0:01
सोता बिना तो सवेरे हमसे ज्यादा
0:08
हां लेकिन नींद को डिस्टर्ब नहीं करना है अपने को सोना अच्छे से
0:15
मैं तो ट्राई करता हूं लेकिन ज्यादा दूर सो आया हूं आत्मा
0:22
हम्म लगता है पूरी छज पूर्ति हो गई कल तो सोए थे दिन में भी सोया था।
0:31
हां। रात को शायद कमी हो के सो गए रात को। हां, बढ़िया है।
0:37
यहां तो रिलैक्स ही करो। और नींद को कभी भी डिस्टर्ब नहीं करना। वहां मेरी हालत खराब है।
0:46
हम होता है कोई कोई पीरियड ऐसा रहता है एक आध दो महीने का कि आदमी थोड़ा कम सोता है।
0:53
ऐसा अधिकतर लोगों की लाइफ में रहता है।
1:01
फिर भी किसी को भी नींद को सबके लिए बोल रहा हूं। नींद को डिस्टर्ब नहीं करना है।
1:06
कई बार हम नींद में जगने का प्रयास करते हैं। साक्षी होने का प्रयास करते हैं। है ना? वह रॉन्ग है एकदम।
1:17
वह हार्ट वाला चालू कर भैया। हमको चाहिए। अब कल बंद कर दिए थे क्योंकि मोबाइल से हो रहा था।
1:30
तो वह गलत है। वो प्रयास वाला जो है ना
1:38
मैं सबके लिए बताए दे रहा हूं कि जो अपन प्रयास करते रहते हैं
1:47
कि नींद में जगे मैं जगा रहूं। शरीर सोया रहे। प्रयास में
1:55
रॉन्ग हो जाएगा और मैं जगा ही रहता हूं
2:05
और शरीर 24 आवर सोया ही रहता है 24 आवर
2:13
यस हां जी इसका जो जागृत स्वप्न सुशुप्ति है ये
2:20
निद्रा ही है समझ शारीरिक
2:27
मैं सोना जानता नहीं। शरीर जगना जानता नहीं। [हंसी]
2:43
मैं देश में कहीं कुछ है ही नहीं।
2:51
देह आत्मा परमात्मा भी एक अदर चीज हो जाती है। मैं मतलब मैं बस
3:00
हां अगर मैं को परमात्मा जान रहे हो मैं आत्मा भगवान तो परफेक्ट है।
3:15
जब भी आप परमात्मा कहते हो तो वह आपका स्व है तब वह परमात्मा कहना आपका उचित है।
3:31
इवन जब आप देह भी कहते हो तब भी वह आपका स्व है तो आप कह सकते हो मैं देह हूं।
3:41
बात यह है और आप परमात्मा कह रहे हो और वह कोई और परमात्मा है अनदर
3:48
तो रॉन्ग हो जाएगा
3:58
एक मित्र का मैसेज आया हमारे नेपाल से क्या नाम है विनोद जी का वह बड़ा मेरे को आज क्या-क्या मैसेज
4:07
ऑडियो में ऐसा लिख के भेजे ये रिकॉर्ड करके
4:14
कि परमात्मा परमात्मा नहीं मैं ही हूं।
4:20
[हंसी]
4:22
[गहरी सांस लेने की आवाज़]
4:26
आप परमात्मा जो बता रहे हो उससे बेहतर केवल मैं हूं।
4:32
ऐसा मेरे को वह जमता है। ऐसा उनका भाव था।
4:39
तो मेरे लिए कोई अलग नहीं है परमात्मा और मैं आपके लिए अलग होगा भले मेरे लिए तो देह और मैं भी अलग नहीं है।
4:53
दुनिया माया और मैं भी अलग नहीं है। मैं जब माया भी बोलता हूं तो मैं ही रहता हूं। मैं आत्मा भगवान।
5:03
और हो सकता है आप भगवान भी बोल रहे हो और वह आपकी माया हो। हां इतना बड़ा डिफरेंस है।
5:29
मैंने यह दो खुल के
5:37
मैं डंडा भी बोल रहा हूं तो मेरे लिए लकड़ी है।
5:44
हो सकता है आप लकड़ी भी बोल रहे हो और आपके लिए डंडा हो। ऐसा भी हो सकता है।
5:52
हां।
5:54
लेकिन हर हालत में लकड़ी है। हर हालत में मैं ही हूं।
6:08
आज एक मित्र का किसी का कमेंट आ गया ऐसे वो YouTube का ऐसे मैं देख रहा था क्या चल
6:18
रहा है तो वो कमेंट में वो लिखते हैं क्या बकवास है ये
6:23
[हंसी]
6:26
हम सोचे हम मुकेश अंबानी हो जाए तो हम मुकेश अंबानी ानी हो जाएंगे क्या?
6:34
[हंसी]
6:39
उनका यह कहना था आप बोलते हो कि आप मुकेश अंबानी सोचो तो आप मुकेश अंबानी बन जाओगे क्या?
6:49
ऐसा उनका सेंस था। वह सत्संग था कि इस साइड आ जाओ।
6:59
परमात्मा की साइड अस्तित्व की साइड आ जाओ।
7:13
तो भैया देखो मुकेश अंबानी बनना पड़ता है। है ना?
7:19
टाटा बिरला ये सब बनना पड़ता है ना? इवन राम, कृष्ण, शिव भी बनना पड़ता है।
7:30
परमात्मा बनना नहीं पड़ता। यह आपका स्वभाव है।
7:37
आपका एक्चुअल होना परमात्मा है।
7:41
तो अपने स्वभाव के साइड आ जाओ और बनने के साइड को छोड़ दो। जो आप जीव बनते हो, देह
7:48
बनते हो या भगवान भी बनते हो, वह बनना नहीं है। राइट साइड आ जाना है
7:56
स्वयं के साइड तो सबका अपना-अपना सोच रहता है।
8:05
प्यारे-प्यारे लोग, प्यारी-प्यारी सोच कई बार अमृत बकवास लगता है।
8:16
कई बार बकवास चीजें अमृत लगती है।
8:20
जी मैं जीव हूं, बॉडी हूं। यह अमृत लगता है लोगों को। साधना करना कई लोग को एकदम ऐसा लगता है कि यही सब कुछ है। बेस्ट है।
8:32
वो है बकवास। पोइजन है वह सब।
8:41
मीठा जहर।
8:56
चाय तो जबरदस्त बनी। आजकल आप गजब कर रहे हो। हां?
9:04
परफॉर्मेंस कंटिन्यू अच्छा होना यानी समझ रहे हो। चाय का अच्छे अच्छे नहीं कर पाए।
9:09
एक चित्रांशी को छोड़ दो। सब फेल खा चुके हैं।
9:16
[हंसी]
9:35
अरे मैं तो वासना बोलता हूं तो वह भी मेरे लिए परमात्मा है। और आप परमात्मा भी बोलो ना तो हो सकता है वह आपकी वासना हो।
9:45
परमात्मा लोगों की वासना होती है। इतना बड़ा डिफरेंस है।
9:54
अब खैर मैं कौन हूं? क्या हूं वो मुद्दा नहीं है। है ना?
10:03
वो मेरे लिए है ना।
10:06
आपका कल्याण कैसे हो? आप कौन हो? क्या हो आपको आपका समाधान मिलना जरूरी है।
10:20
जब कोई आपको बता देता है कि आप ही समाधान हो तो आपको यकीन नहीं होता।
10:26
क्योंकि जिंदगी भर आप समाधान खोज रहे हो।
10:32
जिंदगी भर आप ट्रुथ खोज रहे हो। सच को खोज रहे हो।
10:36
और हम आगे बोल रहे हैं अरे तुम ही सच हो और कोई चीज सच है ही नहीं
10:43
तो यकीन नहीं होता असली चीज में यकीन नहीं होता और फॉल्स में
10:50
जो आपका खयाली भ्रम है। आपके अतिरिक्त सब खयाली भ्रम है। खयाली भूत बोल लो।
11:00
हां।
11:02
उसमें आपको यकीन रहता है।
11:13
भूत ख्याल के ही होते हैं ना।
11:17
[हंसी]
11:23
खैर मैं करा ही देगा यकीन। बस थोड़ा मेरे साथ जीते रहो। अरे मैं करा ही देगा।
11:32
निश्चिंत रह। कैसे नहीं होगा यकीन यार।
11:40
थोड़ा सा विराज उसको उधर दबाना तो पीछे थोड़ा और यस।
12:26
मरने वाले शरीर पर यकीन भटकाने वाले मन पर यकीन।
12:36
मन की कल्पनाओं में यकीन। आपके भगवान मन के भगवान ही होते हैं। असली भगवान तो मैं आत्मा भगवान ही है।
12:48
उसी पर आपको यकीन नहीं है। क्या करें?
12:54
[हंसी]
12:56
[गहरी सांस लेने की आवाज़]
13:24
तो बस ऐसा जीते जीते स्वयं आत्मा का सत्संग सुनते सुनते
13:34
वो आ ही जाता है यकीन हां कैसे नहीं आएगा यार
13:48
और खुद पर भी यकीन ना कर पाए तो किस पर यकीन करोगे
13:58
जो खुद पर श्रद्धा ना कर सका वह किस पर कर पाएगा श्रद्धा
14:04
उसकी सारी श्रद्धा झूठ होगी जब खुद पे ही नहीं है
14:20
तो खुद पर श्रद्धा करने वाले विरले होते हैं। पर होते हैं।
14:31
मैं आत्मा भगवान पे श्रद्धा निष्ठा प्रायोरिटी है।
14:41
मेरे सत्संग का मूल है
14:51
तो काल्पनिक भगवान नहीं आत्मिक भगवान
15:08
मैं आत्मा भगवान
15:27
मैं कोई मंत्र नहीं जिसको सिद्ध करना है। वह स्वतः सिद्ध है।
15:35
मैं कोई अचीवमेंट नहीं हूं जिसको आप पाओगे।
15:40
मैं तो आप हो ही मैं का ज्ञान नहीं करना है
15:51
क्योंकि मैं अर्थात ज्ञान ही ज्ञान
15:57
मैं के प्रेम में पड़ना एक अलग चीज है और आपकी आत्मा आपका स्वयं खुद प्रेम है।
16:09
आपका होना ही प्रेम है। यह एक अलग चीज है।
16:21
मैं से प्रेम बोलना थोड़ा सा रॉन्ग हो जाता है।
16:28
आपका मैं खुद प्रेम है। प्रेम से प्रेम ऐसा नहीं बोला जा सकता ना।
16:37
आपका होना ही प्रेम है ना
16:52
खाते पीते मत सुना करो सत्संग है ना केवल मैं चाय पियूंगा आप लोगों ने पीना है अभी
17:07
बहुत सिंसियरिटी से जब आप सुनते हो कि पूरे जन्मों और पूरे जीवन का सार यही है कि बस मैं सुनना ही हो जाऊं।
17:20
बस यही क्षण है वह।
17:24
बस सुनना तब आप सुन पाते हो। बहुत अवेयरनेस
17:32
चाहिए सुनने के लिए क्योंकि यार बात आपकी हो रही है।
17:42
आपकी बात किसी परमात्मा की नहीं हो रही है बात।
17:51
किसी बुद्धत्व, किसी ज्ञान, किसी भक्ति की नहीं। आप की बात हो रही है।
18:00
बहुत अवेयर होके सुनो सुनना ही हो जाओ
18:09
तब सुन पाओगे और सुनना बस है और कुछ करना नहीं है
18:19
क्योंकि जिंदगी भर केवल आपने गलत सुना है कि आप बॉडी हो माइंड हो
18:28
परमात्मा कोई और है सत्य कोई और है
18:37
बुद्धत्व आत्मज्ञान कोई और है
18:56
बहुत डिफरेंस है अगर आपको आत्मज्ञान चाहिए बुद्धत्व
19:06
चाहिए बट आपको है
19:12
जो ऑलरेडी है अस्तित्व है बुद्धत्व किसी को नहीं चाहिए
19:21
मैं ज्ञान स्वरूप किसी को नहीं चाहिए कोई अदर ज्ञान चाहिए कोई अदर बुद्धत्व जो
19:28
आकर मिलेगा आपका अचीवमेंट हो कोई सर्टिफिकेट हो वो रॉन्ग है।
19:53
आपकी डिमांड ही गलत होती है।
20:05
आपको हूं परमात्मा नहीं चाहिए।
20:13
कल्पना का परमात्मा चाहिए।
20:17
अरे मैं हूं हूं। परमात्मा नहीं चाहिए आपको। कल्पना का परमात्मा चाहिए।
20:26
बहुत डिफरेंस हो जाता है उसमें। हां।
22:15
हां जी
22:26
यस। किसी का कोई सवाल हो, किसी का कुछ कहना हो, आप कह सकते हैं।
22:35
किसी टॉपिक पर सत्संग चाहते हो तो वह भी आप कह सकते हैं।
22:56
एक चीज आपको बताऊं एक बात आ रही है अंदर से कि अधिकतर हम अधिकतर हर आदमी की यह
23:05
प्रॉब्लम है कईयों के सवाल भी रहते हैं कि मेरे को यह नहीं हो रहा है। मेरे को वह नहीं हो रहा है।
23:14
वो कुछ चाहता है ना कि मुझे यह होना चाहिए।
23:26
यह नहीं हो रहा है। वो नहीं हो रहा है मेरे को।
23:32
अब मैं मैं तो है ना। अब मैं को आप चाह रहे हो
23:42
कुछ हो रहा है कुछ नहीं हो रहा है तो आप रॉन्ग जा रहे हो यह क्यों नहीं हो रहा है वो क्यों नहीं हो
23:50
रहा है अरे आप हो और क्या करना है कुछ हो या ना हो
23:57
है ना कुछ भी होगा बड़े से बड़ी चीज होगी छोटे
24:04
से छोटे होगी आपसे बहुमूल्य तो नहीं है ना
24:15
जैसे है से बहुमूल्य हो रहा है कैसे हो सकता है
24:25
अस्तित्व से बहुमूल्य हो रहा है यह हो रहा है वह हो रहा है यह होना चाहिए वह होना चाहिए वो
24:34
कैसे हो सकता है इंपॉर्टेंट है
24:41
और है ही हूं। कहता है आपके भीतर से मैं हूं। आप इंपॉर्टेंट हो ना यार।
24:53
मेरे को यह हो गया, वह हो गया, यह होना चाहिए, वो होना चाहिए। अरे मैं मेरे को वह हटाओ।
25:25
आप हो गए हो इससे ज्यादा और क्या होगा
25:30
[हंसी]
25:32
और आप हो गए हो कि श्रेणी में भी नहीं आते हां समय की श्रेणी में नहीं आते
25:41
हां
25:54
हां किसी को कोई भी प्रश्न दे दो मेरे को
26:01
यहां रख दो
26:28
प्रेम प्रणाम स्वामी जी प्रेम प्रणाम
26:37
स्वामी जी जैसे आप कहते हैं कि मैं नहीं जानता
26:43
इसको भी जो जानता है वही आप हो तो वहां तक दृष्टि क्यों नहीं जाती मतलब
26:52
समझ आती है आपकी सारी बातें 100% एक्सेप्टेंस भी है
26:59
फिर कभी लगता है कि जैसे पहचान नहीं है तो आप यह भी कहते हो कि जो यह जानता है पहचान
27:06
नहीं है वही आप हो तो थोड़ा सा इसको क्लियर करिए स्वामी जी
27:14
वहां दृष्टि इसलिए नहीं जाती कि वह स्वयं दृष्टि है। अपनी आंख से आंख को कैसे देखोगे?
27:22
हां जी।
27:24
हां। आप कुछ भी पहचान लो पहचान करने वाला तो अलग ही हो जाएगा ना। जी।
27:31
हां। तो जो चीज आप पहले से हो आप पहचाने हुए ही हो। उसको पहचाना नहीं जाता।
27:41
आपको अपने आप को पहचानना है ही नहीं। असल में यह बात है।
27:48
आप अपने आप को पहचानते ही हो।
27:52
जैसे इसको पहचानते हो। क्या बोलते हो इसको?
27:56
इसको लक्ष्य बोलते हैं ना अपन। पहचान के बोले ना? जी।
28:02
और इधर आओ। खुद को क्या बोलते हो? मैं बोलते हो ना?
28:09
खुद को मैं बोलते हो ना? या इसको देह बोलते हो, पहचान के बोले ना देह।
28:14
इसको लकड़ी बोले पहचान के। ऐसे ही खुद को पहचान के ही तो आप मैं बोले।
28:22
इतना सरल है। तो मन सेटिस्फाई क्यों नहीं होता फिर?
28:30
मन सेटिस्फाई इसलिए नहीं होता क्योंकि आप कुछ और चीज जानना चाहते हो। मैं को मैं नहीं जानना चाहते।
28:41
आप चाहते हो कि मैं कुछ और निकले।
28:45
कोई परमात्मा निकले, कोई आत्मा निकले, कोई एक्साइटमेंट हो उसमें।
28:52
इसलिए मन सेटिस्फाई नहीं होता और आपको मन को सेटिस्फाई नहीं करना है। जी।
28:58
यह भी एक रॉन्ग ख्याल है।
29:03
तो जैसे आप इसको लकड़ी बोलते हो पहचान के इसको आकाश बोलते हो, इसको धरती बोलते हो,
29:10
इसको देह बोलते हो। ऐसे ही खुद को मैं बोलते हो पहचान के।
29:19
बगैर पहचाने खुद को मैं कैसे कह सकते हो?
29:27
तो हर कोई खुद को पहचानता है।
29:32
बस यही नहीं पहचानता कि वह खुद को पहचानता कि वह खुद को पहचानता है। और यह बातें ऐसे
29:40
गोल-गोल घुमाने जैसी नहीं है। आप पहचानते ही हो खुद को स्वयं की पहचान या स्वयं को जानना
29:49
आप स्वयं कह रहे हो जान के ही तो स्वयं कह रहे हो।
29:54
अब आप जो चाहते हो ना कि स्वयं में कुछ और हो जाए वह मन है।
30:04
स्वयं में स्वयं ही रहेगा वहां कुछ और होगा ही नहीं। यही आत्मा है। स्वयं है।
30:14
जी स्वामी।
30:15
हां जैसे हम लकड़ी में चाहे कि यह डंडा हो जाए। यह खिड़की हो जाए, दरवाजा हो जाए तो
30:22
यह रॉन्ग है ना? यह हो भी जाएगा तब भी यह लकड़ी ही रहेगी।
30:29
बन भी जाएगा।
30:34
तो जैसे ही आप कहते हो मैं अरे पहचान के बोले मैं।
30:44
पहले इसी बात को शोर करो।
30:51
और आप बोले जानने वाला जानने वाला इसको पहचानने वाला अब जानने वाले को कैसे जाने?
31:02
अरे मैं जानने वाला हूं।
31:06
यही तो आप जान रहे हो ना कि मैं जानने वाला हूं।
31:10
यही जानने वाले को जानना है कि मैं जानने वाला हूं।
31:16
वहां ऐसे पीछे जाते थोड़ी ना जाना है कि इसको भी मैं जानने वाला हूं। इसको भी मैं जानने वाला हूं। वह मन है जो आगे पीछे जाता है ना वो मन है।
31:28
वो ट्रैप है वो लोग साधनाएं कराते हैं।
31:30
हां, यह जान लिए। अब इसको कौन जानने वाला है? अच्छा ये भी जान लिए। इसको कौन जानने वाला है? इसके परे चलेगा। इसको कौन जानने
31:38
वाला है? अरे यार मैं जानने वाला हूं।
31:44
यही जानना है बस जानने वाले को क्या जानना है कि मैं जानने
31:51
वाला हूं नेचुरल में मैं जानने वाला हूं
31:59
हां और आप जानने वाले हो सहज है। अपनी सहजता को स्वीकार करो।
32:10
अब आप क्या चाहते हो कि मैं जानने वाले को जानूं?
32:15
अरे आप जानने वाले को जानते ही हो कि मैं जानने वाला हूं।
32:21
जब जानू ऐसा सवाल आ जाता है या ऐसा आपको जानना है तो वो मन आ जाता है।
32:30
हां जी। हां आप अपनी सहजता को स्वीकार करो।
32:37
जी सर जी हां मतलब इसी बात को मैं आपको 20 साल साधना कराऊं 50 साल जैसे जैन मास्टर्स
32:46
कराते थे और लास्ट में बोलूं 50 साल के बाद कि ये क्या है? लकड़ी। यह क्या है बॉडी?
32:58
इसको जान के आप लकड़ी बोले। इसको जान के बॉडी बोले खुद को जान के आप मैं बोले तब आपको यकीन जल्दी हो जाएगा।
33:09
आपको लगेगा कि मैं बहुत कुछ की उसके बाद तो क्यों अननेसेसरी समय को वेस्ट करना?
33:20
और कई साधनाएं आप कर चुके हो। कई जन्म में इस जन्म में
33:29
50 साल के बाद वह मैं कुछ और थोड़ी ना हो जाता है। साधना करने के बाद वाला मैं अलग थोड़ी ना हो जाता है।
33:39
या जानने वाला अलग थोड़ी ना हो जाता है।
33:45
यही ज्ञान की महिमा है कि आप ज्ञान स्वरूप हो।
33:53
आप खुद ज्ञान हो। इसका ज्ञान होना चाहिए कि आप खुद ज्ञान हो।
34:00
किसी और का ज्ञान जो आपको चाहिए वह बुद्धि का ज्ञान है।
34:07
और आप स्वयं ज्ञान हो। तभी तो कहते हो मैं स्वयं बगैर ज्ञान हुए आप खुद को मैं कैसे कहोगे। स्वयं कैसे कहोगे?
34:21
विदाउट ज्ञान आप कह ही नहीं सकते तो जो सहज सरल है ना तो अपनी सहजता को
34:30
स्वीकार करो कि ये इतना ही आसान है आसान से आसान है
34:44
बहुत-बहुत धन्यवाद स्वामी जी बहुत-बहुत अब बहुत-बहुत प्रेम करना
34:51
अभी रुको अभी आपका काम नहीं हुआ है। अभी आप शॉर्टकट मार रहे हो। हां अभी सुनो आप।
35:02
हमको सारे सिग्नल आ जाते हैं।
35:13
तो हम क्या है ना हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते।
35:22
समझ रहे हो? जी स्वामी। हम हां उनको म्यूट करो थोड़ा।
35:29
हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते। बस यही ट्रैप है।
35:37
क्या?
35:39
हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते।
35:47
स्वयं में कुछ और चाहते हैं। कोई पावर, कोई एनर्जी, कोई चेतना, कोई परमात्मा,
35:56
कोई बुद्धत्व, कोई ज्ञान, कोई भक्ति।
36:01
और हम क्या बोला था अभी मैं पॉइंट? स्वयं को
36:07
यस। हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते। बस इतनी सी बात है
36:20
और चैप्टर क्लोज
36:24
[हंसी]
36:26
[गहरी सांस लेने की आवाज़]
36:30
मैं को मैं को मैं नहीं जानना चाहते है ना
36:37
और अब मैं ही हूं ना तो भैया मैं हूं होना नहीं है आप मैं हो ही।
36:47
इवन ये होना हो से भी परे हो आप।
36:52
अब हम क्या करते हैं? कल्पना का भगवान गया। अब मैं आत्मा भगवान अब आपका लक्ष्य है। अरे लक्ष्य आप खुद हो।
37:06
मंजिल आप खुद हो।
37:11
अरे मेरे भाई मछली की आंख ही दिख रही है। उस पर तीर चलाना है। यह आपका लक्ष्य है।
37:20
ठीक है। अब लक्ष्य अगर अर्जुन खुद है।
37:26
तो किस पे तीर चलाएगा? बस ऐसे लक्ष्य आप खुद हो।
37:35
उसमें कोई अचीव नहीं करना है। कोई तीर नहीं चलाना है।
37:43
मंजिल आप खुद ही हो
37:48
और मंजिल लक्ष्य, परमात्मा, अस्तित्व
37:55
इन चीजों से खुद को टेली मत करो। मैं को मैं से ही टेली होता है।
38:02
मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान।
38:12
तो आप मैं को मैं जानते ही हो। जैसे ही कहते हो मैं कौन हूं भैया?
38:20
नॉक हुआ। कौन हूं? अरे मैं हूं।
38:25
अगर आप खुद को नहीं जानते होते तो आपका यह जवाब कैसे निकलता कि मैं हूं?
38:37
आप अच्छे से खुद को जानते हो तभी कहते हो मैं।
38:43
अब मैं को कहते हो कि मैं देह हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं तो वह अब आप ही बन गए माया।
38:53
अच्छा अब कोई और आकर माया नहीं बना। अब मैं आत्मा भगवान ही अब माया बन गया।
39:02
मैं मन मैं देह मन बन गया।
39:10
अपने को आपने कुछ भी कहा तो आप माया बन गए। आप ही माया बने। लकड़ी ही डंडा बनी और कोई चीज डंडा नहीं बना।
39:26
अब मैं देह हूं। मैं डंडा हूं।
39:31
अब डंडा जो फॉल्स है वह खोजेगा लकड़ी को तो मिलन कभी भी संभव नहीं है।
39:43
डंडे देश में लकड़ी का मिलन कभी भी संभव नहीं है।
39:52
देह देश में मैं आत्मा भगवान का मिलन कभी भी संभव नहीं है।
40:01
और लकड़ी देश में मिलना नहीं है। मिलना भी नहीं है।
40:09
हां। मिला ही हुआ बोलना भी एक रोंग हो गया ना। क्योंकि लकड़ी तो लकड़ी है। मिलना बिछड़ने की बात ही नहीं है।
40:19
मैं देश में मिलने जैसी चीज ही नहीं है। पाने जानने
40:25
जैसी चीज ही नहीं है। सहज स्वाभाविक सरल एकदम
40:37
फिर भी खुद को जो आप कहते हो मैं देह हूं।
40:43
मैं बुद्धि हूं या जो भी खुद को मानते हो उसमें आप ही माया बन जाते हो। कोई और चीज माया नहीं बनती।
40:54
हम क्या सोचते हैं? कोई और चीज जीव बन गया, माया बन गई, मन बन गया। नो, भगवान ही माया बने।
41:05
माया पति ही माया बन जाता है।
41:12
तो जब मैं ही माया बना बनना यानी माया होना यानी आत्मा मैं
41:22
तो होना ही बनना हुआ ना
41:33
बगैर हुए बनना तो हो ही नहीं सकता।
41:40
भगवान ही माया बनते हैं भाई और कोई माया नहीं बनता कोई दूसरा आकर
41:47
इस चीज को बार-बार विचार किया करो बार-बार मंथन किया करो तो अचानक खुल जाएगा यह वो
41:55
सेंस कि मैं ही मैं आत्मा भगवान ही बना हूं
42:01
माया मन हम क्या सोचते हैं माया कोई और है और फिर
42:09
उससे बचना है, उससे परे जाना है, मुक्त होना है। अपने आप से कैसे मुक्त होगे?
42:18
आप ही बने हो माया। कोई और नहीं बना है।
42:23
खुद को बॉडी माने। अब इच्छाएं, कामनाएं सब शुरू।
42:29
तो आपकी मान्यता के कारण आप ही बने ना। कामना भी आप बने, इच्छा भी आप बने।
42:42
यह सारा बनना होने से ही है। मैं से ही है।
42:54
तो बनते हो कभी-कभी होते हो हमेशा।
43:02
तो जो है हमेशा वही बनता है कभी कभी
43:09
हमेशा ही बनता है कभी कभी
43:28
तो भैया मैं माया माया क्यों बना? आप ऐसे पूछोगे अरे मैं ही माया बना तो दिक्कत क्या है?
43:37
कोई और थोड़ी ना माया है। लकड़ी ही डंडा बनाना तो दिक्कत क्या है?
43:48
मैं ही देह बना, मन बुद्धि बना तो दिक्कत क्या है?
43:57
कोई और चीज होती ना यह देह मन बुद्धि या माया तो दिक्कत होती
44:06
जब मैं ही बना हूं यह सब तो काहे की दिक्कत तब तो आनंद है सब चीजों
44:15
का क्योंकि मैं ही बना हूं सब कुछ एक ही अनेक हुआ है ना भाई
44:25
एक ही अनेक हुआ है। तो यह पूरा चराचर मेरा आनंद है ना। मैं का आनंद है। नए-नए नाम और
44:34
रूपों में अनंत नाम रूपों में मैं ही प्रस्फुटित हो रहा हूं।
44:43
जीव भी मैं बना हूं। देह भी मैं बना हूं।
44:50
तो मैं बना हूं। मैं को आप छोड़ देते हो। अन बना ही बना है।
44:57
मैं क्या है? अन बना।
45:03
ठीक है। अब मैं आत्मा भगवान है। अन बना।
45:10
अब अन बना ही बना है तो क्या बना है?
45:15
[हंसी]
45:18
अरे अन बनाना अनब बना अन बनाना का अर्थ क्या होता है जो बन ही नहीं सकता कुछ
45:28
है ना अब अन बना ही बना है यानी वह लीला है ना
45:35
तो आनंद है ना यह पूरा जगत आनंद है आत्मा भगवान का मैं
45:44
का यह कोई ट्रैप में आप नहीं फंस गए हो कि कोई आएगा कभी इतना साधना करोगे वह होगा यह
45:52
होगा फिर कल्याण होगा फिर कभी आप स्वयं को जानोगे वह सब बकवास
46:01
ये पूरा आनंद है आपका टोटल आनंद है यह
46:13
अन बना ही बना है तो क्या बना है?
46:18
बनते हुए भी कुछ भी नहीं बना है।
46:23
बनते हुए भी कुछ भी नहीं बना है।
46:30
क्योंकि अनब बनाना ही बना है।
46:33
[हंसी]
46:58
मतलब आनंद ही दुख बन जाए। तो आप दुखी होगे क्या?
47:06
आनंद ही दुख बनता है यार। यह जबरदस्त खेल है।
47:13
[हंसी]
47:18
आत्मा ही देह बनता है। जस्ट विपरीत। क्योंकि अखंड है ना?
47:25
परमात्मा ही माया बनता है। जस्ट विपरीत अनबना ही बना बनता है। जस्ट विपरीत
47:33
तो एकदम विपरीत आ जाता है ना तो आपको लगता है कि कोई और चीज आ गई।
47:40
जैसे दिन के विपरीत रात आ गई। रात के विपरीत दिन आ गया। तो आपको यहां पर भी ऐसा
47:46
लगता है कि यार यह दुनिया माया कहां से आ गई? एकदम से विपरीत।
47:55
आप ही विपरीत हो जाते हो और फिर विपरीत परिस्थिति बन जाते हो और फिर रोते भी हो
48:03
मेरी जिंदगी में बहुत विपरीत परिस्थितियां
48:07
[हंसी]
48:14
अरे भाई आपका विपरीत आप ही तो बन सकते हो ना यार और कौन बनेगा
48:22
हां आपका विपरीत और कौन बनेगा? आप ही बन सकते हो ना?
48:47
विकल्पक विकल्प बन जाता है। यह आनंद है।
48:50
यह कोई ट्रैप नहीं है, कोई दुख नहीं है कि आप कहीं फंस गए हो। हां।
48:57
अरे गुरु शिष्य बन जाता है। हां।
49:06
यह जो आप लोगों को शिष्य का भाव आता है आप सद सदा से गुरु हो
49:12
और शिष्य बने हो यह आनंद है आपका कोई यह अज्ञानता थोड़ी ना है
49:29
इससे पहले आप मेरे साइड से खेल रहे थे मैं आपके साइड से खेल रहा था अब खेल थोड़ा सा उल्टा है। आनंद ले रहे हैं। [हंसी] और क्या है? हां।
49:55
तो अन बना ही बना है।
50:01
अन बना ही बना है इसलिए कुछ भी नहीं बना है।
50:18
ज्ञान ही अज्ञान है। इसलिए कोई अज्ञान नहीं है।
50:24
क्योंकि अज्ञान का भी ज्ञान है ना। ज्ञान का अज्ञान होता है क्या?
50:33
लेकिन अज्ञान का ज्ञान होता है ना। यानी अज्ञान भी ज्ञान है ना।
50:42
कॉमन सेंस अज्ञान की आत्मा भी ज्ञान है तो
50:48
कहां अज्ञान है कितना सरल है यार लेकिन हम कभी भी अपनी
50:57
सरलता को स्वीकार नहीं करते अपनी सहजता को
51:04
हमको वो हठ योग और 25-50 साल कोई कराएं और एक लाइन बोले तब यकीन होगा तब भी नहीं
51:11
होगा यकीन आपको क्योंकि आपको बीमारी पड़ जाएगी साधना करने की ध्यान करने की और आपको
51:19
लगेगा साधना से ही कुछ होगा क्योंकि साधना क्या करती है फ्यूचर में ले जाती है
51:28
50 साल बाद भी वह फ्यूचर में ही ले जाएगी माय डियर असत्य
51:36
समय ही खत्म कर देता है अभी अभी से पहले जो मैं हूं
51:44
उसको कहीं ले जाना नहीं पड़ता। जहां जाना है वहीं बैठा हूं।
51:50
अरे वहीं बैठा हूं। जो होना है वह हूं।
52:10
तो मैं ही माया बना हूं तो अब मैं माया से भयभीत होऊंगा क्या? रस्सी ही सांप बनी है ना तो अब सांप से भय है क्या?
52:22
मैं ही माया बना हूं तो अब माया से भय है क्या? मैं यानी आत्मा भगवान ही माया बना हूं।
52:33
तो भय होगा कैसे?
52:36
माया से भय तभी लगेगा आपको जब आपको यह लगे कि कोई और चीज है माया।
52:45
कोई अदर है, कोई अटैक कर रहा है। तब आपको भय लगेगा।
52:57
मतलब आप नहीं समझे।
53:00
लकड़ी को डंडे से भय है। डंडा लकड़ी की माया है ना। लकड़ी ही डंडा बना है।
53:11
लकड़ी को अगर डंडे से भय लग रहा है तो आप क्या बोलोगे लकड़ी को?
53:24
सेंस ही नहीं बनता ना। क्योंकि लकड़ी ही डंडा बना है तो भय कैसा
53:32
डंडा लकड़ी की माया है तो अब यह सुंदरता है डंडा सुंदरता है अब भय नहीं है सुंदरता
53:41
है तो यह देह मन बुद्धि और ये पूरा संसार
53:48
मेरी माया है मैं की माया है मैं ही हूं तो अब ये सब सुंदर है ना?
54:01
मैं ही हूं। इन द सेंस डंडा लकड़ी ही है। माया मैं ही हूं। इसलिए सुंदर है।
54:10
माया कोई और है तो खतरनाक है। फिर आप रगड़ दिए जाओगे।
54:17
कहीं के नहीं बचोगे क्योंकि माया कोई और है। बोल के आपने भगवान और माया को अलग कर दिया।
54:26
कभी भी पत्नी और पत्नी को अलग नहीं करना।
54:29
माया पति और माया को आप अलग करने का प्रयास बस किए कर तो सकते नहीं।
54:36
उस प्रयास मात्र से आप रगड़ दिए जाओगे बुरी तरह से।
54:48
तो अलग मत करो भैया।
55:06
कल आशीष आया था। हम लोग सत्संग कर रहे थे तो आशीष एक बहुत अच्छी बात बोला कि
55:12
प्रभु कि यह मिलने इतना सुनने के बाद भी कुछ मिल जाए या कुछ हो जाए की चाह क्यों नहीं जाती?
55:22
तो आशीष बोला वह अलग मान रहा है अभी भी परमात्मा को या जो
55:30
भी उसको पाना है बुद्धत्व उसको इसलिए चाह नहीं जाती
55:40
जब आप अलग मान रहे हो अस्तित्व को परमात्मा को इसलिए तो चाह नहीं जाती
55:49
अलग मानना माया है बल्कि खतरनाक वाली माया
56:03
और माया सुंदर तब होती है जब आप जानते हो कि भगवान ही है मैं ही हूं माया सुंदर हो
56:10
जाती अरे मैं ही हूं यार अब निश्चिंत जब रस्सी सांप है तो आपका भय गया
56:21
सांप सांप है वो एक अलग बात हो गई तो आपको भय लगेगा
56:28
कि सांप कोई और चीज है रस्सी कोई और चीज है रस्सी ही सांप है।
56:38
मैं ही माया हूं तो सुंदर है ना? सब सुंदर है फिर।
56:52
अन बना ही बना है। अन बना ही बना है।
57:17
तो जस्ट विपरीत होता है ना तो आपको लगता है कि कोई और चीज आ गई। बल्कि यह मैं
57:23
आत्मा भगवान की बेस्ट क्वालिटी है कि वह अपना भी विपरीत बन जाता है।
57:35
जिसका कोई विपरीत हो ही नहीं सकता।
57:40
हां और अगर मैं अपना ही विपरीत ना बन पाऊं तो मैं अधूरा हूं ना।
57:52
तो मैं संपूर्ण हूं। कंप्लीट हूं। पूर्ण हूं। यही तो बता रहा है
57:59
कि मैं अपना भी विपरीत बन सकता हूं। बन सकता हूं हूं तो अनब बनाना।
58:08
तो यह पूरी मेरी लीला है।
58:28
तो जैसे ही इस पॉइंट को मैं कई बार रेस किया हूं कि जब आप आकाश को देखते हो तो मैं नहीं दिखता।
58:38
जब मैं में रहते हो स्वयं में अपने होने के एहसास में तो आकाश नहीं दिखता
58:47
और जब अभी देखो आकाश को तुरंत ऐसे देखो प्रैक्टिकल सब अब आकाश दिख रहा है तो मैं नहीं दिख रहा है।
58:58
अब मैं ही आकाश बन गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
59:04
मैं ही आकाश हो गया ना कोई गैप नहीं है आकाश होने में।
59:13
मैं ही आकाश हो गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
59:20
अब मैं आ जाओ। तो आकाश गायब हो जाएगा।
59:29
देह को देखता हूं तो मैं नहीं दिखता। देखो देह को।
59:34
अपनी पूरी बॉडी को देखो अच्छे से। मैं को देखो तो देह नहीं दिखता।
59:40
अपने होने में, स्वयं के एहसास में, साइलेंस में।
59:46
वहां फिर देह नहीं दिखता। और देह को देखने पर।
59:53
मैं नहीं दिखता।
59:56
अब मैं ही देह हो गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
1:00:08
तो आप जो भी देखते हो वह पहले हो जाते हो फिर देखते हो।
1:00:16
धरती देखे तो आप धरती हो गए फिर आप धरती को देखते हो।
1:00:24
आकाश बोलने के पहले आप हो गए फिर आकाश को देखते हो
1:00:33
तो यह इतना सहज में आप यह सब हो जाते हो क्योंकि मैं की बाउंड्री नहीं है ना वह सहज में सब
1:00:41
कुछ बन जाता है सहज में
1:00:48
करके आपको कदर नहीं है सहज में आप एक से अनेक हो जाते हो
1:00:59
और फिर अनेक से एक भी हो जाते
1:01:26
तो बना और अनब बनाना है ना अब इस चीज में देखना बना क्या है? माया यानी बनना।
1:01:37
अनब बनाना कौन है? भगवान। मैं आत्मा भगवान। लेकिन
1:01:44
एक पॉइंट आप गौर कर रहे हो कौन बना और कौन अन बना? मैं।
1:01:57
कौन बना?
1:02:00
और कौन अन अरे बोलो यार अरे मैं
1:02:11
होता कौन है हमेशा बनता कौन है कभी-कभी मैं और आप मैं ही हो नाचो गाओ सेलिब्रेट
1:02:22
करो बनता कौन है कभी कभी
1:02:30
होता कौन है हमेशा? अरे मैं
1:02:35
माया कौन बनता है? भगवान कौन होता है? मैं और आप मैं ही तो हो।
1:02:47
आप मैं ही हो।
1:02:49
[हंसी]
1:02:50
होना होना नहीं है।
1:02:59
अरे जानता कौन है? नहीं जानता कौन है?
1:03:05
सीधी बात ना यार मैं ना समझता कौन है? नहीं समझता कौन है?
1:03:16
असली चीज आप ही हो। उधर आपका ध्यान ही नहीं है।
1:03:22
आप जानने ना जानने में लटके हो। भगवान माया में लटके हो। बना अनबना में लटके हो।
1:03:31
होना और बनने में लटके हो।
1:03:41
एक बात बताओ यार दुखी कौन होता है? मैं। आनंदित कौन होता है?
1:03:49
मैं तो वहीं का वही है ना वहां दुख आनंद से मैटर ही नहीं है।
1:03:56
अज्ञानी कौन होता है? ज्ञानी कौन होता है?
1:04:00
पहुंचता कौन है? भटकता कौन है? [हंसी] तो आप मैं ही तो हूं यार।
1:04:25
मैं भूल भूल जाता है। अरे मैं कौन भूल भूल जाता है?
1:04:31
मैं और कौन बार-बार याद आता है? मैं तो हर हालत में आप ही तो हो यार।
1:04:47
कितना सिंपल है।
1:05:05
कोई और चीज भगवान नहीं है। कोई और चीज माया नहीं है। इस चीज को अच्छे से जान लो।
1:05:12
आपके दोनों ट्रैप है। भगवान आपको पाना है। माया से आपको बचना है।
1:05:19
अब माया कोई और नहीं है। भगवान कोई और नहीं है। आप ही हो तो किससे बचोगे और किसको पाओगे?
1:05:27
अब माया से बचना नहीं है। संसार से बचना नहीं क्योंकि आप ही अपना संसार हो। और
1:05:35
भगवान को पाना नहीं है क्योंकि आप ही वह भगवान हो। कितना सिंपल है यार।
1:05:46
सो सिंपल
1:06:05
जानने वाला देखने वाला होने वाला तो मैं हूं मैं को आप भूल जाते हो और जानना देखना उसमें लटके रहते
1:06:17
और मैं को आप भूल जाते हो तब भी आप मैं हो। यह बहुत आनंद की बात है। मैं को भूल
1:06:24
जाने पर भी आप मैं ही रहते हो। यह नाचने की बात है। पागलों नाचो।
1:06:31
[हंसी]
1:06:33
मैं को भूल जाने पर भी आप मैं ही रहते हो। अरे कूद-कूद के नाचो।
1:06:42
[हंसी]
1:06:46
यस फाइनल स्टेटमेंट
1:06:54
बल्ले बल्ले देख लो आजमा के देख लो हम जो भी बोल रहे
1:07:05
हैं क्या बोलते गोविंद जी
1:07:23
तो मैं का सत्संग सर्वश्रेष्ठ होता है। क्योंकि उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
1:07:32
तो आप किस में लटकते हो? भगवान में लटकते हो, फिर कभी माया में लटकते हो। भगवान को पाना है, माया से बचना है।
1:07:41
दोनों आपसे भिन्न है ही नहीं।
1:07:51
अच्छा माया कौन है? जो भी आप मानते हो माया है। भगवान कौन है?
1:07:59
जानना ही भगवान है। जानना ही ज्ञान है। वही आत्मा है। वही परमात्मा है।
1:08:06
तो जानना आपसे अलग कहां है और मानना आपसे अलग कहां है।
1:08:10
लेकिन आप आपको भूल जाते हो। मैं एक्चुअल को पॉइंट को कि मानता मैं हूं। जानता मैं हूं।
1:08:23
जानने वाला मैं ना और मानने वाला मैं।
1:08:29
अच्छा एक बात बताना आपको करोड़ बुद्धत्व मिलेंगे किसको मिलेंगे मैं को मिलेगा ना तो जो करोड़ों बुद्धत्व
1:08:38
को पी लेगा रिसीव कर लेगा वही बड़ा होगा ना एक बुद्धत्व को तो गोली मारो करोड़ों किसको मिलेगा
1:08:47
[हंसी]
1:08:49
तो बॉस तो मैं ही है ना उसको बुद्धत्व क्या करेगा वह
1:08:56
भगवान भी मिलेगा तो किसको मिलेगा मिलेगा खत्म बात यार
1:09:03
तो भगवान जिसको मिलेगा जिसको रिसीव होगा जिस पात्र में वह रिसीव होगा वह पात्र
1:09:10
बड़ा है ना कितनी सिंपल सी बात है
1:09:20
यह कॉमन सेंस आप लगाते नहीं हो अपने को हल्के में लेते
1:09:31
तो पाना खोना गया भैया जानना नहीं जानना सब गया
1:09:41
मैं का मैं रह गया क्योंकि मैं ही था ना जो भी था मैं ही था
1:09:50
जो है मैं ही हूं जो रहेगा मैं ही रहूंगा
1:09:59
वह सुने ना अपन वेदों की पहली लाइन है कि था तो वासुदेव है तो वासुदेव रहेगा तो
1:10:06
वासुदेव वह आपके मैं की बात है वही असली वासुदेव है उसको मैं कहो तो जल्दी क्लियर
1:10:13
हो जाता है क्योंकि आप मैं ही हो वासुदेव में फिर आप कुछ कल्पना करने लगते हो
1:10:23
डायरेक्ट वेदांत वेदांत भी क्या मैं कह रहा हूं मैं हां
1:10:31
मैं ही मैं को बता पाता है कोई शास्त्र भी थक जाते हैं
1:10:42
सारे शास्त्र
1:10:52
शास्त्रों की यही की महिमा है कि शास्त्र बता देते हैं कि शास्त्र से नहीं मिलेगा।
1:10:58
यह शास्त्रों की महिमा है। हां ज्ञान की यही महिमा है कि ज्ञान से नहीं मिलेगा।
1:11:10
प्रेम की यही महिमा है कि प्रेम से भी नहीं मिलेगा। आप कितना ही भक्ति कर लो ज्ञान मार्ग कर लो।
1:11:16
योग मार्ग, तंत्र मार्ग, मंत्र मार्ग, अरे यार मिलने की लैंग्वेज ही खराब है।
1:11:27
अलग मान के ही मिलना वह मिलने वाली बीमारियां पैदा होती है।
1:11:39
तो बना भी गया अन बनाना भी गया।
1:12:10
देखो हम हमेशा बोलते हैं लेकिन कभी भी उसके गहराई में नहीं जाते। बुद्धि के परे
1:12:18
बुद्धि के परे हम ऐसा बोलते हैं ना बुद्धि यानी क्या है बताओ?
1:12:25
स्मरण है ना? और विस्मरण बोल लो उसका अपोजिट साइड।
1:12:38
तो जो स्मरण में भी रहे और विस्मरण में भी रहे वही बुद्धि से परे है। वो तो आप ही हो।
1:12:48
जहां ना स्मरण है ना विस्मरण दोनों की आवश्यकता नहीं है
1:12:56
याद करो तब आप हो नहीं करो तब आप हो
1:13:10
आपको बुद्धि से परे जाना नहीं है आप ऑलरेडी हो [हंसी]
1:13:18
तो इनफ फॉर फॉर एवर कि और कुछ मांगता एनी डिमांड
1:13:26
पांडे जी क्या बोलते
1:13:31
[हंसी]
1:13:33
ये सब सत्संग की महिमा है
1:13:41
प्रेम प्रणाम स्वामी जी हां प्रेम प्रणाम मैं अंकुर लखनऊ से
1:13:49
हम मैं अंकुर लखनऊ से आपके यहां आया भी था सत्संग में हां बताओ अंकुर टू द पॉइंट इधर उधर की बात
1:13:57
नहीं आप एक बात कहते हैं कि इस अन हो रहे तमाशे
1:14:03
को देखकर तू मुस्कुराया कर तो
1:14:11
मैं जब देखता हूं तो हमें सिर्फ तमाशा ही दिखता और मुस्कुराना थोड़ा मुश्किल हो जाता है हमारे लिए।
1:14:17
हां तू तमाशे को देख के मुस्कुराया कर। बट मुस्कुराया कर।
1:14:25
ठीक है?
1:14:27
ओके। खुश रहो। कुछ समझ में नहीं आता तो खुश रहा करो। क्योंकि समझ नहीं आ रहा है।
1:14:35
[हंसी]
1:14:35
बस कुछ समझ में आ गया तो खुश रहा करो। क्योंकि समझ में आ गया।
1:14:41
खुश रहो बस। ठीक है? आप सुन ही नहीं रहे हो हम क्या बोल रहे ठीक है स्टॉप करो उनको अंकुर जी को
1:14:49
हम क्या बोल रहे हो क्या सुन रहे पता ही नहीं है कोई कनेक्शन ही नहीं है
1:15:05
मुस्कुराने के लिए क्या तमाशा और क्या अन हो रहा तमाशा मुस्कुराना है तो बस मुस्कुराना है ना यार।
1:15:16
गीत गाना है तो गीत गाना है ना।
1:15:20
अरे आपको कुछ भगवान आत्मज्ञान कुछ मिले ना मिले अगर आपको नाचना है तो नाचना है।
1:15:30
सीधी बात है। मुस्कुराना है तो मुस्कुराना है।
1:15:38
उसमें क्या है?
1:15:47
नहीं जान पाए उसमें भी जो मुस्कुरा लेता है जान गया उसमें भी मुस्कुराता है
1:15:57
अब वो चैप्टर लो कर दिया वो अंकुर अपन हाई पिच चल रहे थे
1:16:04
कोई बात नहीं फिर ले आते हैं पिच हाई
1:16:08
[हंसी]
1:16:09
अलाम हमारा काम ही क्या है? पानी पिलाओ यार।
1:16:21
तो आज मैं आया तो था यहां सत्संग मैं सोचा चले जाता हूं। घर कल कराऊंगा।
1:16:35
तो वहां किचन के सामने ऐसे बैठे तो फिर भाव आ गया। चलो, मैं बोला, हाल में।
1:16:41
मैं जाने वाला था। आपको भी बोला, मैं जा रहा हूं।
1:16:47
सत्संग में ऐसा पेंडिंग नहीं करना चाहिए। चाहे मैं ही क्यों ना हूं।
1:16:55
अह क्योंकि मैं का पर्यायवाची सत्संग है।
1:17:01
इसलिए हरि अनंत हरि कथा अनंता। मैं अनंत मैं की कथा अनंता।
1:17:10
मैं सत्संग हूं और सत्संग में हूं।
1:17:18
सत्संग निरंतर
1:17:55
हां जी बताओ यार कुछ
1:18:11
[गहरी सांस लेने की आवाज़]
1:18:13
इधर लाइट्स वगैरह ऑन कर दूं ना यार बाहर अंधेरा मत रखा करो
1:18:28
कहां बोल रहा हूं? कहां क्या कर रहा है?
1:18:30
होश है तेरे को? कहां बोला मैं? बाहर बोल रहा हूं। मंदिर के साइड तू यहां बटन दबा रहा है।
1:18:41
उधर उधर जाके भाई मंदिर में।
1:19:02
तो क्रोध करने पर जो बिखर ना जाए और शांत होने में जो बन ना जाए वही मैं हूं।
1:19:16
क्या जो क्रोध में भी नहीं बिखरता और शांत होने में कुछ एक्स्ट्रा नहीं हो
1:19:23
जाता। कुछ एक्स्ट्रा नहीं बन जाता। वही मैं हूं। मैं क्रोध करने की अनुमति नहीं दे रहा हूं भाई। इसका मिसयूज मत करना। मैं
1:19:32
श्रापवाप दे दूंगा। [हंसी] जो श्रापित होता ही नहीं वही मैं हूं।
1:19:43
[हंसी]
1:19:44
लेकिन फिर भी मिसयूज नहीं करना। है ना? अभी परमिशन नहीं है।
1:19:58
नहीं तो क्या ऐसे सुन के ना एकदम आदमी में जग जाता है ओए ऐसा बोलता [हंसी]
1:20:11
हर किसी को अधिकार नहीं होता है ना कृष्ण को अधिकार था कि युद्ध करवा दिए
1:20:21
हर किसी को अधिकार नहीं था। हां ऐसा गलतफहमी में नहीं रहना।
1:21:05
जिंदगी जिंदगी की सच्चाइयां इतनी गहरी है ना तुम लोग डर जाओगे सुन नहीं पाओगे
1:21:12
और इसको यह पब्लिकली नहीं बोला जा सकता उसके लिए एक जीनियस चाहिए सुनने वाला
1:21:20
हम
1:21:53
अनंत कामना करने के बाद भी जो निष्काम रहता है वही मैं हूं।
1:22:03
आप तो डरते हो ना फट्टू हो आप कामना से डरते हो
1:22:11
अनंत कामना के बावजूद भी जो निष्काम है
1:22:21
सृष्टि होने के बावजूद भी जो स्रष्टा है वही स्रष्टा है।
1:22:29
स्रष्टा अपनी सृष्टि से नहीं बसता और सृष्टि के लिए कामना चाहिए।
1:22:36
एक से अनेक होने के लिए क्या चाहिए? कामना चाहिए ना। अनेक से और अनेक होने के लिए और कामनाएं चाहिए।
1:22:44
तो जब आपको बोध होता है तो यह भी आपको सुंदर लगेगा। हां।
1:22:53
यह कैसे संभव है? कामना करते हुए निष्काम होना। ऐसा तो आज तक कोई बोला ही नहीं। अरे ऐसे आप हो इसलिए कोई नहीं बोला।
1:23:05
कामना करते हुए भी एक बात बताओ आज तक आपने हजारों कामनाएं की होंगी। सैकड़ों की
1:23:13
होंगी, लाखों की होगी। तो आपका जो मैं है, क्या हो गया भैया? कामना करने से वह बिगड़ गया क्या?
1:23:24
जिसको कामनाएं बिगाड़ ना सके वही तो निष्काम हुआ ना बताओ असली निष्काम
1:23:34
जिसको सारी कामनाएं अनंत कामनाएं मिलके भी जिसको बिगाड़ ना सके। कोई विक्षेप वहां पैदा ना कर सके।
1:23:47
तो यह सब एक अलग नॉलेज है। यह सब फेस टू फेस मिलो तो यह बताया जाएगा। है ना?
1:23:56
ये सब ऑनलाइन वगैरह नहीं बताना ये।
1:24:04
आप डरते रहते हो।
1:24:07
कामना से जो डर गया वो घंटा निष्काम हो पाएगा।
1:24:15
हां सीधी बात
1:24:25
मालिक नौकर चाकर से डर रहा है।
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क्यों? इतनी कामनाएं उठती हैं आपको।
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किसी के पास कोई जवाब नहीं है क्योंकि आपकी आत्मा आपका एक्चुअल मैं कामना से नहीं डरता है।
1:24:51
जो मैं आत्मा भगवान है ना वह कामना से नहीं डरता है। कामना से डरने वाला जीव है।
1:24:57
माना हुआ जीव है। आप नहीं हो डरने वाले।
1:25:04
हां मैं आत्मा भगवान निश्चिंत है। वह निष्काम है ना?
1:25:13
तो इस पैरामीटर में जो पुराना स्ट्रक्चर है पूरा गिर जाएगा कि आप अचाहा में रहो तो आपकी शांति बढ़ेगी।
1:25:24
चाहोगे तो शांति कम होगी। कुछ भी नहीं चाहोगे तो शांति पूरी होगी।
1:25:31
यह बियों्ड की बात है जो इससे पहले बताया मैं।
1:25:39
जिस शांति को कोई चाह बिगाड़ दे मेरे को तो घंटा वह शांति चाहिए ही नहीं।
1:25:47
हां सीधी लैंग्वेज ऐसी होती है भाई। उसको सीधा ही बोलना पड़ता है।
1:25:54
हां।
1:25:56
मतलब एक चाह आके मेरी शांति को अगर बिगाड़ दे तो मेरे को तो ऐसी शांति चाहिए ही नहीं।
1:26:05
जिसको एक चाह आके कुरेद दे और बिगाड़ दे।
1:26:14
सारी चाहते मिलके भी जिसे ना बिगाड़ पाए मैं वो शांति हूं।
1:26:24
चाहते हुए भी मैं शांत हूं यारों।
1:26:31
दुर्लभो सहजा अवस्था सद्गुरु करुणा बिना लास्ट का 10 15 मिनट जो चला है
1:26:40
वह आपके लिए नहीं है विदाउट माय परमिशन नहीं है नहीं है और नहीं है वह मेरी बात
1:26:47
है आपकी नहीं है ठीक है और आपकी भी तब है जब आप बिल्कुल आत्मनिष्ठ हो गए
1:26:56
जब मैं के अतिरिक्त आपके लिए कुछ भी नहीं है तब ठीक है धोखा मत दे देना या मैं ब्रेक लगा
1:27:05
रहा हूं हां जिस दिन वह बात आपके लिए भी मेरी तरह क्लियर रहेगी
1:27:15
जब वह सहजा अवस्था ग्रहण हो जाएगी और वो मेरे प्रेम में ही होगी बता रहा हूं और कोई नहीं दे सकता उसको इस धरती पर
1:27:23
साफ-साफ बात तब मैं खुद खुद बता दूंगा कि तू युद्ध भी
1:27:31
कर और मेरा स्मरण भी कर अर्जुन तब ऐसे वक्तव्य बोले जाते अभी आपके लिए
1:27:39
नहीं है यह ज्यादा हो रहा है भाई रखो इसको
1:27:55
पानी है क्या उधर मतलब कितनी मजबूरी है ना एक चाहत आई और आपकी वाट लगाकर चली गई। यह क्या होती है?
1:28:06
ऐसी कोई आत्मा होती है क्या?
1:28:11
अरे चाहते हैं तो मैं का श्रृंगार है।
1:28:16
मैं अचाहा का श्रृंगार है।
1:28:24
मैं बताया ना अगर मैं विपरीत ना हो सकूं तो मैं अधूरा हूं।
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संसार तो परमात्मा की आंखों का काजल होता है मालूम हां
1:28:47
काजल है यह संसार यार वह और सुंदर करता है आंखों को परमात्मा को
1:28:54
हम असली सच्चाईयां सच में जानना ही नहीं चाहते जिंदगी की
1:29:03
हम वही घिसा पिटा जीते रहते हैं। मैक्सिमम कोई जाता है तो आत्मज्ञान तक मैक्सिमम जिसको आप लोग बुद्ध पुरुष कहते हो।
1:29:16
और कई बुद्ध पुरुषों को यह सहजा अवस्था का बोध रहता है। वह जानबूझ के नहीं बोलते क्योंकि मनुष्य अभी उतना प्रौढ नहीं है।
1:29:26
खुले आम तो नहीं बोलते।
1:29:29
इवन कृष्ण ने भी अर्जुन को चुन के बोला एक सिंगल को
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अर्जुन को बोला ना चाहते तो गीता सबको सुना सकते थे एटलीस्ट पांडवों को तो सुना सकते थे
1:29:48
इसका मैं थोड़ा हिंट इसलिए दे रहा हूं कि आपके अंदर यह रहेगा कि ऐसा भी कुछ है संभव
1:29:55
है ना और मेरे पास कई अर्जुन है अभी कई
1:30:10
मेरे पास कई कृष्ण भी हैं। अब हां अब वह क्वांटिटी दो-तीन से बढ़ रही है।
1:30:21
उनका पूरा भेद अभेद सब खत्म हो गया है।
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कृष्ण है इन द सेंस उस कैटेगरी के है ना अब फिर वो कंपटीशन वाली बात मत ले आना
1:30:51
तो असली सच्चाइयां ना बहुत गहरी होती है। उसको सुनने के लिए भी दम चाहिए।
1:30:57
आत्मा का साहस चाहिए। जीव का साहस नहीं चाहिए।
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भाई आत्मा ही आत्मा को सुन सकती है। कृष्ण ही कृष्ण को सुन सकता है।
1:31:12
अर्जुन भी थोड़ा सा तो फीका पड़ ही जाएगा।
1:31:15
[हंसी]
1:31:50
तो अब शुरू से सुनते सुनते सुनते सुनते बना अन बनाना
1:31:58
होना बनना भगवान माया से आप मैं में सेटल हुए।
1:32:06
अब फाइनल जब आप मैं में सेटल हुए तब सहजा अवस्था का रिदमम आता है।
1:32:15
जो अभी आया थोड़ा सा आया।
1:32:20
बहुत दुर्लभ है। सहजा अवस्था सतगुरु करुणा बिना।
1:32:32
सद्गुरु सद्गुरु कौन होता है? मैं ही सद्गुरु है। मैं की करुणा के बिना यह असंभव है।
1:32:42
आत्मज्ञान तक तो आप हाथ पैर मारो तो आप अचीव एक वर्ड में बोल रहा हूं। वह जान ही लोगे बोध हो जाएगा।
1:32:53
सहजा अवस्था पॉसिबल नहीं है।
1:33:37
तो जीसस जो एक लाइन बोले ना वो लाइन लोग समझे एक सीमा तक
1:33:45
शत्रु से प्रेम जिसको है।
1:33:54
है ना?
1:33:59
अब उसको मॉडिफाई करके कह दिया गया कि और आज के युग में कि प्रेमी का कोई शत्रु होता ही नहीं है।
1:34:11
लेकिन शत्रुता के समय में भी प्रेम वह और हायर रेंज है।
1:34:18
युद्ध के समय में भी कृष्ण को क्या करोड़ों से कम प्रेम था?
1:34:24
वह बहुत हायर रेंज है। वह और हायर रेंज है।
1:34:33
क्या सोचते हो कि कृष्ण भेद करते हैं कौरव और पांडव में।
1:34:39
ठीक है। धर्म की स्थापना उनको करनी है और पांडव का ही साथ देना है। वह भी मस्ट है।
1:34:51
ठीक युद्ध के समय में भी प्रेम वह असली प्रेम होता है। किसी से आप लड़ रहे हो और
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उससे आपका उसी समय प्रेम है। तब जानना आप रियल प्रेमी हो।
1:35:04
प्रेम की पहचान लड़ाई के समय होती है। यह बहुत खतरनाक बात बता रहा हूं।
1:35:11
मैं लड़ने को नहीं बोल रहा हूं।
1:35:16
किसी से लड़ते समय भी अगर आपके भीतर से उसके लिए आपको प्रेम ही आ रहा है और आपको ऊपर ऊपर किसी मजबूरी वश लड़ना पड़ रहा है।
1:35:26
तब समझना वह प्रेम ही असली प्रेम है।
1:35:35
मजबूरी थी ना लड़ना अर्जुन की कृष्ण की लड़वाना मजबूरी है
1:35:42
शांति प्रस्ताव के बाद भी
1:35:50
नहीं माने कौरव एक इंच जमीन नहीं देना है
1:35:59
तो मजबूरी थी युद्ध करना उद्देश्य था ही नहीं। वह मजबूरी थी।
1:36:09
प्रेमी का उद्देश्य कभी भी युद्ध होता ही नहीं है यार। लड़ना होता ही नहीं है।
1:36:17
समय है उस प्रेमी के पास जो लड़ाई करने जाएगा।
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तो जीसस बोले तो उसमें बहुत गहराई है और कृष्ण का तो परम है अल्टीमेट
1:36:37
कि तू युद्ध भी कर और मेरा स्मरण भी कर तो युद्ध करो तो स्मरण जाता है।
1:36:51
युद्ध कर रहे हो आप और मैं हूं मैं हूं। करोगे तो युद्ध नहीं कर पाओगे।
1:36:57
और स्मरण करोगे अपने होने में, तो युद्ध नहीं कर पाओगे।
1:37:03
युद्ध करोगे तो स्मरण नहीं कर पाओगे। तो तू युद्ध भी कर और मेरा स्मरण भी कर।
1:37:10
यह पॉसिबिलिटी यह संभावना केवल आत्म देश में ही संभव है।
1:37:23
जिसको यह निश्चय हो गया कि मैं हर हालत में हूं ही।
1:37:32
युद्ध करूं, चाहे प्रेम करूं, चाहे कुछ भी करूं। मैं हूं ही।
1:37:42
जिसको यह परम निश्चय हो गया कि मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। उसको यह अथॉरिटी दी जाती है।
1:37:57
ना कोई जीवन है ना कोई मृत्यु है ना कोई देह है जिसको एकदम श्योरिटी है अपने अंदर से।
1:38:06
जिसके लिए मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। फिर वह कुछ भी करें वह भी मैं है।
1:38:18
वह जो करे वह धर्म है। उठूं बैठूं सो सेवा। चलूं फिरूं सो परिक्रमा ऐसा कुछ बोले हैं कबीर साहब। वह फाइनल है।
1:38:30
उसका उठना, बैठना, चलना, खाना बिना सब पूजा पाठ है वह।
1:38:41
और वह उसका, उसका जो बोलते हैं ना वह मैं का है। आप भी चलते हो, फिरते हो, खाते हो।
1:38:50
आपके लिए भी सब पूजा पाठ है। लेकिन आप इस रहस्य को जानते नहीं हो।
1:39:29
तो असली सहजा अवस्था है। परमात्मा को पाना नहीं है। और माया से बचना नहीं है।
1:39:38
संसार से बचना नहीं है और परमात्मा को पाना नहीं है। वो सहज अवस्था है।
1:39:55
वो मैं ही हूं सहज में।
1:40:13
दुख से बचना नहीं है। आनंद पाना नहीं। हां।
1:40:40
याद करना है इसको भी जो भूल जाता है वही सहज है
1:40:48
कि मुझे अपने आप को याद करना है याद करना है इसको भी जो भूल जाता है मस्त
1:40:57
हो जाता है वही और वही एकमात्र सहज है।
1:41:17
जो याद करने को भी भूल जाता है।
1:41:23
याद करना है इसको भी अरे भूल जाता है।
1:41:28
[हंसी]
1:41:41
मुझे कुछ जानना है इससे जो अनजान हो जाता है।
1:41:49
वही सहज है।
1:41:55
मुझे कुछ जानना है। इससे भी जो अनजान हो जाता है। हटा ऐसा बोलता है।
1:42:04
वही सहज है।
1:42:26
जो मैं देह हूं ऐसे कहता है जैसे परमात्मा कहे कि मैं परमात्मा हूं वही सहज है।
1:42:43
इतनी पवित्रता से जो कहता है कि मैं देह हूं।
1:42:51
जैसे परमात्मा कहता है मैं परमात्मा वही सहज है।
1:42:56
बहुत दुर्लभ है सहज अवस्था हां बहुत दुर्लभ है। वह सुलभ
1:43:07
केवल आत्म बोध के बाद होती है।
1:43:13
जंप का भी ऑप्शन है बट बहुत रिस्की है। वह
1:43:40
पानी पिलाओ भाई।
1:43:50
बस यार जो भी सुने हो भूल जाओ मस्त रहो मुस्कुराते रहो
1:43:59
निश्चिंत रहो
1:47:12
हां जी हाय राम
1:47:25
थैंक यू।
1:48:19
हम
1:48:45
आप जिंदगी भर क्या करते हो सजग रहते हो सजग ठीक है नॉट बैड
1:48:53
आप भय के कारण सजग होते हो मन के प्रति सजग इसके प्रति सजग उसके प्रति कि कुछ
1:49:00
गड़बड़ ना हो है इसलिए आप सजग रहते हो।
1:49:10
अरे आप अंतर्यामी हो। जब कहीं रॉन्ग है वह बता देता है रॉन्ग है राइट है राइट है बता
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देता है नेचुरल जो सजगता है आपकी अंतर्यामी की वो
1:49:25
सुंदर है यह जो आप एफर्ट करते हो ना सजगता का
1:49:34
अवेयरनेस का वह फॉल्स है मैं सब काट दूंगा बता रहा हूं बंद कर दे
1:49:42
[हंसी]
1:49:51
एक बात बताना आंख के सामने कोई कीड़ा आता है या कुछ ऐसा आ जाता है तो अपने आप पलकें बंद हो जाती
1:49:59
है ना नेचुरल रास्ते में सांप आ गया दिख गया आपको अपने आप हट जाते हो ना वो नेचुरल सजगता
1:50:08
अवेयरनेस वो आपके अंदर है नहीं
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एक व्यवहारिक तल पे भी भय के कारण जो आप सजग होते हो वो रॉन्ग
1:50:23
है। मन से आप भयभीत हो क्योंकि आप यह नहीं जानते कि आप ही मन बने हो।
1:50:29
आप ही माया बने हो। अज्ञानता के कारण जो भय के कारण सजगता आती है वह रोंग है।
1:50:51
आप यह जानते ही नहीं हो आप अपने ही प्रति सजग हो रहे हो। मन कोई दूसरा थोड़ी ना है।
1:51:00
जिसके प्रति आप प्रयास कर रहे हो सजगता का।
1:51:08
हमेशा नेचुरल सहज जो है ना उसको ध्यान में रखा करो।
1:51:47
तो यह बातें मेरी बड़ी विचित्र लगेंगी क्योंकि अभी तक उल्टा पुल्टा सुना है आपने ना
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अब आत्मा का भयभीत होना टेस्ट है मालूम अब मैं और दूसरे एंगल में जा रहा हूं जो
1:52:04
मृत्यु का भय बोलते हो ना क्योंकि आत्मा मरना जानती ही नहीं है
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ना तो वो उसको विपरीत होना है शरीर लेके
1:52:20
वो मृत्यु का वह टेस्ट ले रही है जो मरना जानता ही नहीं है वह मरने का
1:52:27
टेस्ट ले रहा है यह टोटल आनंद है। बता रहा हूं।
1:52:34
मृत्यु और मृत्यु का भय आनंद है।
1:52:41
हां। भय भी आनंद है।
1:53:12
ये सब शरीर मन यह दुनिया सब आनंद है।
1:53:20
रस ही रस है।
1:53:26
इसमें कुछ ज्यादा समझो मत ज्यादा जानने वाने का प्रयास मत करो
1:53:34
जैसा यह सब कुछ है उसको वैसे ही स्वीकार कर लो
1:53:42
क्योंकि सब अपने आप में सुंदर है अद्भुत है हां व्यवहारिक तल पर हमेशा सही गलत का
1:53:50
ध्यान रखो वो अंतर्यामी बता देता है ये गलत ये सही ऑटोमेटिक ठीक है वो व्यवहारिक
1:53:57
तल पर तो वो है ही ना आत्मिक तल पे आप असत्य से तो ऊपर हो सत्य
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सत्य से भी परे हो आत्मा
1:54:20
व्यवहारिक तल पे किसी मुजरिम को सजा दी जाती है कि तुमने यह जुर्म में किया है।
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है ना? वह जरूरी है। समाज के लिए, नियम कायदों के लिए, व्यवहार के लिए इंपॉर्टेंट है।
1:54:40
लेकिन आत्मिक तल पे हमेशा हर किसी को
1:54:50
एक ही बात बताई जाती है कि तू बेगुनाह है।
1:54:59
तू सदा से शुद्ध है, बुद्ध है, निर्दोष है।
1:55:07
तूने खुद को बॉडी मान के जो भी सही गलत किया तू उससे परे है। इसका बोध कराना ही धर्म है।
1:55:32
आत्मिक तल पर आपको दोष देना पाप है।
1:55:39
धर्म मुक्त करता है हर दोष से। हर गलती से ऊपर उठाता है।
1:55:52
गलतियां गलतियों की है। तुम्हारी नहीं है।
1:55:57
आत्म देश में सत्य से भी परे हो आप। असत्य तो दूर की बात।
1:56:07
और आनंद यह है कि वो आप सहज में हो। वह कोई अचीवमेंट नहीं है।
1:56:16
जिंदगी भर हम यह सुने हैं कि अचीवमेंट किसी चीज का होता है वही चीज होती है। अरे
1:56:24
बगैर अचीवमेंट के भी कुछ होता है माय डियर वो तुम हो।
1:56:30
मैं हूं ओके। फाइनल फुल एंड फाइनल।
1:56:39
यस।
1:56:42
प्रेम प्रणाम
1:56:52
राम राम