Prabhu Shree
0:18
अपने आप को कुछ भी मान लेने पर
0:25
अपने आप को देह मन बुद्धि आत्मा परमात्मा जीव
0:31
स्त्री पुरुष मान लेने पर भी जो जैसा का तैसा रहता है वही मैं हूं।
0:44
ठीक है? खत्म बात।
0:52
खुद को कुछ भी मान लेने पर भी कुछ भी मान लो खुद को।
0:59
उसके बाद भी जो जैसा का तैसा रहता है एज इट इज वही मैं हूं।
1:08
ना मानने पर भी एज इट इज है मानने पर भी एज इट इज जो हूं सो हूं जैसा का तैसा।
1:21
जैसा का तैसा
1:33
अरे देखो आप कितने ही दृश्य देखते हो दुनिया भर के दृश्य देखने वाला जैसा का
1:40
तैसा है ना कि बदल जाता है एज इट इज है
1:49
जो भी हो रहा है आपके जीवन में अच्छा बुरा जो भी हो रहा है
1:56
आपका हो ना जैसा का तैसा है ना
2:03
वह बनता बिगड़ता ही नहीं है उसको आप ना बना सकते हो ना बिगाड़ सकते हो वही आपको
2:23
तो बताओ अब हम तो बता दिए आगे की राम कहानी बताओ।
2:59
हां जी
3:29
किसी भी तरह का प्रश्न पूछने पर भी जो समाधिस्त रहता है जो समाधान में रहता
3:37
जो समाधान में ही रहता है वही तू है।
3:43
चाहे कोई भी प्रश्न उठे, समस्या उठे,
3:50
संशय उठे फिर भी कुछ ऐसा है ना जो समाधिस्थ रहता है, स्थिर रहता है।
4:02
वही आपको बनने बिगड़ने का वहां
4:12
है ही नहीं कुछ
4:48
हम बताओ आप कुछ बोलो यार तो आगे बढ़े नहीं तो चले हम
5:00
हम स्वामी जी नमस्कार नमस्कार
5:11
नमस्कार जी हम नेपाल से सुरेश गिरी
5:17
हां बताइए सुरेश जी हां आपको सुनते हैं और रेगुलर तो नहीं सुन पाते हैं कभी-कभी
5:27
अब स्कूल ऑफिस भी अपना रहता लेकिन आप टू द पॉइंट बात करो टू द पॉइंट क्या पॉइंट
5:34
है आपका सुनना वनना छोड़ो सब हां आप अभी जो बोल रहे थे हर एक करने के पीछे
5:43
जो स्थिर रहता है हम हर एक साधना के पीछे हर एक अवस्था के पीछे
5:50
तो मैं हूं जो है वही क्यों है जी
5:57
मैं हूं जो आप बोलते है ना अपना बोध भी जी
6:05
हां तो स्टॉप करो इनको ये इस चलाएमान दुनिया में भी जो स्थिर
6:14
रहता है है ना ये दुनिया चल रही है सब चल रहा है मन चल
6:23
रहा है भाव उठ रहे हैं चल रहे हैं इसमें भी कुछ ऐसा है ना जो स्थिर है
6:34
तभी तो बता पा रहे हो ना आप कि कुछ चल रहा है वो स्थिरता ही आपको हो
6:49
और जब आपको यह चलायमान भी स्थिर लगने लगे।
7:09
जब आपको इस संसार के आवागमन का भी पता ना चले। यह भी स्थिर लगने लगे।
7:18
ये आवागमन भी स्थिर है।
7:23
तब समझ जाना आप आत्मा में
7:38
जब ये आवागमन आवागमन ना लगे। है ना?
7:46
आपका होना तो स्थिरता है। स्थित प्रज्ञ है।
8:00
बट जब ये संसार का आवागमन भी शून्य हो जाए।
8:07
लगे कि कुछ हो ही नहीं रहा है। यह अभी आपको क्या लगता है कुछ हो रहा है?
8:14
इससे बचना है। अपने में जाना है। अरे नहीं कुछ हो ही नहीं रहा है।
8:25
और कुछ हो ही नहीं रहा है। यह सब अन हो रहा तमाशा है।
8:35
अन हो रहा तमाशा।
8:51
तो जब यह हो रहा अन हो रहा लगने लगे
8:57
तब समझ जाना आप अपनी आत्मा में हो उसके पहले नहीं
9:07
यह हो रहा है आपको हो रहा है लगता है इसको कैसे करें? क्या करें?
9:17
कैसे बचें? कैसे इसके साक्षी हो?
9:25
आप बचते हो इनसे।
9:29
और यह आपके लिए हो रहा है। यह देह, मन, बुद्धि और यह बाहरी दुनिया आपके लिए हो रही है।
9:40
जो हो रहा है होने दो। यह सब बचकानी बातें हैं।
9:56
जब आपको लगने लगे कि अन हो रहा तमाशा है।
10:00
हो ही नहीं रहा है। कुछ हो ही नहीं रहा है तो मुस्कुराया कर।
10:07
इस अन हो रहे तमाशे को देखकर मुस्कुराया कर।
10:16
सब अन हो रहा तमाशा है।
10:44
हम
11:04
अल्लाह
11:32
तो पहले हो रहा है से नहीं हो रहा है में आओ अन हो रहा तमाशा
11:39
उसमें आओ तो चिपकोगे नहीं फिर किसी से भी
11:47
जो भी जान रहे हो, समझ रहे हो, देख रहे हो, यह सब अन हो रहा तमाशा है।
12:08
अन हो रहा तमाशा।
12:15
और इस तमाशे में आप सच्चाई खोज रहे हो
12:26
वो नहीं मिलेगी ऐसा हो जाए वैसा हो जाए फिर जो हो रहा है होने दो
12:34
ये सब कंप्रोमाइज है स्वरूपता की पहचान ही है कि जहां कुछ हो ही नहीं रहा है। वही स्वरूप की पहचान है।
12:46
जहां कुछ हो ही नहीं रहा है। और स्वरूप में आ गए तो बाहर भी कुछ नहीं हो रहा है। भीतर भी कुछ नहीं हो रहा है।
12:54
तब स्वरूप में आए। आत्मा में आए, स्वयं में आए।
13:03
स्वरूप में आने का अर्थ ही है कि जहां कुछ हो ही नहीं रहा है।
13:13
ना भीतर ना बाहर ना मन बुद्धि चल रहे हैं ना बाहर दुनिया
13:21
चल रही है। यह सब अन हो रहा तमाशा है।
13:28
आपका ध्यान मिरर में नहीं है। मिरर में जो चित्र बन रहे हैं उसमें है। मन,
13:36
बुद्धि, दुनिया यह आत्मा रूपी मिरर में ना चित्र बन रहे हैं।
13:42
लेकिन आत्मा में, मैं में आईने में कुछ हो ही नहीं रहा है।
13:53
आप अच्छा कर्म करते हो तो पुण्य, बुरा करते हो तो पाप।
13:58
अरे आईने में अच्छा बुरा कुछ नहीं हो रहा है। है एज इट इज है आईना।
14:11
सारे चलचित्र चलने के बाद भी जो प्योर है वही मैं हूं।
14:23
आईने में सब दिख रहा है ना आत्मा रूपी आईने में देह मन बुद्धि और ये दुनिया
14:30
बाहरी दुनिया ये सब दिख रही है
14:50
यह जो दिख रहा है वह आईने में है क्या?
15:02
आईने में मतलब मैं में है क्या? मैं आत्मा भगवान
15:12
मैं आत्मा भगवान में कुछ हुआ ही नहीं। आज तक ना हो रहा है ना हुआ आज तक
15:21
तो अपने आप को कुछ मान लेने पर भी जो एज इट इज रहता है
15:31
वही मैं हूं अपने को देह मन बुद्धि दुनिया पापी पुण्य आत्मा स्त्री पुरुष मान लेने
15:39
पर भी जो एज इट इज रहता है मान लेने पर भी जो है एज इट इज रहता है। अरे वही मैं हूं।
15:50
वही मिरर है। आत्मा है।
15:54
प्योर जहां कुछ हो ही नहीं रहा है।
16:01
जहां आज तक कुछ हुआ ही नहीं। कुछ हुआ ही नहीं।
16:09
कुछ हुआ ही नहीं।
16:14
तू इस अन हो रहे तमाशे को देखकर मुस्कुराया कर
16:24
गुनगुनाया कर नाचा कर ये सब अनोरा तमाशा है
16:58
तो एक चींटी जैसे ओस की बूंद को देखती है छोटी सी चींटी ओस के बूंद को देखती है और उस ओस ओस की बूंद में आकाश दिखता है उसको।
17:10
है ना? तो इतने बड़े आकाश के अंदर एक ओस की बूंद और ओस की बूंद में वो आकाश को देख रही है।
17:23
है ना?
17:26
ऐसे ही ऐसे ही यह पूरा आकाश ओस की बूंद है आत्मा
17:37
के सामने ये पूरा आकाश ओस की बूंद है और इसमें जीव
17:45
खोज रहा है आत्मा को वो उसकी की बूंद कुछ हुआ ही नहीं है कभी।
18:05
जहां आज तक कभी भी कुछ भी हुआ ही नहीं।
18:14
वही एकमात्र मैं हूं।
18:19
आज तक जहां कभी भी कुछ भी हुआ ही नहीं।
18:27
हो सकता नहीं वही और वही एकमात्र मैं हूं।
18:35
मैं आत्मा भगवान
19:03
तो आत्मा में कुछ है ही नहीं। ऐसा तो नहीं है कहीं।
19:09
आत्मा में कुछ है ही नहीं भी नहीं है।
19:17
यह जो नेगेटिव आप सोचते हो ना कि कुछ है ही नहीं। यह भी नहीं है।
19:27
और कुछ हो तो रहा ही नहीं है।
19:42
अरे हर होने को जो जान रहा है।
19:49
वहां कुछ भी हो रहा है क्या?
19:54
उस जानने वाले में स्वयं में कुछ हो ही नहीं रहा है।
20:09
मुझ आत्मा भगवान में कुछ हो ही नहीं रहा है।
20:26
मानने पर भी हो ही नहीं रहा है।
20:31
खुद को देह मानने पर जीव मानने पर भी हो ही नहीं रहा है। क्योंकि मैं जैसा का तैसा हूं। एज इट इज हूं।
20:47
क्योंकि मैंने जैसे खुद को देह माना
20:55
है ना मैंने खुद को स्त्री माना, पुरुष माना,
21:01
पापी पुण्य आत्मा माना, जीव माना तो क्या मैं पुरुष ही हो गया?
21:13
देह ही हो गया, जीव ही हो गया
21:25
या जो भी आप खुद को मानते हो अच्छा बुरा क्या आप वो हो गए क्या?
21:32
हमेशा के लिए हो गए।
21:40
अरे हम यह बता रहे हैं थोड़ी देर के लिए भी नहीं हुए हो क्योंकि आप ज्यों के त्यों हो।
21:49
तू खुद को जी भर के मान जो मानना है तेरे को तू ज्यों का त्यों ही रहेगा।
21:56
तू ज्यों का त्यों ही रहेगा। मस्त रह इसलिए रख चाहे यार।
22:07
तू खुद को जो मान यार तू ज्यों का त्यों ही रहेगा।
22:14
जी भर के मान भगवान मान, जीव मान, देह मान, मन मान, माया मान।
22:24
तू ज्यों का त्यों ही रहेगा। वो जो दर्पण है मिरर एज इट इज।
22:34
बस एज इट इज।
22:42
वह शुद्धता दर्पण की जिसमें करोड़ों चलचित्र
22:50
आ रहे हैं जा रहे हैं लेकिन वो एज इट इज तो आत्मा रूपी दर्पण में जब आप देह को देखते हो तो आपको लगता है मैं देह हूं।
23:03
आत्म रूपी दर्पण में जब आप मन को देखते हो विचार को तो आपको लगता है मैं विचारवान हूं।
23:11
दर्पण में जो देखते हो भाव देखते हो तो बोलते हो मैं भाव वाला हूं। पुरुष देखते हो पुरुष दुनिया देखते हो दुनिया।
23:24
दर्पण के सामने जो भी आ जाए इसका अर्थ यह नहीं है कि दर्पण वही हो गया।
23:36
है ना? मैं के सामने कुछ भी आ जाए। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं यह सब हो गया।
23:47
दर्पण तो एज इट इज है।
23:50
शुद्धतम निर्लेप
24:04
तो दर्पण की यह गलतफहमी
24:11
है। मेरे को कुछ हो गया। मेरे में कुछ आ गया।
24:19
क्या यह दर्पण की गलतफहमी है? आत्मा की गलतफहमी है? नो।
24:29
दर्पण में जो आपने चित्र देखा कि मैं शरीर हूं, मैं जीव हूं। यह उस जीव की गलतफहमी है।
24:38
कि मेरे को कुछ हो गया।
24:44
समझ रहे हो? ये जो खुद को देख रहे हो ना शरीर जीव ये बॉडी वाला ये जो भी आइटम है
24:50
इसको गलतफहमी है इसको ये जो बैठे हैं अभी ये जो सुन रहे हो ना ये इसको गलतफहमी है
24:58
कि मेरे को कुछ हो गया मैं को कुछ हो गया
25:04
मैं को डायरेक्ट मैं से शुरू करो मैं को गलतफहमी नहीं है भैया दर्पण को गलतफहमी
25:13
नहीं है यथावत है जैसा का तैसा
25:20
ज्यों का त्यों भरपूर अरे भरपूर
25:32
तो खुद में सब कुछ देखो या कुछ भी ना देखो गहरी नींद में कुछ नहीं देखते
25:40
जागते हो तो सब कुछ देखते हो सपने में उल्टा उल्टा पुल्टा देखते हो लेकिन मैं में
25:49
यह तीनों नहीं है जागृत स्वप्न सुशुप्ति
25:57
कुछ नहीं दिख रहा है ऐसा भी नहीं है
26:03
और सब कुछ दिख रहा है ऐसा भी नहीं है और कुछ दिख रहा है कुछ नहीं दिख रहा है
26:11
जैसे स्वप्न में होता है ऐसा ऐसा भी नहीं है।
26:18
है ना? हमारी सोच यहीं तक जाती है ना। बस ये तीनों है ही नहीं। वहां जागृत, स्वप्न, सुशुप्त।
26:49
तो क्या है मैं में ज्यों का त्यों है जैसा का तैसा है उसको आप कुछ भी कहोगे कि
26:58
ऐसा है वो रॉन्ग हो जाएगा मैं ऐसा हूं हूं कहते ही रॉन्ग
27:07
जैसा हूं वैसा हूं जो हूं जो हूं सो हूं जो का त्यों भरपूर
27:17
हां तो बचपन से ले अभी तक आपने खुद को कितनी
27:25
बार देह माना मन बुद्धि स्त्री पुरुष पापी पुण्य आत्मा सही गलत अच्छा बुरा बुरा पता नहीं
27:33
क्या-क्या माना दुनिया भर का जो भी माना आप में कोई बदलाव
27:40
हो गया क्या मानने से तो मानने से भी जो नहीं बिगड़ता वही मैं
27:50
हूं मानने से जो बिगड़ जाए वह मैं नहीं हूं
27:57
भैया हेलो मानने से भी जो नहीं बिगड़ता
28:04
मैं खुद को चाहे जो मानूं मैं अपने आईने में चाहे जो देखूं ना शरीर
28:12
देखूं मन देखूं कुछ भी देखूं मैं श्योर हूं ना मेरी शुद्धता श्योर है
28:19
ना
28:29
तो कुछ भी मान लेने पर जो बनता बिगड़ता नहीं है
28:36
वही और वही और वही एकमात्र मैं हूं केवल मैं हूं
28:44
तो मानने से घबराना नहीं
29:08
क्यों मालूम? क्यों है ऐसा? इसका बहुत गहरा राज है।
29:15
अरे आंख खोल के सुना करो यार। ये ध्यान मत लगाया करो।
29:21
मानने से मत घबराया करो। इसका बहुत गहरा राज है।
29:30
क्योंकि मैं मैं कभी भी मानने से नहीं घबराता है।
29:38
क्योंकि मैं कौन है? भगवान है। मैं आत्मा भगवान भगवान मानने का आनंद लेता है अपनी माया का। मानना यानी माया।
29:55
मैं कभी भी नहीं घबराता है मानने से। कैसे घबराएगा?
30:08
बल्कि मैं ही मानता हूं ना। कौन मानता है?
30:18
मैं ही मानता हूं। इसलिए तो मैं निश्चिंत हूं।
30:24
कोई दूसरा आकर थोड़ी ना मान रहा है। मैं ही मानता हूं। करके निश्चिंत हूं। आईने
30:32
में ही ये सारे चल चित्र है। करके निश्चिंत हूं। आईना ज्यों का त्यों ही रहेगा।
30:43
मेरे को आप अवतार मान लो, चोर डाकू मान लो। मैं तो ज्यों का त्यों ही रहूंगा ना।
30:54
और और बहुत खतरनाक सत्य यह है कि हर डाकू
31:01
हर चोर ज्यों का त्यों है। हर अवतार ज्यों का त्यों।
31:10
परंतु हर चोर डाकू को इसका निश्चय नहीं है।
31:16
चोरी करने वाले को इसका निश्चय आना बहुत मुश्किल है। उसके लिए शुद्ध हृदय चाहिए।
31:24
नहीं तो ज्ञान का दुरुपयोग होता है।
31:34
लेकिन सत्य तो यही है कि मैं आत्मा भगवान को स्वयं को कुछ भी मान लो।
31:43
खुली आजादी है। अभी अभी हां अभी
31:51
कुछ भी मान लो यार खुद को कुछ मान लेने पर भी जो का त्यों
32:00
रहता है वही मैं हूं। वही सदा मुक्त मैं हूं।
32:11
वही मैं सबका स्वभाव मैं हूं।
32:35
तो आईने में जो भी चल चित्र दिखते हैं वह आईने में ही होते हैं ना।
32:49
आईने में ही होते हैं।
32:58
आईने से भिन्न नहीं होते। फिर भी आईना कोरा का कोरा रहता है।
33:07
है ना?
33:09
तो यह जो चल चित्र जो भी हैं मुझ
33:19
आत्मा में ये जो भी व्हाटएवर देह मन ये दुनिया उनिया जो भी
33:27
तब भी मैं कोरा का कोरा हूं ना फ्रेश शुद्ध निर्लेप
33:38
और एकदम निखालिश क्या
33:45
निखालिश मैं
33:55
लेपित हो ही नहीं सकता। मैं अशुद्ध हो ही नहीं सकता।
34:05
मैं मुझे विषयों से बचना नहीं है। मैं विषय से चिपक ही नहीं सकता।
34:15
कैसे चिपक जाएगा आईना? कैसे किसी भी चलचित्र से चिपक जाएगा? हालांकि चलचित्र उसी में है फिर भी नहीं चिपकता।
34:30
क्या करूं? जैसा हूं वैसा हूं।
34:37
जो हूं सो हूं।
34:43
तो चल चित्र से आईने तक जाने के लिए क्या आप कोई साधना करोगे? मंत्र जपोगे,
34:51
ध्यान करोगे, समाधि लगाओगे, पत्थर तोड़ोगे?
34:57
करोगे क्या? बताओ। अरे जल्दी बोलो।
35:05
जल्दी बोलो। क्या करोगे?
35:10
चल चित्र से आईने में जाने के लिए वहीं के वहीं है वह क्या करोगे?
35:18
अरे यार डंडे से लकड़ी में जाने के लिए क्या करोगे? कुछ नहीं करोगे।
35:27
तो आपको बोध हो जाएगा कि आप आईना हो। और जितना करोगे उतना भटकोगे।
35:38
वहां कुछ करना ही नहीं है।
35:43
करना ही बता रहा है। आपका क्या बता रहा है?
35:50
आपका करना क्या बता रहा है कि आईने में एक जीव का देह का चित्र है।
35:56
अब आपका करना यह बता रहा है कि अब आईने ने खुद को देह मान लिया।
36:04
अब आप देह के ढंग से सोचोगे और जो भी करोगे देह के ढंग से करोगे
36:13
खुद को देह मान के करोगे है ना इसलिए मैंने कहा कि कुछ भी मत करो
36:23
और आप आईना तो हो ही आत्मा तो हो ही कुछ करना ही नहीं है उसमें
36:34
क्योंकि आप अपना पास्ट उठाकर देख लो। आपने खुद को जो भी माना, जो भी सोचा अपने बारे
36:41
में, जो भी दुनिया भर के अनुभव किए अपने बारे में आप एज इट इज ही हो ना।
36:50
जब दो दो महीने के बेबी थे तो आज दो महीने के बेबी हो क्या? 10 साल के बच्चे थे। आज 10 साल के बच्चे हो क्या?
37:01
बताओ 20 साल 25 साल के नहीं हो कुछ लोग हैं तो
37:08
ये सारी सीरीज है ना आप तो ज्यों के त्यों हो एकदम निखालिस
37:17
अब जो दो साल में सोचते थे अभी वह सोचते हो क्या
37:24
छ साल में सोचते थे उस समय काम वासना नहीं थी 141 साल में काम वासना आ गई।
37:33
फिर 4050 में वह भी गायब हो जाती है। तो ये सब आ रहा है जा रहा है।
37:41
लेकिन आप तो एज इट इज हो। ब्रह्मचर्य आए या काम वासना आए आप एज इट इज हो। जिंदगी
37:48
में इतनी बार क्रोध किए शांत भी हुए एज इट इज हो।
37:56
आपने खुद को क्या क्या नहीं माना है तब भी
38:02
आप एज इट इज हो यार आप हो कौन
38:08
आपने खुद को हजारों जन्म लिए हैं यह है इस जन्म में वो किए हैं यह है मैं पिता हूं
38:16
पुत्र हूं माता हूं यह हूं वो हूं पता नहीं क्या-क्या माना है पापी पुण्य आत्मा देवता
38:24
मनुष्य जानवर आपने पता नहीं खुद को क्या-क्या माना है।
38:33
इतना कुछ मानने पर भी यार आप एज इट इज हो। यही प्रमाण है कि आप वो मिरर हो।
38:41
आत्मा रूपी मिरर जहां कुछ भी लेपित नहीं होता। चिपकता नहीं है।
38:53
करोड़ों दुख आ जाए, सुख आ जाए, विचार आ जाए, खरबों विचार आ जाए,
39:01
आत्मा के मिरर में वो चिपकते नहीं है।
39:16
तो मुझे आत्मा में कुछ भी लेपित नहीं होता।
39:23
कोई भी चित्र, कोई भी घटना
39:29
जो भी हो रहा है वह मुझ में नहीं हो रहा है।
39:35
और अंततः कुछ हो ही नहीं रहा है। मैं देश में अब यह तो चित्रों के साइड से आप देखें ना
39:45
दुनिया भर के जो चित्र हैं। अब आत्मा के साइड से देखो, आईने के साइड से देखो।
39:55
वहां तो कुछ हो ही नहीं रहा है। खत्म बात।
40:03
अभी आप क्या कंफर्म किए कि आपने जो भी खुद को माना, ये वो बचपन से जो भी माना तब भी आप ज्यों के त्यों हो।
40:15
यह मान्यता के साइड से घुसे उधर देखे है ना
40:22
ठीक है आप ज्यों के त्यों ही हो लेकिन पहले ही यहां से देखो आत्मा से ज्यों के त्यों से
40:36
तो क्या दिखता है खत्म दुनिया
40:45
पहले ही आईने से देखो तो कुछ है ही नहीं यार। कुछ हो ही नहीं रहा है।
40:55
कुछ हुआ ही नहीं आज तक। कुछ हुआ ही नहीं आज तक।
41:06
मुझ में कुछ हुआ ही नहीं। आज तक
41:25
मुझ में अगर कुछ हुआ है, कुछ हो गया है तब तो मैं इन सबका साक्षी बनूं।
41:34
जब कुछ हुआ ही नहीं है तो मैं किसका साक्षी बनूं?
41:43
तो क्या लग रहा है हुआ है कि नहीं हुआ है?
41:51
अरे क्या लग रहा है हुआ है कि नहीं हुआ है? नहीं हुआ है कि कोई डाउट है? हुआ होगा।
42:01
कुछ तो हुआ होगा। पक्का श्योर तब तो ठीक है भैया।
42:13
हो कैसे जाएगा कुछ इसलिए कुछ हो ही नहीं रहा है तू मुस्कुराया कर
42:21
इस अन हो रहे तमाशे को देखकर मुस्कुराया कर
42:40
जहां कुछ हुआ ही नहीं आज तक यार
43:00
तो भैया अब हम व्यवहार में क्या करेंगे यह तो आप बता दिए। अरे व्यवहार में व्यवहार करोगे।
43:10
दुनिया में क्या करोगे? कर्म क्षेत्र में कर्म करोगे। अपने लिए कुछ नहीं करोगे।
43:19
है ना? स्वयं को जानने के लिए पाने के लिए कुछ नहीं करोगे।
43:30
वह तो आप पहले से ही हो।
43:41
तो आईने में चित्र बढ़ा देने से आईना क्या खराब हो जाता है?
43:47
व्यवहार ज्यादा हो जाने से क्या खराब हो जाता है? ज्यादा कर्म हो जाने से क्या गड़बड़ हो जाती है क्या आईने में?
43:58
आईने में कुछ होता ही नहीं है।
44:08
मैं में मैं कुछ होता ही नहीं।
44:22
क्या हुआ है?
44:26
हुआ कुछ नहीं है।
44:32
बात क्या है पता कुछ नहीं है।
44:41
सबको क्या क्या गुमान हो रहे हैं।
44:49
इसमें मेरी खता कुछ नहीं है।
44:58
क्या हुआ है? हुआ कुछ नहीं है।
45:20
हुआ कुछ नहीं है। बस
45:48
हां जी तो जो हुआ ही नहीं
45:59
अगर आप उसको हटाने का प्रयास करोगे तो क्या कहलाओगे
46:08
साधक ध्यानी है ना
46:16
जो हुआ ही नहीं उसको हटाने का प्रयास कौन कर रहा है साधक
46:24
और क्या मान के कर रहा है? हो गया मान के कर रहा है।
46:35
तो वो एक अंतहीन जंगल है। है ना?
47:27
ओके
47:46
तो अब ये रोना धोना बंद कर दो। मेरे घर में यह हो गया। मेरी दुनिया में वह हो गया।
47:53
यह सब नौटंकी छोड़ो। यह सब अज्ञानता है और कुछ नहीं।
48:04
मेरी दुनिया में वो हो गया। कुछ हुआ ही नहीं है मेरे भाई।
48:16
काश कुछ हो जाता तो हम भी उपाय बता देते कि ऐसा कर लो।
48:30
हम भी कोई मंत्रवंत्र दे देते, कोई झाड़फूंक कर देते, कोई साधना बता देते।
48:39
काश कुछ हुआ होता तो हम भी बता देते। भैया कुछ हुआ ही नहीं है तो हम क्या बताएं
48:47
आपको? ऐसा करो, वैसा करो सब तमाशा।
48:58
अच्छा एक और बात बता दे रहे हैं ना हुआ था ना हुआ है ना कभी होगा
49:05
आगे भी कुछ नहीं होने वाला है कुछ होगा ही नहीं
49:12
समझ जाओ अच्छे से इसलिए निश्चिंत रहो क्या होगा कुछ होगा ही नहीं
49:27
क्योंकि होना शब्द जो आता है ना यह हो गया वो हो गया वो समय की दृष्टि से आता है।
49:37
अब मैं के दर्पण में आत्मा के दर्पण में समय भी एक चित्र है। भूत भविष्य वर्तमान
49:45
भी एक चित्र है। जागृत स्वप्न सुशुक्ति भी एक चित्र है।
49:53
देश काल वस्तुएं सब एक चित्र है। स्थानस्थान सब चित्र है।
50:05
तो अब अब यार कुछ होगा ही नहीं यार।
50:10
अरे होगा ही नहीं। तू सदा ज्यों का त्यों ही है। ज्यों का त्यों ही रहेगा।
50:18
तू बुद्ध ही है और बुद्ध ही रहेगा क्योंकि तू बुद्ध ही था।
50:25
तू शुद्ध ही है। शुद्ध ही था। शुद्ध ही रहेगा।
50:31
तू सदा से निर्दोष है मेरे यार। तू निर्दोष ही रहेगा।
50:48
दोष केवल माने हुए हैं। निर्दोषता जानी हुई है। आपकी आत्मा है।
51:34
कभी कुछ हुआ ही नहीं ना होगा
51:54
इस अमृत को पी के सुखी हो। सुखी हो जा अभी के अभी।
53:30
तो खुद को कुछ भी मान लेने पर
53:38
कुछ भी मान लो खुद को या कुछ भी आपने माना है खुद को तब भी जो
53:46
ज्यों का त्यों है वही मैं हूं
53:54
ज्यों का त्यों भरपूर ज्यों का त्यों भरपूर
54:04
जैसा का तैसा वही के वही
54:19
मानने पर जो बिगड़ नहीं जाता और जानने पर जो बन नहीं जाता अभी आपने जान लिया तो
54:26
ज्यों का त्यों कुछ बड़ा नहीं हो गया या कुछ बन नहीं गया बनता बिगड़ता ही नहीं
54:38
जानने से जो बन ना जाए, मानने से जो बिगड़ ना जाए, वही मैं हूं।
54:47
जानने और मानना मेरे अधीन है। मैं इनके अधीन नहीं हूं।
54:55
और मैं ज्यों का त्यों जैसा हूं वैसा हूं।
55:01
यावन हम जैसा हूं वैसा हूं
55:08
मैं जैसा हूं वैसा ही हूं यावर
55:19
मैं ऐसा नहीं अब ऐसा में सब आ गया जो भी आज तक आपने
55:27
सोचा है देखा है जाना है अनुभव किया देह मन दुनिया आत्मा परमात्मा आकार निराकार
55:35
मैं ऐसा नहीं जैसा मैं हूं
55:42
वैसा ही हूं
56:03
जैसा मैं हूं वैसा ही हूं।
56:14
हां जी।
56:25
तो मुझ आत्मा में कुछ हुआ ही नहीं।
56:35
इवन मुझ आत्मा में कुछ हुआ ही नहीं। यह भी नहीं हुआ।
56:44
सबका अभाव हो गया और अब अभाव भी नहीं है। एकमात्र मैं हूं।
56:53
एक को हम द्वितीय ना वहां एक दो भी नहीं है। बस मैं ही हूं।
57:16
तो आज तक आपने जो भी अनुभव किया वह मैं नहीं हूं। क्यों मालूम? क्योंकि जिसका भी आपने अनुभव किया वह आपसे छोटा है ना।
57:30
तो आप हो कैसे सकते हो? इवन अनुभव भी आपसे छोटा है।
57:40
शद्र है। इसलिए मैं मैं हूं बस।
57:47
एकदम जैसा हूं वैसा हूं। ज्यों का त्यों भरपूर।
57:54
अरे भरपूर हूं यार। क्या करना यह सब तमाशाबाजी?
58:16
हमेशा याद रखना। माना हुआ खाली रहता है। खाली क्या है इसमें? डंडा लकड़ी भरपूर है।
58:25
देखो एकदम ठसाठस ऐसे ही आपने खुद को जो भी माना है वो सब
58:33
खाली है। उसमें कुछ है ही नहीं। जीरो।
58:39
खुद को देह माना, दुनिया माना, स्त्री पुरुष माना, वह सब जीरो है। वह है ही नहीं।
58:47
शादी से पहले खुद को पति पत्नी मानते थे क्या?
58:52
जीरो था ना पति पत्नी आज भी जीरो है
59:01
तो खुद को जो भी मानते हो वो खाली है और मैं
59:08
अरे ज्यों का त्यों भरपूर लबालब
59:15
ठसाठस हां
59:24
खुद को छोटा सा बॉडी मान लिए तो यह क्या यह तो खाली है कुछ नहीं है इसमें
59:32
केवल विकल्प है। विकल्प का अर्थ ही होता है जो अस्तित्वहीन होता है। जैसे डंडा कहीं है ही नहीं।
59:40
लकड़ी पे जो डंडे की मान्यता है वह डंडा कहीं है ही नहीं।
59:45
ऐसी माना हुआ देह माना हुआ मन बुद्धि दुनिया कहीं है ही नहीं
59:52
खाली है यह सब ओला है ही नहीं
1:00:01
और मैं ज्यों का त्यों भरपूर अरे भरपूर
1:00:12
हां जी
1:00:23
तो ना हम बसामि बैकुंठे सुने हो ना योगी नाम चित्ते ऐसा एक दोहा
1:00:32
है उसका नारद भक्ति सूत्र का कि मैं ना बैकुंठ में रहता हूं ना योगियों में
1:00:39
और उसमें वह कुछ है संस्कृत हमको आती नहीं कि जब मेरा भक्त मेरा गान करता है, मैं वहीं रहता हूं।
1:00:50
है ना? तो मेरा गान का अर्थ क्या है?
1:01:01
अरे नारायण की पहचान तो होनी चाहिए ना। तब तो उसका गान करोगे।
1:01:07
मुझ आत्मा का गान गुणगान
1:01:16
गुणातीत का गुणगान जब मुझे कोई गाता है जब मैं को कोई गाता
1:01:23
है नारायण तक आप सुने हो अच्छी बात है वो
1:01:32
लेकिन जब मैं को कोई गाता है मैं उसी के पास रहता हूं।
1:01:50
और मैं का गीत क्या है?
1:01:57
कुछ हो ही नहीं रहा है।
1:02:15
मुझ में मैं में कुछ हुआ ही नहीं।
1:02:20
अरे कुछ हुआ ही नहीं। क्या दुनिया क्या ये क्या गुरु शिष्य क्या
1:02:28
ना ज्ञान ना ज्ञान कुछ हुआ ही नहीं।
1:02:51
अरे भाई आप बोलते हो ज्ञान पहले है। बाद में आपको यह सब पता चलता है। जब कुछ हुआ ही नहीं तो किसका ज्ञान पहले है?
1:03:05
कुछ होगा तभी तो उसका ज्ञान पहले आप बोल पाओगे।
1:03:12
जब कुछ हुआ ही नहीं तो किसका ज्ञान पहले?
1:03:19
इसलिए ना अज्ञान है ना ज्ञान है। हां जी।
1:03:30
वैदेश में ये सब का अभाव है। सर्वथा अभाव
1:03:41
हो रहा नहीं हो रहा जो भी है सबका सर्वथा अभाव है।
1:04:18
एकदम गायब है सब कि बचा है किसी का कुछ कोई चित्र दिख रहा है क्या? अरे बोलो यार
1:04:27
ये समाधि मत लगाया करो। हेलो बताओ
1:04:36
कुछ नहीं दिख रहा ना है ही नहीं तो दिखेगा कैसे
1:04:44
बस अपना आप है और कुछ नहीं
1:05:00
जब मैं ही हूं मेरे अलावा कुछ है ही नहीं तो मैं देखूं भी तो देखूं किसको
1:05:06
है ना देखूं भी तो देखूं किसको
1:05:12
जहां देखना देखने तक का अभाव है जानना देखना होना नहीं होना।
1:05:23
सब का अभाव है। जो भी आप सोच समझ सकते हो, जितना गहरे जा सकते हो, ऊंचे जा सकते हो, सबका वहां नेचुरली अभाव रहता है।
1:05:37
ब्रह्मांड का वहां अभाव है। दुनिया, शरीर जो भी जाने समझे
1:05:43
पता नहीं क्या-क्या सबका वहां नेचुरली अभाव है। है ही नहीं।
1:06:00
और अभाव का भी अभाव है।
1:06:40
तो खुद को कुछ मान लेने पर भी मान्यता का उस मान्यता का अभाव उसी समय रहता है।
1:06:51
खाली है ना वो वो तो है ही नहीं ना।
1:06:54
लकड़ी को डंडा मान लेने पर डंडे का अभाव उसी समय रहता है। जिस समय आपने लकड़ी को डंडा माना।
1:07:05
खुद को देह मान लेने पर।
1:07:09
ठीक उसी समय जिस समय आपने माना है। देह का अभाव रहता है।
1:07:15
जो है ही नहीं उसका अभाव ही रहेगा ना भाई। हां।
1:07:47
तो खुद को एक मानते हो तब दो दिखता है तब अनेक दिखता है।
1:07:54
तब बोलते हो एक हो हम द्वितीय नास्त यह भी मान्यता है। खुद को शून्य मानना एक मानना
1:08:02
फिर एक के कारण अनेक की मान्यता आती है।
1:08:09
लेकिन मान लेने पर भी यह खाली रहता है। फूटा हुआ गुब्बारा है। यह फोड़ना नहीं है।
1:08:22
फूटा हुआ गुब्बारा ही फुलाते रहते हो आप। जो भी मानते हो उसमें दम ही नहीं रहता है।
1:08:35
तो मैं ज्यों का त्यों भरपूर और भरपूर।
1:08:44
मैं कभी भी कुछ भी हुआ ही नहीं।
1:08:52
हो सकता नहीं।
1:09:20
तो मैं यह माना हुआ देह फिर उस देह को तुमने माना राहुल है। फिर राहुल का एक रूप है। विराज है। ज्योत है उसका एक रूप है।
1:09:33
जब यह माना हुआ जो देह ही नहीं है तो उसका नाम रूप कहां रहेगा?
1:09:42
फिर आपके कर्म कहां रहेंगे?
1:09:46
जब मानी हुई देह ही नहीं है तो उस देह के माने हुए कर्म कहां है मेरे
1:09:55
भाई? कर्म कर्म जो रोते हो कर्म का सिद्धांत
1:10:04
में तो कर्म ही नहीं मिल रहा
1:10:48
तो कल एक शख्स आए थे। बोले मैं की उपस्थिति में सब हो रहा है। अरे मैं जब उपस्थित होता हूं तो वहां कुछ होता ही नहीं है।
1:10:59
कुछ हो सकता ही नहीं है। वह असली उपस्थिति है मैं की।
1:11:06
क्योंकि जब आप स्वयं में हो और आप हर समय स्वयं में हो क्योंकि आप स्वयं ही हो
1:11:13
और हर समय कुछ नहीं हो रहा है
1:11:35
तो क्या हुआ है?
1:11:39
हुआ कुछ नहीं है।
1:11:46
बात क्या है?
1:11:49
पता कुछ नहीं है।
1:12:39
तो लास्ट में मुझ आत्मा के दर्पण में ना चित्र है ना दर्पण है
1:12:48
बस मैं हूं। इसलिए मैं क्या देखूं और क्या ना देखूं।
1:12:56
पॉइंट बी नोटेड।
1:13:01
ये सेकंड पॉइंट है। मुझ आत्मा में मुझ आत्मा के दर्पण में जो भी चित्र बन रहे
1:13:11
हैं, आ रहे हैं, जा रहे हैं, ना वह चित्र है, ना दर्पण है।
1:13:18
इसलिए मैं क्या देखूं और क्या ना देखूं।
1:13:27
क्या जानू क्या ना जानू क्या समझूं क्या ना समझूं हमको पता नहीं भैया तुम जानो अपना
1:13:48
तो यह लाभया का देश आ गया है
1:13:54
और फिर भी कुछ कुछ बयां हो रहा है
1:15:17
ठीक है भैया मस्त रहो।
1:15:25
आत्मिक रहो।
1:15:51
अब एक चीज बताना मेरे को। ये थोड़ा बिय्ड पॉइंट है।
1:16:00
आत्मा अगर आप आत्मा ही हो और आप हो
1:16:06
तो आत्मा क्या आत्म नष्टिक होती है क्या
1:16:13
जीव वायु को होना पड़ता है यार आत्मनिक खच्चर को गधे को
1:16:22
है ना आप आत्मा ही हो आप परमात्मा ही हो आपको कोई किसी भी टाइप का नस्टिक नहीं
1:16:29
होना है ठीक है आप मस्त रहो राम राम सबको को
1:16:41
तो अपने आप को सब कुछ मान लेने पर भी
1:16:50
अपने आप को सब कुछ मान लेने पर भी जो ज्यों का त्यों रहता है।
1:17:00
मान लेने पर भी जो जजों का त्यों रहता है, वही मैं हूं। वही मैं हूं। वही मैं हूं।
1:17:10
मैं ही मैं हूं। मैं ही मैं हूं। मैं ही मैं हूं।
1:17:30
अपने आप को कुछ भी मान लेने पर भी मैं ज्यों का त्यों
1:17:41
ही रहता हूं। ज्यों का त्यों भरपूर ही रहता हूं। मेरा नेचर है।
1:17:49
मैं हूं।
1:17:52
जो का त्यों भरपूर
1:18:01
मुझ भरपूर में से यानी रत्ती भर भी कम नहीं होता कि इतना ही
1:18:12
मान लो मुझको कम होता ही नहीं है।
1:18:34
पूर्णता में भी हो सकता है कुछ कमी हो पर मुझ में नहीं।
1:18:48
अब वाणी को विश्राम देते हैं। सभी को प्रेम प्रणाम।
1:18:59
अब तो कोई आशीर्वाद भी नहीं दे सकता। गड़बड़ हो गया तो। ठीक है।
1:19:09
आशीर्वाद जीव को दिया जाता है। आत्मा के आशीर्वाद दूंगा।
1:19:16
चलो भैया मस्त रहो।