Prabhu Shree
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नमस्ते गुरु जी नमस्कारम मैं आपकी एक वीडियो देख रही थी जिसमें आप
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बोल रहे थे कि साधना और ध्यान सबसे बड़ा कमर्शियल ट्रैप है।
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हम मैं समझ नहीं पाई हम क्योंकि ध्यान मतलब मेरे हिसाब से ध्यान
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मतलब एक पहली प्राइमरी अवस्था है जहां पे आप थोड़ा सा बैठते हो, ठहरते हो तब जाके
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आप बाकी की चीजें समझ पाते हो। पहले ध्यान से शुरू होती है चीजें।
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हां वो बात अलग है कि लोगों ने उसे कमर्शियल बना दिया है।
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हम बट साधना और ध्यान अपने आप में एक कला है जो सीखनी चाहिए हर किसी को मेरे हिसाब से
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हम हम तो मैं वो समझना चाह रही थी आप एंजॉय कीजिए साधनाओं का ध्यान का जो
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आपको अच्छा लगता है उसको भरपूर जियो क्योंकि वो आपकी जिंदगी
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का सच है जी आपको जो बेहतर लगता है जो सही लगता है जी
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जिसमें आपको अच्छा फील होता है उसका आप आनंद लीजिए
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हां रहा सवाल हमारा हमने जो कहा है कि
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साधना बिजनेस तो एक अलग चीज है साधना अनित्य है। है ना?
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साधना से नित्य को नहीं पाया जा सकता।
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जो खुद अनित्य है कोई भी साधना आप 24 आवर नहीं कर सकते।
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राइट? इसलिए हर साधनाएं अनित्य है और अनित्य से नित्य को नहीं पाया जा सकता।
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अनित्य से अनित्य ही मिलेगा।
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अनित्य की साधना से अनित्य शांति ही मिलेगी।
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अनित्य की साधना से अनित्य आनंद ही मिलेगा। इसलिए हर साधक का आनंद एक रिलीफ होता है।
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बस दो चार दिनों का या दो चार घंटे का। अनित्य का फल अनित्य ही है।
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शुरू में यह सब ठीक है कि आप धन दौलत कमा रहे हो। दुनिया में ही जी रहे हो। विषय भोगों में ही लगे हुए हो।
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उससे बेहतर है आप साधना करो। ध्यान करो। यस।
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लेकिन जब आप टर्न हो गए अपनी ओर या सत्य की ओर फिर साधना ध्यान भी आपको छोड़ना पड़ेगा।
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हां मतलब मैंने वही कहा कि प्राइमरी तो आपको यहां पे स्टार्ट यहीं से करना पड़ेगा।
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ऐसा है और वो भी हां बोलिए।
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जी अ मुझे लगता है पहले ए बी सी डी तो पढ़नी पड़ेगी। तो साधना और ध्यान जो है वो ए बी
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सी डी है। हम हम तो उसकी अपनीेंस है।
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नहीं मेरे देखें तो शुरू में भी उसकीेंस नहीं है।
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हालांकि यह सच है कि मैंने भी साधना की है। ध्यान किया है। है ना?
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लेकिन शुरू में भी इसकीेंस नहीं है। जो फॉल्स है वो शुरू से ही फॉल्स है।
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जैसे डंडा फॉल्स है। यह लकड़ी ही है।
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तो शुरू से ही डंडा फॉल्स है।
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तो साधनाओं से बहुत बड़े धोखे भी होते हैं। उससे मन
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मजबूत होता है। मन अपनी जड़े मजबूत करता है।
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वो हमको पता भी नहीं चल पाता।
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तो आपको साधना चाहिए कि सत्य चाहिए?
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सत्य चाहिए बट स्टार्टिंग में जब तक आपको इसका एक्सपीरियंस नहीं साधना से चाहिए।
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नहीं नहीं मुझे मैं सिर्फ ये जानना चाहती थी कि स्टार्ट जो है यहीं से होता है। जब तक आप स्टार्ट नहीं करेंगे तो सत्य तक
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पहुंच नहीं पाएंगे। उसके लिए आपको एक कदम उठाना जो है तो वो जो कदम उठता है वो ध्यान के थ्रू ही उठता है। पहले आपको बैठना होता है, ठहराव लाना होता है। तब
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जाके आप सत्य की ओर जा पाते हैं। तो वो जो ठहराव है मेरे लिए वही साधना है। वही ध्यान है। और उस ठहराव के बाद जब आप सत्य
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को हासिल करते हैं फिर वहां पे आप जो बताते हैं मैं सब कुछ जो मैं हूं हम उस सत्य को समझना।
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हां।
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तो मैं मैं वो जो स्टेटमेंट पढ़ रही थी तो आपका सुना जो तो मेरा सिर्फ ये था कि हां आप एकदम सही कह रहे हैं कि लोगों ने उसे
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कमर्शियलाइज कर दिया है। ओके वो एक अलग मैटर है।
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हां वो एक अलग मैटर है बट अलग मैटर है।
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बट मैं ये समझना चाह रही थी कि उसकी अपनीेंस है। मेरे हिसाब से तो मैं कितनी सही हूं। मैं वो जानना चाह रही थी आपसे।
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मैं वही आपको समझाना चाह रहा हूं कि उसकी इंपॉर्टेंस है ही नहीं।
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ओके आपने किया वो कोई गलत नहीं है। कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। है ना?
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सत्य के लिए आप एक दिया भी जलाओ। एक भगवान का नाम भी लो, ध्यान करो, साधना करो। जीवन में देखो व्यर्थ तो कुछ भी नहीं जाता।
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जी।
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आप बैठना सीखते हो, साइलेंट होना सीखते हो। कुछ तो सीखते ही हो ना? जी जी
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हां लेकिन वह सीखना इसी के लिए है। हां सत्य के लिए मैं के लिए है ना
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राइट इट्स अ टू लक्ष्य हां लक्ष्य आपका स्वयं होना चाहिए
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जी स्वयं यानी मैं देह मन नहीं मैं आत्मा
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भगवान हां तो जब लक्ष्य करेक्ट होता है
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तो ऑलमोस्ट 90 तो काम हो ही गया।
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फर्स्ट लक्ष्य लक्ष्य क्या है?
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तो मैं जो बता रहा था कि साधना से तपस्या से जैसे
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शिव भी भवानी को कहते हैं कि तप आधार सब सृष्टि भवानी है ना कि यह पूरी सृष्टि का आधार तप है।
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तपस्या है।
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तप ही ब्रह्मा, तप ही विष्णु, तप ही शिवा तप से ही ब्रह्मा है, विष्णु है, शिव है।
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तो कोई भी अगर तप करता है शिवोहम, शिवोहम, शिवोहम, शिवोह उसी भाव को प्राथमिकता देता
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है अपने जीवन में कि वह शिव मैं ही हूं, मैं ही हूं, मैं ही हूं।
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तो निश्चित उसका अगला जन्म शिव हो जाएगा। निश्चित हो जाएगा।
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अहम हरि अहम हरि करता है तो वह हरि हो जाएगा। यह तपस्या का फल है।
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तप आधार सब सृष्टि भवानी।
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तपस्या से, नाम जप से, साधना से तमाम सिद्धियां मिलती है। तरह-तरह के आनंद मिलते हैं। नित्यानंद नहीं मिलता।
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सहजानंद नहीं मिलता।
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पावर्स मिलते हैं। बहुत सारी चीजें मिलती है उससे। लेकिन उस अनित्य से अनित्य ही मिलता है।
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और ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक सब अनित्य है। उनकी भी एक एज होती है।
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हां। लेकिन शिव का जो स्वयं है
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आपका जो स्वयं है उसकी कोई एज नहीं है। और वह साधना से नहीं मिलता।
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वह सत्संग से जो प्राप्त है उसका बोध होता है।
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और वही आपका लक्ष्य होना चाहिए।
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और जब लक्ष्य करेक्ट हो गया और ऐसा बताने वाला कोई मिल गया आत्मा वाला
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गुरु तो तुरंत साधना छोड़ देनी चाहिए।
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उसी क्षण जब तक आपको कोई
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आत्मज्ञानी नहीं मिला है तब तक साधना की आवश्यकता है। ऐसा आप कह
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सकते हो क्योंकि जिंदगी में कुछ तो करोगे तो कम से कम साधना कर लो। भगवान का नाम ले लो।
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दिया, आरती, हवन, पूजन, ध्यान, धारणा, समाधि यह कर लो।
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जब भी आपको अपने जीवन में कोई आत्मवान मिले उसी क्षण ये सब छोड़ देना।
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क्योंकि अब बात डायरेक्ट होगी। आपकी बात होगी, आपके होने की बात होगी।
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और उसी में पूरे अस्तित्व को लिखाया जाएगा कि जिसको आप केवल अपना होना समझते हो ऐसा
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शॉर्ट में कि मेरा होना वो अस्तित्व है।
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परमात्मा है।
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तो साधनाएं परमात्मा के लिए नहीं है।
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नित्य के लिए नहीं है। वह सब अनित्य के लिए और टाइम वेस्ट ही होता है उसमें।
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जैसे भोग विलास में हम कुछ खाते हैं, पीते हैं या जो भी भोग विलास है उसमें क्षण भर का सुख मिलता है ना।
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बस साधना में भी क्षण भर का सुख मिलता है। वह भी विषय है।
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एक रिलीफ साध
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ना वो खुद अपने आप को बता रही है। साध
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स्पेस ना जैसे काम ना
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उसमें ना लगा हुआ है
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मेरे मास्टर महर्षि मुक्त का
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कथन है कि साधना के दो फल होते हैं कि साधना साधना से छुड़ा देती है। पहला फल और साधना संत से मिला देती है दूसरा फल।
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यह उनके वक्तव्य हैं।
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और मेरे हिसाब से मतलब ही नहीं है साधना का।
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क्योंकि कोई भी मेरे को सुन रहा है या मेरे पास आप आ गए हो तो चैप्टर ही क्लोज हो गया ना।
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और साध्य की कभी साधना नहीं होती। सत्य की पहचान होती है। साधना नहीं होती।
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स्वयं आत्मा भगवान का भी बोध होता है। साधना नहीं होती।
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साधना के चक्कर में वह छूटता जरूर है।
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और हर साधना परमात्मा के साथ जबरदस्ती है।
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कि मैं साधना से अचीव कर लूंगा या कुछ पा लूंगा
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या खुद को पा लूंगा परमात्मा को पा लूंगा साधना जबरदस्ती है।
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उससे अनंत गुना बेहतर प्रेम है।
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प्रभु से प्रेम, अपने होने से प्रेम एक ही बात है दोनों।
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तो प्रेम से जियो ज्यादा बेहतर है। है ना?
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अगर डायरेक्ट यह मैं का बोध क्लियर नहीं होता है।
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तो बहुत प्रेम से जियो। पूरे अस्तित्व के प्रति, स्वयं के प्रति तो यह प्रेम से इजी बात बन जाती है।
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साधना तो यानी एकदम थर्ड क्लास चीज है।
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एकदम लास्ट वाली चीज है। मजबूरी है वाली बात है कि
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मतलब जैसे क्लास के लास्ट के बच्चे होते हैं ना
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जो एकदम कितना ही समाज समझा लो नहीं समझते उनके लिए है वह
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तो साधना से बेहतर प्रेम और प्रेम से बेहतर मैं मैं आत्मा भगवान
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क्योंकि आपका मैं ही समाधान है।
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वो साधना नहीं है। समाधान है।
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आपका होना समाधि है। नेचुरल सहज
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तो साधना साध ना बस
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हां
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तो जैसे कोई आपके कोई आपको अच्छा लगा जीवन में
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जो भी है उसके साथ आपको रहना है
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तो जैसे पति पत्नी रहते हैं वो साधना करते हैं।
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एक दूसरे के साथ रहने की उनकी साधना है।
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सबको नहीं कह रहा हूं मैं और सबको कह भी रहा हूं मैं। है ना? वो कैसे रहते हैं?
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साधना करते हैं।
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और दो प्रेमी होते हैं। वह कैसे मिलते हैं? कैसे रहते हैं एक दूसरे के साथ? सहज प्रेम में।
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ओके।
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तो उससे बेहतर प्रेम है, साधना से बेहतर प्रेम
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और आत्मज्ञान यानी अब दूसरा है ही नहीं। ना कोई पति है, ना पत्नी है, ना प्रेमी है, ना प्रेमिका है।
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अपना आप ही है पूरे चराचर में।
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दूसरा कहीं है ही नहीं।
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वह फाइनल है और वो फाइनल ही आप हो। एक्चुअल आप
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तो शादी वाले से लोगों को जल्दी समझ आता है। प्रैक्टिकल बताना पड़ता है ना भाई।
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बट नॉट बैड है ना वह नॉट बैड की कैटेगरी है बस और कुछ
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एक कॉम्प्रोमाइज है कहीं ना कहीं कि यार बस अब क्या है अब शादीवादी का रहो बस
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हां कोई कोई जोड़े होते हैं कोई कोई साधक होते हैं जिनके लिए साधना भी
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प्रेम हो जाता है। वो बहुत इक्कादुक्का होते हैं। उनमें आप लोग हो ही नहीं। जो भी मेरे को सुन रहा है वह है ही नहीं।
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ठीक है। ओके जी।
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थोड़ा सुनो हमको तो आपको सत्य का बोध होगा और स्वयं में मैं आत्मा भगवान में प्रतिष्ठा
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होगी। उसका टेस्ट आएगा और ये सब तो ऐसे ही छूट जाता है। अपने आप
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छूट जाता है क्योंकि वो इतना बेकार ट्रैप है ना हर कोई
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साधना करता है खुद को शरीर मान के ही करता है और वो शरीर है नहीं।
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आप कोई भी साधना करोगे खुद को बॉडी मान के ही करोगे और आप बॉडी हो ही नहीं।
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तो फॉल्स से क्या निकलेगा? फॉल्स ही निकलेगा।
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इसलिए तो सबसे ज्यादा मन जो चलता है वह साधना करते समय चलता है।
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साधना में कोई शांत वांत नहीं होता है।
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शांति तो चलो प्रसाद के रूप में बीच-बीच में मिल ही जाती है। नहीं तो आदमी मर जाएगा।
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जितना कोई साधना करता है, नाम जप करता है, वह करता है, यह करता है तो उस समय उसका मन सबसे ज्यादा हावी रहता है।
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विचार ज्यादा चलते हैं। यह असली हकीकत है साधकों की।
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साधना करने से विचार रुक जाते तो मैं समर्थन करता साधना का।
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साधना करने से आपको तृप्ति आ जाती।
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परमानेंट एक समाधान मिल जाता तो मैं समर्थन करता।
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उससे मिलता ही नहीं है। रिलीफ है बस।
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तो आप हो आपका होना है।
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वह कुछ साधन करके है कि बगैर साधना के आप हो
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उनको ऑन करो विराज कैसे बंद कर देते बगैर साधना के आप हो
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अब आप देख रहे हो इसमें कोई साधना है क्या
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सहज देख रहे हो सुन रहे हो इसमें कोई साधना है क्या
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अच्छा मेरी बातों को आप समझ भी रहे हो इसमें कोई साधना है क्या नेचुरल समझ रहे
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हो है ना तो जब सारी चीजें सहज है
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देखना सुनना समझना इवन जानना तो आपका होना भी तो सहज है।
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बगैर प्रयास के बगैर ध्यान और साधना के आप हो।
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आपका होना साधना ध्यान पे डिपेंड नहीं है।
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उसके आीन नहीं है। तो यह तो आपके लिए अच्छी बात है ना।
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यह हर किसी के लिए अच्छी बात है।
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तो बगैर कुछ भी किए जो आप हो अभी के अभी
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वही तो भगवान है अस्तित्व है
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उस पर भरोसा रखो निष्ठा रखो आप सोचोगे बहुत करेंगे ना तब इस नहीं करने
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में निष्ठा होगी और नहीं होगी क्योंकि आपकी निष्ठा करने में है,
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साधना में है तो आत्मा में निष्ठा कैसे होगी?
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आत्मा में निष्ठा सत्संग से हो जाती है कि हां यार मैं बगैर साधना के हूं।
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बगैर कुछ किए भी मेरा होना है। मैं हूं।
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इवन स्वयं के लिए ना कुछ समझना पड़ता है ना जानना पड़ता है और मैं हूं
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तो इनके बगैर भी आपको हो
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और वो भी आप नित्य हो निरंतर हो
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तो जीव के साइड से साधना है।
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आत्मा के साइड से मैं आत्मा भगवान के साइड से कोई साधना है ही नहीं।
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वह तो समाधान ही समाधान है। तृप्ति ही तृप्ति है।
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स्वयं का बोध होते ही
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आपका देह, मन यह सब गायब हो जाता है।
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और स्वयं ही निरंतर है। कोई भी साधना निरंतर नहीं हो सकती।
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हर साधना में अंतर होता है। अनित्य होती है।
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नित्य और निरंतर केवल मैं हूं।
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आप ही हो। बस आपके अतिरिक्त सब अनित्य है।
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रोशनी थोड़ी विराज कम करो तो इसको
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हां ये ठीक हम खिड़कियां वो खोल दो ना यार मौसम बहुत सुंदर है।
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है ना जाली बस लगा दो
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तो एक स्वामी जी हैं। उन्होंने मेरे को लास्ट टाइम कहा था कि
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तुम क्या बात करते हो यार तुम कलश की बात कर रहे हो। मंदिर के कलश
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की है ना लेकिन पहले मंदिर का बेस बनाओगे मंदिर बनाओगे फिर
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उसका गुंबद बनाओगे पहले सब साधना करोगे वो करोगे उसके बाद मंदिर का कलश
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है ना उसके बाद मंदिर का कल कलश
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ऐसे कैसे सीधा हवा में मंदिर का कलश रख दोगे?
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अरे यार तुम मंदिर के भगवान हो।
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कहां कलश वलश में लगा रखे हो।
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यह शरीर ही मंदिर है और इसी के भगवान आप खुद हो।
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और किसी भी भगवान को साधना शोभा नहीं देती।
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आप खुद को भगवान जानो या ना जानो
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साधना किसी को प्रिय नहीं
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साधना मैं सच बताऊं तो परमात्मा से बचने के लिए
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आत्म बोध से बचने के लिए खतरनाक ट्रैप डोंट डू साधना
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रॉन्ग इज ऑलवेज रॉन्ग
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जो गलत बाद में है वह शुरू से गलत है। और जो शुरू से सत्य है आपका होना वह हर हाल में हमेशा सत्य है।
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सत्यम शिवम सुंदरम
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ओके प्रेम प्रणाम
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देखो भाई क्या पोजीशन है। आंधी तूफान हम
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नाच रहा है क्या? अरे बहुत बढ़िया।
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सौरभ जी को भी अंदर बुला लो ना। वह बाहर तो नहीं खड़े हैं।
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अंदर बुला लो।
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हां जी एनीबडी तो तप आधार सब सृष्टि भवानी
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लेकिन तप तप का आधार भी मैं हूं
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सर्व आधार में यस
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तो हमेशा हम रॉन्ग साइड से जीते हैं। साधना यानी डंडे से लकड़ी में आना।
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देह से आत्मा में मैं आत्मा भगवान में आना
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लेकिन लकड़ी से मैं से
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ना आना ना जाना
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साइड सही होनी चाहिए गलत साइड नहीं चुनना देह की साइड जीव की साइड से मत खेलना
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मैं की साइड स्वयं लकड़ी की साइड
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लकड़ी लकड़ी की साइड में कोई साधना ही नहीं है।
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मैं की साइड में हम हम
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कौन है ये? खोलो खोलो।
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नहीं कोई होगा यार।
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मिट्टी की महक शुरू। हां जी।
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तो धरती गर्म होती है ना तो अपने आप बारिश हो जाती है।
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आप में प्यास होती है ना तो अपने आप भर दिए जाते हो आप।
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बारिश का गिरना कोई साधना नहीं।
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यस एनीबडी है कोई
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कबीर साहब बोलते थे ना आंख ना मूंदो कान ना रूधो तन कष्ट नहीं
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धो
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तन कष्ट नहीं धारो
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अब मैं को छोड़ के आप देख लो सब जगह कहीं ना कहीं कष्ट है।
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शरीर भी कष्ट में आता है। देर अवेर मन कष्ट में आ जाता है।
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बुद्धि भी
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सारी मान्यताएं कष्ट में आ जाती है और मैं में कोई कष्ट है ही नहीं। एकदम
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सच्चिदानंद कष्ट का नामोनिशान नहीं।
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ओके जी। है कोई और कि हम चले?
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हम्म हम्म
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प्रणाम स्वामी जी प्रणाम अभी आप तीन महीना सुनिए हमको उसके बाद अभी लास्ट टाइम टॉक हुई थी
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आपसे हमको थोड़ा सुन लो दो तीन महीना
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गौतम बुद्धा क्या करते थे दो साल भेज देते थे जाओ शमशान में रहो लाशों को देखो
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या तो उनके आश्रम में वह बोलते थे दो महीना मौन रहो उसके बाद बात करेंगे
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तो दो साल बोलते थे वो हम दो महीना दो से तीन महीना कहते कि हमको सुन लो मौन वोन मत
40:18
रहो तो दो साल बाद प्रश्न ही खत्म खत्म हो
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जाते थे शिष्यों के तो उसको फास्ट ट्रैक में हमने लाया है
40:33
दो-ती महीने किया है आपके प्रश्न ही खत्म हो जाएंगे
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फिर आप पूछ लेना जो पूछना है जब प्रश्न ना रहे
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ज्यादा नहीं दो-तीन महीना भी बहुत ज्यादा बोल दिया हूं। आदमी कोई 15 20 दिन अच्छे से सुन लेना। बहुत होता है।
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हां जी। प्रेम प्रणाम भगवान। प्रेम प्रणाम।
41:22
भगवान रवि बोल रहा था मुरैना से हां रवि जी बताइए
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एक बात बोलनी थी बस हम
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हेलो सुन पा रहे हैं प्रभु जी हां जी बताइए।
41:55
हां मेरी मैंने महसिल भाषा में बोला था मैंने कि मैं आपके साथ रहना चाहता हूं।
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हम तो विराज जी ने विराज जी से मेरी बात हुई थी।
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हम तो उन्होंने बोला अभी आप आइए दो चार सत्संग अटेंड कीजिए सामने आइए प्रभु के।
42:15
हम उसके बाद वो अब डिसाइड करेंगे
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हम और सत्संग तो निरंतर सुनता ही रहता हूं पर
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बस वो अंदर से रहता है। पता नहीं क्या है कि बस आपके पास रहना है।
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हम प्रभु जी कब बुलाएंगे अब अपने पास।
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नहीं विराज जी ने जो कहा है वह सही कहा है। हां कहा दो चार सत्संग अभी अटेंड करो।
42:52
हां उसके बाद आगे निर्णय लिया जाएगा।
42:56
जी क्योंकि यहां परमानेंट रहने के लिए हमारे पास वैसा स्पेस नहीं है।
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कि हर कोई यहां परमानेंट रह सके और हर कोई यहां रहना चाहता है। है ना? तो हमने कई लोगों को मना किया हुआ है।
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जी परमानेंट संभव नहीं है ना उतना स्पेस ही नहीं है।
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तो परमानेंट मैं हूं तो मैं में रहो।
43:28
हां मैं तो केवल मैं ही परमानेंट हूं। बस बाकी कुछ भी परमानेंट नहीं है। यह आश्रम यह वो कुछ भी परमानेंट नहीं है।
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मैं ही परमानेंट हूं और वही रहो बस।
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ओके भगवान जैसे की आपके साथ रहने की जो इच्छा होती है तो ये मोह है क्या?
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नहीं डिटेलिंग में मत जाओ।
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जी मोह हो चाहे प्रेम हो और रहो भी ना। मैं ऐसा थोड़ी ना कह रहा हूं कि बिल्कुल आओ ही मत।
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है ना? लोग आते हैं, जाते हैं। जी थोड़ा सत्संग करो निरंतर लाइव सत्संग की एक अलग महिमा होती है। है ना?
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जी जी हां जी प्रेम प्रणाम। प्रेम प्रणाम जी।
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प्रेम प्रणाम। प्रेम प्रणाम जी। वैशाली बोल रही हूं मेरठ से।
44:35
हां वैशाली जी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देना था।
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बस आज तक जो जीवन जी नहीं पाई वो मैं अब जी रही हूं। इतने सालों की यात्रा में पता नहीं कहां-कहां गई नहीं। कहां क्या आनी पड़ी?
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बस सबको बहुत-बहुत धन्यवाद। जी रही हूं मैं हर पल को। सिर्फ आपकी ही देन है।
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आज मेरे पास शायद शब्द कम पड़ेंगे बताने के लिए। आपकी एक लाइन ने तो अभी तीन-चार दिन
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पहले एकदम ऐसे पता नहीं क्यों जोर दिया रे जीव होने में शर्म नहीं और परमात्मा होने
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में गर्व नहीं। वो पता नहीं ऐसी लाइन ने इतना ट्रांसफॉर्मेशन कर दिया।
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कितना अच्छा लग रहा है और और पूरे आपके निष्कर्ष मेरा मतलब जितना भी सुनती हूं सब
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कुछ अब जीने में मैं बस कुछ पॉइंट्स ले आई हूं कि हां सब कुछ है हो रहा है तुम हो
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बस किसी चीज को अर्थ मत दो और मान्यता मत दो बस तब और जब से मैं ऐसे जीने लग गई हूं
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इतना रिलैक्स मतलब जैसे मैं कभी जी नहीं पहले कितना कुछ वीडियो देखती थी वो देती थी किताबें पढ़ती
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थी अब ऐसा लगता है कि जरा सा भी गलती से कोई वीडियो क्लिक भी हो जाती YouTube में सुन भी लेती सोचता है अरे कहां चली गई
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कहां भटक गई कितना कंफ्यूजन आ जाता है सही में पोइजन है अगर कहीं और भी जाओगे
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कोई सुनोगे सही में वो पोइजन ही लगता है अब हम
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आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मेरे भगवान मेरे प्रभु थैंक यू सो
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प्रणाम है आपको भी बस आनंद में रहो ऐसे ही मस्त रहो
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और जो लाइन आपके अंदर उतरी है कि जीव होने में अब शर्म नहीं और परमात्मा होने में अब
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गर्व नहीं है वो पूरी सहजा अवस्था की लाइन है।
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अब उसका उतर जाना एक अलग ही आयाम है। बहुत सुंदर
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प्रणाम जी प्रेम प्रणाम प्रभु जी
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हम जो भी आते हो आपका फेस दिखना चाहिए नहीं तो ये वीडियो में आने का मतलब ही नहीं है।
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हां प्रेम प्रणाम प्रभु जी फेस नहीं दिख रहा है तो इनको साइड करो।
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फेस दिखना चाहिए हमको। हम अपना चेहरा फोकट में दिखा रहे हैं।
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हां। बेवकूफ है हम।
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फ्री फंड का माल लूट रहे हो। हां। उसके बाद भी अपना चेहरा नहीं दिखाओगे तो थोड़ी ना जमेगा।
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वीडियो चैट का मतलब ही क्या हुआ?
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आह!
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हम
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यह मीरा को भी हटाओ। हर बार आ जाती है मीरा। हां।
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सबको हटा दो यार। अब टेलीग्राम ही करेंगे। वही ठीक है।
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सब चेहरा छिपा के बैठे रहते हैं। यहां चुनरी ओढ़ के।
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हम हम हम
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मैं का कद्र दान कोई कोई होता है भाई
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डायमंड की शॉप में जाने वाले कोईकोई होते हैं।
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बाकी सब्जी भाजी और यह वह वाले बहुत होते हैं।
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डायमंड की शॉप में साधक नहीं जा सकता।
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वो कैलकुलेट ही करता रह जाएगा। है ना?
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वो कैलकुलेशन खतरनाक है ना डायमंड लेने वाले के पास जिगरा होना
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चाहिए हम आप दोनों कैसे कहां घूम रहे हो
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प्रणाम प्रणाम गुरुदेव हां जी प्रणाम
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यह हमारे एरिया में आई हुई थी तो इसको मिलने आई हूं। कहां भटक रहे हो आप? इधरउधर।
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नहीं जी दलाऊजी आई थी। यहां हमारा घर है। ओके।
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तो मोना जी वहां से जम्मू से आ गई। मैंने बताया उनको कि मैं आई हुई हूं।
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हम तो कल ही आई हैं। अभी हम लोग साथ ही सुन रहे थे आपको।
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यह भी तो पूरा जंगल होगा। हां जी बहुत सुंदर जंगल में ही रहना चाहिए यार
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दुनिया वाहियात है एकदम
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और बताओ क्या चल रहा है हम जो बता रहे हैं वो खाली खोपड़ी में जा रहा है कि ग्रहण भी
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हो रहा है
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मैं का सत्संग यानी ना जिसको ग्रहण हो जाए
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सबको आपको मंदिर की देहरी चाहिए। मंदिर के दरवाजे, मंदिर का कलश, मंदिर के भगवान से, मैं से किसी को मतलब ही नहीं है।
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मंदिर में क्यों रखा जाता है भगवान को? मन।
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कितनी सुंदर चीज है। सोचो। मन तभी मंदिर कहा गया ना हम मन से नफरत करते हैं।
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मन को साधते हैं। मन सबसे सुंदर होता है।
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माया सबसे सुंदर होती है।
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क्योंकि मैंने माना है यार कैसे सुंदर नहीं होगी?
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सुंदरतम ने माना है।
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मैं आत्मा भगवान सुंदरतम ने माना है। जो भी वो सुंदर ही होगा यार।
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सबसे सुंदर माया मुझ माया पति की माया।
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सबसे सुंदर मन।
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जब तक मन और माया को सुंदर नहीं जानोगे तब तक साधना वाधना यह सब किस्सा कहानी लगा रहेगा।
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मन कितना सुंदर है। कभी भी किसी गलत चीज में ले जाता है। फिर वही बोर करा देता है।
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विरक्ति भी करा देता है।
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मन ही तो गुरु है ना यार। हर चीज में ले जाएगा। हर विषय भोग में वासना में
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और फिर वहां से ऐसे घुमा के आपको ले आएगा बेकार है। फिर वहां घुमा के बेकार है ये बेकार है। आखरी में वो परमात्मा में समा जाता है स्वयं में।
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बहुत सुंदर है मन।
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माया के दुख नहीं होते ना जीवन में तो आपका ध्यान ही नहीं जाता परमात्मा में हां
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तो वो दुख कृपा है जीवन की तकलीफ है कृपा है
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धन्य भागी है जिसको दुख मिला है जीवन में हां उसको ही सत्य की तलाश होती है।
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सत्य की ओर उसका ध्यान जाता है।
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तो आप लोग डर जाते हो माया से, मन से फिर उससे बचने के लिए ध्यान साधना करते हो।
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दुनिया भर की विधियां हैं। है ना?
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और याद रखना माया कभी सधेगी नहीं।
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माया को जीव साध ही नहीं सकता और साधना करने वाला केवल जीव होता है
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और माया को सुंदर जानने वाला भगवान होता है मायापति
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तो माया सधती नहीं सुंदर हो जाती है
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मन सधता नहीं सुंदर हो जाता है। शिव हो जाता है।
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विज्ञान भैरव तंत्र की सारी विधियों से सुंदर शिव है। आपकी आत्मा
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शिव से सुंदर तो नहीं हो सकती। 108 और 112 विधियां जो भी हैं
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और शिव हर किसी की आत्मा है तो टारगेट सॉलिड रखो ना यार। क्या छोटा-मोटा टारगेट रखते हो?
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हां लक्ष्य अल्टीमेट होना चाहिए। छोटा-मोटा होना ही नहीं चाहिए।
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तो माया सजती नहीं सुंदर हो जाती
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तो मैंने माना है सुंदरतम ने माना है इसलिए यह पूरी प्रकृति
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यह सब कुछ सुंदर है। अद्भुत अलौकिक रहस्य से भरा हुआ।
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सुंदरतम सुंदर तब
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तो माया को जब सुंदर जानते हो ना तो वह प्रसन्न हो जाती है और भगवान से मिला देती है मायापति से
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कभी माया को साधने का प्रयास मत करना क्योंकि साधने का प्रयास केवल जीव ही
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करेगा शिव नहीं करेगा हम
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अद्भुत सुंदर है माया मायापति अद्भुत सुंदर
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हां जी
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तो महालक्ष्मी और नारायण राधा और
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कृष्ण सीता और राम भवानी और शंकर यह परम मैसेज है।
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माया और मायापति।
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तो माया और मायापति को ही भगवान और भगवती कहा गया है।
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माया को भगवती मायापति को भगवान
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तो भगवती को कैसे साधोगे भाई पागलवागल हो गए हो क्या भगवती का सम्मान करोगे ना इस पूरी प्रकृति
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का पूरे चराचर का उसकी सुंदरता को देखोगे प्रणाम करोगे कि
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हे भगवती कितने अद्भुत अलौकिक हो
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बल्कि उल्टा उन्हीं को आप कहो कि आपसे कोई पार हो ही नहीं सकता
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और आपसे पार होना एक मूर्खता है।
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एक दंड है। आपसे पार होने की कोशिश।
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तो भगवान ही भगवती के रूप में दिखते हैं।
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मायापति ही माया के रूप में दिखते हैं।
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तो कोई और चीज माया नहीं बनी है। भगवान ही माया बने।
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भगवान ही भगवती बने।
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तो माया का सम्मान भगवान का सम्मान है। इसको याद रखना हमेशा।
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माया का अपमान भगवान का अपमान है। आपके अंदर जो भी उठे बाहर कुछ नहीं करना है।
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माया से रिलेटेड है ना? गलत नहीं समझना।
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आपके अंदर जो भी उठ रहा है बस माया के रूप में जो भी सिचुएशन लाइफ में जो भी बस एकदम
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प्रणाम राम राम राम
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माया को भगवान जान हम
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माया को माया मत मानया को भगवान जान और बारंबार प्रणाम करोगे ना तब माया में
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भगवान दिखते हैं माया हट जाती है सदा के लिए प्रणाम मात्र से हो जाता है यार जो करुण उस साधन से
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नहीं होता वह प्रणाम से हो जाता है एक प्रणाम पलटी कर देता है।
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सियाराम मैं सब जग जानी।
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करहु प्रणाम जोर जुग पानी
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बस प्रणाम।
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प्रणाम से तो कहानी शुरू होती है। आत्म देश की, भगवत देश की।
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जिसको प्रणाम करने नहीं आता उसको धर्म में आना ही नहीं चाहिए।
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जिसको झुकना नहीं आता, प्रणाम करना नहीं आता।
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उसके लिए धर्म नहीं है।
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उसके लिए पॉलिटिक्स है। अपना अहंकार पोषित करता रहे। हो
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प्रथम प्रणाम है स्वयं को भी और इस पूरी प्रकृति को भी महामाया को भी
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बस प्रणाम
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और प्रणाम कहने करने से बेहतर मैं को भी राम कह दो, सबको भी राम कह दो।
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है ना?
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आपको जो भगवान का नाम प्रिय है, शिव है, कृष्ण है, राधा है, स्त्री पुरुष का वहां मतलब नहीं है।
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जो आपको प्रिय लगे भाव सहित बस राम प्रणाम से बेहतर राम है।
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और राम से भी बेहतर सीधा कहो कि मैं ही हूं।
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अब मैं ही हूं बस। क्या भगवान क्या माया ऐसा वैसा कुछ नहीं।
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बस मैं ही हूं।
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क्योंकि अपना इंकार आप कभी नहीं करोगे कहीं नहीं करोगे और
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किया जा ही नहीं सकता और अपना स्वीकार आपको सब जगह सहज में है
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क्योंकि आप ही हो
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तो माया को भगवान जान माया को मैं जान मैं आत्मा भगवान
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तो माया को भगवान जान मैं आत्मा भगवान
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और भगवान को मैं जान बस मैं वह श्रेष्ठ है।
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वहां भगवान का भी भाव नहीं है। बस अपना आप है। बस मैं ही हूं।
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अब मैं हूं तो बस आप निश्चिंत हो गए।
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परम निश्चिंतता
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और मैं नहीं हूं कुछ और है कोई और है तो आप कभी निश्चिंत नहीं हो सकते
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आप निश्चिंत तभी हो सकते हो जब मैं ही हूं पूरे अस्तित्व तभी
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जब तक कोई और है परम पॉजिटिव भगवान है जब तक भगवान भी है
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आप निश्चिंत नहीं हो सकते
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अपने रूम में जैसे आप अकेले रहते हो तब निश्चिंत रहते हो सोते हो निश्चिंत उठते हो
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आपका कमरा है यह पूरा अस्तित्व और क्या और आप ही हो मैं ही हूं बस अलग-अलग नाम रूपों
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में अनंत नाम रूपों में बस मैं ही हूं
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और इसलिए निश्चिंतता है मैं ही हूं ना
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ओम
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हां जी
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जब मैं ही हूं तो किसका ध्यान करूं? मैं और क्या देखूं मैं क्या जानू मैं
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क्या समझूं मैं जब मैं ही हूं तो फिर मैं ही हूं बस और
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क्या
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आपको शुरू में लगता होगा कि मैं मैं में विश्वास कैसे आए?
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श्रद्धा कैसे हो? निष्ठा कैसे हो? अरे मैं में ही केवल विश्वास आएगा। याद रखना क्योंकि और कोई विश्वास पात्र है ही नहीं।
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मैं में ही श्रद्धा और निष्ठा हो सकती है और किसी में नहीं हो सकती। इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में।
1:12:37
अपने पे नहीं करोगे। सोचते हो आप? अपने पर ही करोगे आप।
1:12:44
अपने आप को धोखा नहीं दिया जा सकता।
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कौन है जो खुद पर विश्वास नहीं करना चाहता?
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खुद पर ट्रस्ट नहीं करना चाहता। कौन है ऐसा?
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हकीकत में कोई नहीं है।
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देर रबेर कभी ना कभी किनहीं क्षणों में
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आपको खुद पर ही निष्ठा होएगी, श्रद्धा होएगी।
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ट्रस्ट हो जाएगा क्योंकि और बाकी कुछ भी विश्वास पात्र नहीं है।
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कुछ भी नहीं है। सच बता रहा हूं। कुछ भी विश्वास पात्र नहीं।
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अपने अतिरिक्त ना कुछ भी नहीं है। विश्वास पात्र
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तो जैसे अग्नि में ताप दिखता है। काजल में कालिमा दिखती है।
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जल में तरलता दिखती है।
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आकाश में शून्यता दिखती है।
1:15:10
तो अग्नि का ताप अग्नि ही है। काजल की कालिमा काजल ही है।
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जल की तरलता जल ही है। आकाश की शून्यता आकाश ही है।
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ऐसे ही मैं दिखने वाला यह जगत मैं ही है।
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क्योंकि मैं ही दिख रहा है। मैं से ही दिख रहा है।
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मैं को ही दिख रहा है। मैं पर ही दिख रहा है।
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लकड़ी में दिखने वाला डंडा लकड़ी ही है।
1:16:00
क्योंकि लकड़ी से ही दिख रहा है। लकड़ी में ही दिख रहा है।
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ऐसे ही मैं में दिखने वाला यह जगत मैं ही हूं। बस
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हम्म हम्म हां जी बस अब वाणी को विश्राम देते हैं।
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है ना?
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सभी को प्रेम प्रणाम। कभी भी साधना मत करना।
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ध्यान मत करना।
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क्योंकि साधना किसी और की ही होती है। खुद की नहीं होती। ध्यान किसी और का ही होता है। खुद का नहीं होता।
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खुद में तो यकीन होता है। यकीन
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खुद में श्रद्धा होती है, निष्ठा होती है, यकीन होता है।
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और यकीन की ताकत बहुत होती है।
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यकीन की ताकत को आपने कई चीजों में आजमाया है। कभी खुद में आजमा के देखना।
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कहते हो ना परमात्मा की मर्जी के बगैर पत्ता नहीं हिलता।
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खुद में उस यकीन की ताकत को आजमाना।
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मैं परमात्मा में और देखो आपकी मर्जी के बगैर फिर पत्ता नहीं हिलेगा।
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यह प्रश्न जीव देश से आता है। आत्म देश में यह प्रश्न नहीं होता।
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जब आपका मैं परमात्मा है उसमें आपको निष्ठा है। तो आप ही की मर्जी से सब चल रहा है।
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हां वो यकीन की ताकत को आजमा के देखो।
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खुद को राम जान के देखो। फिर हो है सोई जो राम रच राखा।
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जैसे ही राम देश में आओगे तो अब आपकी इच्छा का तल मन नहीं है।
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अब आप पूरे चराचर की इच्छा पूर्ण करते हो।
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पूरे अस्तित्व की, एक-एक चींटी की, एक-एक पंछी की,
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पर्सनल इच्छाओं के लिए नहीं है। यह है ना?
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क्योंकि पर्सनल इच्छा वाला स्वयं को राम जानने में असमर्थ रहेगा।
1:19:44
यूनिवर्सल इच्छा होती है। एक वही मैं की इच्छा होती है।
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तो तेरी मर्जी पूरी हो। जीसस जो बोले ना लास्ट में अद्भुत था वह वक्तव्य।
1:20:06
तेरी मर्जी क्या तेरी मर्जी पूरी हो।
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अरे मैं की मर्जी पूरी हो ही रही है।
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ये सब मैं की मर्जी से चल रहा है। सब और मर्जी पूरी हो ही रही है।
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हो का सवाल ही नहीं है।
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हम पानी पिलाओ भाई।
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मैं की मर्जी से ही आप मर्जी के रहस्यों को समझ पाओगे।
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इच्छा के रहस्य को फिर इच्छा रहित के रहस्य को