0:18
प्रेम प्रणाम स्वामी जी जैसे आप कहते हैं कि मैं नहीं जानता
0:24
इसको भी जो जानता है वही आप हो हम वहां वहां तक दृष्टि क्यों नहीं जाती?
0:31
मतलब समझ आती है आपकी सारी बातें। 100% एक्सेप्टेंस भी है।
0:39
फिर कभी लगता है कि जैसे पहचान नहीं है तो आप ये भी कहते हो कि जो ये जानता है पहचान नहीं है।
0:47
वही आप हो। तो थोड़ा सा इसको क्लियर करिए। स्वामी जी।
0:54
वहां दृष्टि इसलिए नहीं जाती कि वह स्वयं दृष्टि है। अपनी आंख से आंख को कैसे देखोगे?
1:03
हां आप कुछ भी पहचान लो पहचान करने वाला तो अलग ही हो जाएगा ना।
1:11
हां। तो जो चीज आप पहले से हो आप पहचाने हुए ही हो उसको पहचाना नहीं जाता।
1:21
आपको अपने आप को पहचानना है ही नहीं। असल में यह बात है।
1:27
आप अपने आप को पहचानते ही हो।
1:32
जैसे इसको पहचानते हो। क्या बोलते हो इसको?
1:36
इसको लकड़ी बोलते हैं ना अपन। पहचान के बोले ना?
1:42
और इधर आओ। खुद को क्या बोलते हो? मैं बोलते हो ना?
1:48
खुद को मैं बोलते हो ना या इसको देह बोलते हो पहचान के बोले ना देह इसको लकड़ी बोले पहचान के ऐसे ही खुद को
1:58
पहचान के ही तो आप मैं बोले इतना सरल है
2:07
तो मन सेटिस्फाई क्यों नहीं होता फिर मन सेटिस्फाई इसलिए नहीं होता क्योंकि आप कुछ और
2:15
चीज जानना चाहते हो मैं को मैं नहीं जानना चाहते। आप चाहते हो कि मैं कुछ और निकले।
2:25
कोई परमात्मा निकले, कोई आत्मा निकले, कोई एक्साइटमेंट हो उसमें।
2:32
इसलिए मन सेटिसफाई नहीं होता और आपको मन को सेटिस्फाई नहीं करना है।
2:38
यह भी एक रॉन्ग ख्याल है।
2:43
तो जैसे आप इसको लकड़ी बोलते हो पहचान के इसको आकाश बोलते हो, इसको धरती बोलते हो,
2:50
इसको देह बोलते हो। ऐसे ही खुद को मैं बोलते हो पहचान के।
2:59
बगैर पहचाने खुद को मैं कैसे कह सकते हो?
3:07
तो हर कोई खुद को पहचानता है।
3:12
बस यही नहीं पहचानता कि वह खुद को पहचानता है। और ये बातें ऐसे
3:19
गोलगोल घुमाने जैसी नहीं है। आप पहचानते ही हो खुद को।
3:26
स्वयं की पहचान या स्वयं को जानना। आप स्वयं कह रहे हो। जान के ही तो स्वयं कह रहे हो।
3:34
अब आप जो चाहते हो ना कि स्वयं में कुछ और हो जाए वह मन है।
3:44
स्वयं में स्वयं ही रहेगा। वहां कुछ और होगा ही नहीं। यही आत्मा है। स्वयं है।
3:55
हां। जैसे हम लकड़ी में चाहे कि यह डंडा हो जाए, यह खिड़की हो जाए, दरवाजा हो जाए
4:02
तो यह रॉन्ग है ना। यह हो भी जाएगा तब भी यह लकड़ी ही रहेगी।
4:09
बन भी जाएगा।
4:13
तो जैसे ही आप कहते हो मैं, अरे पहचान के बोले मैं।
4:24
पहले इसी बात को शोर करो
4:31
और आप बोले जानने वाला जानने वाला इसको पहचानने वाला अब जानने वाले को कैसे जाने?
4:42
अरे मैं जानने वाला हूं।
4:46
यही तो आप जान रहे हो ना कि मैं जानने वाला हूं।
4:50
यही जानने वाले को जानना है कि मैं जानने वाला हूं।
4:56
वहां ऐसे पीछे जाते थोड़ी ना जाना है कि इसको भी मैं जानने वाला हूं। इसको भी मैं जानने वाला हूं। वह मन है।
5:03
जो आगे पीछे जाता है ना वो मन है। वो ट्रैप है। वो लोग साधनाएं कराते हैं। हां।
5:10
यह जान लिए। अब इसको कौन जानने वाला है?
5:13
अच्छा यह भी जान लिए इसको कौन जानने वाला है? इसके परे चले गए। इसको कौन जानने वाला है? अरे यार मैं जानने वाला हूं।
5:24
यही जानना है बस।
5:27
जानने वाले को क्या जानना है कि मैं जानने वाला हूं। नेचुरल में मैं जानने वाला हूं।
5:39
हां। और आप जानने वाले हो। सहज है। अपनी सहजता को स्वीकार करो।
5:49
अब आप क्या चाहते हो कि मैं जानने वाले को जानू?
5:55
अरे आप जानने वाले को जानते ही हो कि मैं जानने वाला हूं।
6:01
जब जानू ऐसा सवाल आ जाता है या ऐसा आपको जानना है तो वह मन आ जाता है।
6:12
हां आप अपनी सहजता को स्वीकार करो।
6:18
हां मतलब इसी बात को मैं आपको 20 साल साधना कराऊं 50 साल जैसे जैन मास्टर्स
6:26
कराते थे और लास्ट में बोलूं 50 साल के बाद
6:32
कि यह क्या है लकड़ी ये क्या है बॉडी इसको जान के आप लकड़ी बोले इसको जान के
6:40
बॉडी बोले खुद को जान के आप मैं बोले तब आपको यकीन जल्दी हो जाएगा
6:49
आपको लगेगा कि मैं बहुत कुछ की उसके बाद
6:55
तो क्यों अननेसेसरी समय को वेस्ट करना और कई साधनाएं आप कर चुके हो कई जन्म में
7:03
इस जन्म में 50 साल के बाद वो मैं कुछ और थोड़ी ना हो
7:12
जाता है। साधना करने के बाद वाला मैं अलग थोड़ी ना हो जाता है।
7:19
या जानने वाला अलग थोड़ी ना हो जाता है।
7:25
यही ज्ञान की महिमा है कि आप ज्ञान स्वरूप हो।
7:32
आप खुद ज्ञान हो। इसका ज्ञान होना चाहिए कि आप खुद ज्ञान हो।
7:40
किसी और का ज्ञान जो आपको चाहिए वह बुद्धि का ज्ञान है।
7:47
और आप स्वयं ज्ञान हो। तभी तो कहते हो मैं स्वयं बगैर ज्ञान हुए आप खुद को मैं कैसे कहोगे? स्वयं कैसे कहोगे?
8:01
विदाउट ज्ञान आप कह ही नहीं सकते।
8:06
तो जो सहज सरल है ना तो अपनी सहजता को स्वीकार करो
8:13
कि ये इतना ही आसान है आसान से आसान है
8:25
बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत अभी रुको अभी आपका काम नहीं हुआ है अभी आप शॉर्टकट मार रहे हो। हां।
8:39
अभी सुनो आप। हमको सारे सिग्नल आ जाते हैं।
8:53
तो हम क्या है ना? हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते।
9:02
समझ रहे हो? हम हां उनको म्यूट करो थोड़ा।
9:09
हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते। बस यही ट्रैप है।
9:17
क्या? हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते।
9:27
स्वयं में कुछ और चाहते हैं। कोई पावर, कोई एनर्जी, कोई चेतना, कोई परमात्मा,
9:35
कोई बुद्धत्व, कोई ज्ञान, कोई भक्ति।
9:41
और हम क्या बोला था अभी मैं पॉइंट? स्वयं को
9:47
यस। हम स्वयं को स्वयं नहीं पहचानना चाहते। बस इतनी सी बात है
10:00
चैप्टर क्लोज
10:10
मैं को मैं मैं को मैं नहीं जानना चाहते है ना
10:17
और अब मैं ही हूं ना तो भैया मैं हूं होना नहीं है आप मैं हो
10:24
ही इवन यह होना हो से भी परे हो आप
10:32
अब हम क्या करते हैं कल्पना का भगवान गया अब मैं आत्मा भगवान अब आपका लक्ष्य अरे
10:40
लक्ष्य आप खुद हो मंजिल आप खुद हो
10:51
अरे मेरे भाई भाई मछली की आंख ही दिख रही है। उस पर तीर चलाना है। यह आपका लक्ष्य है।
11:00
ठीक है? अब लक्ष्य अगर अर्जुन खुद है तो किस पर तीर चलाएगा?
11:11
बस ऐसे लक्ष्य आप खुद हो।
11:14
उसमें कोई अचीव नहीं करना है। कोई तीर नहीं चलाना है।
11:23
मंजिल आप खुद ही हो
11:28
और मंजिल, लक्ष्य, परमात्मा, अस्तित्व
11:35
इन चीजों से खुद को टेली मत करो। मैं को मैं से ही टेली होता है।
11:42
मैं को मैं जान उसको कुछ भी मत मान।
11:52
तो आप मैं को मैं जानते ही हो। जैसे ही कहते हो मैं कौन हो भैया?
12:00
नौक हुआ कौन हूं? अरे मैं हूं।
12:04
अगर आप खुद को नहीं जानते होते तो आपका यह जवाब कैसे निकलता कि मैं हूं?
12:17
आप अच्छे से खुद को जानते हो। तभी कहते हो मैं।
12:23
अब मैं को कहते हो कि मैं देह हूं, मैं यह हूं, मैं वो हूं तो वो आप अब आप ही बन गए माया।
12:33
अच्छा अब कोई और आकर माया नहीं बना। अब मैं आत्मा भगवान ही अब माया बन गया।
12:42
मैं मन मैं देह मन बन गया।
12:50
अपने को आपने कुछ भी कहा तो आप माया बन गए। आप ही माया बने। लकड़ी ही डंडा बनी और कोई चीज डंडा नहीं बना।
13:06
अब मैं देह हूं। मैं डंडा हूं।
13:11
अब डंडा जो फॉल्स है वह खोजेगा लकड़ी को तो मिलन कभी भी संभव नहीं है।
13:23
डंडे देश में लकड़ी का मिलन कभी भी संभव नहीं है।
13:32
देह देश में मैं आत्मा भगवान का मिलन कभी भी संभव नहीं है।
13:41
और लकड़ी देश में मिलना नहीं है। मिलना भी नहीं है।
13:49
हां मिला ही हुआ। बोलना भी एक रॉन्ग हो गया ना क्योंकि लकड़ी तो लकड़ी है। मिलना बिछड़ने की बात ही नहीं है।
13:58
मैं देश में मिलने जैसी चीज ही नहीं है। पाने जानने
14:05
जैसी चीज ही नहीं है। सहज स्वाभाविक सरल एकदम
14:17
फिर भी खुद को जो आप कहते हो मैं देह हूं।
14:22
मैं बुद्धि हूं या जो भी खुद को मानते हो उसमें आप ही माया बन जाते हो। कोई और चीज माया नहीं बनती।
14:33
हम क्या सोचते हैं? कोई और चीज जीव बन गया, माया बन गई, मन बन गया। नो भगवान ही माया बने।
14:45
माया पति ही माया बन जाता है।
14:52
तो जब मैं ही माया बना, बनना यानी माया।
14:56
होना यानी आत्मा, मैं तो होना ही
15:05
बनना हुआ ना बगैर हुए बनना तो हो ही नहीं सकता।
15:20
भगवान ही माया बनते हैं भाई। और कोई माया नहीं बनता कोई दूसरा आके।
15:27
इस चीज को बार-बार विचार किया करो, बार-बार मंथन किया करो तो अचानक खुल जाएगा यह।
15:34
वह सेंस कि मैं ही मैं आत्मा भगवान ही बना हूं।
15:41
माया मन हम क्या सोचते हैं? माया कोई और है और फिर
15:49
उससे बचना है। उससे परे जाना है। मुक्त होना है। अपने आप से कैसे मुक्त होगे?
15:58
आप ही बने हो माया। कोई और नहीं बना है।
16:03
खुद को बॉडी माने। अब इच्छाएं कामनाएं सब शुरू।
16:09
तो आपकी मान्यता के कारण आप ही बने ना। कामना भी आप बने, इच्छा भी आप बने।
16:22
यह सारा बनना होने से ही है। मैं से ही है।
16:34
तो बनते हो कभी-कभी होते हो हमेशा
16:42
तो जो है हमेशा वही बनता है कभी-कभी
16:49
हमेशा ही बनता है कभी कभी
17:08
तो भैया मैं माया क्यों बना? आप ऐसे पूछोगे। अरे मैं ही माया बना तो दिक्कत क्या है?
17:17
कोई और थोड़ी ना माया है। लकड़ी ही डंडा बना ना तो दिक्कत क्या है?
17:28
मैं ही देह बना मन बुद्धि बना तो दिक्कत क्या है?
17:37
कोई और चीज होती ना यह देह, मन बुद्धि या माया तो दिक्कत होती।
17:46
जब मैं ही बना हूं यह सब तो काहे की दिक्कत तब तो आनंद है सब चीजों
17:55
का क्योंकि मैं ही बना हूं सब कुछ एक ही अनेक हुआ है ना भाई
18:05
एक ही अनेक हुआ है तो यह पूरा चराचर मेरा आनंद है ना मैं का आनंद है नए-नए नाम और
18:14
रूपों अनंत नाम रूपों में मैं ही प्रस्फुटित हो रहा हूं।
18:23
जीव भी मैं बना हूं। देह भी मैं बना हूं।
18:30
तो मैं बना हूं। मैं को आप छोड़ देते हो। अन बना ही बना है।
18:37
मैं क्या है? अनब बना।
18:43
ठीक है। अब मैं आत्मा भगवान है। अन बना।
18:50
अब अनब बना ही बना है तो क्या बना है?
18:58
अरे अनब बना। अनब बनाना। अनब बनाना का अर्थ क्या होता है? जो बन ही नहीं सकता कुछ।
19:08
है ना? अब अन बना ही बना है यानी वह लीला है ना
19:15
तो आनंद है ना ये पूरा जगत आनंद है आत्मा भगवान का मैं
19:24
का ये कोई ट्रैप में आप नहीं फंस गए हो कि कोई आएगा कभी इतना साधना करोगे वह होगा यह
19:32
होगा फिर कल्याण होगा फिर कभी आप स्वयं को जानोगे वह सब बकवास
19:41
ये पूरा आनंद है आपका टोटल आनंद है ये
19:52
अन्न बना ही बना है तो क्या बना है
19:58
बनते हुए भी कुछ भी नहीं बना है
20:03
बनते हुए भी कुछ भी नहीं बना है क्योंकि अनब बनाना ही बना है।
20:38
मतलब आनंद ही दुख बन जाए तो आप दुखी होगे क्या?
20:46
आनंद ही दुख बनता है यार। ये जबरदस्त खेल है। हां।
20:58
आत्मा ही देह बनता है। जस्ट विपरीत।
21:02
क्योंकि अखंड है ना परमात्मा ही माया बनता है। जस्ट विपरीत
21:08
अनबना ही बना बनता है। जस्ट विपरीत तो एकदम विपरीत आ जाता है ना तो आपको लगता है कि कोई और चीज आ गई।
21:20
जैसे दिन के विपरीत रात आ गई। रात के विपरीत दिन आ गया। तो आपको यहां पे भी ऐसा
21:26
लगता है कि यार ये दुनिया माया कहां से आ गई?
21:31
एकदम से विपरीत आप ही विपरीत हो जाते हो और फिर विपरीत
21:39
परिस्थिति बन जाते हो और फिर रोते भी हो मेरे जिंदगी में बहुत विपरीत परिस्थितियां
21:54
अरे भाई आपका विपरीत आप ही तो बन सकते हो ना यार और कौन बनेगा
22:02
हां आपका विपरीत और कौन बनेगा? आप ही बन सकते हो ना?
22:26
विकल्पक विकल्प बन जाता है। यह आनंद है।
22:30
यह कोई ट्रैप नहीं है। कोई दुख नहीं है कि आप कहीं फंस गए हो। हां।
22:37
अरे गुरु शिष्य बन जाता है। हां।
22:46
यह जो आप लोग को शिष्य का भाव आता है आप सदा से गुरु हो और शिष्य बने हुए हो। यह आनंद है आपका कोई यह अज्ञानता थोड़ी ना है।
23:09
इससे पहले आप मेरे साइड से खेल रहे थे।
23:12
मैं आपके साइड से खेल रहा था। अब खेल थोड़ा सा उल्टा है। आनंद ले रहे हैं।
23:19
और क्या है? हां।
23:35
तो अन बना ही बना है।
23:41
अन बना ही बना है इसलिए कुछ भी नहीं बना है।
23:58
ज्ञान ही अज्ञान है। इसलिए कोई अज्ञान नहीं है।
24:04
क्योंकि अज्ञान का भी ज्ञान है ना। ज्ञान का अज्ञान होता है क्या?
24:13
लेकिन अज्ञान का ज्ञान होता है ना? यानी अज्ञान भी ज्ञान है ना?
24:22
कॉमन सेंस अज्ञान की आत्मा भी ज्ञान है।
24:28
तो कहां अज्ञान है?
24:33
कितना सरल है यार। लेकिन हम कभी भी अपनी सरलता को स्वीकार नहीं करते।
24:40
अपनी सहजता को हमको वह हठ योग और 25-50 साल कोई कराए और
24:49
एक लाइन बोले तब यकीन होगा तब भी नहीं होगा यकीन आपको क्योंकि आपको बीमारी पड़ जाएगी
24:56
साधना करने की ध्यान करने की और आपको लगेगा साधना से ही कुछ होगा क्योंकि साधना क्या करती है फ्यूचर में ले
25:05
जाती है 50 साल बाद भी वो वो फ्यूचर में ही ले जाएगी। माय डियर
25:13
असत्य समय ही खत्म कर देता है। अभी अभी से पहले
25:19
जो मैं हूं उसको कहीं ले जाना नहीं पड़ता। जहां जाना है वहीं बैठा हूं।
25:30
अरे वहीं बैठा हूं। जो होना है वह हूं।
25:50
तो मैं ही माया बना हूं तो अब मैं माया से भयभीत होऊंगा क्या? रस्सी ही सांप बनी है ना। तो अब सांप से भय है क्या?
26:02
मैं ही माया बना हूं तो अब माया से भय है क्या? मैं यानी आत्मा भगवान ही माया बना हूं।
26:13
तो भय होगा कैसे?
26:16
माया से भय तभी लगेगा आपको जब आपको यह लगे कि कोई और चीज है माया।
26:25
कोई अदर है, कोई अटैक कर रहा है।
26:37
मतलब आप नहीं समझे लकड़ी को डंडे से भय
26:44
डंडा लकड़ी की माया है ना लकड़ी ही डंडा बना है।
26:51
लकड़ी को अगर डंडे से भय लग रहा है तो आप क्या बोलोगे लकड़ी को?
27:04
सेंस ही नहीं बनता ना क्योंकि लकड़ी ही डंडा बना है तो भय कैसा
27:12
डंडा लकड़ी की माया है तो अब यह सुंदरता है डंडा सुंदरता है अब भय नहीं है सुंदरता
27:21
है तो यह देह मन बुद्धि और ये पूरा संसार
27:28
मेरी माया माया है। मैं की माया है। मैं ही हूं। तो अब यह सब सुंदर है ना।
27:41
मैं ही हूं। इन द सेंस डंडा लकड़ी ही है। माया मैं ही हूं। इसलिए सुंदर है।
27:50
माया कोई और है तो खतरनाक है। फिर आप रगड़ दिए जाओगे।
27:57
कहीं के नहीं बचोगे क्योंकि माया कोई और है बोल के आपने भगवान और माया को अलग कर दिया।
28:06
कभी भी पत्नी और पत्नी को अलग नहीं करना।
28:09
माया पति और माया को आप अलग करने का प्रयास बस किए कर तो सकते नहीं।
28:16
उस प्रयास मात्र से आप रगड़ दिए जाओगे बुरी तरह से।
28:28
तो अलग मत करो भैया।
28:46
कल आशीष आया था। हम लोग सत्संग कर रहे तो आशीष एक बहुत अच्छी बात बोला कि
28:52
प्रभु कि ये मिलने इतना सुनने के बाद भी कुछ मिल जाए या कुछ हो जाए की चाह क्यों
28:59
नहीं जाती तो आशीष बोला वो
29:05
अलग मान रहा है अभी भी परमात्मा को या जो भी उसको पाना है बुद्धत्व उसको इसलिए चाह
29:13
नहीं जाती जब आप अलग मान रहे हो अस्तित्व को
29:23
परमात्मा को इसलिए तो चाह नहीं जाती अलग मानना माया है बल्कि
29:32
खतरनाक वाली माया
29:43
और माया सुंदर तब होती है जब आप जानते जानते हो कि भगवान ही है। मैं ही हूं।
29:49
माया सुंदर हो जाती है। अरे मैं ही हूं यार। अब निश्चिंत जब रस ही सांप है तो आपका भय गया ना।
30:01
सांप सांप है वो एक अलग बात हो गई। तो आपको भय लगेगा
30:08
कि सांप कोई और चीज है। रस्सी कोई और चीज है। रस्सी ही सांप है।
30:18
मैं ही माया हूं तो सुंदर है ना सब सुंदर है फिर
30:32
अनब बनाना ही बना है।
30:57
तो जस्ट विपरीत होता है ना तो आपको लगता है कि कोई और चीज आ गई। बल्कि यह मैं
31:03
आत्मा भगवान की बेस्ट क्वालिटी है कि वह अपना भी विपरीत बन जाता है
31:15
जिसका कोई विपरीत हो ही नहीं सकता। हां।
31:22
और अगर मैं अपना ही विपरीत ना बन पाऊं तो मैं अधूरा हूं ना।
31:31
तो मैं संपूर्ण हूं, कंप्लीट हूं, पूर्ण हूं। यही तो बता रहा है
31:39
कि मैं अपना भी विपरीत बन सकता हूं। बन सकता हूं। हूं तो अनब बनाना।
31:48
तो ये पूरी मेरी लीला है।
32:08
तो जैसे ही इस पॉइंट को मैं कई बार रेस किया हूं कि जब आप आकाश को देखते हो तो मैं नहीं दिखता।
32:18
जब मैं में रहते हो स्वयं में अपने होने के एहसास में तो आकाश नहीं दिखता।
32:27
और जब अभी देखो आकाश को तुरंत ऐसे देखो प्रैक्टिकल सब। अब आकाश दिख रहा है तो मैं नहीं दिख रहा है।
32:37
अब मैं ही आकाश बन गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
32:44
मैं ही आकाश हो गया ना? कोई गैप नहीं है आकाश होने में।
32:53
मैं ही आकाश हो गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
33:00
अब मैं में आ जाओ तो आकाश गायब हो जाएगा।
33:09
देह को देखता हूं तो मैं नहीं दिखता। देखो देह को।
33:14
अपनी पूरी बॉडी को देखो अच्छे से। मैं को देखो तो देह नहीं दिखता।
33:20
अपने होने में, स्वयं के एहसास में, साइलेंस में वहां फिर देह नहीं दिखता।
33:30
और देह को देखने पर मैं नहीं दिखता।
33:36
अब मैं ही देह हो गया तो अब मैं दिखूं कैसे?
33:48
तो आप जो भी देखते हो वह पहले हो जाते हो फिर देखते हो।
33:56
धरती देखे तो आप धरती हो गए फिर आप धरती को देखते हो।
34:04
आकाश बोलने के पहले आप हो गए फिर आकाश को देखते हो।
34:13
तो यह इतना सहज में आप यह सब हो जाते हो क्योंकि मैं की बाउंड्री नहीं है ना वह सहज में सब कुछ बन जाता है।
34:25
सहज में करके आपको कदर नहीं है।
34:35
सहज में आप एक से अनेक हो जाते हो और फिर अनेक से एक भी हो जाते हो
35:06
तो बना और अनब है ना अब इस चीज में देखना बना क्या है माया
35:14
माने बनना अनबना कौन है भगवान मैं आत्मा भगवान
35:22
लेकिन एक पॉइंट आप गौर कर रहे हो कौन बना और कौन अन बनाना
35:30
मैं कौन बना
35:40
और कौन अन बनाना अरे बोलो यार अरे मैं
35:51
होता कौन है हमेशा बनता कौन है कभी-कभी मैं और आप मैं ही हो नाचो गाओ सेलिब्रेट
36:01
करो बनता कौन है कभी-कभी
36:09
होता कौन है हमेशा अरे मैं माया कौन बनता है भगवान कौन होता है
36:19
मैं और आप मैं ही तो हो।
36:27
आप मैं ही होना होना नहीं है।
36:39
अरे जानता कौन है? नहीं जानता कौन है?
36:45
सीधी बात ना यार मैं ना समझता कौन है? नहीं समझता कौन है?
36:55
असली चीज आप ही हो। उधर आपका ध्यान ही नहीं है।
37:02
आप जानने ना जानने में लटके हो। भगवान माया में लटके हो।
37:08
बना अनबना में लटके हो। होना और बनने में लटके हो।
37:21
एक बात बताओ यार दुखी कौन होता है?
37:25
मैं आनंदित कौन होता है? मैं तो वहीं का वहीं है ना वहां दुख आनंद से मैटर ही नहीं है।
37:36
अज्ञानी कौन होता है? ज्ञानी कौन होता है? पहुंचता कौन है? भटकता कौन है?
37:45
तो आप मैं ही तो हूं यार।
38:05
मैं भूल भूल जाता है। अरे मैं कौन भूल भूल जाता है?
38:11
मैं और कौन बार-बार याद आता है? मैं तो हर हालत में आप ही तो हो यार।
38:26
कितना सिंपल है।
38:44
तो कोई और चीज भगवान नहीं है। कोई और चीज माया नहीं है। इस चीज को अच्छे से जान लो।
38:52
आपके दोनों ट्रैप है। भगवान आपको पाना है। माया से आपको बचना है।
38:59
अब माया कोई और नहीं है। भगवान कोई और नहीं है। आप ही हो। तो किससे बचोगे और किसको पाओगे?
39:07
अब माया से बचना नहीं है। संसार से बचना नहीं है क्योंकि आप ही अपना संसार हो और
39:14
भगवान को पाना नहीं है क्योंकि आप ही वह भगवान हो। कितना सिंपल है यार।
39:26
सो सिंपल।
39:45
जानने वाला देखने वाला होने वाला तो मैं हूं। अब मैं को आप भूल जाते हो और जानना देखना उसमें लटके रहते हो।
39:57
और मैं को आप भूल जाते हो तब भी आप मैं हो। यह बहुत आनंद की बात है। मैं को भूल
40:04
जाने पर भी आप मैं ही रहते हो। यह नाचने की बात है। पागलों नाचो।
40:13
मैं को भूल जाने पर भी आप मैं ही रहते हो। अरे कूद-कूद के नाचो।
40:26
यस। फाइनल स्टेटमेंट।
40:34
बल्ले बल्ले देख लो आजमा के देख लो हम जो भी बोल रहे
40:45
हैं क्या बोलते गोविंद जी
41:02
तो मैं का सत्संग सर्वश्रेष्ठ होता है। क्योंकि उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
41:12
तो आप किस में लटकते हो? भगवान में लटकते हो। फिर कभी माया में लटकते हो। भगवान को पाना है। माया से बचना है।
41:21
दोनों आपसे भिन्न है ही नहीं।
41:31
अच्छा माया कौन है? जो भी आप मानते हो माया है। भगवान कौन है?
41:39
जानना ही भगवान है। जानना ही ज्ञान है। वही आत्मा है। वही परमात्मा है।
41:46
तो जानना आपसे अलग कहां है? और मानना आपसे अलग कहां है?
41:50
लेकिन आप आपको भूल जाते हो मैं एक्चुअल को पॉइंट को
41:58
कि मानता मैं हूं जानता मैं हूं जानने वाला मैं ना और मानने वाला मैं
42:09
अच्छा एक बात बताना आपको करोड़ बुद्धत्व मिलेंगे किसको मिलेंगे मैं को मिलेगा ना तो जो करोड़ों बुद्धत्व
42:18
को पी लेगा रिसीव कर लेगा वही बड़ा होगा ना एक बुद्धत्व को तो गोली मारो करोड़ों किसको मिलेगा
42:29
तो बॉस तो मैं ही है ना उसको बुद्धत्व क्या करेगा वो
42:35
भगवान भी मिलेगा तो किसको मिलेगा खत्म बात यार
42:43
तो भगवान जिसको मिलेगा जिसको रिसीव होगा जिस पात्र में वह रिसीव होगा। वह पात्र बड़ा है ना।
42:54
कितनी सिंपल सी बात है।
43:00
ये कॉमन सेंस आप लगाते नहीं हो और अपने को हल्के में लेते हो।
43:11
तो पाना खोना गया भैया जानना नहीं जानना सब गया
43:21
मैं का मैं रह गया क्योंकि मैं ही था ना जो भी था मैं ही था
43:30
जो है मैं ही हूं जो रहेगा मैं ही रहूंगा
43:39
वह सुने ना अपन वेदों की पहली लाइन है कि था तो वासुदेव है तो वासुदेव रहेगा तो
43:46
वासुदेव वो आपके मैं की बात है वही असली वासुदेव है उसको मैं कहो तो जल्दी क्लियर
43:53
हो जाता है क्योंकि आप मैं ही हो वासुदेव में फिर आप कुछ कल्पना करने लगते हो
44:02
और डायरेक्ट वेदांत और वेदांत भी क्या मैं कह कह रहा हूं मैं। हां।
44:11
मैं ही मैं को बता पाता है। कोई शास्त्र भी थक जाते हैं।
44:22
सारे शास्त्र
44:32
शास्त्रों की यही महिमा है कि शास्त्र बता देते हैं कि शास्त्र से नहीं मिलेगा।
44:38
यह शास्त्रों की महिमा है। हां।
44:44
ज्ञान की यही महिमा है कि ज्ञान से नहीं मिलेगा।
44:50
प्रेम की यही महिमा है कि प्रेम से भी नहीं मिलेगा। आप कितना ही भक्ति कर लो, ज्ञान मार्ग कर लो।
44:56
योग मार्ग, तंत्र मार्ग, मंत्र मार्ग। अरे यार मिलने की लैंग्वेज ही खराब है।
45:03
हां।
45:07
अलग मान के ही मिलना व मिलने वाली बीमारियां पैदा होती है।
45:19
तो बना भी गया अनब बनाना भी गया।
45:26
और गया भी गया।
45:50
देखो हम हमेशा बोलते हैं लेकिन कभी भी उसके गहराई में नहीं जाते। बुद्धि के परे
45:58
बुद्धि के परे हम ऐसा बोलते हैं ना बुद्धि यानी क्या है बताओ
46:05
स्मरण है ना और विस्मरण बोल लो उसका अपोजिट साइड
46:18
तो जो स्मरण में भी रहे और विस्मरण में भी रहे वही बुद्धि से परे है वह तो आप ही हो
46:28
जहां ना स्मरण है ना विस्मरण दोनों की आवश्यकता नहीं है।
46:36
याद करो तब आप हो नहीं करो तब आप हो।
46:49
आपको बुद्धि से परे जाना नहीं है। आप ऑलरेडी हो।
46:58
तो इनफ फॉर फॉर एवर कि और कुछ मांगता एनी डिमांड्स
47:06
पांडे जी क्या बोलते ये सब सत्संग की महिमा है
47:24
हां प्रेम प्रणाम बताइए हम
47:34
हां बताओ अंकुर टू द पॉइंट इधरउधर की बात नहीं बताइए एक बात कहते हैं कि
47:44
तमाश को देख के मुस्कुराया हम तो
47:51
मैं जब देखता हूं तो हमें सिर्फ तमाशा ही दिखता है और मुस्कुराना थोड़ा मुश्किल है।
47:57
हां तो तमाशे को देख के मुस्कुराया कर। बट मुस्कुराया कर।
48:05
ठीक है?
48:07
ओके। खुश रहो। कुछ समझ में नहीं आता तो खुश रहा करो। क्योंकि समझ नहीं आ रहा है।
48:15
और कुछ समझ में आ गया तो खुश रहा करो। क्योंकि समझ में आ गया।
48:21
खुश रहो बस। ठीक है। आप सुन ही नहीं रहे हो। हम क्या बोल रहे हैं।
48:26
ठीक है। स्टॉप करो उनको। अंकुर जी को। हम क्या बोल रहे हैं? वो क्या सुन रहा है पता ही नहीं है। कोई कनेक्शन ही नहीं है।
48:45
मुस्कुराने के लिए क्या तमाशा और क्या अन हो रहा तमाशा।
48:51
मुस्कुराना है तो बस मुस्कुराना है ना यार। गीत गाना है तो गीत गाना है ना।
49:00
अरे आपको कुछ भगवान आत्मज्ञान कुछ मिले ना मिले अगर आपको नाचना है तो नाचना है।
49:10
सीधी बात है। मुस्कुराना है तो मुस्कुराना है।
49:17
उसमें क्या है?
49:27
नहीं जान पाए उसमें भी जो मुस्कुरा लेता है जान गया उसमें भी मुस्कुराता है
49:36
अब वो चैप्टर लो कर दिया वो अंकुर अपन हाई पिच चल रहे थे
49:43
कोई बात नहीं फिर ले आते हैं पिच हाई साला हमारा काम ही क्या है
49:55
पानी पिलाओ यार।
50:00
तो आज मैं आया तो था यहां सत्संग।
50:07
मैं सोचा चले जाता हूं घर कल कराऊंगा सत्संग। है ना?
50:15
तो वहां किचन के सामने ऐसे बैठे तो फिर भाव आ गया। चलो मैं बोला हाल में मैं जाने वाला था। आपको भी बोला मैं जा रहा हूं।
50:27
सत्संग में ऐसा पेंडिंग नहीं करना चाहिए। चाहे मैं ही क्यों ना हूं।
50:36
क्योंकि मैं का पर्यायवाची सत्संग है।
50:41
इसलिए हरि अनंत हरि कथा अनंता। मैं अनंत मैं की कथा अनंता
50:50
मैं सत्संग हूं और सत्संग में हूं।
50:58
सत्संग निरंतर
51:35
हां जी बताओ यार कुछ
51:53
इधर लाइट्स वगैरह ऑन कर दो ना यार बाहर अंधेरा मत रखा करो।
52:08
कहां बोल रहा हूं? कहां क्या कर रहा है?
52:09
होश है तेरे को। कहां बोला मैं? बाहर बोल रहा हूं मंदिर के साइड। तू यहां बटन दबा रहा है।
52:20
उधर उधर जाके भाई मंदिर में।
52:42
तो क्रोध करने पर जो बिखर ना जाए और शांत होने में जो बन ना जाए वही मैं हूं।
52:56
क्या जो क्रोध में भी नहीं बिखरता और शांत होने में कुछ एक्स्ट्रा नहीं हो
53:03
जाता। कुछ एक्स्ट्रा नहीं बन जाता। वही मैं हूं।
53:07
मैं क्रोध करने की अनुमति नहीं दे रहा हूं। भाई इसका मिसयज मत करना। मैं श्राप दे दूंगा।
53:15
जो श्रापित होता ही नहीं वही मैं हूं।
53:24
लेकिन फिर भी मिसयूज़ नहीं करना। है ना? अभी परमिशन नहीं है।
53:38
नहीं तो क्या ऐसे सुन के ना एकदम आदमी में जग जाता है। ओए ऐसा बोलता है।
53:51
हर किसी को अधिकार नहीं होता। है ना?
53:58
कृष्ण को अधिकार था कि युद्ध करवा दिए। हर किसी को अधिकार नहीं था। हां, ऐसा गलतफहमी में नहीं रहना।
54:45
जिंदगी जिंदगी की सच्चाइयां इतनी गहरी है ना तुम लोग डर जाओगे सुन नहीं पाओगे
54:52
और इसको यह पब्लिकली नहीं बोला जा सकता उसके लिए एक जीनियस चाहिए सुनने वाला
55:00
हम
55:33
अनंत कामना करने के बाद भी जो निष्काम रहता है वही मैं हूं।
55:43
आप तो डरते हो ना फट्टू हो आप कामना से डरते हो
55:51
अनंत कामना के बावजूद भी जो निष्काम है
56:01
सृष्टि होने के बावजूद भी जो श्रष्टा है वही श्रष्टा है।
56:09
श्रष्टा अपनी सृष्टि से नहीं बसता और सृष्टि के लिए कामना चाहिए।
56:15
एक से अनेक होने के लिए क्या चाहिए? कामना चाहिए ना। फिर अनेक से और अनेक होने के लिए और कामनाएं चाहिए।
56:23
तो जब आपको बोध होता है तो यह भी आपको सुंदर लगेगा। हां।
56:33
यह कैसे संभव है? कामना करते हुए निष्काम होना। ऐसा तो आज तक कोई बोला ही नहीं। अरे ऐसे आप हो इसलिए कोई नहीं बोला।
56:45
कामना करते हुए भी एक बात बताओ आज तक आपने हजारों कामनाएं की होंगी, सैकड़ों की
56:52
होंगी, लाखों की होगी। तो आपका जो मैं है क्या हो गया भैया? कामना करने से वो बिगड़ गया क्या?
57:04
जिसको कामनाएं बिगाड़ ना सके वही तो निष्काम हुआ ना बताओ असली निष्काम
57:14
जिसको सारी कामनाएं अनंत कामनाएं मिलके भी जिसको बिगाड़ ना सके कोई विक्षेप वहां
57:22
पैदा ना कर सके तो यह सब एक अलग नॉलेज है। यह सब फेस टू फेस मिलो तो यह बताया जाएगा। है ना?
57:36
यह सब ऑनलाइन वगैरह नहीं बताना ये।
57:44
आप डरते रहते हो।
57:47
कामना से जो डर गया वो घंटा निष्काम हो पाएगा।
57:54
हां। सीधी बात।
58:05
मालिक नौकर चाकर से डर रहा है।
58:16
क्यों? इतनी कामनाएं उठती हैं आपको?
58:22
किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्योंकि आपकी आत्मा आपका एक्चुअल मैं कामना से नहीं डरता है।
58:30
जो मैं आत्मा भगवान है ना वह कामना से नहीं डरता है। कामना से डरने वाला जीव है।
58:37
माना हुआ जीव है। आप नहीं हो डरने वाले। हां।
58:46
मैं आत्मा भगवान निश्चिंत है। वह निष्काम है ना।
58:53
तो इस पैरामीटर में जो पुराना स्ट्रक्चर है वह पूरा गिर जाएगा।
58:59
कि आप अचाहा में रहो तो आपकी शांति बढ़ेगी। चाहोगे तो शांति कम होगी।
59:08
कुछ भी नहीं चाहोगे तो शांति पूरी होगी।
59:10
यह यह बिय्ड की बात है जो इससे पहले बताया मैं।
59:18
जिस शांति को कोई चाह बिगाड़ दे मेरे को तो घंटा वो शांति चाहिए ही नहीं।
59:26
हां। सीधी लैंग्वेज ऐसी होती है भाई। उसको सीधा ही बोलना पड़ता है।
59:34
हां।
59:36
मतलब एक चाह आके मेरी शांति को अगर बिगाड़ दे तो मेरे को तो ऐसी शांति चाहिए ही नहीं।
59:45
जिसको एक चाह आके कुरेद दे और बिगाड़ दे।
59:54
सारी चाहते मिलके भी जिसे ना बिगाड़ पाए। मैं वह शांति हूं।
1:00:04
चाहते हुए भी मैं शांत हूं यारों।
1:00:11
दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरु करुणा बिना लास्ट का 101 मिनट जो चला है
1:00:19
वह आपके लिए नहीं है। विदाउट माय परमिशन नहीं है। नहीं है और नहीं है। वह मेरी बात
1:00:27
है। आपकी नहीं है। ठीक है? और आपकी भी तब है जब आप बिल्कुल आत्मनष्ठी हो गए। जब मैं के अतिरिक्त आपके लिए कुछ भी नहीं है तब।
1:00:41
ठीक है। धोखा मत दे देना। या मैं ब्रेक लगा रहा हूं।
1:00:47
हां, जिस दिन वह बात आपके लिए भी मेरी तरह क्लियर रहेगी। जब वह
1:00:55
सहजा अवस्था ग्रहण हो जाएगी और वह मेरे प्रेम में ही होगी बता रहा हूं और कोई नहीं दे सकता उसको इस धरती पे
1:01:03
साफसाफ बात तब मैं खुद बता दूंगा कि तू युद्ध भी कर
1:01:11
और मेरा स्मरण भी कर अर्जुन तब ऐसे वक्तव्य बोले जाते अभी आपके लिए
1:01:19
नहीं है ये ज्यादा हो रहा है भाई रखो इसको
1:01:35
पानी है क्या?
1:01:39
मतलब कितनी मजबूरी है ना। एक चाहत आई और आपकी वाट लगा के चली गई। ये क्या होती है?
1:01:46
ऐसी कोई आत्मा होती है क्या?
1:01:50
अरे चाहते हैं तो मैं का श्रृंगार है।
1:01:56
मैं अचाहा का श्रृंगार है।
1:02:04
मैं बताया ना अगर मैं विपरीत ना हो सकूं तो मैं अधूरा हूं।
1:02:18
संसार तो परमात्मा की आंखों का काजल होता है मालूम हां
1:02:26
काजल है यह संसार यार वो और सुंदर करता है आंखों को परमात्मा को
1:02:34
हम असली सच्चाइयां सच में जानना ही नहीं चाहते जिंदगी की
1:02:43
हम वही घिसा पिटा जीते रहते हैं। मैक्सिमम कोई जाता है तो आत्मज्ञान तक मैक्सिमम जिसको आप लोग बुद्ध पुरुष कहते हो।
1:02:54
हां और कई बुद्ध पुरुषों को यह सहजा अवस्था का बोध रहता है। वह जानबूझ के नहीं बोलते क्योंकि मनुष्य अभी उतना प्रौढ़ नहीं है।
1:03:05
खुलेआम तो नहीं बोलते।
1:03:09
इवन कृष्ण ने भी अर्जुन को चुन के बोला एक सिंगल को
1:03:17
अर्जुन को बोला ना चाहते तो गीता सबको सुना सकते थे एटलीस्ट पांडवों को तो सुना सकते थे।
1:03:28
इसका मैं थोड़ा हिंट इसलिए दे रहा हूं कि आपके अंदर यह रहेगा कि ऐसा भी कुछ है संभव है ना।
1:03:38
और मेरे पास कई अर्जुन है अभी कई
1:03:50
मेरे पास कई कृष्ण भी हैं। अब हां अब वह क्वांटिटी दो-तीन से बढ़ रही है।
1:04:01
उनका पूरा भेद अभेद सब खत्म हो गया।
1:04:08
कृष्ण है इन द सेंस उस कैटेगरी के है ना अब फिर वो कंपटीशन वाली बात मत ले आना
1:04:31
तो असली सच्चाइयां ना बहुत गहरी होती है उसको सुनने के लिए भी दम चाहिए। आत्मा का साहस चाहिए। जीव का साहस नहीं चाहिए।
1:04:45
आत्मा ही आत्मा को सुन सकती है। कृष्ण ही कृष्ण को सुन सकता है।
1:04:52
अर्जुन भी थोड़ा सा तो फीका पड़ ही जाएगा।
1:05:30
तो अब शुरू से सुनते सुनते सुनते सुनते बना अनबना
1:05:38
होना बनना भगवान माया से आप मैं में सेटल हुए।
1:05:46
अब फाइनल जब आप मैं में सेटल हुए तब सहजा अवस्था का रिदमम आता है।
1:05:55
जो अभी आया थोड़ा सा आया बहुत दुर्लभ है सहजा अवस्था
1:06:05
सद्गुरु करुणा बिना सद्गुरु सद्गुरु कौन होता है? मैं ही
1:06:15
सद्गुरु है। मैं की करुणा के बिना यह असंभव है।
1:06:22
आत्मज्ञान तक तो आप हाथ पैर मारो तो आप अचीव एक वर्ड में बोल रहा हूं। वो जान ही लोगे बोध हो जाएगा।
1:06:33
सहजा अवस्था पॉसिबल नहीं है।
1:07:17
सो जीसस जो एक लाइन बोले ना वो लाइन लोग समझे एक सीमा तक
1:07:24
शत्रु से प्रेम जिसको है।
1:07:34
है ना?
1:07:39
अब उसको मॉडिफाई करके कह दिया गया कि और आज के युग में कि प्रेमी का कोई शत्रु होता ही नहीं है।
1:07:51
लेकिन शत्रुता के समय में भी प्रेम वह और हायर रेंज है।
1:07:58
युद्ध के समय में भी कृष्ण को क्या करोड़ों से कम प्रेम था?
1:08:04
वह बहुत हायर रेंज है। वो और हायर रेंज है।
1:08:13
क्या सोचते हो कि कृष्ण भेद करते हैं कौरव और पांडव में।
1:08:19
ठीक है। धर्म की स्थापना उनको करनी है और पांडव का ही साथ देना है। वह भी मस्ट है।
1:08:31
ठीक युद्ध के समय में भी प्रेम वो असली प्रेम होता है। किसी से आप लड़ रहे हो और
1:08:37
उससे आपका उसी समय प्रेम है। तब जानना आप रियल प्रेमी हो। प्रेम की पहचान लड़ाई
1:08:46
के समय होती है। यह बहुत खतरनाक बात बता रहा हूं। मैं लड़ने को नहीं बोल रहा हूं।
1:08:56
किसी से लड़ते समय भी अगर आपके भीतर से उसके लिए आपको प्रेम ही आ रहा है और आपको ऊपर ऊपर किसी मजबूरी वश लड़ना पड़ रहा है।
1:09:06
तब समझना वह प्रेम ही असली प्रेम है।
1:09:15
मजबूरी थी ना लड़ना अर्जुन की कृष्ण की लड़वाना मजबूरी है
1:09:22
शांति प्रस्ताव के बाद भी
1:09:30
नहीं माने कौरव एक इंच जमीन नहीं देना है
1:09:39
तो मजबूरी थी युद्ध करना उद्देश्य था ही नहीं। वह मजबूरी थी। हां।
1:09:49
प्रेमी का उद्देश्य कभी भी युद्ध होता ही नहीं है यार। लड़ना होता ही नहीं है।
1:09:57
समय है उस प्रेमी के पास जो लड़ाई करने जाएगा।
1:10:06
तो जीसस बोले थे उसमें बहुत गहराई है और कृष्ण का तो परम है अल्टीमेट
1:10:17
कि तू युद्ध भी कर और मेरा स्मरण भी कर तो युद्ध करो तो स्मरण जाता है।
1:10:30
युद्ध कर रहे हो आप और मैं हूं मैं हूं करोगे तो युद्ध नहीं कर पाओगे और स्मरण करोगे अपने होने में तो युद्ध
1:10:40
नहीं कर पाओगे युद्ध करोगे तो स्मरण नहीं कर पाओगे तो तू
1:10:46
युद्ध भी कर और मेरा स्मरण भी कर यह पॉसिबिलिटी
1:10:53
यह संभावना केवल आत्म देश में ही संभव है
1:11:03
जिसको यह निश्चय हो गया कि मैं हर हालत में हूं ही।
1:11:12
युद्ध करूं, चाहे प्रेम करूं, चाहे कुछ भी करूं, मैं हूं ही।
1:11:21
जिसको यह परम निश्चय हो गया कि मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
1:11:28
उसको यह अथॉरिटी दी जाती है।
1:11:36
ना कोई जीवन है, ना कोई मृत्यु है, ना कोई देह है। जिसको एकदम श्योरिटी है अपने अंदर से।
1:11:45
जिसके लिए मैं के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। फिर वह कुछ भी करे वह भी मैं है।
1:11:57
वह जो करे वह धर्म है। उठूं बैठूं सो सेवा चलूं फिरूं सो परिक्रमा। ऐसा कुछ बोले हैं कबीर साहब। वो फाइनल है।
1:12:10
उसका उठना बैठना चलना खाना पीना सब पूजा पाठ है वो।
1:12:20
और वह उसका उसका जो बोलते हैं ना वह मैं का है। आप भी चलते हो, फिरते हो, खाते हो।
1:12:30
आपके लिए भी सब पूजा पाठ है। लेकिन आप इस रहस्य को जानते नहीं हो।
1:13:08
तो असली सहजा अवस्था है परमात्मा को पाना नहीं है और माया से बचना नहीं है।
1:13:18
संसार से बचना नहीं है और परमात्मा को पाना नहीं है। वह सहज अवस्था है।
1:13:35
वो मैं ही हूं सहज में।
1:13:52
दुख से बचना नहीं है। आनंद पाना नहीं। हां।
1:14:19
याद करना है इसको भी जो भूल जाता है वही सहज है
1:14:28
कि मुझे अपने आप को याद करना है याद करना है इसको भी जो भूल जाता है मस्त
1:14:37
हो जाता है वही और वही वही एकमात्र सहज है।
1:14:57
जो याद करने को भी भूल जाता है कि याद करना है इसको भी। अरे भूल जाता है।
1:15:20
मुझे कुछ जानना है इससे जो अनजान हो जाता है।
1:15:29
वही सहज है।
1:15:35
मुझे कुछ जानना है।
1:15:38
इससे भी जो अनजान हो जाता है हटा ऐसा बोलता है वही सहज है।
1:16:06
जो मैं देह हूं ऐसे कहता है जैसे परमात्मा कहे कि मैं परमात्मा हूं वही सहज है।
1:16:23
इतनी पवित्रता से जो कहता है कि मैं देह हूं।
1:16:30
जैसे परमात्मा कहता है मैं परमात्मा वही सहज है। बहुत दुर्लभ है सहज अवस्था।
1:16:40
हां बहुत दुर्लभ है। वह सुलभ होती है।
1:16:53
जंप का भी ऑप्शन है बट बहुत रिस्की है वो।
1:17:19
हम पानी पिलाओ भाई
1:17:30
बस यार जो भी सुने हो वो भूल जाओ मस्त रहो मुस्कुराते रहो
1:17:39
निश्चिंत यंत्र
1:20:52
हां जी हाय राम
1:21:05
थैंक यू।
1:21:59
हम
1:22:25
आप जिंदगी भर क्या करते हो? सजग रहते हो। सजग। ठीक है। नॉट बैड।
1:22:33
आप भय के कारण सजग होते हो। मन के प्रति सजग, इसके प्रति, सजग, उसके प्रति कि कुछ
1:22:40
गड़बड़ ना हो जाए। इसलिए आप सजग रहते हो।
1:22:50
अरे आप अंतर्यामी हो।
1:22:52
जब कहीं रॉन्ग है वह बता देता है रॉन्ग है राइट है राइट है बता देता है
1:22:59
नेचुरल जो सजगता है आपकी अंतर्यामी की वो सुंदर है।
1:23:09
यह जो आप एफर्ट करते हो ना सजगता का अवेयरनेस का वो फॉल्स है।
1:23:17
मैं सब काट दूंगा बता रहा हूं। बंद कर दे।
1:23:31
एक बात बताना आंख के सामने कोई कीड़ा आता है या कुछ ऐसे आ जाता है तो अपने आप पलकें बंद हो जाती
1:23:38
है ना नेचुरल रास्ते में सांप आ गया दिख गया आपको अपने आप हट जाते हो ना वो नेचुरल सजगता है
1:23:47
अवेयरनेस है वो आपके अंदर है ही
1:23:54
एक व्यवहारिक तल पे भी भय के कारण जो आप सजग होते हो वो रॉन्ग
1:24:03
है। मन से आप भयभीत हो क्योंकि आप यह नहीं जानते कि आप ही मन बने हो।
1:24:09
आप ही माया बने हो। अज्ञानता के कारण जो भय के कारण सजगता आती है वह रॉन्ग है।
1:24:30
आप यह जानते ही नहीं हो। आप अपने ही प्रति सजग हो रहे हो। मन कोई दूसरा थोड़ी ना है।
1:24:40
जिसके प्रति आप प्रयास कर रहे हो सजगता का।
1:24:48
हमेशा नेचुरल सहज जो है ना उसको ध्यान में रखा करो।
1:25:27
तो ये बातें मेरी बड़ी विचित्र लगेंगी क्योंकि अभी तक उल्टा-पुल्टा सुना है आपने ना
1:25:36
अब आत्मा का भयभीत होना टेस्ट है मालूम है अब मैं और दूसरे एंगल में जा रहा हूं जो
1:25:44
मृत्यु का भय बोलते हो ना क्योंकि आत्मा मरना जानती ही नहीं है
1:25:52
ना तो वो उसको विपरीत होना है शरीर लेके
1:26:00
तो वो मृत्यु का वो टेस्ट ले रही जो मरना जानता ही नहीं है, वह मरने का टेस्ट ले रहा है।
1:26:10
ये टोटल आनंद है। बता रहा हूं। मृत्यु और मृत्यु का भय आनंद है।
1:26:20
हां। भय भी आनंद है।
1:26:52
ये सब शरीर, मन, यह दुनिया ये सब आनंद रस ही रस है।
1:27:06
इसमें कुछ ज्यादा समझो मत, ज्यादा जानने वाने का प्रयास मत करो।
1:27:14
जैसा यह सब कुछ है उसको वैसे ही स्वीकार कर लो।
1:27:22
क्योंकि सब अपने आप में सुंदर है, अद्भुत है।
1:27:27
हां व्यवहारिक तल पर हमेशा सही गलत का ध्यान रखो। वह अंतर्यामी बता देता है यह गलत यह सही ऑटोमेटिक है वो व्यवहारिक तल
1:27:37
पर तो वो है ही ना आत्मिक तल पे आप असत्य से तो ऊपर हो सत्य
1:27:44
सत्य से भी परे हो आत्मा
1:28:00
व्यवहारिक तल पे किसी मुजरिम को सजा दी जाती है कि तुमने यह जुर्म किया है।
1:28:07
है ना? वह जरूरी है समाज के लिए, नियम कायदों के लिए, व्यवहार के लिए इंपॉर्टेंट है।
1:28:20
लेकिन आत्मिक तल पे हमेशा हर किसी को
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एक ही बात बताई जाती है कि तू बेगुनाह है।
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तू सदा से शुद्ध है, बुद्ध है, निर्दोष है।
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तूने खुद को बॉडी मान के जो भी सही गलत किया तू उससे परे है। इसका बोध कराना ही धर्म है।
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आत्मिक तल पर आपको दोष देना पाप है।
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धर्म मुक्त करता है। हर दोष से हर गलती से ऊपर उठाता है।
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गलतियां गलतियों की है। तुम्हारी नहीं है।
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आत्म देश में सत्य से भी परे हो आप। असत्य तो दूर की बात।
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और आनंद ये है कि वो आप सहज में हो। वह कोई अचीवमेंट नहीं है।
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क्योंकि जिंदगी भर हम यह सुने हैं कि अचीवमेंट किसी चीज का होता है। वही चीज
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होती है। अरे बगैर अचीवमेंट के भी कुछ होता है माय डियर वो तुम हो।
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मैं हूं। ओके। फाइनल फुल एंड फाइनल।
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यस।
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प्रेम प्रणाम
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राम राम