0:18
मेरे को यानी अलग लगता ही नहीं है ये सब
0:24
नारायण शिव कृष्ण राम लगता ही नहीं है कि यह मेरे से अलग है।
0:33
रत्ती भर अलग नहीं लगते। और अलग नहीं लगते।
0:44
ये मेरे लिए कोई अचीवमेंट नहीं है। ये मेरे लिए सहज है।
0:53
हां। मतलब ऐसा मेरे को बोलना नहीं पड़ता कि मैं इससे भिन्न कुछ भी नहीं है। ये सहज
1:01
में है। अलग लगता ही नहीं है यह पूरा अस्तित्व।
1:08
इवन कोई कीड़ा मकोड़ा भी मेरे को अपने से अलग नहीं लगता।
1:14
हमारी सोच क्या है? ब्रह्मा, विष्णु, महेश तो वह पावरफुल हो गया ना।
1:20
वह कमजोर कीड़ा भी मेरे को अपने से अलग नहीं लगता।
1:27
वो कमजोर चींटी जो अनजाने में पैरों से दब के मर जाती है वह भी मेरे को अपने से अलग नहीं लगती।
1:40
ऐसा है मेरे जीवन में।
1:43
और यह मेरे गुरु महर्षि मुक्त की कृपा है। बस
1:50
इसको मैं ऐसा कह ही नहीं सकता कि मैं सही चलते-चलते
1:57
मैंने सत्य को खोज लिया और जान लिया, पा लिया। वो रॉन्ग वर्ड्स है।
2:04
ये बोलूंगा तो एक पाप जैसा है।
2:10
यह महर्षि मुक्त की कृपा है। मेरे गुरुदेव की ओशो की भी है।
2:22
और सच में ये कृपा साध्य है। साधन साध्य नहीं है।
2:27
पता नहीं कैसे क्या हुआ क्या बोले इसको वह बोला नहीं जा सकता
2:40
ओशो ने पैदा किया एक अंडे में ही था समझ लो जैसे एक पंछी होता है और महर्षि मुक्त
2:48
ने उड़ा दिया मुक्त आकाश में
2:57
लगता लगता ही नहीं है मेरे को नारायण अलग अपने से अपना आप ही लगता है
3:22
मतलब मैं ऐसा मैं कोई ऐसा पावरफुल नहीं हूं। जैसा आम आदमी सोचता है
3:31
कि नारायण आपसे भिन्न नहीं है तो आप चक्र चलाओ और शिव भिन्न नहीं है तो त्रिशूल कहां है आपका?
3:39
ऐसा नहीं है। है ना?
3:48
तो नारायण का चक्र और शिव जी का त्रिशूल
3:58
वह कोई और थोड़ी ना चला रहा है। मैं ही तो चला रहा हूं।
4:06
इस देह से नहीं चला रहा हूं। है ना?
4:14
इट मींस इस देह से जो संभव है वो इस देह से कर रहा हूं।
4:22
वहां से जो संभव है वहां से कर रहा हूं और कर भी नहीं रहा हूं। यह सब सहज में हो
4:29
रहा है और चींटी की देह में मैं इतना कमजोर हूं कि आसानी से मर जाता हूं।
4:38
वह भी मैं ही हूं।
4:46
जिस पत्थर पर लोग थूक फेंक देते हैं ना, वह पत्थर भी मैं हूं।
4:54
और जिस शिवलिंग पर फूल और पत्र पुष्प चढ़ाए जाते हैं, वह शिवलिंग भी मैं हूं।
5:01
ऐसा कुछ ऐसा अलग अलग वाली बात ही नहीं है यार।
5:08
और पता नहीं है मैं किसको बता रहा हूं।
5:10
मेरे लिए कोई सामने है ही नहीं। आप भी नहीं हो।
5:17
अपने आप से ही बातें कर रहा हूं। बोलना ठीक है शब्दों में बट ऐसा भी नहीं है।
5:42
यह मेरे निज का अनुभव है।
5:47
निज अनुभव प्रत्यक्ष है। मेरे लिए इतना प्रत्यक्ष
5:59
है। मैं बताना चाहता हूं सबको बट बता नहीं पाता हूं।
6:08
हर बार तुम्हें यही तो बताना चाह रहा हूं।
6:20
आप कुछ कह रहे थे मैंने रोक दिया शायद
6:27
यस यस अबब्सोलुटली राइट क्योंकि मैं आप लोगों के अंदर की आवाज
6:34
हूं। है ना? मैं आप लोगों के भीतर से और इधर बाहर से बोल रहा हूं।
6:43
मैं आपको ही बोल रहा हूं। इसलिए मेरा इंकार कोई नहीं कर सकता। क्योंकि मुझे
6:50
इंकार करना यानी आप अपने आप को ही इंकार कर रहे हो।
6:57
कोई कर ही नहीं सकता। इंपॉसिबल शिव भी नहीं कर सकते। नारायण भी नहीं कर सकते।
7:05
राक्षस भी नहीं कर सकते। ये तो देवता हो गए।
7:10
कोई मनुष्य नहीं कर सकता। अज्ञानता वश वह बोल देगा। लेकिन अंदर ही अंदर वह जानेगा कि यही सत्य।
7:21
हां हिम्मत।
7:27
हिम्मत इसलिए नहीं होती मनुष्य को क्योंकि वह खुद को मनुष्य ही मान के जी रहा है।
7:35
मन से घिरा हुआ मनुष्य।
7:39
आत्मा में सनी हुई बात उसको नहीं आई है अभी
7:52
और मेरे लिए यह सामान्य बात है
8:01
जैसे आप डेली लाइफ में चाय पीते हो और उठते हो जागते हो
8:10
कुछ कर्म करते हो खाना खाते हो कितना सामान्य है ना लाइफ स्वास लेते हो
8:19
इतना ही सामान्य है मेरे लिए यह जो भी मैंने अभी बताया और मैं यह बताना चाह रहा हूं कि यह
8:29
आपके मैं के लिए भी सामान्य है जिसको आप मैं कहते हो
8:41
उसके लिए भी सामान है।
8:48
हां उनको माइक दो। तुम लोग ध्यान क्यों नहीं रखते हो? हर चीज मैं क्यों बताऊं?
8:59
जैसे जब हम अकेले हैं या थोड़ा शांत अवस्था में तब तो ये मैं का अपनी स्मृति का एहसास रहता है
9:07
हम क्योंकि हम थोड़ा मुड़ा जागरूक जागरूकता है हम अपने अंदर जैसे समाज में जाते हैं और
9:15
लोगों से ये बात समाज को अलग मान के कह रहे हो क्यों हां अलग मान के कह रहे हो
9:21
है ना समाज को अपने से अलग मत मानो यह तो सही।
9:26
फिर कोई क्या कह रहा है, क्या हो रहा है, मायने नहीं रखता।
9:31
यह तो अलग मान के कह रहा हूं। मैं तो दूसरे को दूसरा मान रहा हूं।
9:34
हां। या दुनिया में ये हो गया, वो हो गया, उस समय आत्मा खो गई। जो हम बोलते हैं वो दुनिया को अपने से अलग मान के कहते हैं।
9:44
द्वंद है। हां।
9:46
एकदम से अलग मान्यता बस।
9:51
और यह जो कृपा हुई मेरे पर
9:57
अगर मैं वर्ड्स में कहूं एक तो यह कृपा ही है भाई है ना बट फिर भी एक स्टेप नीचे आके
10:04
कहूं तो बस मैंने एक काम किया मालूम केवल एक
10:21
मैंने अलग मानना छोड़ दिया।
10:24
जय हां कुछ भी इवन माया को भी भगवान को भी
10:32
पूरे चराचर को अलग मानना ही छोड़ दिया। बस
10:42
बस इतनी सी बात है इतनी सी मैंने ध्यान को अलग मानना छोड़ दिया समाधि को प्रेम को
10:49
ज्ञान को भक्ति को यानी अलग मानना ही छोड़ दिया इवन अशांति
10:57
को भी दुखों को भी मन को भी
11:04
अलग मानना ही मैंने छोड़ दिया बस इतनी इतना सा किया है मैंने समझ लो
11:23
और ये सबका अधिकार है।
11:28
सबके लिए संभव है। इवन शिव राम कृष्ण इसी पद में जीते हैं जो मास्टर्स हैं, बुद्ध
11:37
पुरुष हैं जो उच्च कोटि के देवता हैं।
11:42
सूर्य है, सूर्यारायण है, गणेश हैं। ऐसे 12 उच्च कोटि के देवता हैं। वो वो इसी
11:51
पॉइंट पर जीते हैं। मैं से भिन्न कुछ भी नहीं।
11:57
हां, वह पावरफुल भी है।
12:01
मेरे लिए वह मैं है। मैं आप लोग को कहने के लिए वह समझा रहा हूं।
12:10
तो यह बहुत सुंदर है यह पूरा चराचर अद्भुत अलौकिक क्योंकि आप ही हो।
12:20
आप अपने ही आपको अनंत नाम रूपों में देख रहे हो।
12:35
क्या बोलते हो सौरभ जी उनको माइक दो यार
12:49
सौरभ जी आए मेरे पास लास्ट अगस्त में यस कि उसके पहले अगस्त में
12:57
है ना 2024 के अगस्त में
13:05
और इन्होंने मेरे को कुछ नारायण वाली बात बोली थी कि नारायण से मिलके ही जाऊंगा ऐसा क्या
13:13
बोला था आप याद कराओ तो मेरे को याद है आपको
13:20
भगवान आपने पूछा था कि आप कहां से आए हो और क्यों आए हो ऐसा ऐसा पूछा आपने किस लिए यहां पर
13:29
तो पता नहीं मेरे मुंह से समय निकला था कि नारायण ही नारायण की महिमा सुनने के लिए आए हैं।
13:35
हम ऐसे ही कुछ हां मतलब आपने कहा था कि ये हुए बिना मैं जाऊंगा नहीं। ऐसा कुछ कहा था आपने।
13:45
हां। तो मैं ये भी बोला मैं कि यहां से मैं जाऊंगा नहीं। ये ऐसे ही वर्ड्स था कि जाऊंगा नहीं। हां।
13:52
तब तक नहीं जाऊंगा मैं। तब तक नहीं जाऊंगा। तो अब क्या कहना चाहोगे आप?
14:00
तो नारायण ही नारायण को सुन रहे।
14:07
और अब जाने का विचार अब कहां जाएंगे वो?
14:14
मेरे से कुछ बाहर होगा तब मैं जाऊंगा ना भगवान। कहां जाना है?
14:18
तो हम लोग आ रहे थे वहां से नैरोबी से एक आ साल पहले की बात है या 810 महीने पहले की बात होगी
14:27
तो इनको मैं बोला अभी जाओ तो घर रहो कुछ कुछ मैंने ऐसा बोला था ना मैं फ्लाइट में रिटर्न में
14:37
तो यह आ गए मेरे कंधे में हाथ रख के रोने लग गए मैं नहीं जी पाऊंगा बोले आपके बगैर
14:50
तो बोला ठीक है अब मैं क्या कर सकता हूं
14:59
क्योंकि शरणागत का इंकार मैं नहीं कर सकता
15:07
चाहे वो कोई भी हो वो तो सज्जन है विभीषण गया ना राम के पास तो वो वो मना
15:17
नहीं किए। वो तो राक्षस कुल से आए थे विभीषण।
15:23
राम भी साफ बोल दिए कि शरणागत का इनकार मैं नहीं कर सकता।
15:28
यानी भगवान भी क्या नहीं कर सकता उसको बता रहा हूं।
15:33
शरणागत का इंकार वो भी नहीं कर सकता और ना करना चाहिए।
15:39
कभी नहीं करना चाहिए। चाहे वो किसी भी कारण से आपकी शरण में आया हो। यह तो फाइनल
15:45
है लाइफ का धर्म। छोटी सी चीज के लिए भी कोई आपकी शरण में आया है तो जो आपसे संभव हो वो करना चाहिए।
16:02
और आज उनकी आंखों में वो चमक है। उनकी बातों में हां वो बात आने लग गई है इनमें।
16:13
आत्मा वाली बात हां बिल्कुल उनको अब कोई भी डाउट नहीं है
16:19
नींद में जगा के उनसे पूछ लो और इस बीच उन्होंने क्या नहीं देखा होगा
16:27
कितने सत्संग कई बार मैंने इनको बुरा भी बोला चेक करने के लिए कई बार तारीफ भी की दोनों से वह
16:36
आजाद रहे सजग रहे मतलब
16:42
अलग ही बात होती है जिसका समर्पण होता है ना
16:50
प्रश्न की क्या बात है प्रश्न तो मैं बोलता हूं तब ये जानबूझ के पूछते हैं मेरे से इन किसी ये कोई प्रश्न नहीं पूछते मेरे
16:58
से विराज है राहुल है अब तो यह भी बंद कर दिए गोविंद जी भी पूछना सैफ भी नहीं पूछता
17:09
जो कभी कबभार आते हैं ना वो प्रश्न पूछते हैं।
17:16
मैं आपको नहीं बोल रहा हूं। मैं सबकी बात कर रहा हूं। जो कभी कबभार आते हैं 510 दिन के लिए या तो वह ज्यादा पूछते हैं।
17:31
तो पॉइंट ये है कि जब आपको मैं से अलग कुछ लगता ही नहीं है।
17:37
तो आप कैसे बताओगे किसी को यार कि मैं ही हूं।
17:44
कैसे बताओगे वह वह आपकी बॉडी देख रहा है और आपको शब्दों से बताना है।
17:56
आप बता आत्मा से भी रहे हो लेकिन वो सुन अपने मन से रहा है। अपनी बुद्धि से रहा है।
18:03
पुरानी धारणाओं से पुरानी मान्यताओं से आप बताओगे कैसे?
18:14
हां मतलब वह अपनी समझ से सुनते हैं। हां।
18:38
आज एक कमेंट पढ़ा मैं मेरे पास अच्छे वाले मेरे प्रिय कमेंट आ जाते हैं मेरे पास
18:44
बहुत हो गया ये मैं मैं अहम हरि अहम हरि ऐसा वो लिख के भेजा था केवल हरि बोलो अहम
18:54
मत बोलो ऐसा कोई कमेंट था
19:06
बल्कि अहम हरि जो है ना अचुतो अहम गोविंदो अहम अहम हरि ये
19:17
लाइनें पुराण की है।
19:21
हां यह पुराण की लाइनें हैं।
19:26
उसमें साफ साफ लिखा हुआ है कि अहम हरि
19:43
तो बस हम अपने असली अहम को जो मैं है सहज उसको छोड़ देते हैं।
19:53
उसको लगा होगा कि यह अहंकार है।
19:56
बल्कि अपने आप को हरि से अलग करना अहंकार है।
20:03
अपने आप को इस अस्तित्व से अलग मानना अहंकार है।
20:08
परमात्मा से अलग मान लिए ना आप। अब अहंकार
20:14
बहुत उल्टा पुल्टा सीख लिए हम
20:25
भगवान श्री कृष्ण भी कहते थे मैं जब गीता पढ़ता था तो भगवान श्री कृष्ण भी कहते थे कि मैं मासों में ये मांस हूं वीरों में
20:34
अर्जुन हूं या धनोधरों में राम हूं तो मुझे लगता था इतना मैं मैं क्यों कह रहे हैं मतलब इतनी बुद्धि नहीं थी
20:41
बुद्धि विशाल नहीं होती तो मुझे उनकी बात भी अच्छी नहीं लगती थी कि इतना मैं मैं क्यों कहते हैं क्यों कह रहे हैं
20:48
लेकिन अब जब धीरे-धीरे और पढ़ा पढ़ा और आपको सुन रहा हूं। धीरे-धीरे बात आ गई दिमाग में कि वो उस मैं को नहीं कह रहे
20:56
हैं जो उनका व्यक्तिगत शरीर का मैं है। उस मैं को कह रहे हैं जो यूनिवर्सल मैं है और वो ये बताना चाहते हैं कि हर अच्छी बुरी चीज में वही अस्तित्व विद्यमान है।
21:06
लेकिन शुरुआती समय में मुझे जैसे उनको शंका हुई जिन्होंने कमेंट किया था तो मुझे तो श्री कृष्ण भगवान को ही शंका हो रही थी
21:14
कि वो इस तरीके से इतना मैं क्यों कर रहे हैं।
21:28
कृष्ण ने इतना साफ कहा गीता में लेकिन लोग नहीं समझ पाए। उल्टा ही समझते हैं लोग।
21:38
उन्होंने भी स्ट्रेट कहा है कहीं कहीं कहीं भागवत में कहीं गीता में
21:47
कि जब जब धर्म की हानि होती है तब तब मैं आता हूं बोला है उन्होंने कृष्ण आता है
21:54
नहीं कहा मैं आता हूं बोला हां
22:03
सही है ये सुन के आप गीता उपन उपनिषद क्लियर कर पाएंगे।
22:08
यस। आपका सत्संग सुनने के बाद मुझे गीता ज्यादा समझ में आने लगी। हां।
22:12
पहले से भी समझ में आती थी। लेकिन वो जहां मैं जाके अटक जाता था। जहां मैं मैं और ईश्वर को अलग नहीं कर पाता था। श्री कृष्ण
22:20
के शरीर को और श्री कृष्ण के असली मैं को जहां मैं अंतर नहीं कर पाता था। हम आपका सत्संग सुनने के बाद मुझे वो अंतर
22:28
पता चलने लगा कि वो मैं शाश्वत मैं है जो भगवान से किसी प्रयोग वो मुझे आपका सत्संग सुनने के बाद ही ये
22:36
क्लिक
23:00
गीता की मैं भी बचपन में व्याख्या सुना और बहुत सारी चीजें बट ये पॉइंट मेरे को पता
23:07
ही नहीं चला बचपन में
23:15
वही चीज है कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा जैसे मैं कहूं मैं बॉडी हूं
23:25
तो आप देखोगे बॉडी हो सकता है मेरी नजर मैं पे हो
23:34
है ना तो यह बहुत फर्क हो जाता है
23:41
जैसे मैं कहूं अहम हरि वो हो सकता है आपकी नजर हरि पे हो मेरी नजर मैं पे मेरे लिए प्रथम मैं हूं।
23:54
देन फिर मेरे ही यह सब अनंत नाम रूप है।
23:58
चाहे वो देवता कह लो, चाहे इंसान कह लो, चाहे जंगली जानवर कह लो, चाहे बुद्ध पुरुष कह लो, चाहे अज्ञानी कह लो। वो अज्ञानी मनुष्य भी मैं ही हूं।
24:11
जो मुझ बुद्ध पुरुष की बात नहीं समझ पाता वह अबुद्ध मनुष्यमय हूं।
24:23
यह आनंद है। पता नहीं ये कैसे हो रहा है, क्या हो रहा है बट हो रहा है।
24:35
हम्म
25:52
तो अपने आप को कभी प्रेम करना पड़ता है क्या?
25:59
अपने आप से सहज प्रीति होती है ना।
26:04
तो जब भी मैं यह लाइन दोहराता हूं तो लोग अपने पर्सनल में चले जाते हैं। यह सब भी अपना आप है।
26:12
मेरे को इसको प्रेम करना नहीं पड़ता। सहज प्रीति है ये।
26:22
जब भी यह लाइन आप लोगों ने सुनी होगी कि अपने आप से प्रेम करना नहीं पड़ता सहज होता है तो आप अपने में पर्सनल मैं पे ही
26:31
लेते हो उस बात को कि यह सब भी अपना आप है
26:38
और यह सहज प्रीति है हम क्या प्रेम समझते हैं भावनाओं में बह
26:46
के बहुत इमोशन में आके वह बहुत खतरनाक भी है। हां, बहुत फायदा उठाते हैं लोग।
26:58
बहुत ये किस्से कहानी बता के आपको रुलाएंगे और 10 चीजें करवाएंगे और फिर अपनी बात डलवाएंगे।
27:07
वो बहुत गलत है।
27:12
भावनाएं होनी चाहिए। बहुत गहरी भावनाएं होनी चाहिए। बट
27:18
आत्मा के साथ होनी चाहिए या सत्य के साथ होनी चाहिए
27:30
तो कर्म प्रधान धर्म प्रधान
27:36
भाव प्रधान आत्म प्रधान मैं आत्म प्रधान चाहता हूं उसके बाद भाव
27:54
मैं भावों से ऐसा खेल सकता हूं ना आपको आईडिया नहीं है। हां मेरे अंदर कई कृष्ण राम समाए हुए हैं। रियल बता रहा हूं।
28:06
मैं उनके अंदर समाया हूं। मेरे अंदर समाए हुए हैं। बट मैं वह बात लाता हूं भावों की
28:13
भी लेकिन एक उचित समय में एक बोध के बाद ट्रुथ के बाद
28:20
ताकि वो भाव गहरा तो रहे लेकिन वो हावी ना हो।
28:33
मैं बहुत शार्प बहुत ज्यादा शार्प कर रहा हूं चीजों को
28:48
ताकि कोई कहीं भी भटके ही ना रति भर को ना भटके
29:40
और इसमें एक यह चीज है कि इसको आप किसी भी बल से नहीं पा सकते।
29:49
देह का बल, बुद्धि का बल, विद्या का बल है ना?
29:58
किसी भी बल से आप इसको नहीं पा सकते।
30:10
इसलिए कहा गया निर्बल के बलराम।
30:18
हम उसको एक अलग कमजोरी वाला निर्बलता समझते हैं। है ना? कि जो एकदम वीक है, कमजोर है।
30:28
उसके बलराम ना वैसा नहीं आपने सब आजमाया
30:36
और आप फेल हो गए
30:59
तो मैं को आप मैं होके ही जान सकते हो और मैं ही जान सकता है और कोई दूसरा नहीं
31:06
ना जीव ना परमात्मा ना कोई डायरेक्ट
31:34
और कुछ नहीं आखरी में बहुत हंसी आती है आप बहुत आश्चर्य से भर जाते हो आश्चर्य
31:44
चकित कि यार वो मैं ही हूं।
31:57
वो मैं ही हूं। मैं अरे मैं जिसको मैं कहता था वो मैं ही हूं।
32:06
वह परमात्मा वह अस्तित्व या जो भी बोल लो वह नारायण वो शिव मैं ही हूं।
32:17
बस यह आश्चर्य आपको होता है। फाइनल चैप्टर यही है।
32:28
और वो मैं ही हूं।
32:33
फिर लास्ट में मैं ही हूं। आप वो को भी हटा देते हो।
32:41
क्योंकि हम अपने आप को वह से परमात्मा से या अस्तित्व से टेली करना चाहते हैं
32:49
क्योंकि वो हमारे लिए वो वो हमारे लिए सुप्रीम है।
32:58
आहा वो हमारे लिए सुप्रीम है।
33:05
इसलिए हम परमात्मा से अस्तित्व से अपने आप को टेली करना चाहते हैं।
33:13
यह भी फॉल्स है। समझ रहे हो?
33:20
मैं मैं से ही टेली होऊंगा।
33:23
ना सुप्रीम से, ना वीक से, ना नारायण से, ना वो चींटी मच्छर से,
33:30
कीड़े मकोड़ों से, ना शिव से, ना नारायण से। दोनों जो
33:35
एक्सट्रीम पावरफुल है और जो वीक है ना
33:41
मैं से ही टेली होता है और किसी से नहीं होता
33:50
नहीं हम
34:23
तो अंतिम आश्चर्य में मैं ही हूं।
34:28
पहले हम वो फिर परमात्मा अस्तित्व से टेली करते हैं कि वह मैं ही हूं। तत्व मसीह श्वेत केतु वह तू ही है।
34:37
यानी इसमें वह तू ही है। ऐसे टेली किया जा रहा है ना वो को तू से या मैं बोल लो उसको श्वेत केतु
34:47
तो अपने में ही लेगा ना मैं में कि वो मैं ही हूं यार वो मैं ही हूं
34:56
जिसकी मेरी तलाश थी जो परमात्मा जो अस्तित्व जो बुद्धत्व
35:02
वो मैं हूं इस पे वो एग्री हो गया कि वो
35:13
मैं हूं। जो भी इस पर पूर्णतः एग्री हो गया उसका वो छूट जाता है।
35:20
मैं ही रह जाता है।
35:25
और एग्री नहीं हुआ तो उसका वो बना रहता है कि कोई अलग चीज है।
35:34
हां।
35:35
और जो एग्री हुआ उसका अस्तित्व परमात्मा या वह छूट जाता है। बस मैं क्योंकि वो मैं ही हूं तो मैं प्रधान हो गया ना।
35:48
बस मैं अरे मैं हां जी।
36:14
हां बताइए अश्वक गीता में बहुत बार इस अहो को कहा गया है वो
36:23
जनक जी भी कहते हैं अहो मैं ही आत्मा जैसे आपने कहा ना अहो भाव जगता है जब वो ज्ञान होता हम
36:30
तो जब वो अहोभाव जगता है तो फिर सांसारिक लोगों से संबंध कैसे रहते हैं? क्या बचता है? जैसे परिवार से, पत्नी से, बच्चों से।
36:39
फिर आप सांस लोगों को अपने से अलग मान के कह रहे हो कि एक जान के कह रहे हो?
36:47
अभी तक तो अलग ही जैसे अलग मान के ही यह प्रश्न आएगा।
36:52
अगर वो आपसे अलग है ही नहीं तो यह प्रश्न उठेगा कैसे? फिर डरने का नहीं।
36:59
अरे अलग ही नहीं है तो फिर क्या प्रश्न 2002 के आसपास मेरे साथ एक घटना घटी हम
37:07
एक पुस्तक है आई एम दैट हम निस्गदत्त महाराज के प्रवचनों का संग्रह उसमें मैं खूब पढ़ता था
37:16
वो अद्वैत पे ही है इसी तरीके से एक समय मुझे लगा कि मैं अंतर नहीं कर पा रहा हूं मैं जैसे गया दुकान पे कुछ खरीदने तो
37:25
सामान दुकानें होती है तो अपने बच्चे के लिए चाक रहा हूं कुछ दो चार बच्चे और आ गए।
37:30
तो मैं वो चार छह चाक लेके उतर नहीं पाता था जैसे उन दुकानें थोड़ी ऊंची होती है। दो सीढ़ियां होती है।
37:36
वो बिना उन दिए उन बच्चों को दिए उतर नहीं पाता। और एक समय तो ऐसा है जैसे लगा खत्म हो रहा है। फिर पता नहीं क्यों मेरे अंदर जोर से आया।
37:45
मैंने कहा रुको अभी अभी नहीं है।
37:48
तो क्या अगर ऐसा कुछ हो जाए तो क्या कुछ छूट जाएगा या क्या डर वो डर मुझे क्यों आया?
37:55
नहीं डर आता है अलग मान के है ना यह हो जाएगा वह हो जाएगा हम अलग मानते हैं
38:04
ना बच्चों को या दुनिया को
38:10
या अपने फायदे नुकसान को है ना
38:16
कुछ हमारा घाटा हो जाएगा ऐसा करेंगे तो ये सब अलग मान के या कुछ फायदा हो जाएगा।
38:28
ये सब अलग मान के तब मुझे यह वाला वननेस का ज्ञान जो अभी हुआ है सुन सुन के तो ये जो आप बोलते हैं ना कि बार-बार वो मैं ही हूं।
38:38
मतलब जिसको मैं अलग समझ रहा था कि मेरे पत्नी छूट जाएंगे। मेरे बच्चे छूट जाएंगे।
38:42
तो वो वो वननेस का भाव उसमें मेरे पास नहीं था।
38:45
अरे कुछ नहीं छूटता। मैं भी तो परिवार वाला हूं। वो उस समय ज्ञान नहीं। बल्कि परिवार आपका बड़ा हो जाता है।
38:55
यह ग्लोबल फैमिली और निरंतर प्रेम बहता रहता है। अखंड
39:08
आज कुछ नहीं छोड़ना ओढ़ना वो सब फॉल्स है। रॉन्ग है।
39:26
आप ना किसी चीज को पकड़ सकते हो ना किसी चीज को छोड़ सकते हो। ये सब मान्यता देश में है।
39:45
बिल्कुल नहीं।
39:47
बिल्कुल भी नहीं
40:01
हां यह डायरेक्ट है। आपने जो भी पढ़ा है वह सुंदर है। आई एम दैट या गीता पढ़ी आपने
40:10
या जो भी वो बहुत अच्छा है। क्योंकि आपने
40:15
परफेक्ट पढ़ा। एक जीनियस जो होता है ना वो यही चॉइस करता है। वो आई एम दैट चॉइस
40:22
करेगा। गीता चॉइस करेगा। उपनिषद चॉइस करेगा या जय कृष्ण मूर्ति चॉइस करेगा।
40:32
हां, एक रमना है।
40:34
और मैं आपको बता दूं कि मैंने इनको किसी को नहीं पढ़ा है।
40:41
गीता मैंने गीता मैंने ओशो से सुनी है।
40:44
मेरे को ओशो से प्रेम रहा है। और वो मैं पे फोकस नहीं थी। बहुत रेयरली कहीं-कहीं
40:51
पर उन्होंने बताया भी होगा तो मैं नहीं समझ पाया उस समय बचपन में बाकी मैंने नहीं
41:00
कुछ भी नहीं सुना है ना पढ़ा इंग्लिश भी नहीं आती मेरे को तो ये आई एम दैट कई मित्र बताते हैं तो वो
41:08
भी मैंने नहीं पढ़ी वो मेरे को नहीं पता
41:22
और अच्छा है मैंने नहीं पढ़ी तभी यह ऑथेंटिक निकल रहा है।
41:27
ये तो पढ़ा हुआ निकलता है ना तो उसमें गड़बड़ होती है चीजें। हां संकोच नहीं मतलब वो मिक्स अप फील खराब होता है उसमें।
41:45
यानी मौलिक बात कहने का अलग आनंद है। है ना?
41:52
भले मैं कैसे भी कह पाऊं उसका एक अलग आनंद है।
42:00
मौलिकता का आनंद है। कोई मेरे से भी बहुत कम ढंग से भी बता सकता है। उसको बोध हुआ हो या कोई बता भी नहीं सकता मौन है। बट
42:09
उसका अपना आनंद है। बताना इंपॉर्टेंट नहीं है।
42:34
और अपने को पढ़ लो ना तो सब पढ़ लिया जाता है। अपने को हम कभी नहीं पढ़ते।
42:42
क्योंकि अपने को पढ़ना वहां कोई शब्द नहीं है। वहां कोई मौन भी नहीं है।
42:50
वहां सिर्फ मैं हूं।
42:54
और सिर्फ मैं हूं।
43:01
यह कोई पढ़ना ही नहीं चाहता। मैं सच बताऊं। सबको टाइम पास चाहिए। स्पिरिचुअल एंटरटेनमेंट चाहिए, पावर चाहिए, सिद्धियां चाहिए।
43:12
है ना? सबको आनंद चाहिए, शांति चाहिए। यह भी सेकेंडरी है।
43:26
अपने अतिरिक्त सब एक भ्रम है। सब कुछ हां
43:42
हमेशा याद रखो जिससे भ्रम की पहचान होती है और जिससे सत्य की पहचान होती है वो कौन है?
43:49
तो मैं ही हूं ना।
43:51
आप ही पहचानते हो ना भ्रम को और सत्य को तो आप सुप्रीम हुए ना?
43:59
है ना?
44:03
अरे जीव को परमात्मा को कौन पहचानता है कि यह परमात्मा है। यह जीव है। आप पहचानते हो
44:10
ना? अस्तित्व को, व्यक्तित्व को पहचानने वाला तो मैं हूं।
44:19
अरे यह अस्तित्व आपको पहचान रहा है कि आप अस्तित्व को पहचान रहे हो?
44:27
बताओ।
44:30
आप पहचान रहे हो ना और अपने माने हुए व्यक्तित्व को भी आप पहचानते हो ना
44:37
तो आप हो ना फाइनल हां
44:43
अरे मैं तो एक बार मजाक में कह रहा था ये मलंग और ये ज्योत ये सब पैर दबा रहे थे
44:51
मेरे तो मैं बोला यार देख भाई
44:57
क्या अंतिम अंतिम सत्य फाइनल ट्रुथ बाय द वे कोई और
45:07
भी हो तब भी मैं फाइनल ट्रुथ अपने को ही मानूंगा।
45:18
मैं क्यों अपने को छोड़ किसी और को फाइनल ट्रुथ मानूं?
45:23
फिर जिंदगी भर उसकी गुलामी करूं या उस पर डिपेंड हो जाऊं चाहे वह परमात्मा ही क्यों ना हो।
45:38
हालांकि फाइनल ट्रुथ आप ही हो। मैंने बाय द वे
45:46
लगाया कि अगर यह झूठ भी होता ना कि मैं ही परम
45:53
सत्य हूं। मैं आत्मा भगवान अगर झूठ भी होता ना तो मेरे को यही पसंद है। यह मेरी चॉइस है यार। तुम्हारी तुम जानो।
46:03
क्या?
46:06
आई एम एग्री। झूठ इस झूठ के साथ भी एग्री हूं मैं।
46:12
ऐसे सच का क्या करूंगा मैं? जिस पर डिपेंड होना पड़े किसी पर भी
46:18
जो द्वैत खड़ा कर दे मेरे में और उसमें फिर उसके लिए साधना करूं रोऊं गाऊं नाचूं
46:29
भाव में और 10 चीजें फिर 10 गुरु 100 बात बताएं
46:38
कि 100 बातों से हजार जन्म मेरे बीते क्या करूंगा मैं ऐसे ट्रुथ का? अरे मैं हूं बस खत्म बात।
46:50
अगर यह झूठ है या सच है मेरे को प्रॉब्लम नहीं है। बस मैं हूं भैया। मैं अपने में एग्री हूं। तुम्हारी तुम जानो। जो सुन रहे हो तुम अपनी जान हो।
47:02
अगर ये झूठ है तो भी आ मैं खुश हूं। क्या?
47:12
लेकिन इससे बड़ा सच आज तक इस पृथ्वी पर नहीं कहा गया है। हां, यह स्ट्रेट ट्रुथ है।
47:22
इवन बिय्ड ट्रुथ है।
47:27
क्योंकि यह सच है और यह झूठ है। इसको कंफर्म करने वाला तो मैं हूं ना। तो मैं तो बिय्ड ट्रुथ हूं।
47:37
बियों्ड जीव और भगवान हूं। बियों्ड व्यक्तित्व और अस्तित्व हूं। और मैं हूं यार सही, गलत, झूठ, सच वो तुम जानो। मैं
47:46
मेरे को यह पसंद है। मेरी जिंदगी में मेरे को यह फ्री है। बस
47:56
पूरी दुनिया जिस बात पे भी एग्री हो, नहीं हो, मेरे को कोई मतलब नहीं उस चीज से।
48:04
और मेरे को किसी को एग्री कराना भी नहीं है। मैं अपना गीत गा रहा हूं। जिसको जम गया जम गया नहीं जमा तो भी सुंदर है। मेरा प्रेम है।
48:21
क्योंकि मेरे लिए कोई अलग है ही नहीं कि कोई अज्ञानी, कोई ज्ञानी, कोई सुन ले, कोई ना सुने।
48:30
कई लोग अभी 10 20000 400 लोग हैं जो मैक्सिमम सुनते हैं। कई लोग नहीं सुन रहे हैं ना
48:39
उन लोगों में मैं जी रहा हूं उनमें भी।
48:47
हां कोई गलत नहीं है वह अपनी जगह वह भी सही है और यह भी सही है
48:56
सबकी अपनी मौज है स्वतंत्रता है क्योंकि सब जगह मैं ही जी रहा हूं ना मैं अपने आप को मजबूर थोड़ी ना करूंगा कुछ
49:06
सुनने के लिए या यही सच है उसके लिए
49:17
तो यह झूठ है तो बढ़िया है यार।
49:21
सच की बात तो बाद में करेंगे। क्यों पांडे जी? हां देखा जाएगा।
49:36
यह भ्रम हो, झूठ हो, मृग तृष्णा का जल हो, मेरे को यही पसंद है।
49:48
क्योंकि मेरी बात है ना यार मेरे को अपनी बात अच्छी लगती।
49:53
हां मैं काल्पनिक बातें और मान्यता की बातें उतनी पसंद नहीं करता।
50:27
हम पानी पिलाओ।
50:40
हां जी क्या बोलते पांडे जी
51:10
अब वो मास्टर इशारा कर रहा है। आप उंगली पकड़े हो। वो चांद की ओर इशारा कर रहा है।
51:18
ऐसे सुने ना अपन उंगली नहीं मास्टर तुम्हारी ओर इशारा कर रहा है। आपकी उंगली की ओर नहीं कर रहा है।
51:31
चांद की ओर भी नहीं कर रहा है।
51:37
और मास्टर आपकी ओर इशारा भी नहीं कर रहा है। आपको ही बता रहा है।
51:42
बस वही मास्टर है जो आपको बताता है कि यू आर ट्रुथ यू आर सेंटर
51:52
यू आर एकिस्टेंस केवल वही मास्टर है याद रखना
52:00
बाकी अगर कुछ भी और कहा जा रहा है तो वह आचार्य श्रेणी है मास्टर से लो की श्रेणी
52:08
वह स्टार्ट के लिए ठीक है
53:22
तो चलेगा झूठ।
53:25
तो जो झूठ मैं बता रहा हूं, जिस झूठ को मैं भ्रम को मैं अच्छे से बता रहा हूं।
53:33
उसमें भटक जाओगे तो भी चलेगा ना मैक्सिमम क्या होगा भटक जाएंगे ना चलेगा
53:40
ना बस नहीं नहीं अगर ये झूठ है बाय द वे
53:52
तो भटकेंगे ना क्या है उसमें हां
54:02
भटकना भी मंजूर है।
54:07
लेकिन मैं को छोड़ना मंजूर नहीं है। है ना? भटकना भी मंजूर है। बट अपने आप को खो देना मंजूर नहीं।
54:19
बिल्कुल नहीं। वो एक फॉल्स है धोखा है और बहुत
54:28
पीड़ा है उन धोखों की वो कई जन्मों में समझ आती है। कई जन्म बीत जाते हैं।
54:53
हां जी देखो भैया दो चार साल बाद समझ आया कि आप
54:59
भटक गए हो तो मेरे को नहीं बोलना। हां भाई हां जो भी सुन रहे हो। हां
55:08
हम पहले से ही बता के भटका रहे हैं। हां।
56:32
हां जी आपको ये सब पल नहीं पड़ता होगा ना थोड़ा थोड़ा हां
56:42
हां हम जब 10 बज जाता है रात को सुनते हैं
56:50
तो जब सोने को होता है तो ये कहती हैं कि वो लगा दीजिए वीडियो वो वाला वीडियो वाला मतलब आप वाले वीडियो को वो वाला वीडियो लगा दीजिए
56:59
और हम लोग सो सुनते सुनते कभी-कभी सो भी जाते हैं। कभी पूरा होता है तो बंद भी करते हैं।
57:06
कभी-कभी उसी भाव में सो वो एक हमारा एक घंटे का कोई ना कोई वीडियो आपका हम मेरे साथ कैसा मैं बताऊं?
57:18
मैं रात को थोड़ा कम ही सोता हूं फिजिकली।
57:23
कभी भी उठ जाऊंगा या सोता भी हूं कभी या कम सोता हूं
57:30
तो ऐसा बैठ जाता हूं साइलेंस में कभी मेरे को सुनने का भाव होता है तो अपने
57:38
आप को लगा देता हूं तो अभी वो अहम हरि वाला जो वो है मेडिटेशन
57:45
वो कुछ रातों से मैं रात को वही लगा देता हूं विराज से मैंने मंगाया कि मेरे को MP3 बना
57:53
के भेजो। बोला मैं इनको और मस्त लगा देता हूं। उसमें मेरी आवाज मेरे को इतनी अच्छी लगती है ना।
58:01
हां यानी ओफ वो सुन के भी मेरे को ना और अभी कुछ दिनों
58:09
से बीच-बीच में मैं सुन रहा हूं। वो मेरे को और प्यारा प्यारा लगता है वो।
58:17
हां। वो एक मेडिटेशन कराता हूं मैं यहां हरि ध्यान करके। बहुत मेरे को प्रिय लगता है वो।
58:38
उसमें बोलता हूं मैं कि स्टार्ट होती है ना कि मैं से टेली करें
58:45
और मैं देह मन नहीं
58:52
मैं आत्मा भगवान और फिर मैं जिन तथ्यों को बताने जा रहा हूं उसको मैं से टेली करें
59:05
फिर मैं सर्वज्ञ हूं। मैं सर्वज्ञ हूं।
59:10
इतना प्यारा लगता है ना वो महिमा है। जैसे हम भगवान की महिमा गाते हैं ना। ये मैं
59:18
आत्मा भगवान की महिमा है। मैं व्यापक हूं। अचुत हूं।
59:26
जो भी उसमें चलता है कि यह अहम हरि शिवोह गोविंदो अहम यह अपनी महिमा है।
59:45
आत्म पूजा है बिल्कुल वो। फिर लास्ट में मैं हूं में सेटल होता है।
59:54
वह पूरा चैप्टर फाइनल अपने आप में महिमा भी मैं हूं में समा जाती है।
1:00:02
अपने ही आप में बहुत खूबसूरत है वो हम
1:00:11
और मैं नहीं सुन पाता कुछ और महर्षि मुक्त के ऑडियो तो बहुत कम है। वो
1:00:19
भी नहीं सुनता हूं मैं। ओशो के बहुत है ऑडियो।
1:00:27
वो भी नहीं सुनता हूं मैं। ओशो को भी बहुत समय हो गया सुने मेरे को।
1:00:34
पता नहीं प्रेम है बहुत प्रेम है मेरे को वो एक बोल लो अलग बोल लो जो भी है बट प्रेम तो है
1:00:43
अथा प्रेम है
1:01:10
इतना सहज में संभव हो पाना बगैर गुरु कृपा के असंभव है।
1:01:18
अब वो अपन आत्मा में बोल देते हैं कि यार मैं ही हूं तो कौन किस पर कृपा करेगा? नहीं तब भी कृपा होती है।
1:01:27
है ना? मैं ही हूं तो कृपा भी होती है ना।
1:01:36
गीता हम इतना पढ़ा गीता पढ़ा अष्टव गीता पढ़ा सब
1:01:45
कुछ पढ़ा तो लेकिन मैं मैं हूं कि परिभाषा नहीं जान पाया।
1:01:50
जब मैं हूं कि असली परिभाषा नहीं जान पाया तो हमेशा हमेशा द्वंद लगा।
1:01:55
और वो मैं उन महान ग्रंथों का मैं मुझे कभी-कभी अहंकार जैसा हम
1:02:03
लेकिन जब मैं की परिभाषा मिल गई हम मैं की शाश्वतता मिल गई मैं की सर्वव्यापकता मिल गई तो वहां से अहंकार हट
1:02:11
गया तब वही गीता तब वही अष्टवक्त गीता तब वही चीजें मुझे दूसरे अस्त्र से समझ में आ गया हम
1:02:19
वो बड़ी मैं सामान्य है ना एकदम हां
1:02:28
यही तकलीफ है हमारी कि सत्य अहंकार जैसा लगता है और अहंकार सत्य जैसा लगता है।
1:02:40
हर आदमी तो अहंकार में ही जी रहा है ना अपने व्यक्तित्व में वो सच लग रहा है उसको और असली मैं जो उसी का मैं वो उसको अहंकार
1:02:49
लगता है। जो असली परमात्मा है। यह मेरी माया है। यह असली नकली लगता है और नकली असली लगता है।
1:03:00
अब अब खोजते रहो जिंदगी भर। और हर कोई आपको खींचेगा।
1:03:10
जैसे ही असली की ओर जाओगे ना हर कोई ऐसे टांग खींचेगा। केकड़े जो होते हैं ना एक दूसरे की टांग खींचते हैं। एक बर्तन में
1:03:17
डाल दो। तो नेता जैसे लोग होते हैं ना सब खींचते हैं जो बस वैसा ही है
1:03:26
कि नहीं ये मैं मैं वह गलत है तुम कैसे हो जाओगे भाई? तुम तो इतना
1:03:34
पापवाप किए। क्या नहीं किए हो तुम जिंदगी में? कौन सा कुकर्म नहीं किए हो?
1:03:41
मतलब ऐसे खींचेंगे आपको आपके कर्मों से, आपके पास्ट से और
1:03:48
कई धारणाओं से आपको डाउन ही किया जाएगा।
1:03:59
अरे बुरा हाल कर देते हैं।
1:04:03
और सबसे ज्यादा डाउन जो करता है वो समाज का दोष नहीं है।
1:04:12
गलत गुरु सबसे ज्यादा डाउन करता है।
1:04:16
जो ढोंगी है जिसको खुद भी बोध नहीं है भाई लोग तो
1:04:26
अज्ञान में है उनकी कोई गलती नहीं है या समाज की कोई गलती नहीं होती क्योंकि वह अज्ञान में बोल रहा है जो भी बोल रहा है
1:04:35
लेकिन एक रॉन्ग मास्टर मिल गया वो लगा देगा व्हाट
1:04:54
बहुत ट्रैप्स चलते हैं यहां। बहुत बड़े-बड़े ट्रैप।
1:05:04
इसलिए नासमझ होने के लिए बहुत बुद्धि चाहिए। मालूम जो मैं बोलता हूं नासमझ हो जाओ कुछ जानो
1:05:12
मत कुछ समझो मत इसके लिए यानी श्री गणेश जैसी बुद्धि चाहिए
1:05:19
ऐसे छोटे-मोटे बुद्धि वाला नासमझ नहीं हो पाता जिसका हायर सेंस है जिसके पास खुद की एक
1:05:27
सोच समझ है हां वही हो पाता है ऐसा थोड़ी ना कि कोई भी नालायक आया और बोला मैं नासमझ हो गया ऐसा नहीं होता।
1:05:44
बहुत समझदार ही नासमझ हो पाता है।
1:05:49
और समझदारी का चरम है वो। वो नेगेटिव नहीं है।
1:05:57
अब आपको कुछ ना जानना है ना कुछ समझना है।
1:06:03
वो शिखर है यार। अब आपको ना जानने की जरूरत है ना कुछ समझने की जरूरत है।
1:06:12
क्योंकि अगर आपको कुछ भी जानना समझना है तो आप मूर्ख हो।
1:06:19
असली समझदार वही है जिसको कुछ नहीं समझना है और जिसको कुछ भी समझना है वह समझदार
1:06:27
कैसे कहोगे उसको आप कैसे कह सकते हो भले आपको उसको धर्म समझना
1:06:34
है या दुनिया समझनी है या कुछ भी समझना है अपने आप को समझना है जिसको कुछ भी समझना
1:06:42
है वह समझदार तो हो ही नहीं सकता उसका समझना भी बचा है। उसका जानना बचा है।
1:06:54
असली समझदार वही है जिसको अब कुछ नहीं समझना है। ना कुछ जानना है। वो सीधा बोलता है मैं हूं यार। क्या समझना क्या जानना।
1:07:11
उसके सामने आप भगवान ले आओ, अस्तित्व ले आओ, पावर्स ले आओ। वह बोलेगा ठीक है मैं तो हूं ना। मिल जाए ठीक, नहीं मिल जाए ठीक।
1:07:21
मिलने की लैंग्वेज में जान लूं ठीक, नहीं जान लूं। ठीक। मैं तो हूं ना।
1:07:30
वो निश्चिंत हो जाता है।
1:07:43
मतलब आप में वो सेंस है ही नहीं। यानी जो मैं बोल रहा हूं ना बहुत समझदार ही नासमझ हो हो पाता है। एक बात बताओ अस्तित्व का
1:07:52
भाव दिन में आपको कितने टाइम रहता है?
1:08:00
कुछ मिनट आप साधना भी कर रहे हो तो चलो कुछ घंटे
1:08:07
कि अस्तित्व अस्तित्व चीख रहे हो ठीक है परमात्मा का भाव कितने समय रहता है
1:08:19
कुछ घंटे कुछ मिनट जीव का भाव कितने समय रहता है
1:08:29
सुप्रीम पावर का भाव, अनंत का भाव, अज्ञात का, अव्यक्त का सब थोड़ी-थोड़ी देरी होते हैं ना।
1:08:39
अच्छा मैं का भाव किस समय नहीं होता है यह बताओ।
1:08:47
बताओ ना। तो इतनी समझ तो रखो कि जो चीज नेचुरल परमानेंट है जिसको भाव भी नहीं
1:08:56
करना पड़ता वो असली होगी कि जिसको आप भाव कर रहे हो वह असली होगा
1:09:05
और परमात्मा का भाव खुद को जीव मान के कर रहे हो। अस्तित्व का भाव खुद को व्यक्तित्व मान के कर रहे हो।
1:09:13
व्यक्तित्व ही तो अस्तित्व का भाव करता है ना। नदी ही तो सागर सागर करके चिल्लाती है।
1:09:20
जीव ही परमात्मा कहता है।
1:09:25
सागर थोड़ी ना कहता है कि मेरे को सागर में मिलना है, पहुंचना है।
1:09:37
तो आपका मैं कभी भी नहीं कहता कि मैं को मैं में पहुंचना है। गौर किए हो कभी इस पॉइंट पर।
1:09:46
वह असली है। वह सागर का भी स्वामी है।
1:09:58
कभी भी कहता है क्या मैं को मैं में पहुंचना है। कोई कहता है ऐसे इसमें पूरी पोल खुल जाती है जिंदगी की।
1:10:08
है कि नहीं? तो नाचो यार और क्या?
1:10:15
वही हुआ ना भाई असली चीज वही हुई ना यार सागर जैसा नहीं कहता मैं कहां कहता हूं कि मुझे मैं में मिलना है मैं को पाना है
1:10:26
और मैं को जानना कुछ बेवकूफ लोगों ने बता दिया है वह जानना वरना कुछ नहीं होता है मैं तो सीधा बेवकूफ कहता हूं क्योंकि
1:10:34
थोड़ी भी तारीफ करूंगा फिर फसोगे अरे
1:10:46
खुद को जान के मैं कहते हो कि अनजाने में मैं कहते रहते हो? बचपन से अभी तक खुद को जानते हो तभी तो मैं कहते हो ना। उसमें जानना क्या है?
1:11:03
कभी भी अपने आप को तू वह यह वह कुछ कहते हो क्या? मैं ही कहते हो ना?
1:11:09
आप जानते हो तभी तो मैं कहते हो। हां।
1:11:16
एकदम साफ-साफ क्लियर है यार। मैं एकदम क्लियर हूं।
1:11:29
हां जी।
1:12:26
मैं की वाणी ना वो कोई शब्द नहीं होती। वह मैं ही होता
1:12:35
हूं। यह जो भी शब्द निकले हैं ना, यह मैं ही हूं। यह कोई वाणी नहीं है।
1:12:44
यह मौन भी नहीं है। यह बहुत गहरे यह आत्मा ही है।
1:12:51
हम
1:13:38
अरे वो हनुमान जी ऐसे से छाती फाड़ के सीताराम को दिखाया ना। कितनी सुंदर बात है वो।
1:13:55
अस्तित्व की छाती फाड़ के मैं को प्रकट कर ही देता हूं मैं। हां।
1:14:03
कैसे मैं ही हूं तो कैसे नहीं होगा? सीधी बात है।
1:14:26
और छातीवाती भी क्या फाड़ना है यार। एकदम सिंपल है ये। सहज है।
1:14:33
कितना सरल हूं मैं और सहज हूं मैं।
1:14:42
और एक बात बताओ जो अपने पर भरोसा नहीं कर सका आप कैसे विश्वास करो कि वो किसी भगवान
1:14:49
पे किसी अस्तित्व पे या किसी मनुष्य पर भरोसा कर सकता है कर सकता है क्या जो अपने पे ही भरोसा ना
1:14:59
कर सका वो किसी पे भरोसा कर ही नहीं सकता ये केवल एक धोखा है एक भ्रम है तुम जी
1:15:07
लेते हो बस सहारे ढूंढ-ढूंढ के।
1:15:15
अरे मैं मैं जी और मैं सबका सहारा है। हर कोई मैं के सहारे है ना।
1:15:21
कोई भी देवता हो उसकी आत्मा भी तो मैं है ना। कोई मनुष्य हो, कोई भी हो।
1:15:32
तो मैं के सहारे हर कोई है। पूरा चराचर है और वह मैं आप हो ही सहज में वही मैं हूं।
1:15:47
अब क्या करोगे?
1:16:43
हम
1:17:35
जिसको कोई भी त्याग नहीं सकता वही असली भगवान होता है।
1:17:45
जिसको कोई भी त्याग नहीं सकता।
1:17:49
आप सब त्याग सकते हो अपने माने हुए भगवान कल्पना के
1:17:55
अपने गुरु को भी त्याग सकते हो। लास्ट में आप सब कुछ त्याग सकते हो।
1:18:06
बाकी चीजें तो छोटी-छोटी है। लेकिन अपने आप को त्याग
1:18:15
कैसे त्यागोगे यार
1:18:29
जिसका त्याग होता ही नहीं
1:18:39
और जिसका भोग भी नहीं होता अपना भोग थोड़ी ना करोगे ऐसे दो होके अपने में जाओगे।
1:18:48
एक मैं भोगने वाला और एक मैं जिसको भोगा जा रहा है। ऐसा नहीं होता।
1:18:55
तो ना त्याग ना भोग वही असली परमात्मा है। वही वही तो मैं हूं।
1:19:28
तो अपने आप को आप क्या नहीं मानते हो?
1:19:34
दुनिया भर का मानते हो। बॉडी माइंड ये वो ये आप प्रयास करते हो अपने आप को त्यागने
1:19:42
का मान मान के फिर भी नहीं त्याग सकते
1:19:50
कोई नहीं त्याग सकता यार अपने आप मुक्ति को भी त्याग दोगे बंधन त्याग दोगे
1:19:59
अपने आप को नहीं त्याग सकते
1:20:08
तो गोपियां ऐसे भगा देती थी मुक्ति को सालोक के सायोज बहुत किस्म की मुक्तियां
1:20:15
होती है कृष्ण की सेवा में ना वो सारी मुक्तियों को भगा देती थी डिस्टर्ब मत करो
1:20:23
करके क्योंकि उनको पता है इनको त्यागा जा सकता है मुक्तियों को भी लेकिन आत्मा
1:20:30
कृष्ण ना बस उसी में डूबे रहते थे।
1:20:51
और हम एक बात बुरी लगेगी थोड़ी सी बट हम इतने मूढ़ हैं
1:21:01
कुछ ज्यादा ही मूढ़ हैं कि हम अपने आप को पुरानी स्टोरियों से क्लियर करना चाहते हैं।
1:21:12
पुराने संतों से, उससे, इससे और उससे जो हमसे क्लियर हो रहे हैं, हम उनसे क्लियर होना चाह रहे हैं।
1:21:24
जो किताब आपने पढ़ी है, अब आप उस किताब से खुद को कैसे क्लियर करोगे? वो किताब तो आपसे क्लियर हुई ना। कि उसमें यह हुआ, वह हुआ, वह हुआ जो भी है।
1:21:37
पास्ट में वो हुए थे, वह हुए थे, यह मिले थे। अरे क्या कर रहे हो यार?
1:21:47
अपनीेंस पहचानो। अपनी महत्ता का ध्यान रखो।
1:21:56
देन फिर आपसे भिन्न तो कुछ है ही नहीं।
1:22:11
और अपने आप में आपको क्लिटी है ना तो फिर देन आता ही नहीं है।
1:22:19
लाइफ से देन खत्म हो जाता है।
1:22:25
आप आत्मनस्टिक हुए तो देन फिर खत्म।
1:22:38
तो इतना तो बहुत है यार इनफ फॉर फॉर एवर
1:22:46
या एनी डिमांड्स खिलाओ पिलाओ यार नहीं वो खिलाओ ड्राई फ्रूट खिलाओ यार
1:22:58
हां जी थैंक यू
1:23:31
हम
1:24:15
और यस एनीबडी है कोई
1:24:36
जो मेरे इस झूठ को भी स्वीकार कर लेना चाहे प्रेम से
1:24:52
यहां दिखाओ यार मैं कहूं यार डंडा
1:25:00
डंडा सच है लकड़ी झूठ है। है ना?
1:25:07
और मेरे को यह झूठ पसंद है कि यह लकड़ी है। तो क्या दिक्कत है?
1:25:24
मेरे को मैं पसंद हूं यार। तुम अपनी जानो। है ना?
1:25:31
मेरे को मैं पसंद हूं। और मेरे को ना मैं बहुत ज्यादा पसंद हूं। मैं बता नहीं सकता।
1:25:40
यह अस्तित्व दुनिया भगवान जो भी है मैं उससे भी ज्यादा पसंद हूं अपने आप को ये
1:25:49
जितने भी बुद्ध पुरुष है ना तुम्हारे तुम रखो अपने पास
1:25:54
सम्मान करता हूं मैं लेकिन पसंद ना
1:26:01
मेरे को तो मैं ही पसंद हूं बस अब मैं की करा
1:26:15
अपनी चॉइस आप जानो हम अपनी बता दी ओके इनफ फॉर फॉर एवर बहुत सारा प्यार मस्त
1:26:25
रहो प्रेम प्रणाम प्रणाम