Prabhu Shree
0:18
असल में स्वयं को हम बहुत हल्के में लेते हैं। अपने ही आपको
0:26
बहुत लाइट लेते हैं। हां और खुद को देह मान के बाकी चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं।
0:38
लेकिन खुद को देह मान के किसको देह मान के?
0:47
खुद को देह मान के।
0:52
खुद को जीव मान के।
1:01
मानते खुद ही को हैं। किसी और को नहीं।
1:08
है ना? तो जब हम खुद को ही मानते हैं,
1:18
खुद को ही जब मानते हैं तो नहीं भी मान सकते।
1:26
खुद को नहीं भी मान सकते ना मानना कोई बड़ी चीज नहीं है इसको भी
1:36
फिर नहीं तो लोग टारगेट बना लेते हैं और बहुत बड़ी चीज है ऐसा सोचते हैं ना
1:46
आप खुद को मान भी सकते हो नहीं भी मान सकते आपके ऊपर और इतना ही आसान है जैसे लकड़ी को डंडा
1:55
मानते हो चाहो तो नहीं मानो। लकड़ी को लकड़ी ही जानो।
2:01
मैं को मैं ही जानू। उसको देह मत मानो।
2:09
तो खुद को देह और जीव मानते हैं।
2:14
इंपॉर्टेंट क्या है? मानना नहीं है। खुद को।
2:22
तो आपने जो भी माना है अपने आप को ही माना है। खुद को ही माना है।
2:37
तो जब खुद को ही माना है। जो भी माना है जीव हो, देह हो, स्त्री हो, पुरुष हो, परमात्मा भी हो।
2:49
जब खुद को ही माना है तो क्या माना है?
2:59
जब खुद को ही माना है तो क्या माना है? कुछ नहीं माना है।
3:11
आपने कुछ भी नहीं माना है क्योंकि खुद को ही माना है।
3:22
और खुद कभी भी मान्यता बनता नहीं है। वो ज्ञान स्वरूप है। जानना ही जानना है।
3:43
तो आपने अपने आप को कुछ माना है।
3:50
यह भी एक मान्यता है।
3:58
आपने अपने आपको देह, जीव या जो भी कुछ माना है।
4:05
आपने खुद को कुछ माना है। यह भी एक मान्यता है कि कुछ माना है।
4:22
तो किसी को ऐसा लगता है कि मैंने अपने आप को कुछ माना ही नहीं है।
4:29
हम बताओ
4:39
अपने आप को मैंने मैंने कुछ माना ही नहीं है। कभी भी नहीं माना है। ऐसा किसी को लगता है क्या?
4:51
ईमानदारी से बोलो। नहीं लगता। क्यों नहीं लगता?
5:05
अरे बोल। बोला कर तू थोड़ा सा।
5:17
लगता है लगता है ना कि मैंने अपने आपको कभी भी कुछ
5:26
भी माना ही नहीं है। मैंने अपने आपको कुछ माना है। यह मान्यता है कि माना है। अरे माना है यही तो मान्यता है।
5:42
माना है। यही तो मान्यता है।
5:54
आप सोचते हो ना कि मैंने अपने आप को कुछ माना है यार। मान लिया है। फंस गया हूं।
6:01
देह हो गया हूं। जीव हो गया हूं। अरे माना है। यही तो मान्यता है।
6:20
तो लकड़ी को डंडा मान लेने पर क्या यह डंडा हो जाता है?
6:30
हम लकड़ी को डंडा मान लेने पर, दरवाजा मान लेने पर, खिड़की मान लेने पर, बेंच मान
6:40
लेने पर लकड़ी क्या यह सब हो जाता है डंडा और ये सब?
6:47
क्यों नहीं हो जाता है? अरे जल्दी बोलो ना।
6:58
क्यों नहीं हो जाता है? क्योंकि लकड़ी को ही माना है।
7:08
तो आप खुद को जो देह मानते हो, जीव मानते हो, स्त्री पुरुष मानते हो
7:15
तो आप देह, स्त्री, पुरुष या जीव हो गए क्या?
7:25
मुद्दा तो आप हो ना लकड़ी और डंडा थोड़ी ना है और पिलाओ यार
7:34
तो आप यह सब हो गए क्या
7:42
लेकिन आपको तो लगता है आप देह हो गए जीव हो गए अब कैसे निकले कैसे बचे क्या
7:49
करें अरे क्या क्या डाल दिए हो भाई
8:05
हम बताओ आपको तो लगता है कि अब मैं बॉडी हो गया
8:13
जीव हो गया अब कोई ध्यान बताओ कोई साधना बताओ कोई मंत्र बताओ।
8:31
यह लगने का मूल कारण जो है वह भी आप ही हो।
8:38
क्योंकि आपने माना है। आपका साइन हुआ है।
8:47
करके झूठ भी सच लगता है।
8:53
मान्यता भी लगता है कि इसका अस्तित्व है क्योंकि आपने माना है।
9:06
मैं की मान्यता का यह पावर है। तो सोचो मैं का क्या पावर होगा?
9:18
अरे सोचो
9:42
तो मान्यता जगत में फिर मान्यताएं ही मान्यताएं हैं।
9:48
है ना?
9:52
एक चीज आपने मान ली कि मैं जीव हूं तो उससे अनंत मान्यताएं पैदा हो जाती है।
9:59
फिर हर चीज सच लगने लगती है।
10:04
अगर आप आपको जीव सच लग रहा है कि मैं जीव हूं।
10:10
अब आपको हर चीज सच लगेगी कि मैं देह हूं। मैं पुरुष हूं, मैं स्त्री हूं।
10:19
मैं पापी हूं। मैं पुण्यत्मा हूं।
10:24
एक मान्यता का परिणाम देखो कितना भयंकर है।
10:31
अब आपको हर चीज सच लगेगी जो सच नहीं है।
10:40
अभी इस मान्यता के लिए आप मान्यता रूपी साधना करते हो
10:49
वह भी सब सपने में चल रहा है। सारी साधनाएं ध्यान सब सपने में चल रहा है।
11:04
तो एक मान्यता कि मैं जीव हूं।
11:09
उसका परिणाम मैं देह हूं। उसका परिणाम
11:17
देख लो आपकी जिंदगी बता रही है उसका क्या परिणाम है।
11:25
और देह का अंतिम क्या है? मृत्यु है।
11:36
क्या ही कर डालोगे देह से?
11:48
जो चीज खुद मरने वाली है उससे जो भी करोगे वह चीज तो मरेगी ही ना।
11:56
इस शरीर से जो भी साधना करोगे, ध्यान करोगे वह भी मरेगा ना।
12:19
तो इस चक्रव्यूह का अंत तो है ही नहीं। हम है बताओ।
12:31
कोई बताओ यार तो हम आगे बढ़े ऐसा थोड़ी ना है।
12:40
मतलब एक मान्यता से अनंत मान्यताएं और सब सच लग रहा है जो कि सच नहीं है।
12:50
और मान्यता के बारे में बात करते रहो तो और मान्यताएं सच होती जाती है। इतना पावर
12:56
है माया का मान्यता का मान्यता यानी मन मान्यता यानी माया
13:05
है ना मैंने माना खुद को मैं को वही मन है वही
13:16
माया
13:35
अब माया का अर्थ क्या होता है कोई बताएगा हम
13:49
अरे बताओ ना हम आवरण नहीं
13:58
विकल्प एक बार बोल सकते हो जो है नहीं पर भासता है उसको कहते हैं
14:08
माया जो है नहीं और भासता है प्रतीत होता है
14:15
पता चलता है उसको कहते हैं माया
14:26
तो आप श्योरिटी से कह सकते हो कि ये देह मन ये दुनिया नहीं है।
14:39
ये तो मान्यता ही है ना।
14:44
आपको प्रत्यक्ष होना चाहिए ना ये पॉइंट कि यह है ही नहीं। यह एक्चुअल में मृत तृष्णा का जल है। है ही नहीं।
14:54
जैसे यह डंडा है ही नहीं। ऐसे ही ये बॉडी माइंड और ये है ही नहीं। दुनिया
15:05
यहां क्लेरिटी आनी चाहिए आपको।
15:15
बताओ कैसे आए गियर?
15:26
जो है ही नहीं
15:36
हम हां आत्मनिष्ठा तो उपाय है।
15:50
है नहीं और भास रहा है। जैसे रस्सी में सर्प है नहीं और भास रहा है जिसके कारण भय लग रहा है।
16:03
भय रस्सी से नहीं लग रहा है। आपको मान्यता रूपी सर्प से लग रहा है।
16:09
अंधेरे में देख रहे हो और प्रकाश लाकर चेक करते हो तो वह रस्सी है
16:17
तो ज्ञान का प्रकाश तो लाना पड़ेगा ना कि मान्यता कहीं है ही नहीं। मैं ही हूं।
16:29
ज्ञान के प्रकाश में आपको यह क्लियर होगा कि मान्यता कहीं है ही नहीं। कभी थी ही नहीं।
16:38
मैंने अभी खुद को कुछ नहीं माना। मैंने कभी भी खुद को कुछ माना ही नहीं है।
16:48
यह क्लिटी है कि मैंने कभी भी खुद को
16:58
कुछ माना ही नहीं है। यह क्लेरिटी चाहिए तो चैप्टर क्लोज हो जाएगा।
17:06
और हमारा हर सत्संग चैप्टर क्लोज करता ही है। तो आज भी हमारा धर्म है कि यह चैप्टर क्लोज करना।
17:16
क्या पता फिर मिलना हो ना हो।
17:26
हम तो बताओ विराज बताओ। बोलना है तुमको माइक लो और
17:34
बोलो। हम कुछ ऐसा बताओ कि यह बात ही खत्म हो जाए। हम कब तक बोलते रहेंगे?
17:49
हां ठीक है। सोचने समझने की शक्ति खत्म हो गई।
17:57
हां।
18:00
हां। तो आप मौन रह के इसको पियो ना। जो बताया जा रहा है इसका रस लो आनंद लो आपने
18:07
क्या बोला ठीक है चलेगा
18:16
समझा लेकिन जो हुआ
18:23
हम बताओ विराज प्रभु जैसे जो दिख रहा है वह सही में है कि नहीं यह अनुभूति से पता चल सकता है।
18:36
अगर उसकी अनुभूति होती है फिर तो वह है।
18:40
हम अगर अनुभूति उसकी नहीं होती है।
18:44
हम फिर वो नहीं है। अनुभूति ये प्रमाण है।
18:51
तो ये दिख रहा है जैसे ये दुनिया तो दिख रही है।
18:58
तो कैसे करें? शरीर तो दिख रहा है।
19:04
दिख रहा है लेकिन अनुभूति अगर करने जाए उसकी हम तो अनुभूति होती है क्या उसकी हम
19:16
शरीर की अनुभव अनुभूति करने जाएं तो अनुभूति होती है क्या
19:24
बताओ होती है क्या भाई स्वयं की ही होती है दुनिया की अनुभूति होती है क्या
19:33
मन की तो अनुभूति एक प्रमाण है कि यह कहीं है ही नहीं।
19:45
लेकिन अनुभूति किसकी होती है?
19:48
जैसे डंडा अपनी अनुभूति करे तो डंडे की अनुभूति होगी क्या?
19:58
लकड़ी की होगी ना?
20:02
या लकड़ी भी डंडे की अनुभूति करे तो भी इसको लकड़ी की ही अनुभूति होगी ना।
20:09
तो आप भी देह की अनुभूति करते हो तो आपको अपनी ही अनुभूति होगी ना।
20:19
और देह की अनुभूति में जाओ तो अपनी अनुभूति होती है। है ना?
20:31
और अगर इसको और शार्प करें तो और आगे डील करो। यह तो सही बोल रहे हो आप।
20:45
अनुभूति में प्रभु अपने अलावा और किसी चीज की अनुभूति होती ही नहीं है। हो ही नहीं सकती।
20:52
कैसे? तो मतलब किसी और चीज का अनुभव अब तक मैंने किया ही नहीं है। कभी
21:00
जो भी अनुभव किया है हम वो अपना ही किया है।
21:04
ओके ये ऐसा आप कैसे कह सकते हैं कि मैंने अब
21:12
तक किसी भी चीज का अनुभव नहीं किया है। जो भी किया है अब नहीं किया है।
21:20
थोड़ा इसको डिटेल करो ना। ये सही जा रहे हो आप
21:29
बोल लोगे मेरे को पता है थोड़ा सा और डिटेलिंग करो ना मतलब अनुभूति को जब देखते हैं हम
21:39
तो ऐसा लगता है कि मैं ही हूं मतलब मेरा ही अनुभव हम ऐसा अनुभव होता है
21:48
हम हम
22:00
तो सहज में
22:08
क्या आपको ऐसा भाव रहता है? क्या मैं अनुभव कर रहा हूं
22:17
या अनुभव हो रहा है या मैं अनुभव करने वाला हूं और यह अनुभव करने की वस्तु है
22:26
सहज में जब आप नेचुरल सहज रहते हो उस समय क्या रहता है
22:35
बताओ अभी आप बोल सकते हो सहज सहज की अनुभूति है
22:45
बट उस समय उस समय सहज के समय यह तो अभी जान समझ के
22:52
बोले ना सहज के समय क्या रहता है जो आप सहज रहते
23:00
हो ना आपका होना एकदम सहज है वहां मैं हूं बोलने की भी आवश्यकता नहीं है और आप सहज
23:08
रहते ही हो हां वो मस्त मौला सहज एक आपके अंदर एक मस्त मौला है। क्या है?
23:21
मस्त मौला है। वह सहज रहता ही है।
23:29
वो मस्त मौला मस्त ही रहता है।
23:37
ये अनुभव हो, वो हो, यह ध्यान, वो ज्ञान, वो सत्संग वो मस्ती रहता है। ऐसा कुछ है ना?
23:46
जो ऑलवेज फ्री है। आपके अंदर कुछ ऐसा है। इस सत्संग से भी कुछ ऐसा है जो फ्री है।
23:56
कैच कर रहे हो आप।
24:00
इस सत्संग से भी कुछ आपके अंदर ऐसा है जो एकदम मुक्त है। वही आप हो।
24:14
उसी मुक्त को जो आप हो जो पॉइंट अभी रेज किया गया उसने कभी भी खुद को कुछ माना ही
24:22
नहीं इसलिए ऑलवेज मुक्त रहता है।
24:29
मान्यता का लेप चढ़ता ही नहीं। निर्लेप है। है ना?
24:38
तो यह मुक्त आपके घर में कोई मर जाए आपका एक एरिया ऐसा रहेगा जो उस समय भी
24:46
मुक्त रहेगा थोड़ा सा देखोगे ना दिख जाएगा कितना ही दुख क्यों ना हो
24:55
है ना आपका एक एरिया हमेशा ऐसा रहेगा कि वो मुक्त ही रहता है
25:02
वही आप हो वह रहता ही है।
25:13
वो और सहज रहता है। मतलब वहां रहता है का भी सेंस नहीं रहता और रहता है। एकदम सहज
25:27
आज ये सत्य जाने, वो कल वो जाने, परसों वो जाने, आज वो अनुभव किए, यह किए। लेकिन वह मुक्त ही रहता है ना कुछ ऐसा है आपके अंदर।
25:36
जो अभी भी एकदम मुक्त है वही आप हो
25:42
जो एकदम फ्री है मेरे से भी फ्री है इस सत्संग से भी फ्री है बाकी चीजें तो छोड़ दो
25:53
नित्य मुक्त आपका जो एक्चुअल स्वभाव
26:06
और वह याद रखना वह रहता ही है। जैसे आप बोलते हो आज मेरी जिंदगी में एक दुख आ गया, परेशानी आ गई, विपरीत परिस्थिति आ
26:15
गई। उस विपरीत परिस्थिति में भी कुछ ऐसा रहता है जो मुक्त रहता है। ठीक है यार।
26:24
बोलते हो ना फिर थोड़ी देर बाद। हो गया हो गया। बोलते हो ना?
26:33
क्यों बोलते हो भैया? क्योंकि वह मुक्त बैठा है।
26:42
वो ज्यादा देर ये चिकचिक नहीं करता वो। वो मुक्त ही रहता है।
26:56
तो उस मुक्त को आपको कुछ भी अनुभव हो जाए वह उस अनुभव से भी
27:05
मुक्त रहता है। अच्छे अनुभव, बुरे अनुभव, उच्चतम अनुभव, निम्नतम अनुभव
27:13
उस अनुभव से भी एनी टाइम कुछ मुक्त रहता है ना। यस। वही तो आप हो।
27:22
ऑलवेज फ्री। सबसे फ्री। वो भगवान से भी फ्री है।
27:28
अस्तित्व से भी फ्री है। उसको ज्यादा भगवान भगवान करोगे ना बोलेगा यार थोड़ा सा शांति रखो। वो बोलता है
27:37
वो मस्त मौला है ना ज्यादा मैं हूं मैं हूं भी करोगे ना। अरे
27:44
यार ये आदमी पागल कर दिया है। मैं हूं मैं हूं मैं हूं बोल के। वह ऐसा बोलता है मस्त मौला। सबके अंदर से बोलता है जो सुनते हैं मेरे को।
27:56
हां वो असली में है आपका जो वैसा बोलता है।
28:04
रोज वही सुबहेरे से रात तक मैं हूं मैं हूं मैं हूं। क्या मैं हूं वो मुक्त है इससे मैं हूं से भी।
28:30
यार देखो समझा करो जिंदगी बहुत सरल है। है ना? अब देखो युद्ध हो रहा है अर्जुन। ठीक है?
28:42
उसको अपने भाइयों के साथ युद्ध करना है। राइट?
28:50
और अपने गुरु को द्रोणाचार्य को उस पर तीर चलाना है। अपने पिता मां को तीर चलाना है।
29:01
मारना है।
29:04
और लाखों लोग हजारों लोग पता नहीं कितने मरेंगे वह और अलग।
29:14
इधर द्रोपदी का अपमान
29:21
और उस अपमान का परिणाम इतना बड़ा युद्ध
29:28
और उस उसकी पोजीशन देखो कितनी खतरनाक भगवान कृष्ण को भी पूरा गीता सुनाना पड़ा।
29:39
18 अध्याय के बाद वह समर्पण करता है।
29:50
तो इतनी विकट परिस्थिति में
29:56
खतरनाक परिस्थिति है ना युद्ध की जो अर्जुन की सिचुएशन है जो वहां चल रहा
30:05
है उस कुरुक्षेत्र में फिर कृष्ण का समझाना है फिर अर्जुन के भाई हैं फिर इतना
30:14
बड़ा बड़ा विराट युद्ध है उस कुरुक्षेत्र में। वहां मुक्ति क्या है?
30:22
बताओ।
30:25
वहां भी कुछ ऐसा होगा ना जो मुक्त है। उसी समय जब युद्ध चल रहा है।
30:38
अरे अभी युद्ध को किसने देखा?
30:45
बताओ अभी 5 मिनट पहले युद्ध था क्या?
30:52
अभी युद्ध आया उसको किसने देखा? मुक्त ने ही देखा।
31:02
मैंने देखा। मुक्त ने देखा। तो मुक्त वहां भी है ना।
31:27
जो है है ना है अस्तित्व
31:33
वो जो भी हो रहा है उससे मुक्त होता है चाहे जो भी हो रहा
31:43
देखने वाला जो भी दिखाई दे उससे मुक्त होता है।
31:55
और इसके बावजूद भी
32:04
देखने वाला है अस्तित्व से भी कुछ मुक्त रहता है।
32:13
अरे आपको दिन भर देखने वाला अस्तित्व अस्तित्व मैं हूं मैं हूं ऐसा सेंस रहता है क्या
32:22
तो कुछ ऐसा है ना जो इससे भी मुक्त है और अभी है
32:32
जिसका नेचर ही मुक्त रहना है
32:40
जिसको मुक्ति के अलावा कुछ आता ही नहीं है।
32:49
टोटल फ्री है वह सबसे और फ्री ही रहता है
33:14
तो कुछ ऐसा जो मुक्त है एकदम अभी कुछ ऐसा है ना जो मेरी इन बातों से भी
33:23
मुक्त है जो भी बताया जो भी आप सुन रहे हो समझ रहे हो जी रहे हो
33:32
वो मुक्त है अभी एकदम और वो बोल रहा है
33:41
वही तू है बस तत्व मसी श्वेत केतु
33:49
वही तू है सदा मुक्त मुक्ति से भी मुक्त
34:08
हर होने से मुक्त ना होने से मुक्त
34:14
जानने ना जानने समझने ना समझने से मुक्त कोई चीज आपको समझ नहीं आई। अरे छोड़ यार
34:21
बोलते हो ना मुक्त हो ना तभी बोलते छोड़ यार क्या समझेंगे
34:29
और कोई चीज एकदम समझ गए है ना तो उस समझ को भी आप छोड़ देते हो
34:40
क्योंकि आप मुक्त हो और आप निरंतर छोड़ ही रहे हो सहज में हर चीज को आप छोड़ रहे हो।
34:51
छोड़ना कोई प्रैक्टिस नहीं है।
34:56
अपने आप छोड़ रहे हो। जो भी अनुभव आपको होता है बड़े से बड़ा अनुभव आप छोड़ देते हो दो चार दिन में।
35:06
क्यों छोड़ देते हो मालूम?
35:09
क्योंकि अनुभव से भी आप मुक्त हो।
35:20
आप सहज में ही खुद से छोड़ देते हो। फिर आप आगे मेरे को प्रश्न करते हो। वो चार दिन वो अनुभव चला। अब पता नहीं कहां गया।
35:28
अरे अच्छा हुआ चला गया ना। क्योंकि आप अनुभव से भी मुक्त हो ना।
35:37
एक छोटा सा अनुभव चलो बड़ा सुंदर अनुभव होगा वह वो वो आपसे विराट थोड़ी ना हो
35:44
सकता है तो कुछ ऐसा जो एनी टाइम
35:57
मुक्त रहता है आपके भीतर नित्य मुक्त
36:18
मुक्त ही रहता है एनी टाइम तो ऐसा कुछ
36:27
प्रतीत होता है क्या किसी को होता है ना बताओ
36:34
बस बस वही आप हो यानी आपकी एक्चुअल पहचान है वो
36:43
जो भगवान से भी मुक्त है और मेरे से भी मुक्त है गुरु से मुक्त है सद्गुरु से
36:51
गुरु से संत से जो भी बोल लो वो मुक्त ही है भाई
36:59
कुछ चीज आपके अंदर ऐसी है जो मेरे से भी मुक्त है वही सच और वही तू है।
37:23
अस्तित्व से मुक्त प्रभु से मुक्त हर अनुभव से मुक्त मुक्ति से भी मुक्त
37:32
और बिल्कुल अभी है बिल्कुल अभी है ना
37:40
आपके अंदर कुछ ऐसा है जो हर मंत्र से मुक्त है जो मंत्र आपको दिया गया है उससे
37:48
भी मुक्त जो नाम का जप आपको दिया गया है उससे भी मुक्त कुछ है ना ऐसा वही तू है वही नामी
37:57
है आपके अंदर कुछ ऐसा है जो
38:10
राम कृष्ण शिव अस्तित्व परमात्मा से भी बिल्कुल मुक्त है।
38:19
एकदम अस्तित्व या कुछ भी बोल लो
38:25
निर्वाण से बुद्धत्व से सब से मुक्त है कुछ ऐसा अभी
38:41
उसी पे किसी भी किस्म की मान्यता नहीं चढ़ती है।
38:53
कभी चढ़ी ही नहीं।
38:58
नित्य मुक्त जो एक्चुअल मैं हूं जो एक्चुअल वाला मैं है
39:04
उस पर किसी भी किस्म की मान्यता कभी भी चढ़ी ही नहीं।
39:13
माना ही नहीं।
39:16
अगर वह खुद को सदा के लिए कुछ मान लेता तो वही हो जाता।
39:24
मैंने अपने आप को कभी भी कुछ भी माना ही नहीं है।
39:31
मुक्ति मेरा स्वभाव है।
39:37
और मान लेने पर भी बाय द वे अगर मैंने माना है। बाय द वे मान लेने पर भी मैं मुक्त ही रहता हूं।
39:52
अरे यार देखो आप मरते रहते हो। शरीर बहुत पीड़ा दे रहा है। एकदम लास्ट स्टेज है। एकदम पीड़ा दे रहा है।
40:01
क्या क्या बोलते हो आप? अब मर ही जाऊं तो अच्छा है।
40:08
है ना? आप तुरंत मुक्त होते हो शरीर से।
40:13
आपको पता है कब तक कब तक है यह ग्रिप।
40:19
एग्जैक्ट टाइम में ग्रिप छोड़ देते हो आप।
40:25
किसी का एक्सीडेंट हो गया, वहां पैर टूट गया। वो तुरंत छोड़ देता है ग्रिप। क्या करूंगा जी के यार?
40:34
जब अपना इंस्ट्रूमेंट ही गड़बड़ हो गया तो
41:01
तो जो बंधना जानता ही नहीं है
41:10
जिसने बंधना सीखा ही नहीं जाना ही नहीं
41:19
जो मानना जानता ही नहीं है।
41:28
एनी टाइम मुक्त रहता है।
41:34
हर समय हर परिस्थिति जीवन मृत्यु
41:43
वही तू है जो मुक्त रहता है।
42:03
तो मुक्त हो तो मुक्त की तरह जिया करो
42:13
क्योंकि यहां बंधा हुआ कभी मुक्त नहीं होता। मुक्त ही मुक्त होता है।
42:23
यह इतनी बड़ी लाइन है। आप नहीं अंदाजा लगा सकते। यहां बंधा हुआ कभी मुक्त नहीं होता।
42:30
कभी नहीं होता।
42:33
मुक्त ही मुक्त होता है।
42:40
क्योंकि मुक्त ही मुक्त है।
42:46
तो अपने अंदर मुक्ति का तत्व कौन सा है? उसको देख लो।
42:55
और वही आप हो।
42:57
डैम इजी मुक्ति का तत्व क्या है भाई? कौन सी चीज ऐसी है जो हमेशा मुक्त रहती है? कोई अपमान
43:05
कर दे तो, कोई सम्मान कर दे तो, जिंदगी में कुछ हो जाए तो कुछ ऐसा है ना जो यार
43:12
मुक्त ही रहता है। उसको और कुछ रहने ही नहीं आता है। बस वही आप इसलिए मस्त रहो।
44:25
तो अष्टावक्र कहते है बद्ध अभिमानी बद्ध है मुक्त अभिमानी मुक्त
44:33
जो खुद को मानता है बंधा हुआ है वही बंधा हुआ है जो खुद को मानता है मुक्त वही मुक्त है
44:42
अब आप चूज़ कर लो क्या चूज़ करना है
45:05
अब वो रहता ही है बता रहा हूं कुछ हो जाए जिंदगी में युद्ध चलता रहे वो मुक्त ही रहता है
45:15
हां उसको कोई नहीं बांध सकता भाई ऐसा कैसे
45:32
उसको बांधने की सोचने वाला खुद बन जाता है।
45:38
हां ये मन बुद्धि अहंकार उसको बांधने का सोचते हैं। खुद बंध जाते हैं। उसको नहीं बांध सकते। दुर्योधन सोचा ना मैं कृष्ण को
45:47
बांध दूंगा राजसभा में। खुद बंध गया।
46:00
तो यार वो कृष्ण आप ही हो जिसको कोई बांध नहीं सकता।
46:06
कोई है जो आपको बांध दे।
46:18
मुक्त एकदम मुक्त
46:32
मुक्ति का कोई प्रैक्टिस नहीं है। वो आपका नेचर है। हां।
46:40
छोटे से बच्चे को भी ऐसे बांध के रखोगे ना वह ऐसे हिल डुल के थोड़ी देर में निकल जाएगा। हर किसी को मुक्ति प्रिय है ना?
46:52
क्योंकि वह नेचर है
47:02
तो मुक्त
47:16
तो मुक्त ने यानी मुक्त मुक्त आपकी आत्मा आपका एक्चुअल होना मुक्त ने
47:26
खुद को क्या माना शरीर माना
47:33
जीव माना बताओ
47:45
अरे भाई मुक्ति मुक्ति से जो निकलेगा वह मुक्ति ही होगी ना।
47:53
नाम भले शरीर दे दो। जैसे लकड़ी का नाम भले डंडा दे दो, खिड़की दे दो। है तो लकड़ी ही ना
48:04
मुक्त। अगर बाय द वे खुद को कुछ मान भी ले तो वह भी मुक्ति ही है ना।
48:13
तो यहां हर चीज मुक्ति से बनी है।
48:18
यहां का जर्रा जर्रा आप मैं सब कुछ परम मुक्त और मुक्ति से ही बना है।
48:28
एकदम फ्री है हर एक चीज एकदम स्वतंत्र
48:37
इवन सारी मान्यताएं भी विकल्प भी जो है ही नहीं मान्यताएं वह भी मुक्त हैं।
48:49
इसलिए सुंदर है।
48:57
तो मैं वो शख्सियत हूं जिसने कभी भी खुद को कुछ भी माना ही नहीं है।
49:08
और माना भी है तो वह भी मुक्ति है। वो भी मैं ही हूं।
49:15
तो हर हाल में जब मुक्ति रहे तब मुक्ति ना मानो तब मान लो तब
49:24
चाहे कुछ हो जाए तब ना हो जाए तब और हर हाल में ही तो आप मुक्त रहते ही हो
49:33
ना भाई कौन सा ऐसा विचार आपको आया है जिसने आपको
49:39
बांध के रखा है जन्म से अभी तक बताओ
49:48
हर विचार आया गया इतने भाव आए गए
49:57
कौन सा है आप बंध ही नहीं सकते भाई
50:06
असंभव है बंधना और आप शुरू कहां करते हो? मैं बंध गया
50:15
हूं। मुक्त करो। अरे भाई यहां हम बता रहे हैं असंभव है बंधना।
50:38
तो हमेशा कुछ ऐसा रहता है जो मुक्त ही रहता है। बस वही तू है।
50:48
मैं जो बता रहा हूं उससे भी वह मुक्त है। इतना मुक्त है।
50:59
बस एक ही पॉइंट को रे करना अपनी जिंदगी में जो हमेशा मुक्त ही रहता है
51:08
हर चीज से वो क्या है
51:16
वही तो आप हो क्योंकि आपको सबसे ज्यादा प्रिय मुक्ति है
51:25
क्या और गहरे सच तो यही हैं कि हर कोई देह से मन से मुक्त होना चाहता ही है।
51:39
दुनिया से, झंझटों से मुक्त होना चाहता ही है।
51:47
हर कोई अपने गुरु और परमात्मा से भी मुक्त होना चाहता है।
51:54
ऐसा है। बिल्कुल है। प्रेम एक अलग मुद्दा है।
52:05
प्रेम भी कोई मुक्त कर पाता है किसी और मुक्त से। बांधा हुआ क्या प्रेम करेगा?
52:13
मुक्त मुक्त बैठते हैं तो प्रेम होता है।
52:23
वही मुक्त तू है जो तू होना चाहता है ना वो तू सहज में
52:30
हमेशा कुछ ऐसा रहता है तेरे भीतर जो मुक्त ही रहता है
52:36
हर चीज से हर दुनिया से वही तू है
52:51
हर ध्यान से, हर ज्ञान से, भक्ति से, प्रेम से सबसे फ्री
52:59
कुछ है ऐसा अभी के अभी है। कुछ ऐसा हां वही बस वही वही तू है।
53:11
एग्जैक्ट वही तू है।
53:33
तो सदा मुक्त मुक्ति से भी मुक्त तेरा स्वभाव है वह तू ही है।
53:48
और वह तू ही है
53:57
और वो इतना मुक्त है कि वह मैं तू से भी मुक्त है।
54:04
यह वह वही है वही है से भी मुक्त है। मैं ही हूं मैं हूं। तू ही है। तू ही है से भी मुक्त है। कुछ ऐसा है।
54:15
प्रभु है प्रभु है उससे भी मुक्त है अस्तित्व अस्तित्व मुक्त है कुछ ऐसा है
54:25
और वह अभी है जो सबसे मुक्त है
54:30
हर ध्यान से हर ज्ञान से हर भक्ति से
54:48
और सच में सच में वो मुक्त तू ही है। तू तू है वह मुक्त।
55:03
मैं किसी और की बात नहीं कर रहा हूं। तू ही है वह मुक्त। अभी है तू मुक्त।
55:12
मुक्तियों से भी मुक्त।
55:16
और इस बात को ना तू भी जानता है, अच्छे से जानता है कि तू मुक्त है।
55:29
मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि तू इन बातों से भी मुक्त है।
55:39
अरे तू मुक्त है। मस्त रह।
55:51
तो वो मस्त मौला तू ही है मेरे यार। वह जोरवादी बुद्धा तू ही है।
56:09
तुझे ना किसी मास्टर की तलाश है। तुझे ना किसी परमात्मा की तलाश है।
56:18
तुझे ना अपनी तलाश है। तुझे कोई तलाश है ही नहीं।
56:37
क्योंकि तू मुक्त है। तुझे किसकी तलाश होगी?
56:58
हां जी
57:20
हम हम हम
57:34
क्या बोलते हो सौरभ जी हां हां जी
57:40
अरे कुछ बताओ यार कुछ बोल दिया करो हम अकेले अकेले बोलते
57:49
रहते हैं अब तो सब मुक्त हो यार कुछ बोला करो कुछ बताया करो
58:07
हम जी
58:13
तो सर जो मुक्त का अंश वो तो कभी-कभी एक्सीडेंटली हर कोई फील कर ही
58:22
लेता है। हम लेकिन उस अंश को बढ़ाया कैसे जाए कि जैसे आप हमेशा मुक्त में रहते हैं।
58:32
कई बार सुनो सुनो सुनो दे दो माइक इनको
58:44
मुक्त का ये अंश नहीं है कुछ है ना
58:52
बाकी सब चीजें अंश है आपका होना जो मुक्त है वो अंश नहीं है
59:02
वो पूरा अस्तित्व है आपका यानी यानी मुक्ति ही मुक्ति है। ये सब कुछ मुक्ति से बना है।
59:12
आपका होना ही मुक्ति से बना है। आपकी सोच समझ भी मुक्ति से बनी है।
59:20
इसलिए तो हर विचार आता है। आप विचार से अपने आप मुक्त हो जाते हो। हर भाव से अपने आप मुक्त हो जाते हो।
59:28
जिंदगी की हर परिस्थिति से आप अपने आप मुक्त हो जाते हो। क्योंकि हर जगह मुक्ति ही मुक्ति है।
59:45
तो ये मुक्ति का अंश नहीं है। ये आप हो।
59:56
वो खुद को बॉडी समझ के ही देख रहे हो। करके ये अंश जैसा लग रहा है। हां।
1:00:03
खुद को मुक्ति जान के देखो बाकी सब अंश हो जाएगा।
1:00:10
हां खुद को मुक्ति महसूस करो जानो और जियो
1:00:16
मान भी लो कि आप मुक्त ही हो। क्योंकि आप मुक्त ही हो। यह अगर
1:00:28
डंडा जाने तब लकड़ी है।
1:00:33
लकड़ी खुद को लकड़ी जाने तब लकड़ी है।
1:00:39
लकड़ी खुद को लकड़ी माने तब लकड़ी है। आप खुद को मुक्त ना भी जानो तो चलेगा।
1:00:48
मुक्त मान लो तब भी आप मुक्त हो। क्योंकि आप मुक्त हो।
1:00:56
बंधा हुआ मान के जीने से अनंत गुना बेहतर तो है ना मुक्त मान के जीना खुद को चलो
1:01:05
जानना आपको समझ ना भी आ रहा हो तो खुद को मुक्त मान के जियो
1:01:12
तो वो समान समान मैच हो जाता है चॉइस तो श्रेष्ठ होनी चाहिए ना
1:01:26
और हकीकत तो यह है यार।
1:01:32
हकीकत असली हकीकत तो ये है।
1:01:38
अरे ये है पूछो ना क्या है? अच्छे से पूछो।
1:01:47
अरे मैं जानने और मानने से भी मुक्त हूं यार।
1:01:54
ये जानना मानना सिर दर्द है साला
1:02:02
मैं सदा मुक्त जानने और मानने से सदा सर्वदा
1:02:08
मुक्त ये बात जम गई राहुल को बात क्यों
1:02:26
तो मस्त सेलिब्रेट करो और क्या
1:02:51
तो मुक्त मुक्त ही बनाता है भैया शेर दहाड़ना ही सिखाता है
1:03:00
मिमियाना नहीं सिखाता है ना सिंह होने की साधना नहीं होती।
1:03:14
सिंह होने की साधना नहीं होती। सिंह होने में गरजना होता है।
1:03:22
जो दहाड़ता है वह सिंह है। जो कहता है मैं मुक्त हूं वो मुक्त है।
1:03:31
बस इतनी सी बात है।
1:03:34
जो कहता है मैं बंधा हुआ हूं। जिसका निश्चय बंधा हुआ हूं मैं वह बंधा हुआ है।
1:03:40
जिसका निश्चय मुक्त में मुक्त है।
1:04:09
तो हम क्या भूल जाते हैं मालूम जिंदगी के कीमती चीजों को भूल जाते हैं।
1:04:19
क्या रहता है? आपको परमात्मा होना है। है ना?
1:04:25
अब आपका फोकस भार परमात्मा में है। होने में नहीं है। पर होना तो आपका पहले से है।
1:04:42
वो तो पहले से है ना
1:04:52
अस्तित्व होना है। अरे होना तो पहले से है। विराट होना है। अनंत होना है। होना तो पहले से है।
1:05:18
तो फिलहाल तो ये सब से भी आप मुक्त हो आत्मा परमात्मा अस्तित्व है ना तो मुक्त ही आप अच्छे लगते हो
1:05:27
और मुक्त ही रहो भाई ये मैं हूं से, अस्तित्व से, परमात्मा से, मुक्ति से भी मुक्त।
1:05:38
आप मुक्त ही अच्छे लगते हो यार।
1:05:42
बस मुक्त ही रहा करो। खुद को भी अच्छे लगते हो और दूसरों को भी अच्छे लगते हो।
1:05:52
दूसरों को मतलब हमको। दुनिया के दूसरे तो वह दूसरे ही है।
1:06:11
तो अब मेरे से भी मुक्त हो जाओ जाओ अपना शाम एंजॉय करो
1:06:20
और मस्त रहो मस्त रहो
1:06:28
तो तो ये आश्रम इसलिए जल्दी खाली हो जाता है। यहां मुक्त होते हैं सब उड़ जाते हैं।
1:06:37
हां अभी दो महीना हुआ है देखो खाली हो गया है।
1:06:43
यहां आते हैं लोग मुक्त होते उड़ जाते हैं सीधा। हमको उसी में खुशी होती है।
1:06:50
हम कोई आश्रम थोड़ी ना चला रहे।
1:06:57
आश्रम बनाने वाला ही मुक्त है। घूम रहा है कहीं कहीं।
1:07:03
वो शादीवादी में गया है अभी कहीं।
1:07:31
तो क्या है ना शुरू में यह भाव रहता है कि हमको भगवान का दर्शन करना है।
1:07:43
स्टार्ट यहां से होती है। है ना? अंत में क्या भाव रहता है? अब यार भगवान से भी मुक्त हो जाना है।
1:07:55
है ना?
1:07:57
शुरू में गुरु के दर्शन करने हैं, बैठना है, जीना है उसके साथ। अरे यार अब गुरु से भी मुक्त हो जाना है।
1:08:16
तो आप साइलेंट रहो। आपको पता नहीं यहां कैसा सत्संग चलता है।
1:08:25
ये कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है कि यहां रैंडम कभी कुछ बोल दो क्या है? टू द पॉइंट।
1:08:39
क्योंकि बहुत नाजुक बात है ना कौन सी बात से किसकी जिंदगी पलट जाए
1:08:45
वो आप सोच अंदाजा नहीं लगा सकते सत्संग की मर्यादा होती है
1:08:58
तो हम क्या बता रहे गायब हो गया।
1:09:12
यही मुक्ति है।
1:09:14
हां कि मैं जो भी बता रहा हूं वो भी गायब हो जा रहा है। हां। उसको क्या पकड़ के रखना? कुछ लोग उसको पकड़ के सीख के रखते हैं। उनको गुरु बनना है करके।
1:09:27
मूर्ख है वह महामूढ़ है वह तो माया बन जाता है उनके लिए बोलने में
1:09:36
एक्सपर्ट हो जाते हैं मेरे से भी ज्यादा एक्सपर्ट हो सकते कोई बड़ी बात नहीं है
1:09:59
तो गुरु और शिष्य के संबंध में जब बंधन होता है तब साधनाएं होती है, ध्यान होता है, तंत्र मंत्र होता है।
1:10:13
कोई नाम दिया जाता है, कोई क्रिया दी जाती है, गुरु और शिष्य के संबंध में जब बंधन होता है,
1:10:21
तब यह सब होता है। साधनाएं, ध्यान है ना, क्रियाएं, विधियां
1:10:31
और गुरु और शिष्य के संबंध में जब मुक्ति ही मुक्ति होती है। मुक्ति ही मुक्ति और
1:10:41
मुक्ति ही मुक्ति तब बस प्रेम होता है।
1:10:49
बस प्रेम प्रेम और प्रेम अनंत प्रेम
1:10:57
और यही प्रेम एक्चुअल परमात्मा है।
1:11:02
जो प्रेम मुक्ति से उपजे वही परमात्मा हो सकता है।
1:11:11
इसलिए मेरे से हमेशा फ्री रहना।
1:11:15
मुक्त रहना मेरे से भी। दुनिया से तो रहना ही है मेरे से भी
1:11:23
और मुक्त मुक्त जब बैठे तब होता है प्रेम तब एक अलग वर्ल्ड है
1:11:32
तो आप लोग समझे कि गुरु और शिष्य में जब बंधन होता है जब
1:11:39
गुरु भी बंधा हुआ होता है और शिष्य भी बंधा हुआ होता है तब गुरु साधनाएं देता है ध्यान देता है विधियां देता शिष्य भी वही करता है।
1:11:52
वो बहुत लो कैटेगरी है। ठीक है। शुरू में 100 सो है। है ना?
1:12:01
और असली तो भैया प्रेम तो मुक्ति में ही उपजता है। फल फलता है,
1:12:08
फूलता है, नाचता है, गाता है। जब मैं भी मुक्त और आप भी मुक्त। मैं भी आपसे मुक्त हूं और आप भी मेरे से मुक्त।
1:12:34
तब तब आप बैठते हो कुछ और ढंग से हम बैठते
1:12:41
हैं कुछ और ढंग से ना हमको कुछ समझाना है ना आपको कुछ समझना है क्यों सौरभ जी वो तो
1:12:49
अच्छे से समझते हमारी बात ना हमको कुछ सिखाना ना आप लोग को कुछ
1:12:57
सीखना ना कोई ज्ञान देना है ना आपको कोई ज्ञान सीखना है। बस प्रेम की धारा राधा बह रही
1:13:05
है और कृष्ण नाच रहा है। सर्वत्र वासुदेव सर्वम
1:13:17
अनंत मुक्ति है यार। मुक्ति ही मुक्ति है और कुछ है ही नहीं। सब कुछ मुक्ति से ही
1:13:23
बना है। आपका शरीर, मन, दुनिया, आप खुद
1:13:30
अनलिमिटेड मुक्ति है। अनलिमिटेड कोई उसका पारवार ही नहीं है।
1:13:57
तो जब शिव और नारायण मिलते हैं तो कैसे मिलते हैं बताओ?
1:14:03
कहीं पर भी कोई बंधन है?
1:14:09
जब हरि हर मिलते हैं। हरि और हर कैसे मिलते हैं?
1:14:19
वह अनंत प्रेम है। जब शिव भवानी मिलते हैं।
1:14:27
वह अनंत प्रेम है। जब राधा कृष्ण मिलते हैं वहां किसी को कुछ सीखना बताना जानना कुछ
1:14:36
कहीं है ही नहीं। प्रेम ही प्रेम है बस।
1:15:02
और एक और गहरी सच्चाई बता ही दूं।
1:15:07
बहुत गहरी सच्चाई है। मैं इतना मुक्त हूं।
1:15:14
मैं इतना मुक्त हूं। कि मैं मुक्त हूं। यह तक भूल चुका हूं।
1:15:26
मैं इस बात से भी मुक्त हूं कि मैं मुक्त हूं। क्या?
1:15:36
यस। मैं इतना मुक्त हूं।
1:15:59
मैं इतना मुक्त हूं कि बंधनों से खेला करता हूं।
1:16:04
कृष्ण बोलते हैं ना बांध दो गोपियों मैं नहीं माखन खायो।
1:16:11
अब कृष्ण को कौन बांध सकता है? जेल नहीं बांध सकी।
1:16:16
को कौन बांध सकता है
1:16:28
तो जेल में भी कोई मुक्त पैदा होता है कृष्ण है ना
1:16:37
ऐसा भी होता है ना तो इस शरीर रूपी जेल में आपका होना मुक्त कृष्ण है ना
1:16:46
हालांकि वह पैदा वैदा नहीं होता आपका होना वह अजन्म है।
1:16:54
मुक्त ही है ना वो स्वभाव ही है।
1:17:49
तो मुक्त हो तो मुक्त की तरह रहो। मुक्त की तरह जियो।
1:17:56
मुक्त की तरह मरो। मुक्त हो तो मुक्त की तरह रहो।
1:18:10
बाकी सब माना हुआ नहीं है। वह भी सब मुक्त है।
1:18:17
बाकी सब भी मुक्त है। तुम मुक्त रहो बस। कुछ भी माना हुआ ना हुआ नहीं।
1:18:24
ठीक है।
1:18:28
तो चलो भैया मेरे से भी मुक्त रहो। मस्त रहो। सबको प्रेम प्रणाम।
1:18:34
वाणी को विश्राम देते हैं।