0:18
हम सौरभ जी कुछ बताओ यार कैसा
0:25
है मैं का वर्ल्ड हां मैं आत्मा भगवान
0:39
जिसकी किसी से किसी और से तुलना करना ही अज्ञानता है।
0:49
मैं आत्मा भगवान जिसको किसी और से बतलाना निराकार
0:57
निरंजन अमर पद बुद्धत्व
1:03
कल्पना का परमात्मा रस आनंद जिसको किसी और से बताना भी एक मूर्खता है।
1:15
उसी को बता दो। ऐसा पूछा करो मेरे से। समझ रहे हो?
1:27
सवालों में ना क्वालिटी होनी चाहिए। खाली वो सवाल नहीं होने चाहिए। उसमें आपकी आत्मा होनी चाहिए।
1:36
तो मेरे को भी बोलने में आनंद आता है। हां। तो फिलहाल तो आप बताइए।
1:46
माइक दो भाई उनको।
1:51
माइक में बोलना है। ऐसा हां।
2:06
अरे यार हम धरती में रहे ना रहे कोई बोलने वाला हमारे बात तो होना चाहिए ना
2:12
सत्य को सत्य की तरह है कि नहीं ऐसा दुखी नहीं हो जाना हम अभी कहीं नहीं
2:20
जा रहे हैं बट एक बात बता रहे हैं ठीक है और हम कभी चले भी जाए तो नाचना क्योंकि हम गए हैं।
2:30
है ना? जो कहीं आता जाता नहीं वो कहीं चला गया है।
2:38
हां जी बताइए मैं तो बोलता ही जाऊंगा। मेरा क्या है? आप ही बोलिए भगवान।
2:50
मतलब मैं ही शक्ति हूं बोलूं ना तो भी ये खता है।
2:58
खता है। राइट अरे मैं हूं कहना खता है। यहां है लास्ट में मैं हूं कहना खता है।
3:09
और मैं हूं ना कहना भी एक खता है।
3:14
क्योंकि मैं हूं से सुंदर कोई भी ना सत्य है ना परमात्मा है ना कुछ है।
3:22
इसलिए ना कहना भी एक खता है। तो क्या खता नहीं है?
3:36
मैं हूं कहने वाला खाता नहीं है।
3:41
जो कहता है मैं हूं वो असली है।
3:51
वाणी के माध्यम से कहता है इंस्ट्रूमेंट से कहता है
3:58
बट कहने वाला खाता नहीं है।
4:06
मैं सत्य हूं। ये बोलना भी खूबसूरती है। यस।
4:14
अब इस पर चलते हैं। मैं सत्य हूं। मैं परमात्मा हूं। मैं सच्चिदानंद हूं। यह कहना भी बहुत खूबसूरती है।
4:26
है ना? अरे मैं देह हूं। यह कहना भी बहुत खूबसूरत है। मैं जीव हूं, मैं स्त्री
4:36
हूं, मैं पुरुष हूं। यह कहना भी बहुत खूबसूरत है।
4:43
और मैं देह, मन, जीव, सत्य, परमात्मा, आत्मा कभी हूं ही नहीं।
4:52
यह कहना भी बहुत खूबसूरत है।
4:58
तो मैं सब कुछ हूं और मैं सब कुछ से परे भी हूं। यह कुछ भी नहीं हूं। यह दोनों एक
5:06
साथ हूं और इतना ही नहीं हूं मैं।
5:14
जितना अभी थोड़ा सा कह दिया गया ना इतना ही नहीं हूं मैं।
5:29
हां मैं हूं बस क्या क्यों कैसा
5:46
तो किसी के पूछने पर कौन हूं जहां से मैं हूं निकलता है।
5:55
जहां से मैं हूं निकलता है।
6:06
तो कहां से मैं हूं निकलता है? लाया है।
6:20
हां, वहीं मैं रहता हूं और वहीं से मैं हूं निकलता है।
6:31
परमात्मा से भी पूछो कौन हूं? तो वह क्या कहेगा? वह भी मैं हूं कहेगा।
6:40
फिर आप कौन? तो वह बोलेंगे मैं परमात्मा हूं। आप जैसे कहते हो कि मैं मनुष्य हूं।
6:51
लेकिन मैं हूं ओरिजिनल आंसर है। जो हर देवता देगा, हर मनुष्य देगा, परमात्मा देगा।
6:59
और असली वस्तु मैं हूं ही है। आप ही हो बस।
7:09
जहां से मैं हूं निकलता है। अरे कौन हो?
7:16
मैं हूं।
7:19
जहां से जहां से मैं हूं निकलता है।
7:43
मेरे को चश्मा दो। इसका स्क्रीन एकदम वो होता है मेरे को।
7:55
थोड़ी रोशनी कम करो।
8:11
तो आप लोग एक दिन का प्रोग्राम कैसे बनाए?
8:16
तारीख के बाद ओके
8:28
हम हम नहीं अच्छा किया ट्राई किया था पहले थी
8:38
लोग आजमाते ही नहीं है हम तो किसी को मना ही नहीं करते कोई फोन करके बोलेगा कल आ
8:44
जाए तो हम ही बोलते हैं हम मना करते ही नहीं है और कोई बहुत बदमाश
8:52
है तो उसको मना भी करते हैं कई लोग बोलते हैं हमेशा रहने के लिए आ रहे हैं। उनको मना कर देते हैं।
9:37
तो बस यार
9:52
आत्मा ही आनंद है। मैं ही आनंद हूं।
9:58
और कहीं कोई आनंद नहीं है। सब बकवास है और बकवास है।
10:10
और बकवास है
10:29
सब सब फिर किस्सा कहानी है, एक भ्रम है, एक एंटरटेनमेंट है।
10:55
और आत्मा के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। जो ऐसा बार-बार कहा जाता है
11:02
कि मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
11:15
उसका कारण है कुछ है उसके अपोजिट में ही आप कहते हो कि मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
11:32
कुछ है के अपोजिट में कहते हो। जैसे दिन के अपोजिट में रात कहते हो। है ना?
11:40
प्रकाश के अपोजिट में अंधकार कहते हो। वह अपोजिट में कहा जाता है।
11:52
मैं के अतिरिक्त कुछ है या नहीं है
11:59
या कुछ हुआ या कुछ होगा या था ऐसा मैं देश में होता ही नहीं है
12:08
मैं देश में इन चीजों का पता ही नहीं होता है कि सब कुछ मैं हूं और मैं सब कुछ से
12:14
परे हूं सबका साक्षी हूं या मैं कुछ नहीं हूं। यह सब मैं देश में होता ही नहीं।
12:26
मैं आत्मा भगवान मैं देश में बस मैं ही होता हूं यार।
12:35
वो लग्जरी है।
12:39
ओशो एक जगह बोले थे कि परमात्मा लास्ट लग्जरी है। क्या है?
12:47
लास्ट लग्जरी और वह परमात्मा कौन है?
12:53
मैं हूं आपका मैं है लास्ट लग्जरी आपका स्वयं मैं
13:01
आत्मा भगवान खाली भगवान नहीं मैं आत्मा भगवान
13:15
तो मैं देश में मैं के अलावा किसी का सेंस ही नहीं रहता
13:21
कि मैं सब जगह हूं। हूं कि नहीं हूं कि मैं साक्षी हूं। मैं सर्वज्ञ हूं। मैं
13:30
सर्वत्र हूं या मैं सर्व से परे हूं। यह मैं देश में
13:37
है ही नहीं। ये बातें मैं का देश मैं का देश है। स्वदेश है।
13:55
यह सारी चीजें जो है ना यह खिलौने हैं बस और कुछ नहीं।
14:02
मैं तो खिलौनों के रूप में भी इनको स्वीकार नहीं करना चाहता। नहीं तो आप खेलने लग जाते हो और फंस जाते हो।
14:18
मैं के अतिरिक्त ना कोई गुरु है ना शिष्य है कि कोई गुरु ज्ञान देगा और शिष्य सीखेगा।
14:26
ये सब बातें मैं में नहीं है।
14:37
तो दो ही डिवाइस होती है नेति नेति कि मैं यह नहीं हूं। नहीं हूं नहीं हूं।
14:43
और येति यति कि मैं यह भी हूं, मैं यह भी हूं, मैं यह भी हूं, मैं सर्व हूं। इन दोनों से मुझे बताया ही नहीं जा सकता।
15:05
यह दोनों अधूरे हैं। ये दोनों अधूरे हैं।
15:13
जैसे वो लंगड़े के पास आंख नहीं है।
15:19
और आंख वाले के पास पैर नहीं है तो लंगड़े ने ऊपर बैठा लिया ना।
15:25
तो जब यह दोनों मिलकर चलते हैं तो थोड़ा थोड़ा सेंस आता है मैं का कि यह दोनों एक साथ
15:33
और फिर भी इनसे भी परे जो मैं हूं
16:15
तो किसी के ना पूछने पर भी मैं रहता हूं ना।
16:24
पूछने पर तो आप आंसर देते हो मैं हूं।
16:28
किसी के ना पूछने पर भी जो मैं हूं वही मैं हूं।
16:50
जब दिन में आप कई बार मैं हूं, मैं हूं थोड़ी ना करते हो कि मैं आत्मा भगवान, मैं आत्मा भगवान या मैं हूं।
16:59
उस समय कौन रहता है? आप ही रहते हो। मैं ही रहता है।
17:05
वह असली है और यह मैं हूं संज्ञा यह शब्द यह फॉल्स है।
17:15
बाकी से बेहतर है बट एक्चुअल में फॉल्स है।
17:25
तो सहज में जब आप मैं हूं भी नहीं कहते तब भी आप ही रहते हो तब भी मैं हूं ही रहता है। मैं हूं शब्द नहीं रहता।
17:34
सहज मैं हूं तो रहता ही है ना आपका होना
17:43
तो वो क्या कभी नहीं रहता है ऐसा कभी हुआ क्या जिंदगी में
17:53
तो एब्सेंट होता ही नहीं अभाव होता ही नहीं
18:18
तो सहज रहनी हां
18:26
हां दो यार इतना इतना सारा क्यों नहीं यार ऐसा मत किया करो बस एक गिलास
18:36
बहुत होता है ना पिलाओ भाई
18:54
किसी भी चीज की अधिकता नहीं होनी चाहिए एक मनुष्य के लिए एक गिलास कोई भी चीज मिसय नहीं होनी चाहिए। एकदम आप अलर्ट हो जाओ। है ना?
19:10
चाहे वो मैं ही क्यों ना हूं।
19:21
कहां थे अपन? सहज मैं हूं।
19:33
तो सहज में जो आप हो बस आप हो ना
19:42
अरे आप हो ना
19:51
बस यार उसके आगे पीछे कभी भी कुछ हुआ ही नहीं।
20:19
बाकी सब आप यह जो 80 100 साल की मूवी देख रहे हो बॉडी वाली है ना?
20:29
यह मूवी है। यह कंटिन्यू चल रही है। आकाश इसका पर्दा है।
20:34
है ना? और ये कंटिन्यू मूवी चल रही है करके आपको पता नहीं चलता।
20:42
उससे ज्यादा कुछ नहीं है। यहां कोई विलेन है, कोई हीरो है, कोई क्या है, कोई क्या है? वो सब नाटक चल रहा है।
20:51
ये आपकी रामायण है। राम कथा है समझ लो।
21:02
तो यह मूवी यह राम कथा भी मैं ही हूं।
21:12
इसमें जो भी कैरेक्टर्स हैं भीतर बाहर जो भी यह बहिर चरित्र यह भी मैं ही हूं।
21:37
तो बहिर चरित्र में घेरती है माया।
21:42
सती को घेरी, गरुड़ को घेरी, ब्रह्मा जी को घेरी।
21:48
देख राम का बहिर चरित्र कि वह रो रहे हैं पत्नी के लिए
21:55
सती को माया घेर दी कि काहे के भगवान काहे के ब्रह्म
22:05
और आप महादेव राम नाम का जप करते हो
22:13
गरुड़ ने देखा बहिर चरित्र कि इनके के सर्प बंधन को तो मैं ही खोल रहा हूं।
22:20
फिर काहे के भगवान खुद ही खोल लेते होते तो
22:35
हमारे अंदर एक गलत चीज डाली गई है कि भगवान सर्वशक्तिमान ही होता है।
22:46
ही यह बहुत मार्मिक पॉइंट है।
22:55
बाकी ये सब शक्ति हीन है। पूरा चराचर वो भगवान नहीं हो सकता। यह गलत है।
23:07
कोई भी बड़ी से बड़ी शक्ति हो मैं के बगैर हो सकती है क्या?
23:19
उसके स्वयं के बगैर नहीं हो सकती। शक्ति का आधार भी आपका मैं
23:38
तो परमात्मा की शक्ति कहीं एकदम न्यून है चींटी में मनुष्य में उससे ज्यादा है।
23:45
चीटियों के लिए मनुष्य देवता है। है ना? और आपसे अधिक शक्ति देवताओं के पास है।
23:54
आपका देवता कोई और है। देवताओं का देवता कोई और है। महादेव है। देवों के देव महादेव और सर्वशक्तिमान।
24:05
लेकिन परमात्मा सब में एक समान है।
24:13
मैं सब में एक समान हूं।
24:17
अब मैं इस बॉडी में देखो जैसा हूं वैसा ही उस बॉडी में भी हूं ना।
24:24
चेक करो।
24:27
अपनी बॉडी को चेक करो और फिर दूसरे की बॉडी को चेक करो।
24:33
सब में मैं एक समान हूं ना यार। इधर ज्यादा, इधर कम, इधर ज्यादा, उधर कम।
24:41
ऐसा है क्या? एकदम एक समान।
25:02
भीतर में भीतर के समान हूं। बाहर में बाहर के समान हूं।
25:08
यहां भी एक समान हूं।
26:31
एक
26:41
फिर भी जब मैं के अलावा कुछ नहीं है। इवन
26:51
मैं के अलावा बात करना भी एक खता है जहां फिर भी मैं
27:01
हर किसी को महसूस क्यों नहीं होता?
27:06
इस तरह से हर किसी को अपना मैं बॉडी ही क्यों लगता है?
27:18
माइंड ही क्यों लगता है?
27:26
इसका क्या कारण है?
27:33
इसका मूल कारण है फोकस।
27:39
आपका फोकस आपकी बॉडी माइंड में ही ज्यादा है। जैसे टॉर्च की रोशनी होती ना
27:49
तो आपने फोकस कर लिया है बस इस पे।
27:58
और सूर्य का प्रकाश कैसा होता है? सर्वत्र।
28:05
उसमें आपका ध्यान नहीं है। ध्यान केवल बॉडी में है।
28:13
पूरा फोकस बॉडी को जिलाना है। बॉडी को बचाना है। यह मरे मरेगी। यह मरी छु हुई
28:20
है। याद रखना इसी का सिक्योरिटी करना। इसी का नाम करना।
28:27
आप नाम भी बॉडी का चाहते हो। व्यक्तित्व का नाम।
28:37
यानी इतना ज्यादा फोकस है।
29:05
तो फोकस हटाओ।
29:09
सूर्य का प्रकाश जो सर्वत्र फैलता है। ऐसा अपना फोकस रखो। सर्वत्र
29:34
सर्वत्र फोकस मींस सजग नहीं होना है आपको सर्व के प्रति।
29:42
हम अभी तक केवल सजगता ही सीखे हैं। है ना?
29:49
मैं सजगता की बात नहीं कर रहा हूं।
29:54
मैं अवेयरनेस की होश की भी बात नहीं कर रहा हूं।
30:02
सर्वत्र बोलते ही आपका फोकस सहज में सर्वत्र हो गया।
30:12
सर्वत्र का सेंस
30:19
मैं सर्वत्र हो गया ना उसी क्षण उसी क्षण
30:27
सर्वत्र होके ही आप कहते हो सर्वत्र इस चीज को कोई नहीं जानता
30:37
ब्रह्मांड होके ही आप कहे ब्रह्मांड पहले ब्रह्मांड हो गए
30:46
फिर कहे ब्रह्मांड अस्तित्व अज्ञात अनंत
30:59
वरना आपने कहा कैसे ब्रह्मांड बॉडी के नजर से ब्रह्मांड बड़ा है बॉडी
31:08
छोटी होती है। मैं बॉडी की नजर की बात नहीं कर रहा हूं। देह दृष्टि की बात नहीं कर रहा हूं।
31:17
आत्मा की दृष्टि सृष्टि कहते ही स्रष्टा सृष्टि हो जाता
31:27
है। उसी क्षण पहले सृष्टि हो जाता है। बाद में कहता है सृष्टि।
31:39
यह बहुत बड़ा रहस्य है।
31:43
आपको लगता है आप नहीं हुए सृष्टि ना आप होके ही कहे सृष्टि।
31:54
आप होके ही कहे अनंत। अब देखो मैं जो बोलूंगा आप वही होगे।
32:01
बॉडी माइंड अज्ञात
32:08
कुछ पता चल ही नहीं रहा है। अज्ञात
32:18
बिल्कुल अननोन लापता है।
32:39
अब लापता अज्ञात का अनुभव
32:46
अज्ञात होकर किए कि अज्ञात से एक होकर किए
32:56
कि अलग होकर किए अज्ञात का अनुभव अस्तित्व ले लो है ना यह अस्तित्व
33:05
अस्तित्व का अनुभव अस्तित्व से अलग होकर किए
33:16
क्योंकि अलग होकर तो अनुभव कर ही नहीं सकते
33:24
कि अस्तित्व से एक होकर किए
33:31
एक में अनुभव होता नहीं अनुभव दो में होता है।
33:41
अस्तित्व का अनुभव कैसे किए
33:50
वो शुरू में ठीक है अस्तित्व हो गए आप सृष्टि हो गए आप अनंत हो गए आप तभी कहते
33:57
हो अनंत तो अनंत का अस्तित्व का अनुभव अस्तित्व से अलग होकर नहीं किया जा सकता।
34:08
अस्तित्व से एक हो गए तो भी नहीं किया जा सकता।
34:16
तो कैसे करते हो अस्तित्व का अनुभव? मैं होकर ही करते हो।
34:25
जो आप हो वही होकर करते हो। इसलिए यह सब खताएं हैं।
34:38
रहता मैं ही हूं ना।
34:48
जैसे इस बॉडी में मैं रहता हूं। इस बॉडी में इसको सिर बोलता हूं। इसको हाथ बोलता हूं। इसको पैर बोलता हूं।
34:57
बस ऐसा ही है ना इस बॉडी में मैं ही रहता हूं। इसको आकाश बोलता हूं। धरती बोलता हूं। अनंत बोलता हूं।
35:06
अपने आप को ही कह रहे हो आप।
35:18
दिखाओ उसको।
35:30
लकड़ी का अनुभव
35:40
डंडे का अनुभव तो होता नहीं। होता किसका अनुभव है?
35:48
लकड़ी का अनुभव। है ना? ठीक है।
35:53
तो डंडा लकड़ी से अलग है तो अनुभव हो सकता है क्या? अलग होकर तो
36:01
होता ही नहीं। और यह दोनों एक ही है तो भी अनुभव नहीं होता।
36:07
लकड़ी होकर ही है ना। मैं होकर ही है ना।
36:20
और अंतत डंडा कहीं है ही नहीं।
36:24
ऐसे ये जो भी नाम रूप अपन कहते हैं वह कहीं है ही नहीं।
36:32
तो यह कहीं है ही नहीं कि आत्मा भी तो मैं ही हूं।
36:43
अपना आप है।
36:48
तो अलग होकर अनुभव नहीं होता। एक होकर अनुभव नहीं होता।
36:57
अरे भाई इसको बॉडी से ले लो। जैसे बॉडी से अलग होकर बॉडी का अनुभव कर सकता है क्या कोई भी?
37:07
बताओ।
37:09
नहीं कर सकता। बॉडी से एक होके अनुभव कर सकता है क्या?
37:16
वह भी नहीं कर सकता। तो मैं होकर ही आप अनुभव कर रहे हो ना।
37:24
बोल बस गलत रहे हो कि ये बॉडी है। है मैं ही।
37:31
हां। मैं आत्मा में अमर हूं। बॉडी में पैदा होने मरने वाला हूं।
37:39
हूं मैं ही। मैं आत्मा में शांत हूं। मन में चंचल हूं।
37:48
हूं मैं ही। हूं मैं ही।
37:59
मैं के अतिरिक्त किसी और की सत्ता नहीं हो सकती।
38:12
तो यह वैरायटीज है मेरी है ना कि आत्मा में शांति की तरह मन में
38:19
चंचलता की तरह देह में जन्म मृत्यु की तरह आत्मा में
38:29
अमरता की तरह
39:48
मन में कंफ्यूजन की तरह आत्मा में समाधान की तरह हूं तो मैं ही
40:26
आत्मा में अनचेंजबल और सर्वत्र चेंजबल बट चेंजबल भी मैं हूं।
40:38
यह जो दूसरा चैप्टर है अनचेंजेजबल तो मैं हूं।
40:44
चेंजबल भी मैं हूं। यह जादू है।
40:52
जैसे लकड़ी इसमें लकड़ी की तरह है।
40:58
लेकिन लकड़ी ही चेंजबल है ना। यहां डंडा है, वहां दरवाजा है, वहां खिड़की है, वहां फर्नीचर है कोई।
41:06
लकड़ी ही चेंजबल है ना। बस ऐसे ही मैं ही चेंजबल हूं। बस
41:14
आप सोचते हो यह चेंजबल ये जो बिखर रहा है, बन रहा है यह माया है या कोई गलत चीज है।
41:22
नहीं भैया तुम ही हो।
41:26
चेंजबल भी और अनचेंजेजबल भी।
41:33
दुनिया भी परमात्मा भी।
41:55
यह रॉन्ग नहीं है। चेंजबल क्योंकि मैं किसी भी जगह को खाली नहीं छोडूंगा। अखंड हूं ना।
42:05
तो चेंजबल को भी कैसे छोडूंगा?
42:14
तो चेंजबल में मैं माया की तरह हूं और अनचेंजेजबल में मैं भगवान की तरह हूं।
42:22
हूं मैं ही।
42:33
अनचेंजबल ही चेंजबल होता है।
42:40
हमेशा ही कभी-कभी होता है।
42:44
आप बनते हो कभी-कभी होते हो हमेशा। वो पुराना चैप्टर है।
42:51
यह जो कभी-कभी कौन हुआ? बॉडी कौन हुआ?
42:56
हमेशा आत्मा ही बॉडी हुई ना कभी-कभी
43:06
और कौन हुआ बॉडी बताओ कोई भूत प्रेत आकर बॉडी बन गया है क्या
43:17
हमेशा आत्मा ही बनी कभी-कभी बॉडी
43:24
जो वस्त्र पहना आपने बॉडी को धारण किया वस्त्र से बड़ी चीज है बॉडी जो आपने धारण किया हां
43:33
और धारण कैसे किया बॉडी से ना अलग होके ना एक होके
43:40
मैं होके ही मैं होके ही आपने धारण किया अंतत फाइनल तो
43:52
मैं ही आएगा तो मैं अगर चंचल ना हो सकूं।
44:08
ठीक है?
44:12
तो मैं कैसे कह सकता हूं कि मैं ही अल्टीमेट हूं। परमात्मा हूं। वह तो मेरे में कमी हो गई कि भाई मैं शांत ही हो सकता हूं।
44:24
चंचल नहीं हो सकता।
44:29
बताओ ये तो कमी है ना।
44:36
अरे मैं चंचल भी हो सकता हूं। मैं शांत भी हो सकता हूं। क्योंकि मैं ही होता हूं ना।
44:43
शांति और चंचलता कहीं नहीं है। यह जो मेरी लीला है शांति की चंचलता की
44:51
हमेशा की कभी-कभी की यह अद्भुत है ना।
44:59
अब लीला का क्या नियम है?
45:03
लीला में हमेशा वाले को पता नहीं चलना चाहिए कि वह हमेशा है और कभी-कभी वाले को पता नहीं चलना चाहिए
45:12
वो कभी-कभी है। इसलिए किसी को पता नहीं चलता वो क्या है।
45:23
ज्यादा कभी-कभी में जीता है तो हमेशा आ जाता है। हमेशा में जीता है तो कभी-कभी आ जाता है।
45:32
यह लीला का हिस्सा है।
45:38
अरे भाई जैसे इस दीवार के पीछे आपको पता चल जाए कृष्ण छिपे हैं।
45:45
पल्लूका छिपी का खेल चल रहा है। अगर पता चल गया तो वो खेल कैसा रहा? कैसे खेल हुआ वो?
46:00
तो पता नहीं चल रहा है वो ज्यादा सही है ना
46:08
तो किसी को भी पता चल रहा है क्या नहीं चल रहा है तो सही है ना
46:16
इसीलिए तो मैं पता ना चलना भी मैं ही हो जाता हूं कि मुझे मेरा भी पता ना चले
46:25
और पता चलना भी मैं ही हूं। जैसे अभी थोड़ा सा पता चला
46:33
और अगर मैं पता ना चलना ना हो सकूं तो मेरे में कमी हो जाएगी।
46:46
मैं कभी किसी को पता चलता ही नहीं। और मैं ही पता चल रहा हूं सबको।
46:55
दोनों बातें हैं ना देखो मैं में आपको मैं के अतिरिक्त और क्या पता है बताओ सब पता तो डुप्लीकेट है ना जैसे इसको बॉडी बोलते
47:04
हो इसको लकड़ी बोलते हो इसको आकाश बोलते हो तो काम चलाऊ नाम है
47:10
मैं क्या काम चलाऊ नाम है क्या मैं के अतिरिक्त आपको पता क्या है
47:20
कुछ भी पता नहीं है
47:42
तो मैं ही परिवर्तित होता हूं।
47:47
मैं ही परिवर्तन हूं और अपरिवर्तन भी मैं
47:54
हर तरह का कंफ्यूजन जो आपको होता है यह समझ नहीं आ रहा है वह नहीं हो रहा है यह क्यों समझ नहीं आ रहा है वह भी मैं हूं
48:01
इसलिए नहीं आ रहा है ये बात बहुत पते की है
48:10
वह भी मैं हूं करके नहीं आ रहा है और कभी लगता है सब क्लियर हो गया सब समझ आ
48:18
गया ग्रहण हो गया जो भी है वह भी मैं हूं
48:39
पानी देना
48:48
तो देह में देह की तरह मैं हूं। इसको नहीं भूलना। आप क्या सोचते हो? मैं देह में देह की तरह हूं तो आपका भार देह में चले जाता
48:57
है। मैं को आपने छोड़ दिया। देह में देह की तरह क्या?
49:07
बोलो ना। मैं हूं।
49:10
मन में मन की तरह मैं हूं। शांति में शांति की तरह। आत्मा में आत्मा की तरह
49:20
सर्व में सर्व की तरह मैं हूं। कोई और नहीं है।
49:26
असर्व में असर्व की तरह
49:37
आकाश में आकाश की तरह धरती में धरती की तरह मैं हूं। मैं हूं। इंपॉर्टेंट है।
49:53
मैं पहले बोलता था कि मैं आकाश में आकाश की तरह हूं तो सबका भार आकाश में चले जाता था। इसलिए मैं मैं हूं को लास्ट में डाल
50:02
दिया। अभी आकाश में आकाश की तरह मैं हूं।
50:07
बाहर तो मैं हूं पे देना ना भैया। नहीं तो आकाश में लटक जाओगे। आ रहा मैं आकाश हूं। आकाश हूं, विराट हूं। अरे मैं हूं।
50:17
इंपॉर्टेंट है ना?
50:20
परमात्मा में परमात्मा की तरह, जीव में जीव की तरह, माया में माया की तरह मैं हूं।
50:29
हां जी। बहुत मुश्किल है ये सब बोलना।
50:50
भटकने में भटकने की तरह पहुंचने में पहुंचने की तरह सिर्फ मैं
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तो अभी आपको जो भी फील हो रहा है अच्छा बुरा बहुत अच्छा बहुत बुरा वो फील की तरह
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मैं हूं उसको नहीं भूलना
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तो तो ये तरह लगाने से मैच हो जाता है।
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जैसे आकाश में आकाश की तरह अब आकाश आपसे मैच हो गया। फिर मैं हूं बोल के उसको मार दो आकाश को।
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क्या? हां। क्योंकि इंपॉर्टेंट आप हो ना?
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अनंत में अनंत की तरह। अस्तित्व में अस्तित्व की तरह।
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मैं हूं। यस। मैं का डंडा मारते ही वह गायब हो जाता है।
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ओके जी इनफ फॉर
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कभी गौर किए हो कि खालीपन का अनुभव क्या खालीपन कर सकता है?
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मैं ही है बस मैं ही कर सकता। पूर्णता का अनुभव भी
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मैं तो बस आज वाणी को विश्राम देते हैं। थोड़ी
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थकान है तो फिर करेंगे सत्संग। है ना?
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सभी को प्रेम प्रणाम।