0:00
ओम
0:18
असत पे दृष्टि क्यों पड़ती है? जबकि असत है ही नहीं और सत्य का कभी अभाव होता ही नहीं। है ना?
0:27
जी सर। हां। तो असत्य पे या असत्य पे कभी दृष्टि आपकी
0:38
पड़ेगी ही नहीं। बस
0:45
बस अपने से भिन्न कुछ मानो ही मत।
0:52
आप अपने से भिन्न मानते हो तो यही असत हो जाता है।
0:59
अपने से भिन्न आपने कुछ भी माना तो वही असत है। शरीर, मन, दुनिया
1:08
भिन्न की मान्यता में असत प्रकट हो जाता है और तब उस पर दृष्टि जाती है। वह दृष्टि
1:15
भी रॉन्ग है और असद भी रॉन्ग है।
1:21
अपने से भिन्न कुछ मानो ही मत। बात ही समाप्त हो जाएगी।
1:33
अपने से भिन्न मानते हो के असत पैदा हो जाता है। भिन्न मान्यता के कारण माया पैदा
1:41
हो जाती है। और अलग मानो ही मत।
1:50
तो माया पैदा ही नहीं होगी। तो उस पर दृष्टि असत है ही नहीं तो उस पर दृष्टि जाती क्यों है?
2:01
और सत्य है सुनिए ना आप सुनिए है ना
2:08
तो और सत्य है तो उसका तो अभाव होता ही नहीं है। है ना? तो असत जो है
2:18
वह मान्यता है। देखो डंडा
2:26
मान्यता है। दृष्टि आपकी लकड़ी में ही जाती है।
2:34
क्या देख रहे हो आप? लकड़ी ही तो देख रहे हो।
2:41
दृष्टि भी आपकी लकड़ी में जाती है।
2:49
डंडा केवल माना हुआ है। असत केवल माना हुआ है जो कहीं है ही नहीं।
2:59
तो आप देख सत्य को ही रहे हो। स्वयं को ही या परमात्मा को ही
3:05
मान रहे हो कि यह दुनिया है। आप क्या सोचते हो यह दुनिया है? अरे यह
3:12
दुनिया नहीं है या आप ही हो। परमात्मा ही है।
3:20
देख भी आप सत्य को ही रहे हो। माने बस गलत हो कि यह दुनिया है।
3:37
तो दुनिया दुनिया है कि दुनिया को देखने वाला दुनिया है।
3:50
दुनिया को देखने वाला दुनिया है। और दुनिया को देखने वाला कौन है?
4:00
मैं हूं। तो मैं ही हूं ना जिसको आप दुनिया कह रहे हो।
4:07
मैं आत्मा भगवान दुनिया है कहां यार? आपके बगैर ये दुनिया
4:14
हो सकती है क्या? लकड़ी के बगैर डंडा हो सकता है क्या?
4:22
तो लकड़ी ही तो है जिसको आप डंडा कह रहे हो। आप ही तो हो जिसको आप दुनिया कह रहे हो।
4:31
दुनिया है कहां? देखो चारों साइड जो आप देखते हो ना तो शरीर दृष्टि से मत देखो।
4:37
शरीर दृष्टि से आप क्या देखते हो? यह भीतर है। यह बाहर है। वो शरीर दृष्टि है। स्वयं की आत्मा की दृष्टि में क्या है?
4:48
आत्मा ही है। दूसरा कोई है ही नहीं।
4:59
देखने वाला ही दिख रहा है।
5:05
आप देख भी सकते को रहे हो। देखने वाले को ही देख रहे हो।
5:11
मान रहे हो कि बस यह दुनिया है, असत है।
5:22
मान रहे हो कि यह बॉडी है। मान रहे हो कि ये माइंड है। ये दुनिया है। ये मान्यता
5:28
है। देख आप सत्य को ही रहे हो। देख आप लकड़ी ही रहे हो। बोल्ड अंडा रहे
5:35
हो। अच्छा छू भी आप लकड़ी को रहे हो। देखो
5:44
अच्छा वजन इसमें डंडे का वजन है कि लकड़ी का वजन? तो इस दुनिया में किसका वजन है भाई?
5:52
दुनिया का कि अपना?
5:55
अपना वजन है ना यार। तो दुनिया है कहां? अपने आप को निकाल दो।
6:02
दुनिया बचती क्या? लकड़ी को निकाल दो। तो डंडा बजता क्या है?
6:08
तो वजन तो मैं का ही है ना। ये दुनिया का वजन है।
6:15
ये शरीर का वजन है। वजन मैं का है।
6:21
शरीर का नहीं है। देख भी आप सत्य को रहे हो।
6:31
हां। और इसका अभाव तो हुआ ही नहीं है। तो सत्य को ही तो देख रहे हो।
6:37
अभाव हो ही नहीं सकता ना। वही सत्य है ना और वही मैं हूं।
6:53
तो आप कहते हो कि क्या है?
6:57
हम आप कहते हो भैया कि
7:03
यह तो बात ठीक है, जमता है। फिर भी बीच बाजार में जाते हैं,
7:16
ऑफिस जाते हैं, बिजनेस करने जाते हैं या कहीं जाते हैं तो गड़बड़ क्यों हो जाती है?
7:25
आप आपके साथ यह है कि गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। तब सब ठीक है
7:34
और गड़बड़ हो रही है तो सब गड़बड़ है
7:49
पिलाओ यार चाय
8:06
तो आपका जो मुद्दा है ना कि हम ऑफिस जाएं और दुनियादारी में सब करें और गड़बड़ ना
8:15
हो। मेन जो बेसिक है ना आपका आपको ना दुनिया
8:21
में ठीक करना है अपने नॉर्मल तो आप कंफर्टेबल हो ना अपने में
8:29
अब नॉर्मल तो रिलैक्स हो ध्यान या सत्संग सुन रहे हो बढ़िया आनंद में हो
8:36
दुनिया में आपको ठीक करना है और दुनिया में कब तक ठीक नहीं होगा
8:42
जब तक दुनिया को अपने से अलग मानोगे तभी गड़बड़ होगी
8:52
दुनिया को अपने से अलग अलग माने और गड़बड़ शुरू। आप खुद ही गड़बड़ करते हो
9:01
अलग मान के। अब आप क्या करते हो?
9:06
लकड़ी अलग, डंडा अलग। अब गड़बड़ तो आप ही कर रहे हो ना।
9:16
अब यह दुनिया आपसे अलग ही नहीं है। अंतत आप ही हो। तो गड़बड़ होगी कैसे?
9:23
बताओ मेरे को
9:33
आपके साथ एक दुविधा है। मैं आनंद हूं। यह बात आप स्वीकार कर लेते हो। दुनिया भी मैं ही हूं। यह आप स्वीकार नहीं करते हो।
9:43
और दुनिया भी आप ही हो ना। दुनिया है कहां? और दुनिया की आत्मा भी आप ही हो।
9:54
जैसे आनंद की आत्मा आप हो, शरीर की आत्मा आप हो, ऐसी इस दुनिया की आत्मा भी आप। आपके बगैर यह दुनिया हो सकती है क्या?
10:06
नहीं हो सकती। यह कब होती है? जब इसको आप अपने से भिन्न मानते हो। अलग मानते।
10:15
अलग माने कि दुनियादारी शुरू, गड़बड़ होना शुरू। तो अलग मानना ही क्यों है भाई?
10:27
कितना कितना सुंदर है ये। हां।
10:35
इवन बिजनेस ऑफिस दुनिया क्या बेकार चीजें थोड़ी ना है। सुंदर है
10:43
वो भी। जो भी डेली लाइफ में किचन में या कहीं पर
10:52
भी आप काम करते हो सुंदर है ना वो उसको आप अलग क्यों मान रहे हो ये पूरा चराचर ये
10:59
पूरी दुनिया इसको अपने से अलग बस मत मानो
11:07
अलग मान्यता ही गड़बड़ करती है द्वंद पैदा कर देती है
11:16
और यह अलग है नहीं आपसे। आप माने हो करके द्वंद पैदा हो रहा है।
11:23
नेचुरली सहज में ये कुछ भी अलग है ही नहीं।
11:44
तो जीव को जिंदा रहना है तो वो अलग मानता रहता है।
11:51
उसको कितना ही समझाओ वो अपनी जान बचा लेता है।
11:59
वो बचा ही लेता है। वो अलग मानेगा ही। उसको कितना ही आप समझा डालो वो बोलेगा
12:08
नहीं भगवान अलग है मैं अलग हूं दुनिया अलग है
12:15
मैं अलग हूं वो उसी ट्रैप में जीता है। वो अपनी जान
12:23
बचा ही लेता है। और जीव की जान
12:33
इसी एक लाइन पर बची रहती है कि मैं अलग और यह अस्तित्व अलग
12:39
और वह अपने ऐसे जाल फेंक के वो शकुनी है ना वो पवारा ले ही आता है।
12:52
अलग है ये ऐसे कैसे एक हो जाएगा। इतना बड़ा अस्तित्व तुम इतने छोटे से ऐसा
12:59
वह अपना खेल देता है। पहले खुद को पहले ही डिसाइड कर लेता है कि मैं देह हूं।
13:07
अब आप फंसे आप फंसते किस में हो कि मैं देह हूं। अब आप देह का चश्मा लगा लिए।
13:15
अब आप जो टेली करोगे देह से करोगे। हां यार देह तो छोटा है। अस्तित्व बहुत बड़ा है। यह कैसे मेरे से एक हो सकता है?
13:25
समझ रहे हो?
13:28
खुद को आपने फिक्स कर लिया कि मैं बॉडी हूं। अब आपको डाउट ही होगा ना। अब मैच खाएगा ही
13:37
नहीं ना। अब परमात्मा से कैसे टेली करोगे?
13:42
अब परमात्मा इतना विराट है और विराट से भी विराट है और आप तो यार
13:49
छोटे से हो। फिर आपको जीव बोलेगा तेरे को तो थोड़ी सी चोट लगती है हुआ करता है तू काहे का
13:59
परमात्मा है नहीं यह सब देह दृष्टि है जीव की दृष्टि हां
14:07
ऐसे वो फंसाता है उसकी चाल समझो शकुनी की हां
14:18
शकुनी पहले एक दो पासे खुद हार सामने वाले को कॉन्फिडेंस दे दिया। हां,
14:25
वह लगातार खेल रहा है। पांचों इंद्रियां, पांचों पांडव जीत लिया
14:31
वो। अब तुम्हारा हृदय जीतना चाहता है वो द्रोपदी को।
14:40
समझ रहे हो? वो तो मैं आत्मा कृष्ण है करके बचे हुए हो।
14:47
वरना वो भी निपटा देगा वो।
14:54
तो आप देह का चश्मा लगा के टेली करते वहीं धोखा हो जाता है।
15:03
देह भाव हटाओ। मैं देह हूं ऐसा सेंस हटाओ। डायरेक्ट देखो मैं से। डायरेक्ट
15:12
अरे डायरेक्ट देख रहे हो ना आकाश को।
15:18
डायरेक्ट कि मैं से भिन्न कुछ भी नहीं। देह से नहीं देखते भैया। ये तो विंडो है।
15:25
आंख विंडो है। है ना? मन का पर्दा और देखते आप स्वयं से
15:32
ही हो। स्वयं का ही प्रकाश रहता है। तो डायरेक्ट देखो। मैं से भिन्न कुछ भी
15:41
नहीं। अलग कुछ मानो ही मत। तुरंत मर जाएगा जीव बरू है वह
15:50
हां उसको यह साइनाइट है उसके लिए आप इसमें ठान लिए बस यही सत्य है यही मैं
15:59
हूं कि मैं से भिन्न कुछ भी नहीं ना परमात्मा ना अस्तित्व ना दुनिया ना कुछ
16:05
वो मरा जीव इतना सा बस खेल है
16:18
अलग मानो ही मत और आनंद इसी में है। अलग मान के जी के देख लिए ना भाई 25 साल 50
16:25
साल 100 साल जितना भी जियो अभी तक अब अलग मत मानो ऐसा जी के देखो कि मैं से
16:33
भिन्न कुछ भी नहीं। आपका क्या बिगड़ जाएगा क्या कुछ? अगर जो
16:40
मैं बता रहा हूं ऐसा जिओगे तो कुछ बर्बाद हो जाओगे क्या?
16:46
अरे सम्राट हो जाओगे पूरे ब्रह्मांड के बस अलग मत मानो
16:55
कि मैं से अलग कुछ है ही नहीं और है ही नहीं
17:03
इन हवाओं को इस आकाश को इस धरती को अपने से अलग क्यों मानना
17:09
इस पूरी प्रकृति को क्यों अपने से अलग मानना
17:16
सारे मनुष्यों को, देवताओं को, परमात्मा को मैं से अलग है ही नहीं।
17:25
मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
17:42
हां जी।
17:55
तो आपको एक बात बता रहा हूं। जैसे आप
18:02
इससे अलग नहीं मान रहे हो ना?
18:07
लकड़ी से अलग डंडे को नहीं मान रहे हो। यहां आपको एकदम क्लियर है ना?
18:13
इसमें कि डंडा लकड़ी से अलग है ही नहीं। सेम ऐसा यहां पे भी है। सेम
18:22
कि यह दुनिया यह पूरा वर्ल्ड मैं से अलग है ही नहीं। सेम है ऐसा यहां
18:30
पे। आप केवल खुद को शरीर समझते हो करके यह बड़ा लगता है और कुछ नहीं।
18:55
तो मेरी दुनिया मैं ही हूं। क्या मेरी दुनिया
19:04
मैं ही हूं। आपके बगैर नहीं हो सकती आपकी दुनिया।
19:12
लकड़ी के बगैर डंडा नहीं हो सकता।
19:26
और आपके बगैर जो हो ना सके।
19:33
आपके बगैर जो दुनिया हो ना सके तो वह दुनिया है कि आप हो?
19:46
अरे आपके बगैर जो हो ही ना सके तो उसका अस्तित्व है कि आपका अस्तित्व है?
19:55
सीधी सी बात है ना लकड़ी के बगैर डंडा हो ही नहीं सकता। आपके बगैर दुनिया
20:02
हो ही नहीं सकती। तो दुनिया का अस्तित्व थोड़ी ना है। आप ही का अस्तित्व है। आपने माना है बस कि ये
20:11
दुनिया है कहीं नहीं। जैसे डंडा कहीं नहीं है। तीन काल में नहीं है। ऐसी दुनिया तीन काल
20:18
में नहीं है। है ही नहीं। मैं ही हूं बस। ये कोई दुनिया नहीं है
20:28
भैया। ये आप ही हो। यह जो भी दिख रहा है इसको दुनिया मत बोलो। इसको बोलो मैं ही
20:36
हूं। बगैर आपके यह हो ही नहीं सकता।
20:45
बगैर देखे ये दिख नहीं सकता। बगैर आपके अनुभव भी नहीं हो सकता। भाषित
20:54
भी नहीं हो सकता। तो आप ही इसका आधार हो। सर्व आधार
21:05
लेकिन एक तकलीफ क्या है मालूम क्या है मालूम
21:12
आप ही इसका आधार हो इसका बार-बार हम इस पॉइंट पे फोकस कर रहे
21:22
हैं ना कि दुनिया का इसका आप आधार हो
21:30
यही यही फॉल्स है। इसका बोलना ही इसके अस्तित्व को स्वीकार
21:41
करना है। इसका बोलना ही इसके अस्तित्व को स्वीकार
21:51
करना है। अरे ये इसका ये दुनिया नाम की कोई चीज कभी हुई ही नहीं।
21:59
आप ही हो बस। हां अब ठीक आया।
22:11
आप ही हो बस। मैं ही मैं हूं। बस
22:18
यह भी मैं हूं। वह भी मैं हूं। ऐसा नहीं है। आप उसकी सत्ता को स्वीकार कर रहे हो। आप क्या बोल रहे हो? डंडा भी लकड़ी। अरे
22:27
डंडा है ही नहीं तीन काल में। देह, मन, बुद्धि और दुनिया तीन काल में है ही नहीं।
22:35
हां। तो देह नहीं, मैं आत्मा हूं। यह बुद्धि
22:43
गम्य है। इसको बुद्धि बुद्धि को यह समझ में आता है। हां यार यह बात सही है कि देह नहीं मैं
22:52
आत्मा हूं। मन नहीं मैं आत्मा हूं। लेकिन तीन काल में देह, मन और संसार है ही नहीं।
23:03
यह अहम गम्य है। आत्मगम्य है। यह मेरी और आपकी बात है।
23:13
मन, बुद्धि और जीव की बात नहीं है। यह इसको यह लोग नहीं पचा सकते। मर जाएंगे ये
23:20
लोग कि तीन काल में देह, मन और संसार
23:27
है ही नहीं, हुआ ही नहीं। इसको केवल मैं आत्मा भगवान ही टेली करता हूं। और उसको ही यह बात हजम होती है, ग्रहण होती है,
23:38
आत्मसात होती है।
23:47
कि तीन काल में देह मन और संसार है ही नहीं क्योंकि आपने माना है
23:56
और उसके साक्षी बने या उसको बोले कि यही ये भी मैं हूं यह भी मैं हूं। आपने माना है तो आपने तो स्वीकार कर लिया उसकी सत्ता
24:04
को उसके अस्तित्व को। इनके अस्तित्व का ही इंकार कर दो, यार,
24:12
नक्की करो। है ना? देह, मन और संसार के अस्तित्व का
24:20
ही इंकार कर दो। यह तीन काल में है ही नहीं। और है ही नहीं। है कहां? साला मेरे को बताओ ना। संसार है कहां? मन कहां है?
24:29
लाओ खोज के। देह है कहां?
24:35
पांच तत्व ऐसे मिलकर क्रॉस हो गए हैं। उसको आप देह बोल रहे हो। जैसे बहुत सारी रेखाएं क्रॉस होती है तो एक बिंदु बन जाता
24:43
है अपने आप। तो उसको आप बोल रहे हो कि ये मैं हूं। यह तो अहंकार हो गया ना।
24:51
देह कहीं नहीं है। है ना?
24:57
ना कोई दुनिया है, ना कोई मन है।
25:03
तीन काल में यह सब है ही नहीं। और यह आत्मगम्य है। अहम गम्य इसको केवल
25:12
आपका अहम, मैं असली वाला मैं आत्मा वाला वही ग्रहण करता है।
25:27
तो इसको ग्रहण करो कि तीन काल में यह सब है ही नहीं। है मान के फाइट करोगे या इससे ऊपर उठने की कोशिश करोगे तो मरोगे।
25:36
सीधी बात आप क्यों डंडे की सत्ता का स्वीकार कर रहे
25:43
हो? विकल्प का इनकी सत्ता का ही इंकार कर दो ना।
25:55
आप एग्री हो गए कि यह कहीं हैं। इनकी सत्ता को आपने स्वीकार किया तो देर अवेर जीव फंसा देगा आपको।
26:04
हां। और वास्तव में इनकी सत्ता है ही नहीं। आपके बगैर ये हो सकते हैं क्या? आपके बगैर
26:13
आपकी देह, आपका मन, आपकी दुनिया हो सकता है क्या? हो ही नहीं सकता। तो आप ही हो
26:20
ना? जिसको गलती से देह मन और दुनिया माने हो
26:27
और अब मानना भी क्यों है
26:33
जो है ही नहीं उसको मानना भी क्यों है
26:42
मानो ही मत इनका रामबाण यही है याद रखना ब्रह्मास्त्र
26:49
है यह जो देह मन बुद्धि और संसार का
26:57
देह मन बुद्धि संसार के अस्तित्व का ही इंकार कर दो आ मजे से बैठे रहो
27:16
हां इनका अस्तित्व तो काहे इनकार खत्म साला
27:22
नाटक नौटंकी फालतू का फालतू छाप
27:31
अब आप क्या करते हो नहीं एकदम एग्री हो डंडा है अब डंडा है एग्री
27:41
हो तो अब आप डंडे के साक्षी बनोगे अब आपको लकड़ी में रहना है अरे पागल तुम लकड़ी में
27:47
ही है लकड़ी तो लकड़ी में ही है साक्षी जिसका तुम बन रहे हो बेवकूफ बन रहे
27:54
हो और तुम बेवकूफ हो। अगर तुम साक्षी हो तो तुम बेवकूफ हो
28:01
क्योंकि जिसका तुम साक्षी बन रहे हो वो कहीं है ही नहीं।
28:10
और तुम बेवकूफ हो। हां अगर साक्षी बन रहे हो तो।
28:17
जो है ही नहीं उसका साक्षी कैसे बनोगे यार उसको देखोगे कैसे
28:26
कहीं पे भी डंडा दिख रहा है क्या ऐसे ही मन बुद्धि संसार
28:35
है ही नहीं ना तो इसके साक्षी क्या बनोगे तुम
28:42
इनके अस्तित्व का ही इंकार कर दो इनके अस्तित्व का स्वीकार करके ही आप
28:50
साक्षी बनते हो और जिसके अस्तित्व का आपने स्वीकार कर लिया तो द्वंद आ ही गया फाइट तो होगी ना
28:59
भाई अब कितना ही जगते रहो फिर नींद में जगना है आपको योगी सोता ही नहीं है
29:09
जगता ही रहता है इन द सेंस भैया
29:17
जो चीज है ही नहीं उसके लिए तुम परेशान हो रहे हो। दुनिया हो
29:26
तब तो परेशानी हो। मन बुद्धि हो तब तो परेशानी हो।
29:36
है ही नहीं बता रहा हूं मैं। रियल में नहीं है। देखो ना मन कहां है? बता दो मेरे को।
29:45
बुद्धि कहां है? बताओ। ऐसे खोपड़ी फोड़ के निकलती है क्या बुद्धि या मन?
30:01
दुनिया कहां है? बताओ। छू के देखो। कहां है दुनिया? यह दीवाल दुनिया है। यह घर दुनिया है। यह गांव दुनिया है। सब जगह ऐसे छू के देखो। कहां है रे दुनिया?
30:12
देखो ऐसे छू के देखो। हवा में ये ये बिस्तर क्या बोलते हो इसको? ये दुनिया है। कहां है दुनिया?
30:22
ये दुनिया है। अपने घर को छू के देखो। सब दुनिया है ये।
30:30
ऑफिस में हो तो ऑफिस को छू के देखो। तो शॉप में शॉप को छू के देखो। ये दुनिया है।
30:37
अरे कहीं नहीं है पागल। कहीं नहीं है। डंडा कहीं नहीं है।
30:48
कहां छू के देखो ना। कहां पे वो पेड़ तो नहीं आएंगे?
31:00
बेवकूफ बने हो बेवकूफ हां बनो साला साक्षी
31:09
जो है ही नहीं उसके साक्षी बनते हो तो इनके अस्तित्व का ही इंकार कर दो बस
31:17
क्योंकि है ही नहीं वैसे भी मन का भी अनुभव करके देख लो मन मिल जाए तो बता देना
31:27
मन की सत्ता का जब स्वीकार करते हो,
31:32
मन के अस्तित्व का जब आप स्वीकार करते हो तभी मन है। नहीं तो है ही नहीं।
31:41
मन की याद ही मन है। वरना मन है कहां यार जो पूरी दुनिया को
31:48
परेशान करके रखा है वो असल में है ही नहीं। होता तो पता नहीं क्या-क्या कर देता।
31:59
तो जो है ही नहीं वो है ही नहीं।
32:12
तो देह, मन और संसार तीन काल में है ही नहीं।
32:19
खूब सेलिब्रेट करो। बेवजह का
32:30
और तुम साधना किससे करते हो मालूम खुद को शरीर मान के करते हो
32:36
है ना हर हर साधक खुद को शरीर मान के ही साधना करता है जो नहीं है वो मान के ही
32:43
करता है या मैक्सिमम खुद को मन बुद्धि मान के करता है फिर करेक्ट करता रहता है यह
32:50
विधि ये ध्यान वो प्रयोग अरे वो है ही नहीं भैया तू मान क्यों रहा है मरेगा
32:57
तू मरेगा जीते जी मरेगा
33:11
जैसे किसी को भूत पकड़ लेता है ना समझ रहे हो तो भूत पकड़ा नहीं रहता वो मान
33:19
लेता है कि पकड़ गया है। पकड़ा वकड़ा कुछ नहीं रहता। वह भय भय के कारण ना मान लेता
33:27
है कि मेरे को भूत पकड़ लिया है। उसकी आवाज बदल जाती है। हॉरेबल देखता है वो। आपको भी लगता है हां इसको भूत पकड़ लिया
33:35
है। ऐसे ही है बस। भूत कहीं नहीं है। ऐसी शरीर
33:43
मन और दुनिया कहीं नहीं। इतनी सी बात कुछ भी आपको पकड़ा नहीं है
33:50
मेरे भाई किसी की हिम्मत नहीं कि आपको पकड़ ले
34:04
तो देह मन और संसार के अस्तित्व का ही इंकार कर दो यार जश्न मनाओ जस
34:13
हां फालतू जिंदगी मत जियो हो जो चीज है ही नहीं उससे फाइट कर रहे हो।
34:22
कोई जैसे हवा में ऐसे तलवार चलाए मन से फाइट आपकी हवा में तलवार चलाने से
34:30
भी खतरनाक है। हवा में ऐसे तलवार कोई चलाए तो आप क्या बोलोगे? पागल हो गया ना?
34:39
और मन को जो काटने के लिए आप तलवार चला रहे हो ध्यान, ज्ञान, साधना की आप कम बड़े पागल हो।
35:16
तो इनके अस्तित्व का इंकार केवल वही कर सकता है जो मैं आत्मा भगवान
35:24
में जीता है। हां उसी के पास वो साहस होता है कि एक एक बार में काट देता है।
35:33
देह, मन और दुनिया के अस्तित्व का ही इनकार। यह अहम गम्य है। आत्मगम्य है।
35:41
बुद्धि गम्य नहीं है। इस इस बात को मेरी केवल आपकी आत्मा ही
35:49
समझेगी। बुद्धि नहीं समझेगी। आत्मा को ही आत्मसात होगा। ग्रहण होगा
35:57
और अनुभव होगा। बुद्धि को नहीं होगा। आपके मन बुद्धि के बस की बात नहीं है ये
36:07
और हम उसको बता भी नहीं रहे हैं। वो तो क्योंकि है ही नहीं। तो देह, मन, बुद्धि और संसार
36:15
तीन काल में है ही नहीं मेरे यार।
36:27
अब मैं कौन सा सत्संग करूं? कौन सा ध्यान करूं? कौन सा ज्ञान सुनू?
36:35
कौन सी मुक्ति पाऊं?
36:41
क्योंकि यह तो है ही नहीं। और है ही नहीं।
36:49
छू के देखो। कहीं है तो बताओ।
36:58
देह को भी अपने अनुभव से छू के देखो। हाथ से नहीं छूना। फिर बोलोगे हाथ से छू रहे हैं। ये है। अरे अनुभव से छू के देखो।
37:07
अनुभव हो रहा है क्या शरीर का? 70 किलो के वजन का। निर्भ का ही अनुभव होता है ना। वेट का
37:15
कहां अनुभव होता है? हड्डी का, मांस का अनुभव हो रहा है कहीं?
37:20
तुम खुद को साला हड्डी मांस समझ के जी रहे हो। ब्लड समझ रहे हो।
37:27
लीवर किडनी समझ रहे हो। मरोगे कहीं पे भी फील हो रहा है लीवर का, किडनी
37:35
का, हड्डी का, मांस का फील ही नहीं होता। वह अनुभव ही नहीं होता। है ही नहीं तो होगा कैसे भाई?
37:49
है ही नहीं तो इसी क्षण से
38:00
देह मन और दुनिया के अस्तित्व का ही इंकार कर दो
38:06
खत्म मामला क्योंकि है ही नहीं ना
38:13
असत तो असत ही है
38:27
अब आप बोलते हो असत में दृष्टि क्यों जाती है? अगर आपको पता चल जाए रियल में कि यह असत है तो दृष्टि जाएगी कैसे? वो तो खत्म
38:34
हो जाएगा ना। आपको पता चल जाए झूठ है यह है ही नहीं।
38:43
जैसे डंडा है ही नहीं तो दृष्टि जाएगी कैसे?
38:50
दृष्टि सत्य में ही जा रही है आपकी मेरे यार। आप सत्य ही देख रहे हो। आप खुद सत्य
38:58
हो और सत्य ही सत्य है। बस आप ही आपको हो बस
39:05
और कुछ हो कैसे सकता है यार? बकवास।
39:21
तो देह मन बुद्धि और दुनिया के अस्तित्व का ही इंकार कर दो और मजे से जियो अपनी
39:28
जिंदगी खुश रहा करो प्रसन्न रहा करो
39:39
एकदम से इसको मान ही लो कि यह तो है ही नहीं दे मन और यह संसार
39:51
बात ही खत्म हो गई
40:38
खुद को शरीर मान के पता नहीं क्या सोचते हो मैं पैदा हो गया मैं मरूंगा
41:06
मरने के बाद पता नहीं मैं कहां जाऊंगा।
41:15
पहले ही आप उसके अस्तित्व का स्वीकार कर लिए ना शरीर के तो अब आप शरीर से ही टेली करते हो जन्म के
41:24
पहले मैं कहां था मरने के बाद मैं कहां जाऊंगा इ ई उ ऊ ऊ ऊ ऊ मरोगे
41:33
शरीर से ही टेली कर रहे हो ना आप पहले तो आप मान लिए कि आप शरीर ही हो अब उसी से
41:40
टेली कर रहे हो जन्म के पहले मरने के बाद क्या होता है अरे फॉल्स से ही टेली कर लिए हो पहले खुद को
41:49
मैं बॉडी हूं तो आप जो सोचोगे वह गड़बड़ ही होगा ना अब खुद को शरीर मान के आप 10 करोड़ जन्म
41:58
भी साधना करोगे तो गड़बड़ ही होगा ना
42:08
अब वो साधना चाहे कोई भी गुरु बताए साधना ही फॉल्स है ना
42:40
तो फिर आपको समझाया जाता है नहीं ऐसा नहीं है पुत्र बहुत साधना करोगे ना फिर जब थक
42:47
जाओगे जब थक जाओगे तब पता चलेगा यानी क्या बोला जा रहा है मालूम बहुत गलत
42:55
करोगे ना बहुत गलत देखोगे ना डंडा ही डंडा डंडा ही डंडा डंडा ही डंडा और जब थक जाओगे ना ये
43:05
सब बेवकूफ बनाने के तरीके हैं। है ना? वहां क्या एक्सरसाइज है क्या? वहां
43:12
थकान होगी। सत्य यानी इतना कमजोर है कि वह बगैर थके
43:19
मिलेगा ही नहीं। परमात्मा इतना वीक चीज है कोई कि वो बहुत थकेगा और फिर कभी मिलेगा।
43:28
इतना कमजोर होता है परमात्मा। क्या समझो खुद को यार?
43:37
ये सब फॉल्स है। बचो बच के रहना रे बाबा। तुझ पर नजर है। सब की नजर तुझ पर है। सबको
43:46
चाहिए शिष्य। और शिष्य तभी तक जिंदा रहेगा जब तक साधना करेगा। नहीं तो वो गुरु ही है।
43:58
शिष्य को पता चल गया कि देह, मन और दुनिया तो है ही नहीं। मैं साधना किसके लिए करूं।
44:06
वो ततक्षण अपने गुरु पद में आ गया। धंधा खत्म।
44:15
सब धंधे हैं मेरे भाई। इस दुनिया का सबसे बड़ा धंधा है साधना और ध्यान।
44:23
याद रखना मेरी बात को। बाकी धंधे तो छोटे-छोटे हैं। हां।
44:32
साधना और ध्यान। इन्वेस्टमेंट कितना है? जीरो।
44:40
क्योंकि फॉल्स है और प्रॉफिट
44:49
अनाप सनाब इससे बढ़िया कोई धंधा होगा। इसीलिए तो
44:56
जिसको देखो ज्ञानबाजी में लगा हुआ है। हमारे देश में तो बहुत चलता है ना। जिसको देखो गुरु बन रहा है, ध्यान करा रहा है,
45:04
साधना करा रहा है। उसको भी पता नहीं वह क्या कर रहा है और क्या करा रहा है।
45:11
और एकदम सही समझ के करा रहा है। उसको बोलो ना तो उसको बुरा लग जाता है।
45:19
अब एक बात बताओ आप खुद को शरीर मान के साधना करते हो। ठीक है। लकड़ी खुद को डंडा
45:26
मान रही है। अब डंडा साधना करेगा कैसे बताओ?
45:37
करेगा कैसे जो है ही नहीं वो करेगा कैसे वो ट्रैप में ही जा रहे हो ना आप एक
45:44
मान्यता से दूसरी मान्यता
46:07
अभी धरती में जितने भी गुरु बन के बैठे हैं उन सबको पहले मेरे पास आना चाहिए।
46:13
उनको पहले खुद का तो बोध हो सवा नहीं है। पूरे धरती को भटकाए पड़े
46:23
हैं। जघन्य अपराध है ये। जघन्य
46:30
बात पैसे की नहीं है। पैसा कमाना बुरी चीज नहीं। कमाने के लिए करोड़ों चीजें हैं।
46:35
कमा लो ना भाई। एक चीज को तो छोड़ दो।
46:59
फिर आपको आकाश का ध्यान कराया जाता है। आकाश को देखो। जिंदगी में कभी आकाश को मत देखना। जड़ हो
47:07
जाओगे। जड़ का ध्यान जड़ ही करेगा। बता रहा हूं।
47:15
हां। फिर आपको बोला जाता है नहीं इसमें चेतना है। अब चेतना को देखो।
47:24
यह चिदा आकाश है। मतलब आप ही बस रॉन्ग हो। बाकी सब चीजें
47:31
ठीक है। आकाश ठीक है, चिदा आकाश ठीक है। कल्पना का भगवान में ध्यान करो ठीक है।
47:39
उसको ध्यान करो, इधर ध्यान करो वो ठीक है। आप ही गलत हो बस। और मामला उल्टा है। आप
47:46
ही मात्र सही हो। बाकी सब फॉल्स है।
47:54
तुम खुद चेतन हो ना भैया। कौन से चेतन का और आकाश का ध्यान कर रहे हो? तुम मुर्दा हो कि जिंदा हो?
48:02
चेतन हो ना? जड़ थोड़ी ना हो। किसी को भी लगता है क्या मैं जड़ हूं, पत्थर हूं। ऐसा
48:09
लगता है क्या? तुम खुद चेतन हो ना? अभी आकाश में क्या चेतन चेतन खेल रहे हो?
48:20
यह सब फॉल्स है। ध्यान ही फॉल्स है।
48:34
तो भैया डोंट डू साधना है ना
49:00
तो फिर भगवान का नाम लो यह फिर भी अच्छा है। लेकिन नाम से नाम ही जुड़ा है। अपना तो आपको पता नहीं रहता।
49:09
खुद को दे मन मान के ही अगर भगवान का नाम लोगे तो आप माया का ही नाम ले रहे हो।
49:18
माया को ही जप रहे हो। खुद को भगवान जान के मैं आत्मा भगवान जान के जब भगवान का
49:26
नाम लेते हो तब भगवान का नाम लेते हो नहीं तो आप माया
49:32
का ही नाम जप कर रहे हो हां बहुत नाजुक मामले हैं
49:40
और आपको पता नहीं है हर कोई और आप
49:48
हमेशा निरंतर भगवान का नाम लेते हो और भगवान का
49:56
सबसे सुंदर नाम है। मैं हूं।
50:02
आप मैं बोलते हो ना वह भगवान का सबसे श्रेष्ठ नाम है।
50:13
अहम को ब्रह्मास्म कहा गया है। ब्रह्मास्म को अहम नहीं कहा गया है। अहम को हरि कहा गया है। हरि को अहम नहीं
50:22
कहा गया है। और हर कोई सहज में कहता है मैं अरे वही तो
50:32
भगवान का नाम है। वही भगवान है। उसके लिए कौन सी साधना करोगे?
50:41
जो रियल है उसके लिए कोई साधना नहीं है और झूठ है उसके लिए दूसरा झूठ लाओ।
50:53
तो मैं जब आप कहते हो ना मैं यही भगवान का श्रेष्ठ नाम
51:01
यही भगवान है। असली वाला कल्पना वाला नहीं यही अस्तित्व है। असली वाला तुम्हारा वो
51:10
बड़ा बड़ा जो सोचते हो ना ये व्यापक अस्तित्व व्यापक वो वाला नहीं जो कैलकुलेट करते हो
51:18
कि यह ब्रह्मांड फिर ऐसे इतनी सारी और गैलेक्सियां हैं। फिर इतने प्रकाश वर्ष दूर वो है। वो तो तुम्हारा ज्ञान का एकांश
51:27
मात्र है। जो तुमसे सिद्ध हो रहा है वह तुमसे शूद्र ही है।
51:38
असली अस्तित्व जो आप कहते हो ना मैं वह असली अस्तित्व है। तुम असली अस्तित्व
51:45
हो। तुम हो अस्तित्व यार। हां।
51:52
तुम हो परमात्मा। और इसके अतिरिक्त सब झूठ है। सब सब एक
52:00
चक्रव्यूह है। है ना? याद रखना बता रहा हूं सब कुछ चक्रव्यूह
52:11
वो फसोगे जैसे वो फंसा था ना चक्रव्यूह में कौन था वो अभिमन्यु हां
52:33
खुद को शरीर, मन, दुनिया यह सब मान के ही आप गुरु खोजते हो।
52:41
गुरु भी खुद को शरीर, मन, दुनिया को सही मान के आपको ज्ञान देता है।
52:47
तो अब मृत्यु इन मृत्यु इज इक्वल टू क्या होगा?
52:56
वह कह रहे हो तुम। फिर बोलते हो हमारे जीवन में दुख क्यों है?
53:03
खुद ही गलत जी रहे हो तो उसको कौन क्या कर सकता है?
53:09
इतना खतरनाक चक्रव्यूह है ये। पानी को
53:54
तो लकड़ी को डंडा मानना
54:00
है ना खुद को मैं को देह मानना
54:06
लकड़ी को डंडा मान के लकड़ी को जानने चलना
54:16
मैं को देह मान के मैं को जानने चलना कितना कठिन हो गया
54:26
अब लकड़ी को लकड़ी जान, मैं को मैं जान। मैं को कुछ भी मत मान। कितना आसान हो गया।
54:37
और मैं को मैं जानता ही हूं। तभी तो कहता हूं मैं। बगैर जाने थोड़ी ना कहता हूं मैं।
54:48
कितना सरल है।
55:12
अब लकड़ी ने खुद को डंडा मान लिया। है ना? अब मैं इसको बताऊं यह तंत्र, वह मंत्र, यह साधना,
55:22
वह ज्ञान, वह ध्यान तो इसके साथ धोखा है ना।
55:28
सरासर धोखा है। अब ये कितने ही मंत्र कर ले ना।
55:36
जब इसने खुद को मान ही लिया कि मैं डंडा हूं। आपने खुद को मान ही लिया कि मैं देह
55:43
हूं। तो आप कितने ही मंत्र तंत्र साधना कर लो आपका कुछ हो ही नहीं सकता।
55:50
आपने फॉल्स को स्वीकार कर लिया जो है ही नहीं।
55:57
मैं देह हूं बोलने से पहले चेक तो करो।
56:03
परखो तो कि आप रियल में देह हो। जानो तो जानने चलो ना।
56:11
देह को जानने चलो तो क्या मिलता है? निर्भ मिलता है, वेटलेस मिलता है, अनुभव मिलता
56:19
है, हड्डी, मांस, ब्लड कुछ तो मिलता ही नहीं है। तो आप देह कहां से हो गए भैया?
56:29
दुनिया को जानने चलो। पकड़ो कहां है दुनिया? कहां है दुनिया? मिलती नहीं दुनिया।
56:38
जानो तब भी रहे ना भाई। या अनुभव में रहे दोनों में नहीं मिलते लोग
56:46
क्योंकि यह है ही नहीं। देह, मन और दुनिया के अस्तित्व का ही
56:53
इंकार कर दो। हां जी।
56:59
और कर ही दो। बता रहा हूं। इनकी कोई सत्ता नहीं है। केवल स्वयं की
57:09
सत्ता है।
57:37
हां जी
58:28
तो एक चीज बताना देह देह है।
58:35
देह देह है कि देह को देखना देह है।
58:47
देह को देखना देह है। देह देह है।
58:54
कि देह को देखना देह है। जब देखते हो तब देह है ना
59:02
कि देह देह है। जब देखते हो तब देह है ना तो देह है कहां?
59:17
देह को देखना देह है। मन को देखना मन है। दुनिया को देखना दुनिया है। वो भी इनको
59:26
मानकर जानकर नहीं जानकर तो मिलते ही नहीं।
59:35
तो देह को देखना क्या है? देह है।
59:51
मतलब डंडे को देखना डंडा है
1:00:01
और लकड़ी में
1:00:10
लकड़ी में लकड़ी ही लकड़ी है ना देखना दिखना कुछ नहीं है ऐसी मैं में मैं ही मैं हूं
1:00:19
देखना दिखना कुछ नहीं ये सब मान्यताएं मानते हो तभी देखते हो
1:00:30
पहले आप एग्री कर लिए ना देह तभी देखे इसलिए देह मन और दुनिया के अस्तित्व का ही
1:00:38
इंकार करो उड़ा दो गोली से एकदम है ही नहीं ये
1:00:45
मानो ही मत स्वीकार करो ही मत कि यह है और जी के देखो
1:00:54
जीवन मुक्त ततक्षण हां
1:01:52
एकदम से इनके अस्तित्व का इंकार कर दो। बस
1:01:59
खत्म है चैप्टर।
1:02:15
ठीक है और वाणी को विश्राम दें कि और कुछ
1:02:23
फरमाइश डिमांड
1:02:38
बस देह, मन, बुद्धि, संसार, दुनिया इनके अस्तित्व का इंकार कर।
1:02:46
यह है ही नहीं कहीं। हां। बेधड़क जियो।
1:03:06
ओके प्रेम प्रणाम हां जी आप कुछ कह रहे थे
1:03:18
मैं थोड़ा सा पूरे थोड़ा सा करना चाहता हूं मेरा
1:03:25
मैं नहीं पहले पहले जब भी सवाल पूछते हैं तो आपने हमको अभी सुना है दो चार महीने
1:03:33
YouTube में हां जी सुन रहे हैं हां जी हां बताइए आप
1:03:41
मैंने आपको पहले मैंने वोटों को पढ़ा था काफी कुछ पहले किए हुए लेकिन जो आपने जो मैसेज
1:03:50
शुरुआत की जैसे आपकी वीडियो सामने आती हुई तो कहीं ना कहीं में बड़ी काम मैं स्वरूप
1:03:59
रहा हूं। हम ऐसे में एक एक गुरु को भी ध्यान किया हुआ है। यही लोग हो अपने मार्ग
1:04:08
अपने गुरु के पास रखो और जो गुरु जो है अपने ध्यान रखते जाओ और आप बात
1:04:19
तो उनकी भी थोड़ी है कही है लेकिन एक आपने दिया मन से बात नहीं ध्यान रखा और आपने
1:04:30
बोला कि मैं मैं उसको ध्यान रखा मतलब पीछे आ जाओ तो वो मुझे एकदम क्लिक की
1:04:38
बात मैं पीछे खड़ा हो गया मैंने देखा कि हां यार मैं तो ऐसे फसा हुआ था उस चीज में हम
1:04:46
तो मुझे उस बात से उनकी बात भी क्लियर हुई उनके पास वो भी ऐसे कुछ बोल रहे थे लेकिन उनका कहने का तरीका था लेकिन आपका जो
1:04:55
प्रीतम के ये सब प्रेम होता है हमारा रुको आप साइलेंट रहो मैं बताता हूं स्टॉप
1:05:02
करो इनको कि उनकी बात भी ठीक थी वीक थी। ऐसा कुछ नहीं है भाई। हमारा प्रेम रहता है ना तो
1:05:10
हम गुरु में अच्छा अच्छा देख लेते हैं। है ना? इससे बेहतर था कि आप ओशो ही सुनते
1:05:17
वो ज्यादा बेहतर है। है ना? और विचार और
1:05:23
यह हटाना ये वो मतलब क्या हो रहा है ना
1:05:31
एक तुच्छ विचार एक विचार की सामर्थ होती कितनी है?
1:05:39
अब आप उसको देख रहे हो। आप ही का पावर ले रहा है। अब वो अब वो आप पर हावी होगा।
1:05:46
फिर ऐसे कई विचारों को आप देख रहे हो। है ना? तो आप जितने भी विचारों पर फोकस
1:05:56
करोगे तो आप विचारों को ही तो ऊर्जा दे रहे हो। तो विचार बढ़ेंगे कि कम होंगे?
1:06:06
अब आप क्या करते हो? विचारों के बीच के गैप को देखते हो। लेकिन क्या देखते हो मालूम? विचारों के
1:06:15
बीच के गैप को तब भी ध्यान विचारों में ही रहता है आपका।
1:06:22
विचारों के बीच के गैप को बीच का गैप। अरे उसके बीच का गैप तो देखने वाला है विचारों
1:06:31
को वह आप पहले से हो निर्विचार विचारों के बीच के गैप
1:06:40
को जो आप देख रहे हो ना वह खुद देखने वाला है वो आप पहले से हो
1:06:49
वो होना नहीं है आपको निर्विचार बट उसमें क्या होता है विचारों में ही
1:06:57
आपका ध्यान रहता है। गैप गैप आप बोलते रहो। फंसते विचारों में ही हो।
1:07:03
क्योंकि साधना किए यानी फंसे। साधना किए यानी नारायण देश से जीव देश में
1:07:11
आए और जीव देश में आया हुआ बेड़ा गर्त। आप फंसे
1:07:22
आप अपने पद से डाउन हुए ना। वो फसे ना
1:07:36
ये सब जंजाल है बी अलर्ट
1:07:49
और समर्पण का कोई मार्ग नहीं होता भैया। समर्पण में बस समर्पण होता है।
1:07:55
है ना? उसको भी एक्सरसाइज करके थोड़ी ना आप करोगे कि यह समर्पण मार्ग है। यह जो तरह-तरह के ज्ञान मार्ग है, वो मार्ग है,
1:08:08
क्रिया योगा है, भक्ति मार्ग है। यार मार्ग ही तो है यह।
1:08:18
मार्ग ही तो है ना। और हम बता रहे हैं मंजिल। आप स्वयं
1:08:27
मंजिल हो। मंजिल हो के मार्ग में चल रहे हो।
1:08:34
अब चाहे वो कोई भी मार्ग हो। मंजिल होके
1:08:42
मार्ग में चलना अच्छी बात नहीं है।
1:09:05
मेरी बात पल्ले नहीं पड़ती तो महर्षि मुक्त वो फेमस नहीं है। उनकी कुछ बुक्स मिलेंगी वह पढ़ लो। उनकी बात भी पल्ले
1:09:14
नहीं पड़ती तो होशों को सुन लो। है ना? और इधरउधर मत भटकना।
1:09:23
बहुत खतरनाक चीजें हैं। है ना? सबका सम्मान करो। सबको प्रणाम करो। बट इधर-उधर नहीं
1:09:33
भटकना। ठीक है। रमना वगैरह भी आप पढ़ सकते हो।
1:09:42
महाराज जी का क्या नाम था? निस्गदत्त महाराज हैं। और जय कृष्ण मूर्ति हैं। यह पढ़ लो तो
1:09:52
इससे भी एक मैच्योरिटी आएगी। सही सेंस जाएगा। है ना?
1:09:59
गीता है, रामायण है। सिंपल चीजें भी पढ़ लो। बाकी भैया इधरउधर बहुत प्रपंच है।
1:10:26
तो निर्विचार होके ही आप विचारों को देखते हो। विचारों को जो देख रहा है वह खुद
1:10:35
निर्विचार है। तो विचारों को क्यों देख रहा है?
1:10:42
जब खुद निर्विचार है तो विचारों को क्यों देख रहा है? वह जानता ही नहीं कि वह खुद
1:10:49
निर्विचार है इसलिए विचारों को देख रहा है। तुम जानते ही नहीं कि तुम सहज में
1:10:58
निर्विचार हो करके ही विचारों को देख रहे हो।
1:11:05
अपने होने में देखो ना कोई भी विचार उठता है क्या?
1:11:15
स्वयं में अपने होने के एहसास में देखने वाले में चले जाओ
1:11:25
तुरंत विचार गायब हो जाएगा।
1:11:35
हम विचारों में फोकस करते हैं। रिवर्स मारो देखने वाले में जो विचारों को देख रहा है।
1:11:49
तो जो देख रहा है वहां एक भी विचार उठ सकता है क्या? वो निर्विचार है। देखने
1:11:56
वाला यानी आप खुद हो देखने वाले। आप स्वयं निर्विचार हो ही होना होना नहीं
1:12:04
है।
1:12:15
स्वयं भावातीत हो ही होना नहीं है।
1:12:55
तो विचारों को देखना ही विचार है।
1:13:03
भावों को देखना ही भाव है। देह को देखना ही देह है।
1:13:13
मन को देखना ही मन है। दुनिया को देखना ही दुनिया है। क्योंकि देखते हो तभी दिखता
1:13:21
है। नहीं देखते हो तो यह सब नहीं दिखता है।
1:13:30
तो देखने वाला ही तो दिखता है।
1:13:51
तो ठीक ठीक उल्टा
1:13:59
विचारों को ना देखना ही निर्विचार है।
1:14:07
देह को ना देखना ही विदेह है।
1:14:16
भावों को ना देखना ही भावा तीत है। क्यों देखना है?
1:14:33
कुछ देखना ही नहीं है। बस अपना आप
1:14:43
हूं। क्या देखना है यार?
1:14:49
मेरे देखने लायक कुछ बना ही नहीं है ऐसा जो मैं देखूं।
1:15:31
निर्विचार निर्विचार विचार की आंखें
1:15:44
निर्विचार आपकी बींग
1:15:53
तुम खुद निर्विचार
1:16:09
अपनी महत्ता को पहचानो। जो तुम हो उसको पहचानो अच्छे से।
1:16:20
जो भी तुम होना चाहते हो ना वह तुम पहले से हो। निर्विचार भावातीत
1:16:28
परमात्मा अस्तित्व जो तुम होना चाहते हो वो तुम पहले से हो तो यह होना क्यों चाहते हो?
1:16:39
जब तुम पहले से हो तो यह होना क्यों चाहते हो?
1:16:45
तुमने खुद को कुछ मान लिया है शरीर वगैरह इसलिए होना चाहते हो।
1:16:53
वरना तुम भी होना नहीं चाहते। यस।
1:17:03
तुमने खुद को जीव शरीर मान लिया है इसलिए होना चाहते हो।
1:17:10
वरना तुम भी होना नहीं चाहते। वह तो तुम हो ही। ओके।
1:17:18
इनफ फॉर फॉर एवर। यस।
1:17:30
यानी लकड़ी खुद को डंडा मान लिया है और फिर लकड़ी होना चाहता है।
1:17:39
तुमने खुद को जीव या देह मान लिया है। इसलिए यह सब अस्तित्व परमात्मा यह सब
1:17:48
निर्विचार होना चाहते हो। यह आपको होना नहीं है। मान्यता बस हटा दो।
1:17:58
वह तो आप हो ही है। सब सहज में तो क्या होना चाहते हो भैया?
1:18:57
तो घुमा फिरा के आप अपने में ही क्यों आ जाते हो?
1:19:06
क्योंकि आपके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। इसलिए आ जाते हो। ठीक है? इसलिए मस्त रहो
1:19:14
और मस्त रहो। सभी को प्रेम प्रणाम।