0:00
कर लो।
0:50
[हंसी]
0:57
हां चालू कर लो। बताओ क्या टॉपिक है आज का?
1:25
बहुत दिन बाद बहुत सारी दुनियादारी की मैं बातें किया आज के दिन।
1:37
कुछ ऐसे ही लोग मिले सुबह से
1:48
तो जो संसारी बातें हैं या आउटर वर्ल्ड की बातें हैं।
1:55
वो मेरे को आउटर लगती नहीं है।
2:02
मेरे को ऐसा लगता ही नहीं है कि कोई और विषय आ गया जो मेरे से कुछ अलग है।
2:14
मजे से बात किया सब।
2:17
[हंसी]
2:32
तो आनंद है उसका भी।
2:36
चॉइसलेसनेस में कोई फर्क नहीं पड़ता। है ना? फिर भी एक चॉइस होती है।
2:46
कि सत्संग हो सत्य की बातें हो, प्रभु की बातें हो।
2:56
अब कृष्ण के लिए तो कौरव पांडव चॉइसलेसनेस है ना
3:03
फिर भी चॉइस है पांडवों के साथ रहे गोविंद
3:10
और पांडवों में भी अर्जुन को गीता सुनाए है कि नहीं
3:22
तो अद्भुत है अलौकिक है ये जीवन चॉइसलेसनेस होते हुए भी कोई चॉइस होती है
3:32
हां और चॉइस होते हुए भी कोई चॉइस नहीं होती
3:43
क्योंकि होता है ना नदी का फ्लो एक जगह ही ज्यादा बहता है
3:49
[नाक से की जाने वाली आवाज़]
3:59
तो बताओ आप लोग क्या सुनना पसंद करोगे?
4:04
ऑन करो सबको जो भी कुछ कहना चाहे
4:12
बताओ हम
4:26
मैं को सिर्फ मैं ही सुनाओ। यह बात तो सत्य है।
4:41
क्योंकि जो सिर्फ मैं ही सुनना चाहता है और कुछ नहीं सुनना चाहता।
4:51
वह उसको मैं का बोध हो जाता है।
5:13
हां जी।
5:25
बहुत ही अल्टीमेट चाय बनी है। आप कैसे सीख गए इतनी अच्छी चाय बनाना?
5:34
[हंसी]
5:35
तो और है क्या ये? हां अभी पीने दो, पीने दो। अच्छी चाय यानी अच्छा सत्संग।
5:43
[हंसी]
5:48
क्या शराबियों का मूड बनता है ना? जैसे पी के हमारा मूड चाय से बनता है। क्या करें?
5:58
[हंसी]
6:02
चाय वाले बाबा
6:04
[हंसी]
6:17
तो बताओ आप लोग खामोश कैसे हो यार ऐसे खुलो मेरे से ऐसे मौन मौन मत रहो मौन में कुछ नहीं मिलता
6:26
मरने के बाद मौन हो जाना अभी से क्यों मौन होते हो?
6:45
मेरे को इतनी खुशी हुई मैं ओशो प्रेमी रहा
6:51
और उस समय जो ओशो के डिसाइपल थे जो ओशो के साथ थे
6:57
उन्होंने इतने खुल के प्रश्न किए हर तरह के प्रश्न मेरे को बहुत खुशी हुई।
7:08
इतनी ईमानदारी से खुल के प्रश्न करना यह लाजवाब है।
7:17
लोग डरे डरे रहते हैं। खुल के कुछ पूछ भी नहीं पाते।
7:23
वह अंदर ही रह जाती है उनकी बात।
7:28
फिरोशों का खुल के जवाब देना और ज्यादा खुल के यह और आनंद आई है
7:40
तब कोई समाधान निकलता है ना जब मास्टर के सामने आप कुछ ओपनली पूछते हो
7:49
टू द पॉइंट अपने आत्म कल्याण के लिए
7:58
नहीं तो आप शरीफ बने रहते हो, धानी ज्ञानी बने रहते हो और अंदर कुछ और चल रहा है। आप कुछ पूछते ही नहीं हो।
8:08
तो वो तो फेक है ना पूरा।
8:16
ईमानदार होना जरूरी है। जो अंदर लग रहा है जेनुइन वह पूछना चाहिए। उसको क्लियर करना चाहिए।
8:29
हमको कुछ पता होगा तो हम बता देंगे।
8:42
साधु बनने और साधु होने में बहुत फर्क होता है। गुरु बनने और गुरु होने में बहुत फर्क होता है।
9:00
बहुत फर्क है उसमें।
9:17
गुरु अगर आप सम्मान पाने को बन रहे हो बने हो अगर तो आपने अपमान को निमंत्रण दे दिया।
9:31
उससे आप नहीं बच सकते। बनना यानी खतरनाक चीज।
9:50
अंतर्यामी को गुरु बनना पड़ता है।
9:54
और अंतर्यामी सब जानता है ना? उसको गुरु थोड़ी ना बनना पड़ता है।
10:02
वैसे सहज हां जी
10:16
जी प्रभु मेरी आवाज आ रही है हां आ रही है
10:23
जी प्रभु जी प्रेम प्रणाम प्रेम प्रणाम जी
10:30
मैं ये पूछना चाह रही थी कि आत्मा आत्मनिष्ठा जो आप कह रहे हैं
10:36
वो आत्म निष्ठा का मैं जैसे मैं कैसे मुझे कैसे लगे कि मेम आत्म निष्ठा
10:43
प्रैक्टिकल कैसे यूज है उसका वर्क उस मेरे ऊपर मुझे वर्क कैसे करना है आत्म निष्ठा
10:51
काना आत्म निष्ठा अर्थात अब किसी और पर निष्ठा
11:00
नहीं करूंगा या नहीं करूंगी है ना?
11:05
अब काल्पनिक भगवान नहीं आत्मिक भगवान। मैं आत्मा भगवान।
11:16
अब मैं के अतिरिक्त किसी और पर निष्ठा मैं करूंगी ही नहीं।
11:22
ना देह पर, ना मन पर, ना बुद्धि पर, ना दुनिया पे क्योंकि कोई भी निष्ठा के लायक ही नहीं।
11:35
सिर्फ स्वयं पे मैं आत्मा भगवान पर निष्ठा।
11:41
बहुत डिफरेंस है। काल्पनिक भगवान नहीं आत्मिक भगवान।
11:49
हमारा भगवान जो रहता है वह मन का भगवान रहता है। इस चीज को हर कोई नोट कर लो।
11:59
हमारा भगवान मन का भगवान रहता है। काल्पनिक भगवान रहता है।
12:10
और असली भगवान आत्मिक होता है। [हंसी] असली भगवान आत्मिक होता है।
12:21
मैं आत्मा भगवान।
12:25
तो मेन मुद्दा जो है ना
12:35
पहले तो काल्पनिक भगवान को हटाओ वह मन का भगवान है। आत्मिक भगवान में आओ। आपका स्वयं ही आपकी आत्मा ही परमात्मा है।
12:47
प्रथम प्रथम देह पर निष्ठा मत करो।
12:56
यह 80 100 साल का नाटक है। देह के रिलेशन देह यह सब नाटक है।
13:08
सब मिट जाता है। सब एक भ्रम है।
13:12
वह आप भी जानते हो। फिर भी इस पर निष्ठा करते हो। मन पर निष्ठा मत करो। हर बार धोखा देगा।
13:23
निष्ठा किसी पर मत करो। स्वयं पर बस
13:29
और कोई भी निष्ठा का पात्र नहीं
13:38
और जो खुद पर निष्ठा नहीं कर सका क्या आपको लगता है वह किसी पर निष्ठा कर
13:47
पाएगा जिसकी निष्ठा खुद पे ही नहीं है तो वह किस पर निष्ठा कर पाएगा?
14:02
उसकी निष्ठा भी एक धोखा है।
14:08
तो वो बस ट्राई मार रहा है। करके देखते हैं क्या होता है।
14:26
सबसे दुर्लभ बात है
14:45
सबसे दुर्लभ है आत्मनिष्ठा।
14:55
पुराने शब्दों में इसी को केवल निर्वाण, मोक्ष, बुद्धत्व, परमात्मा, अस्तित्व कहा जाता था। जिसको मैं अब आत्म निष्ठा कहता हूं।
15:09
क्योंकि उनमें एक धोखा है। वह पुराने वर्ड्स में एक धोखा है।
15:17
उसमें फिर आप एक कल्पना करते हो। फिर फ्यूचर में चले जाते हो।
15:24
और आत्मा यानी मैं। मैं मैं आपको भविष्य में जाना ही नहीं है।
15:31
अभी के अभी है ना मैं? इसमें आपको हियर एंड नाउ साधना नहीं है।
15:37
मैं तो अभी हूं यही हूं। इवन अभी से पहले हूं।
15:46
सब आ जाता है आत्मनिष्ठा। समय से पहले।
15:57
मैं हूं।
16:00
इसमें कोई साधना ही नहीं है। तो फ्यूचर कहां से आएगा?
16:06
साध्य में फ्यूचर नहीं है।
16:18
हर चीज आती है जाती है। मैं आता जाता नहीं। बनता बिगड़ता नहीं।
16:28
होने ना होने से परे सदैव मैं हूं।
16:39
मेरा कोई आदि अंत नहीं।
16:45
और यह कोई बातें नहीं है। यह आप हो। मैं आपकी बात कर रहा हूं।
16:54
मैं किसी और की बात नहीं कर रहा हूं। आपकी आत्मा की बात हो रही है। मैं की बात हो रही है।
17:06
आदि अंत को जासु ना पावा।
17:10
वह आत्मा राम केवल आपकी आत्मा है। और फिर सब की आत्मा है।
17:18
सर्व आत्मा राम
17:25
पहले अपने से टेली करो स्वयं पर निष्ठा अनंत निष्ठा
17:36
कल्पना के भगवान से भी ज्यादा निष्ठा
17:56
मैं समझ सकता हूं आप अपने आप में झुक नहीं सकते है ना
18:05
अपने प्रति आप शरणागत नहीं हो सकते नहीं तो डलिटी आ जाएगी
18:11
खुद के पैर छुओगे तो डैलिटी आ जाएगी शरणागत होगे तो शरणागत होने वाला और मैं फिर ड्वेलिटी िटी आ जाएगी।
18:22
है ना?
18:25
अपना आप ध्यान नहीं कर सकते क्योंकि जो ध्यान कर रहा है और जिसका कर रहा है डलिटी आ जाएगी।
18:33
यह दुविधा है वहां पे। अपने से आप प्रेम भी नहीं कर सकते। क्योंकि फिर डलिटी आ जाएगी।
18:45
मैं समझता हूं यह आपकी दुविधा है कि अपने प्रति कैसे समर्पण करें। अपने प्रति कैसे प्रेम अपना ध्यान कैसे करें?
18:57
अपने प्रति कैसे झुक जाएं।
19:00
अरे यही तो प्लस पॉइंट है कि अपने प्रति आपको झुकना भी नहीं है।
19:08
ध्यान भी नहीं करना है। समर्पण भी नहीं करना है।
19:14
देखना भी नहीं है खुद को।
19:21
अरे भाई ध्यान करके आप चाहते क्या हो जो ध्यान करके आप पाना चाहते हो आप पहले से हो। जो समर्पण करके आप पाना चाहते हो आप पहले से हो।
19:33
जो झुक के आपको फील आता है जो पाना चाहते हो आप पहले से हो।
19:53
एकमात्र मेरी शरण आया मैं की शरण आ तो चलो अर्जुन उस समय अलग था कृष्ण अलग है
20:01
तो कृष्ण ने कहा अब इस पॉइंट पे आप अगर अलग करके खुद को जीव समर्पण कर रहा
20:11
है मैं आत्मा भगवान में तो फिर डलिटी हो गई ना वो रॉन्ग हो जाएगा
20:21
यही आनंद है कि यहां समर्पण भी नहीं करना है।
20:32
यह प्लस पॉइंट है। यह कोई माइनस नहीं है।
20:41
समर्पण करने के बाद अर्जुन के सारे संशय गिर गए।
20:47
ओके। अब मैं क्या बोल रहा हूं? मैं देश में मैं हूं में किसी को भी कोई संशय है क्या?
20:56
वहां तो पहले से ही संशय नहीं है। गिराना भी नहीं है। अरे क्या?
21:04
हां बोलने का है डंडा दो [हंसी]
21:11
बताओ ना वहां तो भाई आपको कोई संशय है क्या किसी को भी स्वयं में है तो बता दो
21:22
तो यह आनंद हुआ ना कि आपको समर्पण भी नहीं करना है
21:34
आपको अपना ध्यान भी नहीं करना है। अपने को देखना भी नहीं है। क्योंकि मैं दिखता ही नहीं हूं।
21:44
जो दिख जाए वह मैं नहीं हूं।
21:48
फिर आप बोलते हो मैं दिखता नहीं। मैं देखता हूं। अरे मैं देखता भी नहीं हूं।
21:56
बस मैं हूं। वहां देखना और दिखना दोनों जख्म है।
22:04
बस मैं हूं। देखना दिखना कुछ नहीं है वहां।
22:16
तो आपको आपको क्या है मालूम? आपको एक प्रॉब्लम है।
22:23
आपको हर चीज को विषय बनाना है। परमात्मा को भी विषय बनाना है। देखना है।
22:31
देखा विषय को जाता है।
22:37
फिर भी यह आंसर ज्यादा ठीक है कि मैं दिखता नहीं देखता हूं।
22:44
मैं देखने वाला हूं। यह फिर भी ठीक है। बहुत सही है। उससे तो फाइनल में मैं हूं।
22:52
देखना दिखना कुछ नहीं है।
23:01
तो आज तक मेरे को एक बात बताओ किसी को भी पूरे चराचर में आज तक जितने भी पैदा हुए
23:10
या आज जो हैं किसी को भी परमात्मा क्यों नहीं दिखा?
23:19
क्योंकि देखने वाला खुद परमात्मा है।
23:23
इसलिए नहीं दिखा जो परमात्मा देखना चाह रहा है वह खुद परमात्मा है।
23:36
हालांकि चाहता मन है।
23:39
है ना? फिर भी मन को जो जानने वाला है बोलो। या जो देखने वाला है वह खुद परमात्मा है।
23:49
इसलिए किसी को परमात्मा नहीं दिखा।
23:57
लेकिन वह देखने वाला वह परमात्मा केवल मैं हूं। यह है आत्मनिष्ठा।
24:04
आप अपने अंदर क्या डालकर रखे हो कि वह परमात्मा मैं ना निकल जाऊं।
24:10
कोई और ही निकले परमात्मा।
24:15
भगवान कोई और ही हो जिसको मैं देखूं और जिससे मैं मिलूं।
24:23
यह मन का भगवान है। कल्पना का आत्मिक भगवान नहीं है।
24:30
आत्मिक भगवान वह परमात्मा
24:38
केवल मैं तत्व मसी श्वेत केतु तू वही है।
24:50
वह मैं ही हूं।
24:55
वो मैं ही हूं।
24:59
यह है आत्म निष्ठा। वह अस्तित्व वह परमात्मा राम कृष्ण शिव मैं ही हूं।
25:07
यह है आत्म निष्ठा। मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
25:19
और आपके अंदर इतना रॉन्ग डला हुआ है कि वह भगवान वो परमात्मा कोई और ही निकले।
25:29
अरे कोई और कैसे निकलेगा भाई? कोई और कैसे निकलेगा?
26:17
आप बहुत गलत चीजें चाहते हो कि परमात्मा दिख जाए यह गलत चाह है आपकी
26:24
परमात्मा को जान लूं हमेशा किसी और चीज को जाना जाता है यह गलत चाह है आपकी
26:36
परमात्मा से मिलूं। यह गलत चाह है आपकी।
27:17
तो जो मैं हूं
27:26
जो मैं हूं
27:33
इसमें किसी भी तरह की शंका, डाउट,
27:40
परेशानी,
27:53
आपका पस्ट मैं हूं ही असली परमात्मा है।
27:59
जिसको सिर्फ आप कहते हो मैं हूं।
28:07
आपका मींस आप आपका में फिर आप अलग कर लोगे कि मेरा आप ओरिजिनल परमात्मा हो।
28:19
तू ओरिजिनल परमात्मा है। तू यह लैंग्वेज सही है।
28:27
स्ट्रेट तो तू जीव होकर खुद को जीव मान के परमात्मा को खोज रहा है।
28:43
तू खुद को परमात्मा जान के परमात्मा नहीं खोज रहा है।
28:54
तू खुद को व्यक्तित्व मान के अस्तित्व खोज रहा है। तू खुद को अस्तित्व जान के अस्तित्व नहीं खोज रहा है।
29:24
तो परमात्मा दिख जाए परमात्मा से मिल लूं।
29:28
परमात्मा में समर्पण कर दूं।
29:32
परमात्मा का ध्यान करूं। परमात्मा को जानूं। यह सारे भावों को छोड़ो।
29:44
परमात्मा कभी दिखेगा नहीं। कभी नहीं दिखेगा। क्योंकि वह मैं हूं।
29:52
इतना ही जान लो आप मैं को नहीं जान सकते।
29:55
मैं को जिंदगी भर सुन लो तो भी नहीं जान सकते क्योंकि वह मैं हूं।
30:02
और मैं से आप मिल नहीं सकते।
30:07
डलिटी में मिलना होता है ना
30:25
तो यह मिलना जानना देखना इसका कारण क्या है मालूम आप चाहते ही हो कि परमात्मा कोई
30:32
और निकले मैं ना निकल जाऊं इसलिए आप देखना चाहते हो, साधना करना चाहते हो, ध्यान करना चाहते हो, मिलना
30:41
चाहते हो। केवल एकमात्र कारण यही है कि परमात्मा दिख जाए, मिल जाऊं, जान जाऊं।
30:53
एकमात्र कारण यही है क्योंकि आप चाहते ही नहीं हो कि वह
31:01
परमात्मा आप ही निकलो और आप ही निकलोगे और कहीं नहीं निकलेगा।
31:11
ना जानने में, ना देखने में, ना मिलने में किसी भी एंगल में नहीं आएगा।
31:21
अरे जब कोई और परमात्मा जो आपके मन का है
31:30
कोई और परमात्मा यानी मन ही का होता है और मैं परमात्मा आत्मा का होता है
31:39
अनदर मन का होता है जब कोई और परमात्मा
31:45
जो आपके ख्यालों का मानसिक काल्पनिक
31:53
जिससे आप मिलना चाहते हो तो वह मिलेगा तो वह बिछड़ेगा ना यार इतनी
32:01
सी बुद्धि नहीं है क्या जो मिलेगा वो बिछड़ेगा
32:08
जिसको जान लोगे वह नहीं जानना हो जाएगा जिसको देख लोगे वह फिर अनदेखा हो जाएगा
32:18
इतनी बुद्धि तो रखो और परमात्मा तो नित्य होता है। निरंतर होता है।
32:29
यह आने जाने वाला माया है। मन का परमात्मा है।
32:41
जो साधना से मिलेगा वह साधना छोड़ दोगे तो छूट जाएगा।
32:47
जो ध्यान से मिलेगा ध्यान नहीं करोगे छूट जाएगा जो सजगता से मिलेगा जिस दिन सजगता छूटेगी
32:56
वह भी छूट जाएगा तो ऐसे परमात्मा को पहले ही छोड़ दो
33:03
क्योंकि वह मन का है असली नहीं है
33:10
असली परमात्मा आपका स्वयं
33:16
मैं आत्मा भगवान असली परमात्मा कृपालु होता है। दयालु होता
33:24
है। वह इतना आपको सताता नहीं है मिलने के लिए
33:34
कि इतना तप करो इतना वो करो इतना वो करो तो मिलेगा तो मिलूंगा।
33:43
सताने वाला परमात्मा मन का होता है। थोड़ा समझो चीजों को ना बुद्धि यूज़ करो। आज ना
33:51
आज नासमझ मत होना। [हंसी] आज समझदार बनना।
34:00
सताने वाला परमात्मा, तड़पाने वाला परमात्मा या अस्तित्व जो भी बोल लो वह मन का होता है।
34:12
असली परमात्मा दयालु कृपालु सहज
34:18
इसी क्षण में मौजूद प्रत्यक्ष होता है
34:24
वो आता जाता कभी नहीं तो आप किसी भी काल्पनिक
34:34
भविष्य में मिलने वाले परमात्मा को खोज रहे हो तो भविष्य केवल वल मन का होता है।
34:44
आत्मा का नहीं होता। आत्मा में समय नहीं होता। भविष्य मन का होता है, माया का होता है।
34:52
है ना?
34:59
मतलब आप सोचो कि आप क्या आपकी तलाश ही सही हैं।
35:07
क्या पता आपकी तलाश ही गलत हो। वो गलत है।
35:14
काल्पनिक भगवान नहीं आत्मिक भगवान
35:28
मैं आत्मा भगवान।
35:41
अब आपको और एक चीज बताऊं।
35:46
आपको भगवान नहीं चाहिए। आपको भगवान का नाम चाहिए।
35:51
फिर आप बोलोगे बाद में नाम से नाम ही अलग नहीं होता। यह क्या कर रहे हो यार?
35:58
है कि नहीं?
36:01
सीधा भगवान जो आप स्वयं हो
36:08
नामी सीधा नामी फिर भले नाम ले लेना और आप अपना नाम लेते ही हो मैं हूं
36:18
हर कोई अपना नाम लेता है मैं हूं चाहे कोई भी देवता हो कोई भी मनुष्य हो
36:26
किसी भी धर्म वाला हो अपना नाम क्या है उसका असली नाम मैं हूं। फिर जो मैं देह हूं,
36:34
मैं मन हूं, मेरा यह नाम है, वह है, वह सब माया है।
36:46
तो आपको भगवान नहीं चाहिए, भगवान का नाम चाहिए।
36:54
आपको भगवान नहीं चाहिए, भगवान की कहानियां चाहिए।
37:04
आपको भगवान नहीं चाहिए। भगवान की याद चाहिए। समझ रहे हो कैसे-कैसे धोखे खाते हो आप।
37:15
कितने शार्प धोखे हैं ये।
37:22
और एक्चुअल भगवान जो आपका होना है आपका स्वयं है हर किसी का स्वयं है
37:35
उस पर आपको निष्ठा करनी पड़ रही है कि कोई इधर से कोई गुरु टाइप का कोई अमित आ के निष्ठा करा रहा है। यह शर्म की बात है।
37:49
इतनी भी बुद्धि नहीं है तुम लोगों को कि इसको भी मेरे को बताना पड़ रहा है।
37:58
इसमें भी तुमको चाहिए कि कोई आकर बता दे सील थप्पा लगा दे।
38:19
तुमको लगता है मैं तुम्हारा ध्यान साधना छुड़ा रहा हूं। तुच्ची चीजों को छुड़ाने नहीं आया हूं मैं।
38:28
असली चीज बताने आया हूं जो तुम खुद ही हो।
38:38
सब छुड़ा देते हो। यह कुछ भी पकड़ने नहीं देते। क्यों पकड़ने दूं मैं तुमको कुछ भी?
38:46
क्यों पकड़ने दूं तुमको कुछ भी परमात्मा होके तुमको क्या पकड़ना है
38:56
क्या जानना है क्या देखना है परमात्मा को कुछ देखना है क्या
39:02
साइड चेंज करो जीव की साइड से परमात्मा की साइड में आओ स्वयं को परमात्मा जानो जीव
39:11
मत मानो परमात्मा को कुछ देखना है क्या जानना है क्या कुछ होना है क्या
39:20
परमात्मा को भी इनलाइटेंड होना है क्या कैवल्य समाधि
39:28
परमात्मा भी किसी का ध्यान करेगा
39:37
वो तुम हो उससे कम तुम हो ही नहीं सकते चाहोगे तो भी नहीं हो सकते
39:46
जिंदगी भर मैं जी हूं जी हूं जपते रहो तब भी तुम परमात्मा हो
39:52
इसको बदला ही नहीं जा सकता अकाट्य सत्य है
40:06
परमात्मा अपना नाम जपेगा क्या वो तो कोई पूछता है तब कहता है मैं हूं वो
40:12
तो मैं हूं भी नहीं कहता और परमात्मा मतलब मैं तुम्हारी बात कर रहा
40:20
हूं ना फिर मत समझना कि कभी हम परमात्मा होंगे भविष्य में जब यह बात अच्छे से समझ
40:27
जाएंगे फिर मन आपका खेल रहा है क्या समझना क्या है इसमें
40:35
बेवकूफ हो क्या समझना है
40:44
जो चीज नित्य रहती है हमेशा रहती है। वह तो सिर्फ आप ही हो जिसको कहते हो मैं हूं।
40:56
मैं का कभी भी अभाव होता है क्या? इतनी सी बात को मैं कितनी बार बताया हूं। तुम क्यों इसको ग्रहण नहीं करते?
41:21
तुमको दिक्कत क्या है?
41:26
क्यों कोई और ही परमात्मा तुमको चाहिए कब तक धोखा खाओगे भाई?
41:56
देखो भाई जिसका कभी भी एक क्षण को भी अभाव नहीं होता केवल वही परमात्मा हो सकता है।
42:04
वो सिर्फ मैं हूं। है ना? जिसका कभी भी एक क्षण को भी अभाव नहीं होता,
42:11
वही सर्वशक्तिमान हो सकता है और कोई नहीं हो सकता।
42:17
जिसका अभाव हो जाए वह सर्वशक्तिमान होगा कैसे?
42:24
वह तो सिर्फ आपका होना है जिसका कभी भी अभाव नहीं होता।
42:38
जो कभी अप्रिय नहीं लगता वही परमात्मा होगा ना।
42:48
मैं अपने आप को कभी भी अप्रिय लगता हूं।
42:55
कल्पना का भगवान जब आपकी इच्छाएं पूरी नहीं करता तो वह भी अप्रिय लगता है। हां वह भी लगता है। उससे भी आप नाराज होते हो।
43:07
अपने आप से कभी नाराज हुए हो?
43:13
अपने आप में कभी भी किसी को भी आज तक कोई भी अपने आप से बोर हुआ?
43:21
नहीं हुआ क्योंकि आप स्वयं आनंद हो सच्चिदानंद हो
43:28
अपने आप से कोई बोर हुआ क्या खुद को देह मान के मन मान के जो आप बोर होते हो वह
43:36
मानसिक है लेकिन अपने आप से कभी भी कोई भी बोर हुआ क्या आज तक
43:44
क्योंकि वह सच्चिदानंद है आपका स्वयं हम
44:12
निर्विरोध सिद्धांत है वेदांत का।
44:20
जिसका कोई विरोध ही नहीं कर सकता वही परमात्मा होता है।
44:27
राम का विरोध रावण ने किया। कृष्ण का विरोध कंस ने किया।
44:37
रावण ने क्या अपने मैं का विरोध किया। राम क्या अपने मैं का विरोध कर सकते हैं?
44:46
तो वह मैं असली राम है।
44:51
एक्चुअल राम जो सब में रमा है जिसको मैं आपकी आत्मा कह रहा हूं। जिसको आप मैं हूं कहते हो।
45:00
जिसका कोई विरोधी होता ही नहीं।
45:05
कृष्ण अपना विरोध कर सकते हैं। कंस अपना विरोध कर सकता है। वह असली कृष्ण है। असली वासुदेव है। जिसका वास सब जगह है। आप में भी है।
45:19
यह मैं हूं के ही सुंदरतम नाम है। राम, कृष्ण, शिव। जिसका कोई विरोध कर ही नहीं सकता।
45:27
निर्विरोध सिद्धांत। वही परमात्मा है।
45:33
असली ओरिजिनल
45:44
और आप बड़ा प्रेम प्रेम करते हो जब तक असली का पता नहीं है। आपको प्रेम भी नहीं हो सकता। आप प्रेम को भी नहीं जान सकते।
45:57
नकली माल से प्रेम नहीं होता है।
46:00
ज़ेरॉक्स कल्पना का भगवान ज़ेरॉक्स है। उससे कैसे प्रेम करोगे?
46:06
वह भगवान मन का है और तुम्हारा प्रेम भी मन का है।
46:13
आत्मिक प्रेम नहीं है।
46:17
और भगवान भी आत्मिक होता है। प्रेम भी आत्मिक होता है। ज्ञान भी आत्मिक होता है।
46:24
और कोई प्रेम नहीं होता और कोई ज्ञान नहीं होता है। होता है तो आत्मिक होता है।
46:35
अरे चाय पिलाओ यार।
46:38
[हंसी]
46:39
पानी दो। तू बैठ। पानी दे।
47:14
तो गलत धारणाएं गलत मान्यताएं तो कटेंग ही हां
47:28
कल्पना के भगवान फिर काल्पनिक गुरु में आप उलझे रहते हो अभी देखता हूं कोई जय कृष्ण
47:34
मूर्ति में कोई ओशो में कोई रमना में वो काल्पनिक अब जब लाइव थे तब तो आप लाभ ले
47:42
नहीं पाए अब अपने दिमाग को चलाते हो उसमें जो तुमको पसंद और खेल चलता रहता है।
48:01
हां वो लाइव होते तो तुमको झाड़ते जैसे मैं अभी झाड़ रहा हूं। वो तुमको बुरा लगता है।
48:08
हां। हर बार प्यार ही थोड़ी ना करूंगा।
48:36
ओम
48:56
अरे मैं तुमको परमात्मा बता थोड़ी ना रहा हूं। मतलब
49:03
तुम कुछ और हो कैसे गए यह मेरे को समझ नहीं आता।
49:14
कैसे हो सकते हो तुम कुछ और असंभव
50:28
तो वो परमात्मा मैं ही हूं।
50:32
ऐसी निष्ठा ही आत्म निष्ठा है। वह अस्तित्व, वो एक्जिस्टेंस केवल मैं हूं।
50:40
ऐसी निष्ठा ही आत्म निष्ठा है। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, भवानी,
50:48
महालक्ष्मी, नारायण जो भी है वह मैं ही हूं।
50:54
ऐसी निष्ठा, आत्म निष्ठा है।
51:00
सत्यों का सत्य, परम सत्य और उसका भी सत्य मैं ही हूं।
51:07
ऐसी निष्ठा आत्म निष्ठा संपूर्ण संतों सारे संतों सारे गुरुओं
51:16
सारे सद्गुरुओं का सार मैं हूं यह आत्मनिष्ठा है।
51:27
इससे कम में नहीं होती निष्ठा।
51:31
हां। हां चिल्लर थोड़ी ना है। कुछ भी सोचोगे, कुछ भी जिओगे तो आत्मनिष्ठा हो जाएगी। इससे कम सोचना ही यहां पाप है।
51:40
आत्मनिष्ठा में।
51:56
केवल मैं ही जगत पति हूं। यह है आत्मनिष्ठा।
52:06
मायापति मैं हूं। यह है आत्मनिष्ठा।
52:12
माया से घबराते रहते हो। तुम कांपते रहते हो। अरे तुम मायापति हो।
52:19
माया तुम्हारा आनंद है। भय नहीं। और उसके तुम पति हो।
52:26
तुम हो मायापति। फिर मायापति को भी कोई और मत समझना। यह है आत्मनिष्ठा।
52:47
अब वो परमात्मा मैं हूं। वह अस्तित्व मैं हूं। यह सब मैं हूं। अरे बस मैं हूं। यह है आत्मनिष्ठा।
52:58
आप क्यों कंपैरिजन कर रहे हो? बड़ी-बड़ी चीजों से, अस्तित्व से, परमात्मा से फिर वह पावरफुल चीजों से जो कंपैरिजन आप करते
53:07
हो खुद का वही रॉन्ग है। सीधी सा बात मैं हूं आत्मनिष्ठा।
53:16
अरे मैं हूं वह छोटा बड़ा कंपैरिजन कंपैरिजन।
53:24
कोई जरूरत ही नहीं उसकी।
53:48
तो भगवान का नाम नहीं भगवान भगवान नहीं मैं यह है आत्मनिष्ठा
53:56
भगवान का नाम नहीं भगवान भगवान नहीं मैं यह है आत्मनिष्ठा
54:06
मैं आत्मा भगवान में अब आत्मा भगवान भी फट गया। प्यरेस्ट फार्म आपका मैं जिसको बोलना भी नहीं है मैं।
54:27
आत्मनस्टिक को तो मैं तक नहीं कहना पड़ता। इतनी निष्ठा है उसको।
54:34
समझ रहे हो? मैं तक नहीं कहना पड़ता।
54:56
तो काल्पनिक भगवान नहीं आत्मिक भगवान।
55:00
आत्मिक भगवान नहीं मैं यह है आत्मनिष्ठा
55:14
असत्य नहीं सत्य सत्य नहीं मैं यह है आत्मनिष्ठा दुख नहीं आनंद आनंद नहीं मैं यह है
55:24
आत्मनिष्ठा अशांति नहीं शांति शांति नहीं मैं।
55:33
यह है आत्मनिष्ठा।
55:40
मैं हूं आत्मनिष्ठा।
56:01
यह अभी बना है क्या? टेस्ट चेंज हो गया लगता है मेरे को।
56:08
ऐसा है क्या?
56:12
चलो आपकी चाय का काम तो हो गया। [हंसी]
56:19
[गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]
56:45
भगवान जब आत्मिक होगा ना तो धर्मों के झगड़े ही समाप्त हो जाएंगे
56:54
क्योंकि इसका कोई विरोध कर ही नहीं सकता।
56:58
निर्विरोध सिद्धांत है। ये एक्चुअल वेदांत है।
57:09
हर धर्म इसका स्वागत करेगा।
57:13
क्योंकि यह सब की आत्मा है। हर संत का संदेश यही है।
57:19
हर अवतार का यही है। इट मींस मैं ही हूं।
57:28
है ना?
57:32
कोई कुछ भी संदेश दे दे, मैं से बड़ा कोई संदेश दे सकता है क्या?
57:40
नहीं दे सकता। [हंसी] आज तक जितने भी संतों ने जो भी संदेश दिया
57:47
ऋषियों ने दिया सुंदर है वो सम्मानीय है लेकिन मैं से बड़ा संदेश हो सकता है क्या
57:54
उनसे बड़ा हो सकता है क्या संदेश देने वाले से बड़ा मैं से बड़ा कोई संदेश नहीं होता तो मैं
58:04
ही मैं का संदेश है बस चढ़ गई है मेरे को बता रहा हूं चाय। हां।
58:15
[हंसी]
58:23
[हंसी]
58:36
और प्रेम आत्मा से निकलता है। याद रखना तुम्हारी कल्पना से नहीं निकल सकता।
58:46
सच्चाई से जो सत्य का भी सत्य है तुम्हारी आत्मा वहां से निकलता है असली प्रेम। असली
58:54
भक्ति जहां भक्त और भगवान विभक्त नहीं है।
59:08
मैं वेदांत पढ़ा नहीं हूं। ना कोई ब्रह्मसूत्र पढ़ा हूं। लेकिन जो बता रहा हूं यह प्योर वेदांत है। प्योर
59:15
ब्रह्मसूत्र है। स्ट्रेट
59:30
बस आपकी आत्मा जो आप स्वयं हो मैं आत्मा भगवान
59:41
उसके अतिरिक्त सब एक ब्रह्म जाल है। एक स्वप्न है।
59:48
मृग तृष्णा का जल है।
1:00:09
चक्कर है क्या थोड़ी दो ना थोड़ी सी देना।
1:00:23
एकदम थोड़ी सी हां
1:00:37
तो जब आप खुद को देह मानते हो तो हर कोई आपको देह दिखता है।
1:00:43
जब खुद को आप मन मानते हो, बुद्धि मानते हो, तो हर कोई आपको मन दिखता है। हर किसी में आपको अच्छाई दिखती है, बुराई दिखती है। मन देश से।
1:00:55
और जब आपकी स्वयं आत्मा को भगवान जानते हो आप। तब आपको सब भगवान दिखते हैं।
1:01:06
वह सहज है। बट प्रथम प्रथम स्वयं में खुद से ही खुद टेली होता है।
1:01:23
अरे बहुत ज्यादा है। मेरे को निकालना है। हां। मिलाना है।
1:01:58
दम है तो अपना विरोध करके दिखाओ। असली धर्म का कोई विरोध नहीं कर सकता।
1:02:04
और असली धर्म स्वधर्म ही है। आप स्वयं हो धर्म।
1:02:10
अपना विरोध करके दिखाओ। अपने पर हिंसा करके दिखाओ।
1:02:17
असली धर्म स्वधर्म है।
1:02:22
बाकी सब अलग है।
1:02:35
अपने पे तो प्रेम ही आता है ना। क्योंकि अपना आप ही धर्म है, अपना आप ही परमात्मा है।
1:02:45
इस टाइप की लैंग्वेज आप लोग पहली बार सुन रहे हो तो नए-नए जो हैं हो सकता है उसको थोड़ा समझना आए।
1:02:57
बट यही समझने योग्य है। इसमें रत्ती भर धोखा नहीं है।
1:03:06
हां।
1:03:09
सब धर्मों का सम्मान करो। मैं किसी की निंदा नहीं करता। क्योंकि सारे धर्म मेरी
1:03:16
आत्मा है। लेकिन असली धर्म चाहिए तो मैं आत्मा। भगवान।
1:03:23
मैं का धर्म। वह स्वधर्म।
1:03:45
इतनी अंडरस्टैंडिंग आज की मनुष्यता को होनी ही चाहिए। साला तुम एआई बना लिए उससे क्या होता है? तुम्हारी लड़ाई तो खत्म नहीं हुई।
1:03:57
तुम्हारे युद्ध तो खत्म नहीं हुए।
1:04:01
सत्य को जानोगे ही नहीं तो कहां से युद्ध खत्म होगा?
1:04:08
स्वधर्म की पहचान होते ही युद्ध समाप्त हो जाएगा।
1:04:14
यह पहला लेसन होना चाहिए। हर मनुष्य को पूरी धरती में हर लैंग्वेज में।
1:04:22
धर्म के नाम पर कोई झगड़ सकता है। धर्म का मतलब ही प्रेम होता है। करुणा होती है।
1:04:32
उसके नाम पर कोई झगड़ कैसे सकता है यार?
1:04:40
लड़ कैसे सकता है?
1:04:44
वो अज्ञानता है। वो लड़ाई, वो झगड़े, वह हिंसा तुम्हारे अंदर झगड़ा है। तुम धर्म के नाम पे झगड़ रहे हो।
1:04:58
कोई धर्म लड़ाई सिखाता ही नहीं है।
1:05:19
तो मेरा धर्म तेरा धर्म जैसी कोई चीज नहीं होती। स्वधर्म ही होता है। वह सबका है।
1:05:24
सबके पास स्व है और सबके पास धर्म है।
1:05:46
हर कोई धर्म आत्मा है। क्योंकि हर किसी की आत्मा धर्म है।
1:05:53
धर्मात्मा कितना सुंदर वर्ड है।
1:05:59
हर कोई धर्मात्मा है।
1:06:14
यही आत्मनिष्ठा है। आत्मा ही निष्ठा है। निष्ठा ही आत्मा है।
1:06:25
प्रकाश ही प्रकाश सूर्य है। सूर्य ही प्रकाश ही प्रकाश है।
1:06:50
तो धर्म एक है, परमात्मा एक है और मैं एक हूं।
1:06:59
बात खत्म। और मैं सबका हूं।
1:07:07
किसी का हूं। हूं। किसी का नहीं हूं। ऐसा तो मैं में होता ही नहीं।
1:07:20
तो पॉइंट यह था कि आप चाहते हो कि परमात्मा कोई और ही निकले। मैं ना निकल जाऊं कहीं गलती से। आपको भय है।
1:07:32
आपके जीव भाव को भय है।
1:07:37
और कभी कोई और नहीं निकलेगा। आप ही निकलोगे। आज नहीं तो हजार साल बाद।
1:07:44
आपको यही बोध होगा कि आपका स्व ही स्वयं ही परमात्मा है।
1:07:53
यही असली बोध है। और निकलेगा क्या? वो है।
1:08:02
अभी है।
1:08:06
हजार साल बोल दिया तो मन फिर खेल देगा आपका। हां यार कभी जानूंगा इस बात को।
1:08:12
क्या जानना है अपने आपको? क्या जानोगे अपने आप को?
1:08:17
कभी जानोगे, कभी जानोगे। मैं तो सीधा बता रहा हूं ना। क्या जानोगे अपने आप को? ऐसा है।
1:08:28
ऐसा है, सदा से है। गलत जान लिए थे। बस उसको हटा रहा हूं मैं।
1:08:38
आपकी अज्ञानता को।
1:09:00
हां जी
1:09:14
यार अगर आप थोड़े भी बुद्धिमान हो ना तो आपके अंदर ऐसा सेंस होना चाहिए
1:09:23
कि वह परमात्मा मैं ही निकलूं गलती से कोई और ना निकल जाए
1:09:29
थोड़ी सी भी बुद्धि है ना तो इतना सेंस तो होना चाहिए।
1:09:39
कि वो परमात्मा मैं ही निकलूूं। भूल के भी गलती से भी कोई और ना निकल जाए।
1:09:52
बुद्धि का उपयोग करो, सदुपयोग करो।
1:10:05
बिनु सत्संग विवेक न होई
1:10:50
राम को खोजते खोजते आप राम को मिलोगे।
1:10:54
कृष्ण को खोजते खोजते गोलोक में कृष्ण को मिलोगे ना ऐसा आपका जो सेंस रहता है
1:11:02
शिव को खोजते खोजते आप शिवलोक में शिव से मिलोगे या धरती में शिव से मिलोगे
1:11:11
उससे बेहतर सेंस रख सकते हो ना कि आपकी आत्मा ही शिव हो जाए राम हो जाए कृष्ण हो जाए जो कि है सेंस बुद्धि थोड़ी तो उपयोग
1:11:21
करो
1:11:34
जो भी आप जिसको भी भगवान मानते भी हो अगर तो आपकी आत्मा में ऐड होना चाहिए ना आपके
1:11:40
होने में। जिसको भी आप मानते हो। सुंदर है वह भी लेकिन
1:11:47
आपकी आत्मा में ऐड होना चाहिए। वह मानसिक नहीं होना चाहिए। कल्पना का नहीं होना चाहिए।
1:13:55
इससे कम की बातें मेरे को तो जमती नहीं है भैया। है ना?
1:14:04
पानी पिलाओ।
1:14:06
अब कुछ लोग ऐसे हो गए उनको भी नहीं जमती है। है ना?
1:14:13
जमती है क्या?
1:14:41
तो बस जो तुम हो
1:14:48
तुम हो ना अरे तुम हो ना
1:14:58
बस वही वही वही वही वही वही वही
1:15:09
ईश्वरों का भी ईश्वर है। महेश्वर है। अस्तित्व का भी अस्तित्व है।
1:15:16
जो कह लो कम है। कुछ ना कहो वह भी कम है।
1:15:31
बस जो तुम हो सहज में हो जिसको कहते हो मैं हूं
1:15:43
इसका कोई बोध नहीं होता वह खुद बोध है इसका कोई ज्ञान नहीं होता वह स्वयं ज्ञान
1:15:50
है इससे कोई प्रेम नहीं होता वह स्वयं प्रेम है।
1:15:58
परमात्मा के इस मैं से मिलता नहीं है। वह स्वयं परमात्मा है।
1:16:05
और इन सब के पार भी है। मतलब आप वो नहीं आप।
1:16:38
तू ही है तू ही है वही है वही है और मैं एक ही है ऐसा भूल के मत समझना
1:16:46
कि तू और मैं एक ही है वह और मैं एक ही है। ऐसा भूल के मत समझना।
1:16:55
तू मन का खेल है। तू मन का ऐसा खेल है ना जो चाहे कई जन्म खाएगा।
1:17:03
आपको रुलाएगा, भाव में ले जाएगा। भावातीत में नहीं ले जाएगा।
1:17:14
या वही है वही है। यह सब एक ही है। बोल देते हैं ना टेंपरेरी लैंग्वेज में। तू और मैं असली ज्ञान में तो एक ही है। ऐसा एक
1:17:23
लैंग्वेज चलती है। टेंपरेरी बकवास लैंग्वेज है वो।
1:17:29
मैं यानी मैं
1:17:41
पहले मैं क्लेरिटी फिर सब कुछ आपका मैं है। तू नाम की कोई चीज होती ही नहीं है।
1:17:50
क्योंकि जिसको आप तू कह रहे हो वह भी मैं है।
1:17:55
मैं आपको कह रहा हूं, तू उधर कौन सुन रहा है? तू सुन रहा है कि मैं सुन रहा हूं? मैं है ना?
1:18:03
तू फॉल्स है। वह फॉल्स है।
1:18:26
अरे मैं के अतिरिक्त सब फॉल्स है। हां जी।
1:18:39
ओके। और कुछ सुनना है। हां जी।
1:19:16
अब सती देखी राम को वो पत्नी के लिए रो रहे हैं। तो सती को हो
1:19:25
गया मोह है ना गरुड़ को हुआ मोह ब्रह्मा जी को हुआ मोह कृष्ण जी को देख के ठीक
1:19:36
तो कभी भी बहिर चरित्र में फोकस मत करना
1:19:42
तुम क्या करते हो वह गौतम बुद्ध ये किए भिक्षा मांगे वो किए वो किए वो किए हम भी
1:19:51
वह करेंगे अब फसे महावीरा ने यह किया, यह व्रत किया, वह किया, वह किया, हम भी वह करेंगे। तुम बहिर चरित्र को देख रहे हो भाई।
1:20:04
माया में फसोगे और निकल नहीं पाओगे। महावीर का त्याग महावीर का त्याग था।
1:20:12
तुम्हारा नहीं है। वह तुम कॉपी नहीं कर सकते।
1:20:19
कबीर ने वह किया। रामकृष्ण ने वह किया, ओशो ने वह किया, उन्होंने वह किया। तुम केवल कॉपी ही करना सीखोगे क्या? पागल हो क्या?
1:20:30
इतने बेवकूफ हो तुम। साला कॉपी ही करते रहोगे जिंदगी भर।
1:20:39
शर्म आनी चाहिए। शर्म बहिर चरित्र की कॉपी मत करो।
1:20:57
अपना आत्म कल्याण करो तुमसे निकलेगा ना सब कुछ तुमसे निकलेगा क्यों नहीं निकलेगा
1:21:11
तुम नए ही ढंग के बुद्ध होगे नए ही ढंग के महावीर होगे अपने ढंग के कॉपी करोगे तो कभी नहीं हो पाएगा।
1:21:24
इंपॉसिबल और कॉपियां सारी बहिर चरित्र की होती है।
1:21:35
अंतरचरित्र यानी मैं उसकी कोई कॉपी होती है क्या?
1:21:44
ओरिजिनल ओरिजिनल की कॉपी नहीं होती और वह ओरिजिनल
1:21:51
आप खुद हो
1:22:12
तो ये ध्यान साधनाएं जेरॉक्स के लिए होती है। ओरिजिनल के लिए नहीं होती है ना।
1:22:20
यह सब लॉलीपॉप है। एक आध घंटे चलता है खत्म हो जाता है।
1:22:29
तुम सोचते हो बहुत बड़ा काम कर रहे हो। बड़े ज्ञानी धानी आध्यात्मिक बनते हो।
1:22:37
धोखेबाज हो तुम यार। खुद को धोखा दे रहे हो।
1:24:00
असली धर्म तुम हो असली परमात्मा तुम हो और तुम ही हो। इसको कभी मत भूलना।
1:24:12
कभी मत भूलना और कभी मत भूलना।
1:24:18
बाकी सब भूल जाओ क्षम्य है। इसको मत भूलना।
1:24:26
और जब तुम परमात्मा हो तो सब कुछ परमात्मा है। देन।
1:24:32
सब कुछ भगवत स्वरूप है। भगवत ही भगवत है।
1:24:54
तो लात मारो मिलने वाले बुद्धत्व को। लात मारो मिलने वाले कैवल्य को।
1:25:02
है बुद्धत्व में जियो जो है अभी जो आप हो बुद्धत्व में जियो
1:25:11
हूं कैवल्य में जियो है कैवल्य में है राम में है शिव में
1:25:21
है अस्तित्व में
1:25:48
सी हुए ज्ञान को लात मारो बौद्धिक ज्ञान
1:25:58
वह बर्बाद कर देगा। बता रहा हूं आपको कहीं के नहीं रहोगे। एक भ्रम हो जाएगा। जान गए समझ गए।
1:26:10
मारो लात आत्मज्ञान आप स्वयं ज्ञान स्वरूप हो यार।
1:26:16
आपको कुछ भी जानने की जरूरत नहीं है।
1:27:00
मैं को किसी को जगाना नहीं पड़ता।
1:27:07
मैं के दायरे में आते ही तुम भूल ही जाते हो कि तुम कभी सोए भी थे।
1:27:18
मैं की रेंज में क्षेत्र में जो एकमात्र क्षेत्र है मैं आते ही तुम भूल ही जाते हो।
1:27:30
कि तुम कभी जीव थे, तुम कभी सोए थे, जागना है। यह वह सब भूल जाते हो तुम।
1:27:40
यह मैं का क्षेत्र है, स्वदेश है। यह तो चीर फाड़ के खत्म कर देता है।
1:27:49
अज्ञानता को चीर देता है।
1:27:55
और आपका स्व जिसको एक खरोच भी नहीं मारी जा सकती।
1:28:00
वो जो सदैव प्रकट है उसका बोध। भी सदैव प्रकट है।
1:28:10
जो सदैव होता है उसका बोध भी सदैव प्रकट होता है। याद रखना ऐसा नहीं कि कभी होगा।
1:28:22
जो सदैव प्रकट है उसका बोध भी सदैव प्रकट है। और वह मैं ही हूं।
1:29:22
कॉपी नहीं करना।
1:29:27
मैं अपनी कॉपी करने ही नहीं देता। इसलिए गेटअप चेंज ही करते रहता हूं।
1:29:35
तो तुमको क्या जिंदगी भर कॉपी करनी है।
1:30:03
ओम
1:30:23
क्या तुमको यह सिखाना पड़ेगा?
1:30:26
यह सीखने की वस्तु है। मैं कभी नहीं।
1:30:35
जिसको सीखा जाए वह मैं नहीं।
1:30:50
जिसका ज्ञान हो जाए वह मैं नहीं। इवन जिसका बोध हो जाए वह भी मैं नहीं।
1:31:02
इन सब से भी परे मैं हूं सहज में।
1:31:16
तो मैं का ना ज्ञान होता है ना बोध होता है ना उसको आप सीख सकते हो
1:31:26
मैं में कुछ होता ही नहीं है यार सदा एक रस जैसा का तैसा रहता है।
1:31:40
ना कोई अनुभव होता है।
1:31:50
और कुछ नहीं होता। यह तो होता ही नहीं है।
1:31:56
मैं जैसा का तैसा ही रहता हूं भैया।
1:32:04
सदैव।
1:32:07
जैसा का तैसा
1:32:23
तो मैं पे निष्ठा करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ आज तक
1:32:33
और मैं को मैं पे निष्ठा करनी नहीं है। यही आत्मनिष्ठा है।
1:32:42
निष्ठा जीव करेगा ना। मैं को मैं पर निष्ठा करनी क्या?
1:33:02
वह आप हो सदा से सदा से
1:33:12
आत्म निष्ठा के भी परे आप स्वयं सदा से सहज
1:34:09
यह सब सुन के मेरे पर भी डिपेंड मत हो जाना। मेरे से हमेशा आजाद रहना।
1:34:18
हां।
1:34:19
तब आत्मनिष्ठा प्रेम से मिल लेंगे अलग बात लेकिन डिपेंड नहीं होना।
1:35:29
तुम बेवकूफ हो करके डालते हो इसको YouTube में चल रहा है क्या आत्मा परमात्मा तो कई बार डाले हो समझ
1:35:37
नहीं आता किसी को
1:36:07
बेवकूफ हो तुम। है ना?
1:36:20
हां जी।
1:36:54
मैं देखता हूं है बुद्धत्व किसी को नहीं चाहिए
1:37:03
है ना जो है ही है ही तो बुद्धत्व है। है ही अस्तित्व है।
1:37:13
और हूं परमात्मा किसी को नहीं चाहिए। मैं हूं ही तो परमात्मा है।
1:37:23
मैं हूं ही आत्मा है।
1:37:41
सहज हूं ही मुक्ति है। यह मुक्ति किसी को नहीं चाहिए।
1:37:54
मरो भूख तो कौन क्या कर सकता है? लटके रहो मन के खेलों में।
1:38:32
अभी परमात्मा किसी को पसंद थोड़ी ना है।
1:38:35
कभी वाला परमात्मा कभी मिले भविष्य में वह भी मिलने वाला।
1:38:43
अभी जो तुम हो जो असली है ओरिजिनल
1:38:51
वो इंपॉर्टेंट है ना और वह इंपॉर्टेंट नहीं है तो कुछ भी इंपॉर्टेंट नहीं
1:39:02
कुछ भी इंपॉर्टेंट नहीं है और अगर आप किसी और चीज को इंपॉर्टेंस दे रहे हो
1:39:10
तो उसको अलग मान के दे रहे हो।
1:39:20
वो एक भ्रम है, जाल है।
1:39:30
लोग बोलते हैं, यह मैं कहीं अहंकार ना हो जाए।
1:39:37
अहंकार में तो जी रहे हो तुम।
1:39:43
तुम्हारा मैं परमात्मा नहीं हुआ करके अहंकार हो गया है। बेवकूफों
1:39:56
खुद को देह मन मान के अहंकार में जी रहे हो।
1:40:06
और हो परमात्मा मार डालूंगा आज मैं ज्यादा हो रहा है।
1:40:18
[हंसी]
1:40:23
अरे कितना चालाक है मन देखे कहां कैसे अहंकार खोज लेता है। परमात्मा में अहंकार खोज लेता है। खुद अहंकार में जी रहा है।
1:40:46
[खांसने की आवाज़][हंसी]
1:40:52
और सुनना है कुछ? बहुत है।
1:41:00
ठीक है। [हंसी] चलो भैया।
1:41:11
चीर फाड़ करना पड़ता है। सर्जरी में थोड़ी ना एकदम से सिरप थोड़ी ना पिलाऊंगा सर्जरी में।
1:41:52
प्रेम प्रणाम तो बंद क्यों किया?
1:42:07
[हंसी]
1:42:11
हम बोले तो बंद करना है।
1:42:36
तो परमात्मा को पूजा जाता है। है ना?
1:42:46
फूल चढ़ाए जाते हैं, जल चढ़ाए जाते हैं, चंदन लगाया जाता है।
1:42:57
परमात्मा को पूजा जाता है।
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और जब परमात्मा आप ही हो तो
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तो कुछ नहीं किया जाता है।
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कुछ भी ना करना ही वास्तविक असली भक्ति है।
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असली निष्ठा है स्वयं पे।
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मैं हूं तक ना कहना। कुछ भी ना करना इतनी आत्मनिष्ठा अपने में।
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परम
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ओके बहुत सारा प्रेम
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बहुत सारा प्यार प्यार ही प्यार सभी को प्रेम प्रणाम।