।
34:03
हां।
34:24
क्योंकि सत्संग का हर पल
34:30
मास्टर के साथ बैठे रहने का हर एक पल हर हर एक पल
34:40
शाश्वत से ज्यादा होता है। भले इसका बोध आप लोग को अभी नहीं है बट
34:50
कालांतर में जरूर होगा। एक एक पल शाश्वत से ज्यादा होता है।
34:59
समय से ज्यादा होता है। मैं सहज में सबसे मिल लेता हूं। वह मेरी
35:10
तरफ से है ना। हां। मैं जैन मास्टर जैसा सताना नहीं
35:16
चाहता किसी को। वो मेरा प्रेम है।
36:15
हम हां जी कोई है?
36:25
चेंज करो तो इन लोग तो बोलते ही नहीं है यार खामोश वाले हैं सब समाधि वाले हैं सब
36:33
मोहब्बत वाला कोई है क्या
37:07
तो सालों से शबरी झाड़ू लगा रही है। वेट कर रही है राम का।
37:23
भरत को राम से ही दूर कर दिया गया है केवल एक छोटे से राज्य के लिए।
37:34
समझ रहे हो?
37:46
वह भी 14 साल
38:04
मैं उतना वेट नहीं कर कराना चाहता किसी को भी
38:21
उतना धैर्य आप रख भी लोगे बट मैं नहीं चाहता।
38:34
अहिल्या पत्थर बनके पड़ी ही रही। सब होता है बता रहा हूं।
38:41
हां जब तक राम के चरण ना पड़े वो जीवंत नहीं
38:48
हो सकती।
39:35
देखो बहुत डेलिकेट है। है ना?
39:54
वर्षों का इंतजार, जन्मों का इंतजार,
39:58
जन्मों की प्यास।
40:37
बहुत मास्टर्स होते हैं कि कई साल कुछ करवाते हैं आपसे। और 20 20 25 साल बाद वो फाइनल चैप्टर को
40:47
बताते हैं। होते हैं। सही बता रहा हूं। ये होता ही है।
40:55
की पॉइंट को बहुत रेयरली बताया जाता है।
41:02
ऐसा नहीं कि मास्टर में करुणा नहीं होती। बहुत होती है।
41:10
तुम में कदर नहीं होती है। जब सहज मिलता है ना तो कदर नहीं होती।
41:29
तो यह जो सहज में अमृत बह रहा है इसको बस पी लो।
41:37
उतर जाने दो अपने अंतरतम में।
42:05
अष्टावक्र तो जनक से कह पाए मैं तो देख ही नहीं रहा हूं। मेरे लिए तो
42:14
आप सब अष्टावक्र हो। जनक भी नहीं हो। नारायण ही हूं।
42:33
तो मेरी आंखों से अपने आप को देख लिया करो। तो आसान हो जाएगा।
42:45
अपनी आंखों से आप केवल अपना विचार भाव पाप पुण्य गलतियां
42:53
क्या-क्या देखते रहते हो? शरीर वरी जो तुम हो ही नहीं।
43:03
तुम क्या हो? मेरे से पूछो ना। मैं बताता है ना। मैं बताता क्या हो तुम?
43:13
एक्चुअल में तुम क्या हो?
44:07
तुम अपनी जिंदगी में कुछ भी खोज लो
44:17
श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ
44:24
पर वो तुमसे श्रेष्ठ नहीं होगा।
44:33
तुम कुछ भी पा लो कोई ध्यान, कोई समाधि कोई भी ध्यान
44:41
तुमसे गहरा नहीं हो सकता। कोई भी समाधि तुमसे ज्यादा स्थिर नहीं हो सकती।
45:04
कुछ भी खोज लो ना। परमात्मा खोज लो। जिसको तुम परमात्मा समझते हो वह भी खोज
45:12
लो।
45:33
तुमसे श्रेष्ठ कुछ नहीं हो सकता।
45:41
अपनी कद्र करना सीखो
45:55
कि ध्यान के स्वामी को ध्यान नहीं करना है। समाधि के मालिक को समाधि नहीं लगानी है।
46:09
शांति जिसकी छाया है उसको शांति में नहीं बैठना है। परमात्मा जिसका स्वभाव है उसको परमात्मा
46:18
नहीं खोजना है।
46:25
बस अपनी कदर अपने पर निष्ठा
46:42
तुम क्या हो मेरे से पूछो ना मैं बताता हूं ना
47:20
और तुम केवल सही ही नहीं हो। है ना?
47:27
गलत से बेहतर सही होता है। असत्य से बेहतर सत्य होता है।
47:33
बट जो मैं है ना वो सत्य से भी विराट होता है। सुंदर होता है, परे होता
47:41
है। तुम केवल सत्य ही बस नहीं हो।
47:52
सत्य से भी परे
48:01
सत्य तुमसे है। तुम सत्य से नहीं।
48:18
और अपने को छोड़ क्या खोज रहे हो?
48:33
ज्ञान खोजते हो। जानना पना तुम में जानना पना ही जानना पना है।
49:12
तुमको कुछ जानना नहीं है। तुमको पता है तुम जानने को भी जानते हो।
49:25
तुम जानने को भी जानते हो। जो जानने को भी जानता है उसको क्या जानना है?
49:37
हम कुछ नहीं जानते।
49:49
उसको भी जानते हो। और जानने को भी जानते हो
49:58
जो जानने को जानता है और उसको क्या जानना है यार परमात्मा को आप जानते हो जीव को जानते हो
50:07
अस्तित्व को व्यक्तित्व को वो तो जानते ही हो
50:13
कुछ नहीं जानते उसको भी जानते हो जानने को भी आप जानते हो कि यह जानना है।
50:24
यह ज्ञान है। उसका भी ज्ञान है। आपको तो क्या ज्ञान चाहिए और आपको?
50:36
जिसको ज्ञान का ज्ञान है। उसको कौन अज्ञानी कह सकता है?
50:45
पूरा चराचर ज्ञान स्वरूप है। अखंड ज्ञान। ज्ञान का ज्ञान है आपको यार
50:55
नाचते क्यों नहीं है सुन के
51:08
तुम कौन हो मेरे से पूछो ना
51:45
तुम प्रेम को खोजते हो। अरे तुम्हारे होने से प्रेम बहेगा ही।
51:55
तुम्हारा होना ही प्रेम है। तुम नहीं चाहोगे तो भी बहेगा।
52:02
असली प्रेम जिसका बहाव सहज होता है और आपसे बहता ही है। 24 घंटे आप क्रोध कर सकते हो। क्या बताओ?
52:18
घृणा कर सकते हो। 24 घंटे आप प्रेम में हो सकते हो ना।
52:25
यही बताता है कि आपका स्वभाव प्रेम है। आपको प्रेम में होने में कोई तकलीफ ही नहीं है।
52:32
और 24 घंटे फाइट कर सकते हो। 101 मिनट किए एक घंटा 2 घंटा किए फिर तीन
52:39
महीना करोगे ही नहीं। उसका जो पेन है ना उस फाइट का बोलोगे यार ये बेकार चीज है।
52:49
तुम्हारा स्वभाव ही प्रेम है यार। तुम जहां रहोगे प्रेम वहां रहेगा।
52:59
तुमको प्रेम पानावाना नहीं है। वह पाने वाला प्रेम ही मोह है कि दो तो कई गुना हो
53:06
के मिलता है। वो खतरनाक चीज है। ठीक है। समझ नहीं आता तो बांटता रहे बांटते रहे करो। वो भी ठीक है। है ना? वो एक डाउन
53:16
कैटेगरी है। अरे
53:22
तुम्हारा होना ही प्रेम का बटना है।
53:31
तुम बांट ही तो रहे हो अपने आप को प्रेम को
53:37
तुम्हारा होना ही प्रेम का बटना है और प्रेम का पाना भी
54:01
प्रेम गली अति सागरी जा में दो ना समाया अरे प्रेम कोई गली वली नहीं है
54:08
तुम्हारी आत्मा है जहां सब समा जाता है एक दो हजार अनंत
54:16
परमात्मा भी समा जाता है
54:27
कौन अपनी बाहों में इस आकाश को भर नहीं लेना चाहता? यह प्रेम नहीं तो और क्या है?
54:37
कौन अपनी आंखों से सितारों तक प्रेम को नहीं भेजता है? बताओ।
54:44
आपकी आंखें सितारों को देखती हैं और प्रेम वहां तक पहुंच जाता है। इतने दूर
54:53
लोक लोकांतर तक तुम यार कल्पना के भगवान से भी प्रेम कर
55:03
लेते हो। यही बताता है कि तुम्हारे अंदर प्रेम ही प्रेम है। और क्या बताऊं मैं?
55:16
वह तुम्हारा लबालब स्वभाव है प्रेम। हां।
55:23
और तुम वो प्रेम रिम खोज रहे हो।
55:29
आठ में कुछ है
55:44
प्रेम पंथ एसो कठिन कोई कठिन वठिन नहीं
55:50
बगैर प्रेम के जीना कठिन है मेरे भाई
55:57
बगैर प्रेम को जी रहे हो यानी मर रहे हो वह कठिन है।
56:15
क्योंकि स्वभाव है ना अपने नेचर के विरुद्ध जी रहे हो तो वो कठिन है ना।
56:24
पूछो ना मेरे से कौन हो तुम बताता हूं।
56:36
साक्षी के भी साक्षी हो तुम मालूम जो देह का मन का विचार और भाव के जो
56:44
साक्षी बनते हो तुम तो साक्षी जो तुम बने उस उसका भी तो कोई
56:51
साक्षी है तभी तो कह रहे हो कि यह साक्षी साक्षी का साक्षी है तुम्हारा होना
57:00
अंतर्यामी का अंतर्यामी तुम केवल अंतर्यामी ही नहीं हो। अंतर्यामी
57:07
के भी अंतर्यामी हो। तभी तो कहते हो कि मेरा अंतर्यामी
57:15
यह कहता है, वह कहता है, मैं अपने अंतर्यामी की सुनता हूं। यानी तुम अंतर्यामी के भी अंतर्यामी हो। तभी कह
57:24
सकते हो। कि मेरा अंतर्यामी यह कहता है। पूछो ना मेरे से तुम हो कौन?
57:37
क्या हो यार तुम?
57:40
और इन चीजों को मैं तुमको सता सता के बताऊं तो मेरे से कोई दुष्ट गुरु नहीं है।
57:46
10 साल बाद इस लाइन को अगर मैं बताऊं कि तुम अंतर्यामी के भी अंतर्यामी हो।
57:54
तो मैं दुष्ट हुआ ना मैं गुरु कैसे हुआ यार मेरे में करुणा है ही नहीं हर चीज का मैं प्राइस ले रहा हूं तुम्हारा समय ले
58:02
रहा हूं तुम्हारा जीवन ले रहा हूं और अगले क्षण का ठिकाना है देह का तो नहीं है कम से कम
58:10
और ठिकाना है भी तो माया का तो ठिकाना नहीं है कब घेर ले तुमको और कब तुम मिल पाओ ना मिल पाओ
58:24
तो अंतर्यामी की आत्मा हो तुम। अंतर्यामी की भी आत्मा होती है। वो तुम हो
58:35
पवित्र को पवित्र करने वाले। पापों को भी पवित्र करने वाले।
58:55
तुम्हारे दैहिक, भौतिक,
58:58
मानसिक सारे पाप निरंतर तुम में भस्म होते रहते हैं।
59:08
यह जो चिदा आकाश है स्वयं का जब दिखाओ कुछ
59:16
जब यह नॉर्मल आकाश में कुछ छोड़ते हो ऐसे तो वह गिर जाता है। कुछ टिकता है क्या यहां? इस नॉर्मल आकाश
59:24
में कुछ भी छोड़ दो तो गिर जाएगा। नहीं टिकता ना
59:30
तो सीधा आकाश में मैं के आकाश में पाप पुण्य कैसे टिकेगा?
59:39
शरीर मन भी कैसे टिकेगा?
59:43
सब गिरते जाता है, भस्म होते जाता है। तुमको कुछ करना नहीं और हो रहा है।
59:56
बचता ही नहीं कुछ यार।
1:00:14
तो मैक्सिमम तुम सोचते हो अपने लिए कि तुम पापी हो। मैक्सिमम पुण्य आत्मा बनना है।
1:00:20
कुछ अच्छा करना है जिंदगी में। तुम्हारी सोच बस वहीं तक रहती है और यह
1:00:28
अच्छा भी है कि दुनिया भर के पाप कर्मों से बेहतर आप पुण्य कर्म करो।
1:00:38
सुंदर भी है। लेकिन तुम
1:00:47
केवल अच्छे पुण्य आत्मा नहीं हो।
1:01:00
केवल पुण्य आत्मा हो क्या यार तुम कि पुण्यों का संग्रह कर लिए देवता बन गए
1:01:09
मैक्सिमम तुम पापी तो हो ही नहीं,
1:01:24
पुण्यत्मा भी नहीं।
1:01:43
पुण्य तो तुम्हारी छाया है। तुम्हारे इर्दगिर्द अपने आप होते रहते। जब तुम अपने
1:01:50
स्वयं में रहते हो ना तो तुम्हारे इर्दगिर्द अपने आप पुण्य होते रहते हैं। करने भी नहीं पड़ते।
1:02:03
वह तो तुम्हारी परछाई है।
1:02:23
ना तुम सिर्फ देह हो ना तुम सिर्फ आत्मा हो ना तुम सिर्फ
1:02:30
परमात्मा हो तुमको परमात्मा कहना भी बहुत कम कह देना
1:02:37
है क्योंकि जिसको तुम परमात्मा समझते हो ना वह एक वो एक बस
1:02:45
एक अचेतन मन में खींची गई एक विराट रेखा है बस
1:02:53
जीव के अपोजिट वाली विराट रेखा जीव का विपरीत परमात्मा
1:03:02
जीव जिसको एक्सट्रीम सोच सकता है कल्पना कर सकता है वह उसको तुम परमात्मा समझ रहे
1:03:09
हो इसलिए तुमको परमात्मा कहना ना यानी बहुत
1:03:17
कम कहना है और तुमको जीव कहना तो पाप है सरासर पाप है
1:03:27
परमात्मा फिर भी चलेगा तुमको
1:03:36
तुम कहना ही मैं को मैं कहना ही
1:03:46
मैं का सम्मान है। आपका सम्मान है। असली सम्मान
1:03:57
एक्चुअल यस हमारे यहां सौरभ जी हमको बोलते हैं मैं से
1:04:06
कम का आप बात ही मत किया करो उनको अब कुछ दूसरा जमता ही नहीं है
1:04:20
तो वो तुम्हारा सम्मान है तुम्हारा सम्मान हो मालूम और तुम सम्मान खोजते हो
1:04:29
दूसरों की नजर का सम्मान कि दूसरे तुम्हें सम्मानित करें और फिर कभी अपमानित करें
1:04:35
सम्मान का विपरीत आता ही है मान और अपमान
1:04:53
और तुम तुम्हारा सम्मान हो नेचुरल पूरी दुनिया तुम पर थू थू करती रहे ना सब
1:05:03
मिलके भी करें तब भी
1:05:10
जो मैं का सम्मान है मैं की सत्ता है वो मुस्कुराती रहती है।
1:05:24
वो असली सम्मान होता है।
1:05:34
दूसरे का दिया गया सम्मान एक ना एक दिन छीन लिया जाएगा। और दूसरे का दिया गया अपमान भी एक ना एक
1:05:43
दिन छीन लिया जाएगा क्योंकि वो अज्ञानता में सम्मान और अपमान
1:05:50
दे रहा है ना आत्मसम्मान ही एकमात्र सम्मान होता है।
1:06:00
बस हमेशा याद रखो। तो जब तुम खुद को देह मानते हो तो तुम
1:06:11
अपना अपमान कर रहे हो। जब तुम खुद को मन बुद्धि पापी पुण्य आत्मा मानते हो तुम
1:06:17
अपना अपमान कर रहे हो। पूछो ना तुमको कि तुम कौन हो? मेरे से
1:06:28
पूछो। मैं बताता है।
1:06:35
एक्चुअल जो तुम हो वही बताऊंगा।
1:07:05
तो कभी किसी और का ध्यान मत करना क्योंकि जिसका ध्यान करोगे वो शूद्र है।
1:07:12
है ना? तभी उसका ध्यान हो पा रहा है। कभी अपना ध्यान भी मत करना क्योंकि तुम
1:07:21
इतने अनलिमिटेड हो कि उसका भी ध्यान किया ही नहीं जा सकता। पॉसिबल ही नहीं है।
1:07:28
हां। तो अपनी महत्ता को पहचानो।
1:08:02
और मैं हूं इसकी समाधि कब टूटती है बताओ आप हो ना सहज में तो यह समाधि कभी भी टूट
1:08:12
टूटती है क्या वह असली सहज समाधि है
1:08:22
जो टूटती ही नहीं जो लगानी ही नहीं पड़ती
1:08:29
वो एकदम सहज समाधि है
1:08:46
तो यह बुद्धत्व, यह समाधि, ये ध्यान,
1:08:53
ये साधनाएं,
1:08:58
ये निर्वाण, ये केवल, ये खिलौने हैं तुम्हारे। खेल लिया करो इनसे।
1:09:07
ज्यादा पगलाओ मत इसमें। है ना?
1:09:13
खिलौनों में उलझ गए हो यार जिसमें खुद ही चाबी भरते हो और दो चार
1:09:21
घंटे दो चार साल चलता है मैक्सिमम वो खिलौना खराब हो जाता है
1:09:28
फिर नया खिलौना फिर नया खिलौना आप ही की चाबी से चल रहा है ना यह और
1:09:35
किसकी चाबी से चल रहा है बाकी अब बुद्धत्व पाना है भरे चाबी
1:09:42
उसके लिए गुरु चाहिए। उसके लिए ध्यान चाहिए। उसके लिए समाधि चाहिए।
1:09:48
फिर वैसे गुरु भी मिल जाते हैं।
1:09:58
ये खिलौने हैं। इनसे खेला करो।
1:10:15
हम
1:10:39
हम्म नए प्लेयर को लगाया करो बीच-बीच में। म्यूट रखना सबको अभी हां।
1:10:46
हम्म और लगाते जाओ बीच-बीच में। मेरा अपना वो चलता रहता है ना। हां इसलिए
1:10:54
अब चालू कर दो। हेलो है कोई?
1:11:09
हम कहां थे अपन?
1:11:12
अरे बताना यार। खिलौने। हां।
1:11:20
यह सब खिलौने हैं। याद रखो समझ रहे हो?
1:11:25
और आपको अगर मैं हकीकत बताऊं अगर आपको रियल में सुनना है सुनना है
1:11:32
हां तो सुनो।
1:11:41
यह अस्तित्व यह परमात्मा तुम्हारे बड़े खिलौने
1:11:50
यह निर्वाण यह तुम्हारे बड़े खिलौने
1:11:59
जैसे बचपन में वो छोटी कार चलाते थे ना ऐसे हाथ वाली
1:12:05
बड़े हो गए बड़ी कार हो गई ना बस यही है थोड़े स्पिरिचुअल हो गए तो आपका खिलौना
1:12:12
बड़ा हो गया आप अनंत को देखते हो आप परमात्मा को देखते हो और विराट को देखते हो अज्ञात को देखते हो बड़ा तीस मारखा
1:12:20
बनते हो अस्तित्व अस्तित्व अस्तित्व चिल्लाते हो
1:12:27
ये तुम्हारे बड़े खिलौने हैं यार ये छोटा और बड़े से मुक्त हो जीव तुम्हारा छोटा
1:12:34
खिलौना है परमात्मा बड़ा है खिलौना ही है बता रहा हूं बस
1:12:44
तुम्हारी चाबी भरी हुई है बचपन में जैसे जीव वाली चाबी भरे थे। अब
1:12:52
परमात्मा वाली भरते हो। बचपन में व्यक्तित्व वाली अब अस्तित्व वाली भरते हो।
1:13:03
ये खिलौने और क्या है?
1:13:21
तो सीमित सीमित खेलते हो तो फिर असीम का ध्यान करते हो असीम वसीम खेलते हो
1:13:28
है ना ये कुछ नहीं तुम्हारे बड़े खिलौने हैं जैसे कार बदल लेते हो ना बचपन में छोटी कार से खेलते हो बड़े होके बड़ी कार से
1:13:38
बचपन में छोटा घर बड़े होके बड़ा घर और और क्या फर्क क्या है?
1:14:07
तो बड़े खिलौनों से भी मुक्त हो जाओ। बिग अचीवमेंट
1:14:16
बड़े खिलौने है ना।
1:14:23
बुद्धत्व और यह सब जो तुम्हारे हाई सोच है ना जो भी वह सब बड़े खिलौने हैं और कुछ
1:14:29
नहीं।
1:14:43
और तुम ही चाबी भर के खेल रहे हो। याद रखना। हां।
1:14:59
और फिर तुम लड़ते भी हो कि मेरा खिलौना ज्यादा सही है।
1:15:09
मेरा खिलौना ज्यादा सही है।
1:15:22
अपनी कद्र करो। फेंको सारे खिलौने।
1:15:30
मैच्योर हो जाओ। अब खिलौनों से खेलने का समय नहीं है। अब बहुत हो गया।
1:15:45
तुम कौन हो? मेरे से पूछो। मैं बताएगा।
1:16:06
मैं बताने ही आया हूं। हां।
1:16:30
और कब तक खेलोगे थक तो गई हो खिलौने आखिर खिलौने होते
1:16:46
याद रखो विश्राम केवल अपने आप में ही है। असली ओरिजिनल परमात्मा केवल अपने आप में
1:16:55
है। जिसको आप परमात्मा समझते हो वह परमात्मा है ही नहीं। क्योंकि जिसको आप समझ गए वह परमात्मा हो कैसे सकता है?
1:17:09
आपकी समझ में जो आ गया, आपकी कल्पना में या आपके सेंस में आ गया
1:17:17
वो परमात्मा हो कैसे सकता है यार बताओ।
1:17:23
इतनी तो बुद्धि रखो कम से कम।
1:17:44
तो छोटा खिलौना जीव बड़ा खिलौना परमात्मा छोटा खिलौना व्यक्तित्व बड़ा खिलौना अस्तित्व
1:17:53
है ना छोटा खिलौना जो भी हो रहा है सब स्वीकार है
1:18:02
बड़ा खिलौना अरे कुछ हो ही नहीं रहा है तू मुस्कुराया कर
1:18:10
यही तो है क्या तेरी मर्जी पूरी हो ये छोटा खिलौना है
1:18:17
कुछ हो ही नहीं रहा है मर्जी की बात ही नहीं है ये बड़ा खिलौना है तू मुस्कुराया कर यह बड़ा खिलौना है
1:18:25
और क्या है कब तक खेलोगे
1:18:35
एक चीज बताना आप कौन सी ऐसी चीज है जिसको खिलौना बनाया ही नहीं जा सकता।
1:18:46
क्या आप अपने आप को कभी भी खिलौना बना सकते हो?
1:18:54
बस वही फाइनल है। बाकी चीजें खिलौना ही है। आकार, निराकार,
1:19:07
साकार ये सब खिलौना है।
1:19:22
ब्रह्मांड बड़ा खिलौना है। शरीर छोटा खिलौना है। खिलौना
1:19:44
तो मैं मर जाऊंगा। ये छोटा खिलौना है। मैं अमर हूं। ये
1:19:50
बड़ा खिलौना है। अमरता मैं सिर्फ अमर हूं यार। ये क्या बात हुई?
1:20:01
चाइलिश बातें हैं ये सब। शुद्ध हूं, बुद्ध हूं। यह बड़े खिलौने हैं। अशुद्ध हूं,
1:20:09
अज्ञानी हूं, छोटे खिलौने। कौन सी चीज है जो खिलौना बनती नहीं है?
1:20:15
वह सिर्फ मैं हूं। मैं खिलौने बनाता हूं, खेलता हूं। मैं
1:20:23
खिलौना बन ही नहीं सकता। तो समझो इस खेल को। तुमने कैसे खेला? कैसे
1:20:34
खुद पे जीव भाव लाया। फिर कैसे खुद पे ब्रह्म का भाव लाया, परमात्मा का भाव लाया। खुद पे मैं परमात्मा हूं, परमात्मा
1:20:42
हूं, हरि हूं, नारायण हूं। ये भाव तुम ही तो लाते हो खुद पे और कौन लाता है?
1:20:49
फिर तुम बड़ा खेल रहे हो ना कि ये सब कुछ परमात्मा है। मैं भी
1:20:56
परमात्मा हूं। अब तुम बड़ा खेल खेल रहे हो। लेकिन है तो खेल ही ना। बड़े खिलौने हैं। असली क्या है?
1:21:06
जो खेल रहा है इन खिलौनों से।
1:21:22
द्वैत का खिलौना फिर अद्वैत का फिर द्वैता अद्वैत का ऐसे फिर कई सीरीज बना दी
1:21:38
मनुष्य छोटा खिलौना देवता बड़ा खिलौना और है क्या
1:21:58
तब मैच्योर हो जाओ बस मैं हूं
1:22:08
बहुत हो गया खेल तमाशा
1:22:30
बस मैं क्या करना है यार कुछ हो ना हो करना क्या है
1:22:50
मेरे को कभी आप लोग भाव में बोलते हैं कि आपने मुक्त कर दिया गुरुदेव आपने क्या दे दिया? अरे यार
1:23:00
तुमको कौन मुक्त कर सकता है? मुक्ति के स्वामी हो तुम।
1:23:08
किसकी सामर्थ है कि तुमको मुक्त कर सके।
1:23:22
आपने यह दे दिया, वो दे दिया। तुमको क्या दिया जा सकता है भाई?
1:23:29
नारायण को आप कुछ दे सकते हो?
1:23:32
बताओ। नारायण को आप कुछ दे सकते हो।
1:23:42
मैं आपका मैं तो नारायण से भी पर है। क्या दोगे?
1:24:07
मैंने तुमको कुछ दिया ही नहीं है। बस गलत चीजें छीन ली है।
1:24:13
है ना? तुम्हारे खिलौने बड़ा ऐसे दिल लगा के रखे रहते हो। ऐसे मैं छीन लेता हूं। और क्या?
1:24:23
थोड़ी छीना झपटी करता हूं। बड़ा दिल लगा रहता है तुम्हारा एनलाइटनमेंट के साथ
1:24:30
परमात्मा अस्तित्व के साथ
1:25:24
आप कितना शूद्र में जीते हो कि यह घटना घट गई वो घट गया। आपको क्या घटा बताओ है ना?
1:25:35
कभी भी आपको कोई घटना घटे ना उसको तुरंत फेंक देना।
1:25:43
यानी तुम वो हो कि किसी घटना के अंदर आ गए। कितने भिखारी छाप हो तुम।
1:25:52
चाहे वो घटना कितनी ही बड़ी क्यों ना हो। तुम एक घटना के अंदर आ गए यार। शर्म करो। क्या घटा?
1:26:04
फिर क्या लैंग्वेज रहती है? तुमको क्या हुआ? तुम क्या हो यार? तुम
1:26:11
को कुछ हो गया उस हो गया में तुम पैक हो गए आ गए शर्म करो
1:26:29
तुमको क्या घटेगा तुमको क्या होगा यार यह चिल्लर चीजें यह होना और घटना जहां
1:26:39
चिल्लर है वहां तुम घटना खोज रहे हो और होना खोज रहे हो।
1:26:49
फेंको या अपना भिखारीपना ये कटोरा अपने
1:26:59
स्टैंडर्ड में रहो।
1:27:29
और मैं को मैं बताना नहीं पड़ता मेरे भाई। हां।
1:27:36
मैं को मैं बताना नहीं पड़ता।
1:28:04
हाय
1:28:56
हां जी
1:29:19
तुमको मैं कौन होता हूं यार सत्य बताने वाला
1:29:27
सही को बताने वाला या तुमको ही बताने वाला
1:29:41
तुम्हारे मैं को क्या बताया जा सकता है यार
1:29:50
अनिर्वचनीय का भी जो स्वामी है
1:29:58
उसको क्या मैं बता सकता हूं
1:30:25
तो अपनी कदर करो। अपनी महत्ता को पहचानो।
1:30:42
अपना नाम वाम का माने मत निकलो। मैं का नाम पूरे चराचर में व्याप्त है और विख्यात
1:30:50
है। मैं नाम से कौन विख्यात है? बताओ।
1:30:56
आपका नाम पूरे चराचर में देवी देवताओं में सब जगह विख्यात है। क्या भिखारी नाम अपने
1:31:04
शरीर का नाम करने चले हो साला आइडेंटिटी का हैं?
1:31:10
जो मरेगा और असली चीज जो मैं उसका नाम पूरे चराचर
1:31:17
में विख्यात है। कौन नहीं जानता मैं को यार है साला कोई?
1:31:32
नाम कमा रहे हैं। गुरु बन रहे हैं साला पगले लोग। मैं का बोध है नहीं। गुरु बनने चले कई
1:31:41
लोग। फेम सबसे खतरनाक चीज है। याद रखना।
1:31:48
डेंजरस। उसको आत्म बोध ही नहीं है जो फेम के चक्कर
1:31:55
में
1:32:11
तो मैं असली नाम जो है असली फेम बोल लो क्या बोले उसको
1:32:17
तो वह तो यार तुम चराचर में विख्यात हो। कौन नहीं जानता मैं को?
1:32:31
कोई है ही नहीं। देवता लोग भी जानते हैं। मैं को इंसानों की बात छोड़ो। हां। नारायण से भी पूछोगे तो कौन है?
1:32:39
बोलेंगे मैं हूं। कौन नहीं जानता मैं को?
1:33:03
चराचर में विख्यात मैं आत्मा भगवान
1:33:12
चराचर में विख्यात
1:33:52
और यह जो भी आपके जीवन में चल रहा है ना यह बाहरी लाइफ जिसको आप बाहरी लाइफ बोलते हो यही मैं की
1:34:01
कथा है। जैसे राम कथा कृष्ण कथा होती है ना यही आपकी कथा चल रही है। आनंद है, लीला है, रस है और क्या?
1:34:14
हर जगह मेरी ही कथा है। मैं की ही कथा है। हां।
1:34:22
इवन राम कृष्ण कथा भी मैं की ही कथा है। शिव कथा भी मैं की ही कथा है। क्योंकि शिव
1:34:30
भी मैं में विश्राम लेते हैं। नारायण भी लेटते हैं तो स्वयं में विश्राम लेते हैं। और वो मैं तुम सहज में हो।
1:34:39
पूरे चराचर में विख्यात
1:34:50
अरे मैं को साधना से तो पाया ही नहीं जा सकता। सुनो मैं को विश्राम से भी नहीं पा
1:35:00
सकते आप। हां।
1:35:10
मैं को विश्राम भी नहीं पा सकता। मैं उससे भी सुप्रीम हूं ना।
1:35:16
शांति भी मैं को नहीं पा सकती। मैं को बस मैं होकर ही
1:35:26
जो आप हो ही जो पाया हुआ ही है। और कुछ होकर नहीं जान सकते या नहीं पा
1:35:34
सकते। पाने और जानने की लैंग्वेज में कहें तो हालांकि वह भी एक लो लैंग्वेज है बट
1:35:41
मजबूरियां हैं शब्दों की। समझ रहे हो विश्राम भी
1:35:51
नको नथी हां नो विश्राम नो शांति
1:36:00
मैं वो मैं ही बस और किसी की सामर्थ्य नहीं है।
1:36:21
हम क्या सुनना है अपने बारे में बताओ ना मेरे को मैं बताता
1:36:34
सच बताना इतनी तारीफ कभी की किसी ने आपकी वो तो तो लोग आपकी बॉडी की आपके विचारों
1:36:43
की ज्यादा से ज्यादा मन की तारीफ करते हैं। आपकी तारीफ तो यार कोई करता ही नहीं है।
1:37:17
तो मेरा काम सबसे आसान है यार। बस आपकी तारीफ कर दो। मामला खत्म।
1:37:27
और कौन अपनी तारीफ नहीं सुनना चाहता?
1:37:36
हां लेकिन मैं आपके गलत चीज की तारीफ कभी नहीं करूंगा। आपके व्यक्तित्व की,
1:37:42
आपकी मान्यताओं की और जो भी आप बड़ा साधना वाधना करके बड़े
1:37:48
होशियार बनते हो उसको तो रगड़ दूंगा मैं।
1:38:14
हां जी अब पिला दो शरबते आजम
1:38:20
है ना हम
1:38:29
हम
1:38:59
तो शिष्य का अर्थ क्या होता है?
1:39:05
शिष्य जो खुद को अपनी आंखों से शुरू में देखता था। अब वो मास्टर की आंखों से खुद को
1:39:15
देखता है। ओ उसको भरोसा आने लगता है। यस आई एम
1:39:22
यस यस यस आता है उसके अंदर से। हां। तो शिष्य जब मास्टर की आई से खुद को देखता
1:39:31
है वो धन्य हो जाता है। धन धन्य एकदम
1:39:38
मास्टर की आइस
1:39:52
और वैसा देखतेदे उसकी खुद की आईज भी प्रकट हो जाती
1:40:00
क्योंकि बाद में वह जानता है कि मास्टर की आईज और मेरी आइस कोई अलग है ही नहीं। इसका
1:40:07
बोध उसको बाद में होता है। बाद में क्या बोध होता है डिसाइपल को कि
1:40:14
मैं भी तो खुद को ऐसा ही देखना चाहता था जैसा मास्टर मुझे देखते हैं।
1:40:22
हां वो एकदम गदगद रहता है। लबालब
1:40:36
और फिर लास्ट में जो लास्ट अभी आ ही गया है मास्टर भूल जाता है मास्टर को। डिसाइपल
1:40:45
भूल जाता है डिसाइपल को। बस
1:40:51
प्रेम ही प्रेम बहता रहता है। रस ही रस बहता रहता है।
1:40:59
कई राधा, कई कृष्ण, कई गोपियां।
1:41:04
बस उनका प्रेम ऐसे सहज बहता रहता है।
1:41:14
बस प्रेम ही प्रेम रहता है। जहां दो भी नहीं एक भी नहीं कुछ है ही नहीं। फिर बस प्रेम रस
1:41:24
आनंद एक महस एक सेलिब्रेशन
1:41:32
ना कोई डाउट है ना कोई संदेह है और प्रेम की गंगा में सब डुबकी लगाते रहते
1:41:43
हैं लगाते रहते
1:42:10
तब कोई हनुमान जी होते हैं जो राम जी को कहते हैं कि अपने पास ही रख लो प्रभु कहां कहां जाऊंगा मैं?
1:42:19
है ना?
1:42:25
असली ज्ञान प्रेम हो जाता है।
1:42:33
तब कोई राम कहता है कि तुमसे और ऋण हम नाही कभी तुमसे और ऋण हम नाही
1:42:43
राम काज कैसे करते थे हनुमान देखो नया विश्राम
1:42:49
छोड़ के करते थे राम काज की बिना मोहे कहां विश्राम
1:42:56
जो विश्राम का त्याग कर दे राम काज के लिए
1:43:13
फिर जीना मरना बस फिर क्या है? अब तो देह है ही नहीं।
1:43:20
दुनिया है ही नहीं। बस एक प्रेम ही प्रेम रहता है। रस ही रस।
1:43:27
एक महारास
1:43:51
हम ला रहा है बस तो फिर
1:44:02
बात दिल की नजरों ने की
1:44:09
फिर दिल की बातें नजरों से होती है।
1:44:20
फिर सब बे ठिकाना है। फिर क्या है वो मेरे को भी नहीं पता।
1:44:42
फिर फिर फिर लास्ट सहजावस्था में लिसन
1:44:49
फिर जीव बनने में शर्म नहीं आती और परमात्मा बनने में गर्व नहीं होता
1:44:58
वह सहज अवस्था है।
1:45:05
वो एक अलग ही रस है। अलग ही रस है वो।
1:45:54
मेरे को शर्म नहीं आती यार जीव बनने में। सही बता रहा हूं। बहुत आनंद आता है। हां।
1:46:11
मैं जब दुनियादारी की बातें करता हूं ना ओ आप अध्यात्म भूल जाओगे।
1:46:23
अरे मेरी दुनिया है यार।
1:46:33
मैं पूजा करता हूं जब देखे तो आप लोग क्या आनंद है मतलब वो नहीं समझ सकता कोई वो
1:46:41
समझने वाली चीज ही नहीं है यहां हां
1:47:28
बहुत दुर्लभ होती है सहजा अवस्था उसका कोई 12वार ही नहीं वो बस ऐसा है कि बैठे-बैठे
1:47:36
साथ में ऐसा वो वो पागलपन आ जाएगा। अब बसशर्ते मेरे से प्रेम हो तब
1:47:44
है ना वो वहां तक आना चाहिए आत्मज्ञान तक या प्रेम तक तो एटलीस्ट मेरे से प्रेम अगाद
1:47:54
हां
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बंद गुरु पद परंपरागा
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बहुत सुंदर है यार। इतना सुंदर है। आप लोग यहां तक सुन लिए इसको। वाह
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यही बता रहा है कि अघात प्रेम है।
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तो मैं हूं को भूल के आप यह पूरा खेल खिलौना और यह सब क्यों कर रहे हो मालूम है आपको?
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क्योंकि आपको भी पता है कि मैं ही हूं।
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आप अपने अंदर बहुत पहले से शोर हो कि यार हूं तो मैं ही और कुछ कहीं है ही नहीं।
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इसलिए निश्चिंत होके आप ये खेला खेलते रहते हो। यह सारा जो भी है वन टू आर
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मेंढक को पता है वो किसी भी पानी में कूदे वो डूबेगा नहीं
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या तो कुएं के पानी में जंप मार दे नदी में सागर में बेटा को पता है ना मैं कहीं भी कूद जाऊं
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मैं डूबूंगा नहीं ऐसा ही आपको भी पता रहता है
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और आप अपने आनंद से यह खेल रहे हो क्योंकि आपको कोई डुबो ही नहीं सकता ना यार। मेंढक
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तो चलो एग्जांपल है वो डूब भी जाए। आपको कोई डूबो ही नहीं सकता।
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मेंढक साक्षी का प्रतीक है कि साक्षी नहीं डूबता। साक्षी भी डूब जाता है। मैं हूं नहीं डूबता। याद रखना।
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साक्षी का भाव डूब जाता है और आपको कोई डूबा सके।
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अरे कहीं मिले तो मेरे को बता देना। मिलाओ यार।
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हां आप मैं डूब गया, भटक गया। उसका आप एक्टिंग कर रहे हो। बस आप वो आपका एक सुंदर खेल है और कुछ नहीं है। वो
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डूबा आपको कोई नहीं सकता।
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तो इनफ फॉर फॉर एवर अरे नहीं तो मत बोलो यार
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इनफ फॉर फॉर एवर हो गया भैया आज हां रियल में हो गया हर बार की तरह
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पहले भी मैं
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तो जाओ अब अपना अपना लीला करो जो भी आपका रोल है आनंद लो है ना
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और मस्त रहो, आत्म नष्टिक रहो। ठीक है। सभी को प्रेम प्रणाम।