Prabhu Shree
0:18
तो यार देखो अब मेरे से कुछ पाना तो है नहीं जानना समझना भी नहीं है। है ना?
0:35
ना मेरे को समझाना है ना जनाना है ना मुक्त कराना है
0:46
मैं भी फ्री आप भी फ्री
0:54
फिर भी हर शाम को आकर हम यूं क्यों बैठ जाते हैं
1:04
हर शाम ये मीटिंग ये इवनिंग मीटिंग
1:16
क्या यही प्यार है?
1:19
यस प्यार
1:31
बस ये प्रेम है।
1:37
यही है वह पॉइंट अब आने लग गया है।
1:45
बगैर स्वार्थ का प्रेम।
1:50
यहां से आराम से। पारत लागी करें सब प्रीति
1:56
सुर नर मुनि सबकी यही रीति यह उससे बियों्ड का पॉइंट है कई लोग के जीवन में
2:05
स्वार्थ से परे का स्वार्थ से उठ पाना ऑलमोस्ट असंभव है।
2:19
तो यह प्रीति है और यही सबको प्रिय है।
2:27
सब मैं क्या बोलूंगा? आप क्या बोलोगे? सुनोगे
2:35
वो अब गौ है। मायने नहीं रखता उतना।
3:06
तो अब आपको भी और हमको भी एक बात कंफर्म है।
3:16
यह पूरा अस्तित्व आप और मैं केवल प्रेम है।
3:23
प्रेम है और प्रेम है।
3:27
यह अस्तित्व नहीं है। प्रेम है। बस परमात्मा भी परमात्मा नहीं है। प्रेम है।
3:39
आत्मा भी आत्मा नहीं है। प्रेम है।
3:44
मैं हूं भी मैं हूं। नहीं है।
3:52
प्रेम है।
3:59
और क्या करना है? बाकी चीजों का रखा क्या है?
4:15
अकत कहानी प्रेम की
4:42
और हकीकत यह है कि अगर बगैर स्वार्थ का प्रेम है
4:55
तो एक मनुष्य बहुत है।
5:01
आप एक ही मनुष्य में पूरे अस्तित्व को अनंत परमात्मा को देख लोगे उसके प्रेम में
5:09
जी लोगे उसमें पूरा ब्रह्मांड दिखेगा आपको
5:18
बहुत है एक मनुष्य अगर प्रेम है तो और प्रेम नहीं है तो यह पूरा विश्व भी बहुत नहीं है।
5:37
एक पत्थर बहुत है। सच कहूं तो प्रेम है तो श्रद्धा है तो
5:54
पूरे ब्रह्मांड में एक को देखना या किसी एक में पूरे ब्रह्मांड को देखना
6:02
एक ही बात एकदम
6:35
तो प्रेमवश यह बैठना होता है, मिलना होता है। यह सत्संग होते हैं।
6:52
और कुछ नहीं है। अब
6:59
भगवान मैं हूं ये वो सब भूल जाओ। बस प्रेम
7:06
और क्या है
7:25
तो मेरे मास्टर बोलते थे कि प्रेम आत्मा का भोजन है।
7:32
प्रेम आत्मा है। भोजन नहीं है।
7:52
कोई ज्ञानी किसी को जानता है। किसी मनुष्य को बहुत प्रयास करता है। जानता है।
8:03
उसकी गहराई तक जाता है, मनन करता है।
8:10
बट नहीं जान पाता।
8:16
जब तक आपको किसी से प्रेम नहीं है, आप उसको जान ही नहीं सकते।
8:24
प्रेम ही असली ज्ञान है। प्रेम ही जान पाता है।
8:32
जब तक इस अस्तित्व के प्रेम में नहीं हो ना आप नहीं जान सकते इस अस्तित्व
8:40
और वही जानना असली है जब आप किसी को गले लगा के जानते हो
8:48
मेल्ट होके जानते हो वही हो जाते हो इतना
8:55
तन्मय हो जाते हो असली जानना प्रेम है
9:04
और आपको प्रेम ही नहीं है तो आपने कुछ नहीं जाना है। वो ज्ञान ज्ञान का ज्ञान ये वो कोई मायने नहीं रखता वहां।
9:40
और इस पृथ्वी लोक में कुछ भी नहीं रखा है। सब
9:51
बस एक नाटक है और कुछ नहीं है।
10:10
बगैर प्रेम के ही तो परमात्मा संसार जैसा लगता है।
10:19
बगैर प्रेम के ही तो आत्मा देह जैसी लगती है।
10:29
बगैर प्रेम प्रेम नहीं है ना तो संदेह उठेगा
10:38
श्रद्धा नहीं आ सकती बगैर प्रेम के
10:46
बगैर प्रेम की प्रार्थनाएं किसी काम की नहीं होती।
10:56
वह बस एक साधना होती है।
11:02
बगैर प्रेम का जीवन ही मृत्यु है और कोई मृत्यु नहीं है।
11:16
बगैर प्रेम के अध्यात्म एक मरुस्थल है। जहां रस नहीं है।
11:33
बगैर प्रेम के हम यूं बैठ ही नहीं सकते यार। हर शाम को कोई कैसे आ सकता है? एक ही बात को सुनने के लिए कोई आ सकता है क्या?
11:47
वह भी सालों से
11:56
तो बस प्रेम है और कुछ नहीं है जीवन में
12:02
और सब कुछ प्रेम में है। एक एक स्वास
12:38
तो इस अस्तित्व के साथ प्रेम से रहो ना बस।
12:45
अस्तित्व अपने सारे राज ओपन कर देगा।
12:51
बस आपको प्रेम से रहना है। प्रेम नहीं छोड़ना।
13:09
कोई भी रहस्य हो आपके जीवन में।
13:16
प्रेम के साथ रहो उस रहस्य में।
13:37
अब प्रेम बहुत डेलिकेट है।
13:42
बहुत नाजुक है और वह स्ट्रांग तभी होता है जब
13:49
कोई भी डिमांड नहीं होती। कोई स्वार्थ होता ही नहीं।
13:56
उससे प्रेम जैसा स्ट्रांग फिर ज्ञान भी नहीं है।
14:02
ज्ञान भी नहीं है।
14:47
अब प्रेम के पास शब्द बहुत कम होते हैं और मेरे को पता नहीं और क्या बोलना है। है ना?
14:57
आप लोग बताओ कुछ।
15:08
प्रेम के पास थोड़े आंसू होते हैं।
15:14
थोड़ा पागलपन
15:23
एक प्यारी सी नासमझी और हाथ में एक रेड रोज
15:32
और वो घूमता रहता है पूरी दुनिया में उसको परमात्मा कोई नहीं देना है वो रेड
15:41
रोज प्रेम देखता ही नहीं कौन परमात्मा है, कौन
15:48
मनुष्य है, कौन जीव है? वो वो बस जी भर के प्रेम करता है।
15:58
लुटता जाता है।
16:22
तो प्रेम से रिक्त मैं हूं। मैं हूं नहीं है।
16:34
प्रेम से रिक्त परमात्मा होता ही नहीं।
16:49
और मैं आपको एक और सच्चाई बताऊं ना प्रेम इतनी सेटेड बातें करता ही नहीं है।
16:59
उसके शब्द लड़खड़ाएंगे।
17:03
वह थोड़ा बोलेगा नहीं बोल पाएगा। चुप भी नहीं रहेगा। वो अजीब अजीब पागल रहता है।
17:11
इतनी टेक्निकल सेटेड बातें नहीं होती प्रेम में।
17:52
प्रेम जैसे ही उपजता है ना तो पहले आपके ज्ञानी को बिखेर देता है। वह जो खुद को आप ज्ञानी समझते हो ना ऐसे
18:02
बिखेर देता है। हट ऐसा कर
18:50
तो प्रेम का यह क्षण अब मेरे को तो पूरा शाश्वत लगता है।
19:01
एक क्षण प्रेम से भरा हुआ पूरा शाश्वत रस ही रस।
19:12
क्या करना है साला ये सब कचरा चीजें?
19:29
परमात्मा तू हो या मैं हो प्रेमी नहीं है तो करोगे क्या तू मैं का चाटोगे क्या
20:04
तो प्रेम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि प्रेम करेक्ट नहीं करता है।
20:18
वो चूस नहीं करता है।
20:22
अंधा होता है ना वो वो सही को ही चूस नहीं करता है।
20:51
नमस्कार अभी शांत रहो।
21:10
तो यार वो लाउन प्रेम प्रभु का विधान है मेदाद
21:17
टैब में वो मेरे को इतना प्यारा लगता है ना वो
21:23
चैप्टर मैं यह बुक पढ़-पढ़ के ही पढ़ा हुआ और इस बुक को के इस चैप्टर को सबसे ज्यादा
21:31
पढ़ा कि प्रेम प्रभु का विधान है।
21:48
बाकी मेरे पास कोई शब्द नहीं है। ऐसा कोई खास
21:58
प्रेम बहुत है आप सबके लिए बहुत है। बहुत ज्यादा है।
22:17
और आप लोग मेरा प्रेम स्वीकार कर लेते हो उसके लिए मैं धन्यभागी हूं।
23:05
सोचो ना एक छोटे से घर को आप कितना प्रेम से बनाते हो।
23:14
और परमात्मा ने इस अस्तित्व को कितने प्रेम से बनाया है। खुद ही समा गया है और इतने प्रेम से बनाया।
23:27
हर चीज जीवंत है, रौनक है।
23:32
हर शख्स की आईज, ये ये चांद सितारे, ये तितलियां कितनी रौनक है।
24:14
जिंदगी का सबसे श्रेष्ठ अनुभव है प्रेम का अनुभव और आप प्रेम का अनुभव कर सकते हो।
24:27
यही कितनी बड़ी बात है। वही तो परमात्मा है।
24:36
जो आप प्रेम का अनुभव करते हो ना। बस वही प्रेम। बस वही
24:45
आप कितने दिन से सुन रहे हो। कुछ जानना समझना नहीं है। प्रेम होता है तो वहां
24:51
ऑटोमेटिक है। सब क्या जानना समझना ये वो बकवास?
25:16
मैं एक तांत्रिक के साथ रहा कई दिन बहुत प्यारे शख्स वो
25:25
तो वो मेरे को सुबह उठाते थे मेरे बालों को ऐसे सहलाते हुए
25:35
बहुत प्यार से
25:42
और और हर दिन कभी मैं जल्दी उठ जाता था तो मैं आंख बंद
25:51
कर लेता था कि वो आए पहले सहलाएं फिर मैं
25:58
उठूं खूब प्यार करते थे मेरे
26:11
तो उनको बोलता था मेरे को आपका यह मंत्र तंत्र नहीं चाहिए। यही बहुत है।
26:19
दो यार वही चैप्टर निकालो।
26:26
यही बहुत है। और करना क्या है?
26:40
परमात्मा को जान लूंगा। यह सब भी ईगो है। पा लूंगा, जान लूंगा। सब अहंकार है।
26:50
परमात्मा ही हो जाऊंगा। यह सब अहंकार है।
26:56
प्रेम हो जाओ। वह असली परमात्मा है। और आपको कुछ होने की जरूरत है ही नहीं।
27:26
प्रेम प्रभु का विधान है।
27:39
प्रेम ही प्रभु का विधान है।
27:52
तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो।
27:59
तुम प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो।
28:09
मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं।
28:18
यह दो लाइनें संपूर्ण शास्त्र है।
28:26
तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो।
28:33
तुम प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो।
28:41
मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं।
28:50
तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो।
28:57
और किसी चीज के लिए तुम नहीं जी रहे हो।
29:04
तुम प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो।
29:15
मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं। नहीं नहीं।
29:38
और प्रेम करना क्या है?
29:44
और प्रेम करना क्या है? सिवाय इसके कि प्रेमी प्रीतम को सदा के लिए अपने अंदर लीन कर ले।
30:02
और प्रेम करना क्या है?
30:08
सिवाय इसके कि प्रेमी प्रीतम को सदा के लिए अपने अंदर लीन कर ले ताकि दोनों एक हो जाए।
30:38
ज्ञान में एक होना और प्रेम में एक होना जमीन आसमान का फर्क है।
30:47
असली एकता प्रेम में आती है।
30:52
जब प्रेमी प्रियतम को समा लेता है अपने अंदर और खुद उसमें समा जाता है।
31:02
और निकलना ही नहीं चाहता
31:14
और मनुष्य को प्रेम किससे करना है?
31:21
क्या उसे जीवन वृक्ष के एक विशेष पत्ते को चुनकर उस पर ही अपना पूरा प्यार उड़ेल देना है?
31:40
क्या उसे जीवन वृक्ष के एक विशेष पत्ते को चुनकर उस पर ही अपना पूरा प्यार उेल देना है।
31:53
हम एक विशेष पत्ता चुनते हैं।
31:57
हमारा यह पूरा जीवन वृक्ष है। उसका एक विशेष पत्ता चुनते हैं।
32:05
उस पत्ते का नाम होता है राम, कृष्ण, शिव, सद्गुरु।
32:18
परमात्मा, आत्मा यह विशेष पत्ता है। है ना?
32:25
क्या उसे जीवन के एक विशेष पत्ते को चुनकर उस
32:32
पर ही अपना पूरा प्यार उेल देना है चश्मा
32:40
तो फिर क्या होगा उस शाखा का जिस पर वह पत्ता उगा है
32:51
उस तने का जिससे वह शाखा निकली है क्या होगा?
32:57
अगर आप एक पत्ता चुनते हो तो क्या होगा उस शाखा का जिस पर वो पत्ता उगा है उस तने का जिससे वह शाखा निकली है।
33:10
उस छाल का जो उस शाखा की रक्षा करती है।
33:15
उन जड़ों का जो छाल तने शाखाओं और पत्तों का पोषण करती है। क्या होगा इनका?
33:24
अगर तुम किसी एक विशेष पत्ते को चुनोगे
33:32
क्या होगा उस मिट्टी का जिसने जड़ों को छाती से लगा के रखा है
33:40
सूर्य समुद्र और वायु का क्या होगा जो मिट्टी को उपजाऊ बनाते
33:56
यदि किसी पेड़ पर लगा एक छोटा सा पत्ता यदि किसी पेड़ पर लगा एक छोटा सा पत्ता
34:05
तुम्हारे प्रेम का अधिकारी हो तो पूरा पेड़ उसका कितना अधिकारी होगा।
34:15
यह पूरा पेड़ है। यह जीवन वृक्ष है। यह कितना अधिकारी है। केवल गुरु गुरु भी मत
34:24
करते रहो। केवल राम कृष्ण ही मत करते रहो।
34:30
है ना? प्रेम रहे सबसे बट ये और कितना कितने अधिकारी हैं उसको तो देखो आप।
34:39
यदि किसी पेड़ पर लगा एक छोटा सा पत्ता तुम्हारे प्रेम का अधिकारी हो तो पूरा
34:46
पेड़ उसका कितना अधिकारी होगा
34:53
यानी फैलने दो प्रेम को ना अनंत तक हर किसी के हृदय तक
35:09
जो प्रेम संपूर्ण के एक अंश को चुनता है।
35:15
जो प्रेम संपूर्ण के एक अंश को चुनता है। वह अपने
35:21
भाग्य में आप ही दुखों की रेखा खींच लेता है।
35:32
तुम कहते हो कि एक ही वृक्ष पर भांतिभांति के पत्ते होते हैं।
35:39
कुछ स्वस्थ होते हैं, कुछ अस्वस्थ, कुछ सुंदर, कुछ कुरूप,
35:47
कुछ दैत्याकार होते हैं। बड़े, कुछ बौने छोटे पसंद करने और चुनने से भला हम कैसे बच सकते हैं?
36:00
चॉइस से कैसे बच सकते हैं?
36:07
मैं तुमसे कहता हूं बीमारों के पीलेपन में से तंदुरुस्तों की ताजगी पैदा होती है।
36:20
बीमारों के पीलेपन से तंदुरुस्तों की ताजगी पैदा होती है।
36:30
मैं यह भी कहता हूं कि कुरूपता सुंदरता की रंग पट्टी है।
36:35
रंग और कुची है और यह भी कि बौना बौना ना होता छोटाछोटा
36:45
ना होता यदि उसने अपने कद में से कुछ कद दैत्य को भेंट ना कर दिया होता दैत्य इट
36:55
मींस बड़ा तुम जीवन वृक्ष हो
37:10
यानी देखो यह पॉइंट क्या है? तुम जीवन वृक्ष हो। ये पूरा तुम जीवन वृक्ष हो।
37:20
अपने आप को टुकड़ों में बांटने से सावधान रहो।
37:28
फल की फल से तुलना मत करो। ना पत्ते की पत्ते से ना शाखा की शाखा से
37:36
ना वृक्षों की माटी से पर तुम ठीक यही करते हो जब तुम एक अंश को
37:46
बाकी अंशों से अधिक अथवा बाकी अंशों को छोड़कर केवल एक अंश को ही प्यार करते हो।
37:59
पर तुम ठीक यही करते आए हो। तुम्हारा प्रेम कोई परमात्मा खोज रहा है। कोई बुद्ध पुरुष खोज रहा है।
38:10
कोई अवतार खोज रहा है। विशेष पत्ता
38:43
हमेशा विशेष कि यह जानता है, इसको बोध है, इसको वो वो
38:53
है क्या करोगे यार प्रेम ये सब देखता है क्या?
39:03
अच्छा मैं तो तुमको यह कहूं कि
39:11
मतलब ही नहीं है इन बातों का। प्रेम इतना इतना अंधा होता है ना उसको यह सब चीजें दिखाई ही नहीं देती।
39:31
मैं तुम में नहीं देखता हूं।
39:36
इस कोई भी चीज देखता ही नहीं। कि तुम में क्या है? ये
39:44
ठीक है वो ठीक है नहीं है
39:50
और मैं भी तुम जैसा हूं याद रखना तुम्हारे जैसी मेरी कामनाएं हैं इच्छाएं
39:59
हैं वासनाएं हैं मेरी देह है
40:04
मेरी सोच है मैं कुछ एक्स्ट्रा कोई मास्टर और यह वह कुछ नहीं हूं भैया
40:13
साफसाफ बता दे रहा हूं। एकदम साफसाफ
40:23
क्योंकि मैं वो शर्तों वाला प्रेम चाहता ही नहीं जो किसी मास्टर को ही मिलता है।
40:34
नहीं चाहिए ऐसा प्रेम मेरे को।
40:37
प्रेम प्रेम है यार। मैं मैं करता हूं तुमसे। तुम मेरे से करते हो खत्म बात। कौन
40:45
क्या है? परमात्मा है, जीव है। कोई मायने नहीं रखता उस चीज का।
41:29
प्रेम जीवन का रस है। प्रेम जीवन का रस है।
41:38
जबकि घृणा मृत्यु का मवाद किंतु प्रेम का भी रक्त की तरह हमारी रगों
41:48
में बेखौफ प्रवाहित होना नितांत आवश्यक है।
41:58
बेखौफ प्रवाहित होना नितांत आवश्यक है।
42:06
रक्त के प्रवाह को रोक दो तो एक खतरा एक संकट बन जाएगा
42:13
और घृणा क्या है सिवाय दबा दिए गए या रोक दिए गए प्रेम के
42:23
रोका गया प्रेम ही घृणा है और कुछ नहीं
42:33
और घृणा क्या है सिवाय दबा दिए गए और रोग लिए गए प्रेम के जो इसलिए घातक विष बन
42:42
जाता है खिलाने वाले और खाने वाले दोनों के लिए घृणा करने वाले और घृणा पाने वाले
42:49
दोनों के लिए तुम्हारे जीवन वृक्ष का पीला पत्ता
43:00
केवल प्रेम से वंचित पत्ता है।
43:06
तुम्हारे जीवन वृक्ष का पीला पत्ता
43:14
सूखा पत्ता केवल प्रेम से वंचित पत्ता है।
43:25
पीले पत्ते को दोष मत दो।
43:34
पीले पत्ते को दोष मत दो।
43:39
मुरझाई हुई शाखा केवल प्रेम की भूखी शाखा है।
43:48
मुरझाई हुई शाखा को दोष मत दो।
43:56
सड़ा हुआ फल केवल घृणा पर पाला गया फल है।
44:04
सड़े हुए फल को दोष मत दो बल्कि दोष दो
44:10
अपने अंधे और कृपण मन को
44:16
जो जीवन रस को प्रेम को भीख की तरह थोड़े से व्यक्तियों में बांटकर अधिकांश को उससे वंचित रखता है।
44:34
बल्कि दोष दो अपने अंधे और कृपण मन को जो प्रेम को भीख की तरह
44:42
थोड़े से व्यक्तियों में बांटकर अधिकांश को उससे वंचित रखता है
44:50
और ऐसा करते हुए अपने आप को भी उससे वंचित रखता है।
45:03
आत्म प्रेम के अतिरिक्त कोई प्रेम संभव नहीं है।
45:10
अपने अंदर सबको समा लेने वाले मैं के अहम के अतिरिक्त अन्य कोई अहम अहंकार वास्तविक नहीं है।
45:26
इसलिए प्रभु शुद्ध प्रेम है।
45:30
प्रभु शुद्ध प्रेम है। शुद्ध प्रेम।
45:52
इसलिए वह इसी अहम मैं आत्मा भगवान वाला अहम से प्रेम करता है।
46:00
जब तक प्रेम तुम्हें पीड़ा देता है। तुमने अपना वास्तविक मैं नहीं मिला।
46:12
ना ही प्रेम की सुनहरी कुंजी तुम्हारे हाथ लगी है।
46:20
क्योंकि तुम एक क्षण भंगुर मैं को अहंकार को प्रेम करते हो।
46:27
इसलिए तुम्हारा प्रेम भी क्षण भंगुर है।
46:39
स्त्री के लिए पुरुष का प्रेम प्रेम नहीं। वह प्रेम का एक बहुत धुंधला चिन्ह है।
46:49
संतान के लिए माता या पिता का प्रेम प्रेम के पवित्र मंदिर की देहरी मात्र है।
47:01
जब तक हर पुरुष हर स्त्री का प्रेमी नहीं बन जाता
47:08
और हर स्त्री हर पुरुष की प्रेमिका
47:17
जब तक हर संतान हर माता या पिता की संतान नहीं बन जाती
47:24
और हर माता या पिता हर संतान के माता-पिता
47:32
तब तक स्त्री पुरुष हार्ड मास के साथ हार्ड मास के घनिष्ठ
47:42
संबंध की डींग भले मार लें किंतु प्रेम के पवित्र शब्द का उच्चारण
47:51
कभी ना करें क्योंकि ऐसा करना प्रभु निंदा होगी
48:06
जब तक हर पुरुष हर स्त्री का प्रेमी नहीं बन जाता और हर
48:13
स्त्री हर पुरुष की प्रेमिका जब तक हर संतान हर माता या पिता की संतान
48:20
नहीं बन जाती और हर माता या पिता हर संतान के माता-पिता
48:29
तब तक स्त्री पुरुष हार्ड मांस के साथ हार्ड मांस के घनिष्ठ
48:39
संबंध की डींग भले ही मार लें किंतु प्रेम के पवित्र शब्द का उच्चारण
48:47
कभी ना करें क्योंकि ऐसा करना प्रभु निंदा होगी।
48:57
जब तक तुम एक भी मनुष्य को शत्रु मानते हो तुम्हारा कोई मित्र नहीं।
49:12
जब तक तुम एक भी मनुष्य को शत्रु मानते हो, तुम्हारा कोई मित्र नहीं।
49:23
जिस हृदय में शत्रुता का वास है, वह मित्रता के लिए सुरक्षित आवास कैसे हो सकता है?
49:41
जब तक तुम्हारे हृदय में घृणा है तुम प्रेम के आनंद से अपरिचित हो।
49:54
यदि तुम अन्य सभी वस्तुओं का प्रेम से प्रेम रस से पोषण करते हो।
50:04
यदि तुम अन्य सभी वस्तुओं का प्रेम रस से पोषण करते हो पर किसी छोटे से कीड़े को
50:14
उससे वंचित रखते हो तो वह छोटा सा कीड़ा अकेला ही तुम्हारे जीवन में कड़वाहट बोल देगा।
50:31
यदि तुम अन्य सभी वस्तुओं, सभी मनुष्यों
50:38
का प्रेम रस से पोषण करते हो। पर किसी छोटे से कीड़े को
50:46
अपने प्रेम से वंचित रखते हो तो वह छोटा सा कीड़ा अकेला ही तुम्हारे जीवन में कड़वाहट बोल देगा।
51:00
अकेला ही क्योंकि किसी वस्तु या किसी व्यक्ति से
51:06
प्रेम करते हुए तुम वास्तव में अपने आप से ही प्रेम करते हो।
51:16
क्योंकि किसी वस्तु या किसी व्यक्ति से प्रेम करते हुए तुम वास्तव में अपने आप से ही प्रेम करते हो।
51:27
इसी प्रकार किसी वस्तु या किसी व्यक्ति से घृणा करते हुए तुम वास्तव में अपने आप से ही घृणा करते हो।
51:40
क्योंकि जिससे तुम घृणा करते हो, वह उसके साथ जुड़ा हुआ है जिससे तुम प्रेम करते हो।
51:52
ऐसे जुड़ा हुआ है जैसे किसी सिक्के के दो पहलू जिन्हें कभी एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
52:02
यदि तुम अपने प्रति ईमानदार रहना चाहते हो।
52:09
पॉइंट बी नोटेड।
52:13
यदि तुम अपने प्रति ईमानदार रहना चाहते हो तो उससे प्रेम करने से पहले जिसे तुम
52:22
चाहते हो और जो तुम्हें चाहता है तुम्हें उससे प्रेम करना होगा जिससे तुम
52:30
घृणा करते हो और जो तुमसे घृणा करता है।
52:41
यदि तुम अपने प्रति ईमानदार रहना चाहते हो तो उससे प्रेम करने से पहले जिसे तुम
52:49
चाहते हो और जो तुम्हें चाहता है तुम्हें उससे प्रेम करना होगा
52:56
जिसे तुम घृणा करते हो और जो तुमको घृणा करता है
53:11
प्रेम कोई गुण नहीं। प्रेम एक आवश्यकता है।
53:20
रोटी और पानी से भी बड़ी। प्रकाश और हवा से भी बड़ी।
53:32
कोई भी अपने प्रेम करने का अभिमान ना करें।
53:39
प्रेम को उसी सरलता तथा स्वतंत्रता के साथ स्वीकार करो
53:46
जिस सरलता तथा स्वतंत्रता से तुम स्वास लेते हो
53:57
क्योंकि प्रेम को उन्नत होने के लिए किसी की आवश्यकता नहीं।
54:04
प्रेम तो उस हृदय को उन्नत कर देगा जिसे वह अपने योग्य समझता है।
54:15
प्रेम के बदले में कोई पुरस्कार मत मांगो।
54:21
प्रेम ही प्रेम का पर्याप्त पुरस्कार है।
54:29
जैसे घृणा ही घृणा का पर्याप्त दंड है।
54:35
ऐसे प्रेम ही प्रेम का पर्याप्त पुरस्कार है।
54:43
ना ही प्रेम के साथ कोई हिसाब किताब रखो क्योंकि प्रेम अपने सिवाय किसी और को हिसाब नहीं देता।
54:57
प्रेम ना उधार देता है ना उधार लेता है। प्रेम ना खरीदता है ना बेचता है।
55:07
बल्कि प्रेम
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जब देता है तो अपना सब कुछ दे देता है और जब लेता है तो सब कुछ ले लेता है।
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बल्कि प्रेम देता है तो अपना सब कुछ दे देता है। सब कुछ और लेता है तो सब कुछ ले लेता है।
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सब कुछ
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इसका लेना ही देना है। इसका लेना ही देना है और देना ही लेना है।
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इसीलिए यह आजकल और कल के बाद भी एक सा रहता है।
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इसका लेना ही देना है। इसका देना ही लेना है।
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इसीलिए यह आजकल और कल के बाद भी एक सा सदा एक सा रहता है।
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इसीलिए वह रह पाता है। सदा एक सा क्योंकि इसका लेना ही देना है और देना ही लेना है।
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एक विशाल नदी जोज अपने आप को समुद्र में खाली करती जाती है।
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समुद्र उसे फिर से भरता जाता है।
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इसी तरह तुम्हें अपने आप को प्रेम में खाली करते रहना है
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ताकि प्रेम तुम्हें सदा बढ़ता रहे।
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तालाब जो समुद्र से मिला उपहार जो बारिश होती है तालाब जो समुद्र से मिला उपहार
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उसी को सौंपने से इंकार करता है। एक गंदा पोखर बनकर रह जाता है।
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एक विशाल नदी जोज्यों अपने आप को समुद्र में खाली करती जाती है।
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समुद्र उसे फिर से भरता जाता है बारिश करके।
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इसी तरह तुम्हें अपने आप को प्रेम में खाली करते रहना है।
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इसी तरह तुम्हें अपने आप को प्रेम में खाली करते रहना है।
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ताकि प्रेम तुम्हें सदा भरता रहे।
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ताकि प्रेम तुम्हें सदा सदा भरता रहे।
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प्रेम में ना अधिक होता है ना कम।
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जिस क्षण तुम उसे किसी श्रेणी में रखने या मापने का प्रयत्न करते हो। उसी क्षण वह तुम्हारे
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हाथ से निकल जाता है और पीछे छोड़ जाता है अपनी कड़वी यादें।
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प्रेम में ना अधिक होता है ना कम।
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जिस क्षण तुम उसे किसी श्रेणी में रखने का मापने का प्रयत्न करते हो, उसी क्षण वह तुम्हारे हाथ से निकल जाता है।
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और पीछे छोड़ जाता है अपनी कड़वी यादें।
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ना प्रेम में अब होता है और तब होता है।
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ना ही यहां होता है ना वहां होता है।
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सब ऋतुएं प्रेम की ऋतुएं हैं। सब स्थान प्रेम के निवास के योग्य स्थान है।
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प्रेम में ना अब होता है, ना तब होता है, ना यहां होता है, ना वहां होता है।
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सभी ऋतुएं प्रेम की ऋतुएं हैं।
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प्रेम कोई सीमा या बाधा नहीं जानता।
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प्रेम कोई सीमा या बाधा नहीं जानता।
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जिस प्रेम के मार्ग को किसी भी प्रकार की बाधा रोक ले वह अभी प्रेम कहलाने का अधिकारी नहीं है।
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मैं अक्सर तुम्हें कहते सुनता हूं कि प्रेम अंधा होता है।
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अर्थात उसे अपने प्रियतम में कोई दोष दिखाई नहीं देता।
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इस प्रकार का अंधापन सर्वोत्तम दृष्टि है। सर्वोत्तम दृष्टि है।
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सर्वोत्तम।
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मैं अक्सर तुम्हें कहते सुनता हूं कि प्रेम अंधा होता है। अर्थात उसे अपने प्रीतम में कोई दोष दिखाई नहीं देता।
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इस प्रकार का अंधापन सर्वोत्तम दृष्टि है।
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काश काश तुम सदा इतने अंधे होते
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कि तुम्हें किसी भी वस्तु में कोई दोष दिखाई ही ना देता।
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काश तुम सदा इतने अंधे होते कि तुम्हें किसी भी वस्तु में कोई दोष दिखाई ही नहीं देता।
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स्पष्टदर्शी और बेधक होती है प्रेम की आंख।
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इसलिए उसे कोई दोष दिखाई नहीं देता।
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स्पष्टदर्शी और बेधक होती है।
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वो बहिर चरित्र देखती ही नहीं है। बेधक होती प्रेम की आंख इसलिए उसे कोई दोष दिखाई नहीं देता।
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जब प्रेम तुम्हारी दृष्टि को निर्मल कर देगा तब कोई भी वस्तु तुम्हें प्रेम के अयोग्य दिखाई नहीं देगी।
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स्पष्टदर्शी और वेधक होती है प्रेम की आंख इसलिए उसे कोई दोष दिखाई नहीं देता।
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जब प्रेम तुम्हारी दृष्टि को निर्मल कर देगा तब कोई भी वस्तु तुम्हें प्रेम के
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अयोग्य दिखाई नहीं देगी।
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तब कोई भी वस्तु तुम्हें प्रेम के अयोग्य दिखाई नहीं देगी।
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केवल प्रेमहीन दोष पूर्ण आंख सदा दोष खोजने में व्यस्त रहती है।
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केवल प्रेमहीन दोष पूर्ण आंख सदा दोष खोजने में व्यस्त
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रहती है। और जो दोष उसे दिखाई देते हैं वे उसके अपने ही दोष होते हैं।
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प्रेम जोड़ता है, घृणा तोड़ती है।
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प्रेम जीवन के मधुर संगीत से स्पंदित शांति है।
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घृणा मृत्यु के पैशाचिक धमाकों से आकुल युद्ध है। तुम क्या चाहोगे?
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प्रेम करना और अनंत शांति में रहना या घृणा करना और अनंत युद्ध में जुटे रहना।
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तुम क्या चाहोगे? प्रेम करना और अनंत शांति में रहना।
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या घृणा करना और अनंत युद्ध में जुटे रहना।
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समस्त धरती तुम्हारे अंदर जी रही है। सभी आकाश तथा उनके निवासी तुम्हारे अंदर जी
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रहे हैं। अतः धरती और उसकी गोद में पल रहे सब बच्चों से प्रेम करो।
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यदि तुम अपने से प्रेम करना चाहते हो।
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समस्त धरती तुम्हारे अंदर जी रही है। सभी आकाश तथा उनके निवासी तुम्हारे अंदर जी रहे हैं।
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अतः धरती और उसकी गोद में पल रहे सब बच्चों से प्रेम करो। यदि तुम अपने आप से
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प्रेम करना चाहते हो और आकाश तथा उनके सब वासियों से प्रेम
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करो। यदि तुम अपने आप से प्रेम करना चाहते हो।
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यदि तुम अपने आप से प्रेम करना चाहते हो। क्योंकि यह अपना आप ही है।
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के केवल प्रेम ही चमत्कार कर सकता है।
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यदि तुम देखना चाहते हो तो अपनी आंख की पुतली में प्रेम को बसा लो।
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यदि तुम सुनना चाहते हो तो अपने कान के पर्दों में प्रेम को स्थान दो।
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मीरदास का डिसाइपल अभिमार पूछता है कि किंतु मैं किसी से घृणा नहीं करता।
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किसी से भी नहीं करता मीर दाद
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घृणा ना करना प्रेम करना नहीं होता बीमार
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अभिमार उसका नाम है डिसाइपल का घृणा ना करना प्रेम करना नहीं होता अभिमार्यों
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क्योंकि प्रेम में क्रियाशील शक्ति है, भाव है।
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जब तक यह तुम्हारी हर चेष्टा को, तुम्हारे हर पद को राह ना दिखाए।
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तुम अपना मार्ग नहीं पा सकते।
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और जब तक प्रेम तुम्हारी हर इच्छा में हर विचार में पूरी तरह ना समा जाए।
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तुम्हारी इच्छाएं तुम्हारे सपने में कटीली झाड़ियां होंगी।
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तुम्हारे विचार तुम्हारे जीवन में शोक गीत होंगे।
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जब तक प्रेम तुम्हारी हर इच्छा में हर विचार में पूरी तरह समा ना जाए।
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इस समय मेरा दिल रबाब है और मेरा गाने को जी चाहता है।
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ऐ भले जमोरा तुम्हारा रबाब कहां है?
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जमोरा क्या मैं जाकर उसे ले आऊं मेरे मुर्शिद जाओ जमोरा
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प्रेम प्रभु का विधान है। तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो।
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तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो। तुम
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प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो।
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मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं। नहीं नहीं।
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तो अपना अपना रवाब आप उठा लो और सेलिब्रेट करो। है ना?
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सबको खूब सारा प्यार। बहुत-बहुत प्रेम।
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प्रेम ही प्रेम। प्रेम ही प्रेम।
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याद रखना हमेशा याद रखना मेरी बात को
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तुम गलत हो तुम पापी हो, गलत जी रहे हो, अज्ञानी हो, कुछ भी हो यार,
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मेरा प्रेम तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा। हमेशा रहेगा ही।
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मेरे को यह दिखता ही नहीं। तुम्हारी गलतियां, तुम्हारे यह सब पाप और पता नहीं क्या-क्या। मैं रियल में अंधा हो गया हूं।
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तुम्हारा होना मेरे लिए बहुत है प्रेम के लिए।
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तुम्हारा होना बहुत है यार।
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मेरे प्रेम के लिए
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बस मैं हमेशा गले से लगाता रहूंगा आज और कुछ नहीं आता मेरे को।
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यही सीखा हूं बचपन से अभी तक।
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मैं हमेशा ऐसे दिल करता है बस बैठा रहूं सबके साथ।
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मेरे को अकेलापन पसंद नहीं है।
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आई डोंट लाइक सबके साथ आप लोगों के साथ। बस बैठा रहो।
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तुम मेरे को मेरे एकांत से भी ज्यादा प्रिय हो। बहुत ज्यादा प्रिय हो।
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तुम लोग मेरी असली प्राइवेसी हो।
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तो बहुत मुश्किल है अपने अंदर की नफरत से जीतना।
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जीत पाना आप
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देश तक को जीत सकते हो।
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तीनों लोकों को जीत सकते हो।
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पर अपने अंदर की नफरत से जीत पाना असंभव है।
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प्रेम ही जीत पाता है अपने अंदर की नफरत से, घृणा से तो प्रेम को जीतने दो।
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बहने दो, गाने दो, नाचने दो,
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प्रेम प्रणाम
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तो